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असहमति का अधिकार | 24 Feb 2021 | भारतीय राजनीति

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति के अधिकार का महत्त्व व इससे संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ: 

हाल ही में देश में किसानों द्वारा किये जा रहे विरोध प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में सर्वोच्च न्यायालय में पिछले वर्ष दिल्ली के शाहीन बाग क्षेत्र में हुए विरोध प्रदर्शनों पर एक समीक्षा याचिका दायर की गई है। न्यायालय ने अपने पूर्व के फैसले की समीक्षा करने से इनकार कर दिया, जिसमें कहा गया था कि किसी व्यक्ति को विरोध करने का पूर्ण/अनिवार्य अधिकार नहीं है और यह स्थान तथा समय के संदर्भ में प्राधिकारी के आदेशों के अधीन हो सकता है।

यह राज्य की सुरक्षा, स्वतंत्रता और उत्तरदायित्त्व तथा नैतिकता के बीच की रस्साकशी पर एक बार पुनः हमारा ध्यान आकर्षित करता है। जहाँ एक तरफ यह सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वह यह सुनिश्चित करे की कोई भी विरोध प्रदर्शन हिंसक अराजकता में न बदलने पाए। वहीं दूसरी तरफ सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक समाज की पहचान हैं, जो यह मांग करता है कि सत्ता में बैठे लोगों द्वारा आम जनता की आवाज़ सुनी जानी चाहिये तथा उचित चर्चा और परामर्श के बाद निर्णय लिये जाने चाहिये। 

इस दुविधा के बावजूद भारतीय समाज के लोकतांत्रिक ताने-बाने को संरक्षित करने के लिये देश के लोकतांत्रिक प्रणाली से जुड़े हितधारकों का यह उत्तरदायित्त्व है कि संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत प्रदान किये गए स्वतंत्रता के किसी भी अधिकार को गंभीर रूप से क्षति नहीं पहुँचनी चाहिये।  

असहमति का महत्त्व: 

असहमति के अधिकार की चुनौतियाँ:  

सरकार के प्रस्तावों या निर्णयों को चुनौती देने के लिये की गई कोई भी सार्वजनिक कार्रवाई तब तक ही संवैधानिक रूप से वैध है, जब तक कि यह शांतिपूर्वक ढंग से की जाती है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(2) लोगों के बगैर हथियार के और शांतिपूर्वक इकट्ठा होने के अधिकार पर पर्याप्त प्रतिबंध लगाता है।

ये प्रतिबंध भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता या नैतिकता या न्यायालय की अवमानना, या उकसावे आदि मामलों में लगाए जा सकते हैं।

आगे की राह:  

निष्कर्ष: 

सार्वजनिक विरोध में भाग लेने के लिये वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता,  समूह बनाने  और शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने का अधिकार बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। इस संदर्भ में सार्वजनिक रूप से चर्चा करने की आवश्यकता है, अब समय आ गया है जब अनुच्छेद 19 (2) में उल्लिखित उचित प्रतिबंधों को समीक्षा के तहत लाया जाना चाहिये।

अभ्यास प्रश्न:  शांतिपूर्ण प्रदर्शन की स्वतंत्रता लोकतांत्रिक प्रणाली का एक अनिवार्य तत्त्व है और विचारों की अभिव्यक्ति तथा उनके प्रसार के लिये सार्वजनिक सड़कें ‘प्राकृतिक’ एवं सबसे उपयुक्त स्थान हैं। आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिये।