भारत में धर्मनिरपेक्षता और यूनिफॉर्म सिविल कोड (भाग-1) | 02 Jan 2018

संदर्भ

  • हाल ही सत्ताधारी दल के एक बड़े नेता द्वारा कथित तौर पर यह कहा गया है कि “हम भारत का संविधान बदल देंगे, क्योंकि धर्मनिरपेक्षता से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है।”
  • हालाँकि, बाद में वे अपने बयान से मुकर गए लेकिन धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान का वह मूल-लक्षण है जिससे मुकरा नहीं जा सकता है।
  • भले ही संविधान की प्रस्तावना में इसे बाद में जोड़ा गया हो, लेकिन शुरू से ही भारतीय संविधान का चरित्र धर्मनिरपेक्ष रहा है। आज़ादी के बाद कुछ वर्षों में भारत में धर्मनिरपेक्षता अक्षुण्ण रही है।
  • लेकिन, यूनिफॉर्म सिविल कोड का बहाल न हो पाना और बाबरी से लेकर दादरी तक कुछ ऐसी घटनाएँ घटी हैं जो भारत के एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होने पर सवाल खड़ा कर रही हैं।

इस लेख में हम भारत में धर्मनिरपेक्षता और यूनिफॉर्म सिविल कोड से संबंधित पहलुओं पर चर्चा करेंगे।

धर्मनिरपेक्षता के संबंध में महान नेताओं के विचार

Secularism in India

  • महात्मा गांधी के विचार:
    ⇒ महात्मा गांधी अपने निजी और सार्वजनिक दोनों जीवन में एक धार्मिक व्यक्ति थे और वे राजनीति और धर्म के मध्य नज़दीकी संबंध के हिमायती थे।
    ⇒ गांधी राजनीति को नैतिकता के मूल्यों पर आधारित करना चाहते थे और उनके नैतिकता के मूल्य धार्मिक रंग में रंगे हुए थे।
  • पंडित नेहरू के विचार:
    ⇒ नेहरू गांधी के उलट राजनीति व धर्म के बीच किसी भी प्रकार का कोई भी संबंध रखने के खिलाफ थे। वे धर्मनिरपेक्षता को भारतीय स्वभाव में समायोजित करना चाहते थे।
    ⇒ लेकिन दोनों नेता भारत जैसे बहुलवादी देश में धर्मनिरपेक्षता को विभिन्न धर्मों के बीच सद्भाव स्थापित करने का एक सशक्त माध्यम मानते थे।
  • डॉ. अंबेडकर  के विचार:
    ⇒ अंबेडकर  मानते थे कि प्रारंभ में तो अल्पसंख्यकों के आस्तित्त्व को मान्यता दी जानी चाहिये। किन्तु हल ऐसा होना चाहिये कि अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक आगे चलकर एक दिन एक-दूसरे में घुल-मिल जाएँ।

