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विधि निर्माण के सुधार में न्यायपालिका की भूमिका | 08 Sep 2021 | भारतीय राजनीति

यह एडिटोरियल दिनांक 06/09/2021 को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित ‘The judicial role in improving lawmaking’ लेख पर आधारित है। इसमें विधि निर्माण की वर्तमान प्रक्रिया के समक्ष विद्यमान समस्याओं की चर्चा की गई है और विचार किया गया है कि इस विषय में न्यायिक हस्तक्षेप किस प्रकार भविष्य की राह प्रदान कर सकता है।

समय के साथ संसद में होने वाली बहसों की गुणवत्ता में आई गिरावट ने विभिन्न हितधारकों की ओर से सुधार की माँग को प्रेरित किया है। हाल ही में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने भी इस समस्या पर प्रकाश डाला और माना कि सार्थक विचार-विमर्श के बिना पारित कानूनों में मौजूद अस्पष्टताएँ और अंतराल परिहार्य मुकदमेबाजी को अवसर देते हैं।    

जबकि CJI ने यह सुझाव दिया कि विचार-विमर्श की गुणवत्ता में सुधार के लिये अधिवक्ताओं और बुद्धिजीवियों को सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करना चाहिये, स्वयं न्यायपालिका विधि निर्माण की प्रक्रिया में सुधार की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

विधायी प्रक्रिया के साथ संबद्ध समस्याएँ

न्यायपालिका की भूमिका

निष्कर्ष

भारतीय न्यायपालिका ने प्रायः यह प्रदर्शित किया है कि अन्य संस्थानों में व्याप्त शिथिलता को संबोधित कर लोकतंत्र को समृद्ध करना संभव है। विधायी प्रक्रिया की समीक्षा के लिये एक त्वरित और व्यवस्थित दृष्टिकोण अपनाकर न्यायपालिका संसद में भरोसे की पुनर्बहाली में मदद कर सकती है और हमें उस औचित्य की संस्कृति की ओर आगे बढ़ा सकती है जिसकी परिकल्पना संविधान में की गई है।

अभ्यास प्रश्न: विधायी प्रक्रिया की समीक्षा के लिये एक त्वरित और व्यवस्थित दृष्टिकोण अपनाकर न्यायपालिका संसद में भरोसे की पुनर्बहाली में मदद कर सकती है। चर्चा कीजिये।