संविधान और धर्मनिरपेक्षता

Secularism in India

  • पश्चिमी देशों की धर्मनिरपेक्षता से भिन्न:
    ⇒ भारत में एक राष्ट्र के तौर पर धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है, सरकार की सभी धर्मों से एक समान दूरी बनाए रखना। दरअसल, यह पश्चिम के देशों और अमेरिका आदि की धर्मनिरपेक्षता से काफी अलग है।
    ⇒ भारत और पश्चिम की धर्मनिरपेक्षता के मध्य विद्यमान अंतर को हम एक उदहारण के माध्यम से समझ सकते हैं।
    ⇒ यदि पश्चिम के किसी देश में चर्च की कोर कमेटी द्वारा यह तय कर दिया जाए कि आगे से कोई महिला प्रिस्ट नहीं बन सकती तो सरकार और न्यायालय इन मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकते।
    ⇒ जबकि यदि भारत में कोई मठ या मंदिर किसी महिला सदस्य को महंत बनाने से इनकार करता है तो सरकार और न्यायालय इन मामलों में हस्तक्षेप कर सकते हैं।
  • संविधान में धर्मनिरपेक्षता का उल्लेख:
    ⇒ धर्मनिरपेक्षता शब्द का प्रयोग भारतीय संविधान के किसी भाग में नहीं किया गया था, लेकिन संविधान में कई ऐसे अनुच्छेद मौज़ूद थे जो भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य बनाते हैं।
    ⇒ मसलन संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत देश के सभी नागरिक कानून की नज़र में एक समान हैं।
    ⇒ वहीं अनुच्छेद 15 के तहत धर्म, जाति, नस्ल, लिंग और जन्म स्थल के आधार पर भेदभाव पर पाबंदी लगाई गई है।
    ⇒ अनुच्छेद 16 के तरह तक सार्वजनिक रोज़गार के क्षेत्र में सबको एक समान अवसर प्रदान करने की बात की गई है। (कुछ अपवादों के साथ)
    ⇒ भारतीय संविधान में धर्मनिरपेक्षता शब्द की बजाय पंथनिरपेक्ष शब्द का प्रयोग 1976 में 42वें संविधान संशोधन के द्वारा संविधान की प्रस्तावना में शामिल किया गया है।
    ⇒ संविधान के अधीन भारत एक पंथनिरपेक्ष राज्य हैं, ऐसा राज्य जो सभी धर्मों के प्रति तटस्थता और निष्पक्षता का भाव रखता है।
    ⇒ संविधान में भारतीय राज्य का कोई धर्म घोषित नही किया गया है और न ही किसी खास धर्म का समर्थन किया गया है।
  • मूल अधिकार और धर्मनिरपेक्षता:
    ⇒ भारतीय संविधान निर्माताओं ने मूल अधिकारों के अंतर्गत बहुत से ऐसे प्रावधान किये हैं, जो राज्य की धर्मनिरपेक्ष प्रकृति को बढ़ावा देते हैं।
    ⇒ संविधान के अनुच्छेद 25 में प्रत्येक व्यक्ति को अपने धार्मिक विश्वास और सिद्धांतों का प्रसार करने या फैलाने का अधिकार है।
    ⇒ अनुच्छेद 26 धार्मिक संस्थाओं की स्थापना का अधिकार देता है। इसके अलावा अनुच्छेद 27 कहता है कि नागरिकों को किसी विशिष्ट धर्म या धार्मिक संस्था की स्थापना या पोषण के एवज में कर देने के लिये बाध्य नहीं किया जा सकता।
    ⇒ अनुच्छेद 28 कहता है कि राज्य की आर्थिक सहायता द्वारा चलाए जा रहे शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक शिक्षा नही दी जाएगी।
    ⇒ जबकि संविधान का अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यक समुदायों को स्वयं के शैक्षणिक संस्थान खोलने एवं उन पर प्रशासन का अधिकार देता है।
  • भारत में धर्मनिरपेक्षता का स्वरूप:
    ⇒ भारतीय धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा अमेंरिका की तरह धर्म और राज्य के बीच अलगाव पर आधारित नही है।
    ⇒ भारत की धर्मनिरपेक्षता न तो पूरी तरह धर्म के साथ जुड़ी है और न ही इससे पूरी तरह तटस्थ है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता के इन मूल्यों को ही सैद्धान्तिक अंतर के रूप में बताया गया है।
    ⇒ गौरतलब है कि भारत के सुप्रीम कोर्ट ने केशवानंद मामले में दिए अपने निर्णय में धर्मनिरपेक्षता को भारत की आधारभूत संरचना का हिस्सा माना है।

यूनिफॉर्म सिविल कोड: धर्मनिरपेक्षता के लिये एक बड़ी चुनौती

  • जब देश धार्मिक तौर पर एक है तो सबके लिये एक समान कानून क्यों नहीं है? दरअसल, यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता आज तक बहल नहीं हो पाई है और एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के तौर पर यह देश की सबसे बड़ी चुनौती है।
  • देश के प्रमुख धार्मिक समुदायों के ग्रंथों, रीति-रिवाज़ो और मान्यताओं के आधार पर बनाए गए व्यक्तिगत कानूनों के स्थान पर भारत के सभी नागरिकों के लिये एक समान संहिता बनाने को ही यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता कहते हैं।

यूनिफॉर्म सिविल कोड आवश्यक क्यों ?

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  • सभी को बराबरी का दर्ज़ा:
    ⇒ एक आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य का यह उत्तरदायित्व है कि वह विभिन्न जाति, धर्म, वर्ग और लिंग से संबंध रखने वाले अपने सभी नागरिकों के लिये एक समान नागरिक और व्यक्तिगत कानून का निर्माण करें।
  • लैंगिक समानता की बहाली:
    ⇒ आमतौर पर यह देखा गया है कि लगभग सभी धर्मों के व्यक्तिगत कानून महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण हैं।
    ⇒ पुरुषों को उत्तराधिकार और विरासत के मामले में तरज़ीह दी जाती है। ऐसे में, यूसीसी पुरुषों और महिलाओं दोनों को समानता के स्तर पर लाने में सहायक होगा।
  • नव-भारत की आकांक्षाओं की पूर्ति:
    ⇒ दरअसल, समकालीन भारत पूरी तरह से एक नया समाज है, जिसमें आधे से भी अधिक आबादी 25 वर्ष से कम उम्र के लोगों की है।
    ⇒ भारत के इस नौजवान वर्ग की सामाजिक चेतना को समानता, मानवता और आधुनिकता के सार्वभौमिक और वैश्विक सिद्धांतों ने आकार दिया है।
    ⇒ यूनिफॉर्म सिविल कोड इस चेतना को और भी मज़बूत बनाएगा।
  • राष्ट्र की एकता और अखंडता की सुरक्षा:
    ⇒ सभी भारतीय नागरिकों को कानूनों द्वारा एक समान सरंक्षण प्राप्त है, क्योंकि आपराधिक कानून और अन्य नागरिक कानून सभी के लिये समान हैं।
    ⇒ यदि यूसीसी लागू होता है तो किसी विशेष समुदाय को रियायतें या अन्य विशेषाधिकारों के मुद्दों पर राजनीति की कोई संभावना नहीं होगी, जिससे देश की एकता और अखंडता अक्षुण्ण रहेगी।

यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू कर पाना मुश्किल क्यों?

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  • देश की सांस्कृतिक विविधता के कारण व्यावहारिक कठिनाइयाँ:
    ⇒ भारत के सभी धर्मों, संप्रदायों, जातियों, राज्यों आदि में व्यापक सांस्कृतिक विविधता देखने को मिलती है।
    ⇒ यही कारण है कि विवाह जैसे व्यक्तिगत मुद्दों पर आम और एक समान राय बनाना व्यावहारिक रूप से कठिन है।
    ⇒ उदाहारण के लिये, हिन्दू धर्म में विवाह को जहाँ एक संस्कार माना जाता है, वहीं मुस्लिम धर्म इसे 'संविदा' (Contract) मानता है।
  • धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का अतिक्रमण:
    ⇒ भारत में बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक तबका और उनका प्रतिनिधित्व करने वाली संस्थाओं का मानना है कि यूसीसी उनके धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन होगा।
    ⇒ दरअसल, ऐसा इस मुद्दे के राजनीतिकरण के कारण हुआ है। दक्षिणपंथी विचारधारा के उग्र समर्थकों का विचार यह है कि अल्पसंख्यक समुदाय की सभी समस्याओं की जड़ उनके पर्सनल लॉज़ ही हैं।
    ⇒ जबकि, उन्हें वोट बैंक मानने वाली पार्टियाँ इस संबंध में तुष्टीकरण की नीतियों का पालन करती रहीं हैं, जिससे कट्टरपंथी वर्ग फल-फूल रहा है।
  • एक संवेदनशील और मुश्किल कार्य:
    ⇒ यदि यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने का निर्णय ले भी लिया गया तो इसे समग्र रूप देना आसान नहीं होगा।
    ⇒ इसके लिये न्यायालय को व्यक्तिगत मामलों से संबंधित सभी पहलुओं पर विचार करना होगा।
    ⇒ विवाह, तलाक, पुनर्विवाह आदि जैसे मसलों पर किसी धर्म विशेष की भावनाओं को ठेस पहुँचाए बिना कानून बनाना आसान काम नहीं है।