अंतर्राष्ट्रीय संबंध
भारत और दक्षिण कोरिया के संबंधों का पुनरुत्थान
- 24 Apr 2026
- 182 min read
यह एडिटोरियल 21/04/2026 को द बिज़नेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित “Chips to ships: South Korea, India must collaborate in additional sectors” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख भारत-दक्षिण कोरिया संबंधों के बहुआयामी विकास का विश्लेषण करता है, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली से लेकर महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकी एवं समुद्री सहयोग तक की रणनीतिक प्रगति पर प्रकाश डाला गया है। यह साझेदारी में बाधा उत्पन्न करने वाली चुनौतियों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है तथा संतुलित एवं विशेष रणनीतिक समन्वय प्राप्त करने हेतु व्यावहारिक उपायों का भी प्रस्ताव करता है।
प्रिलिम्स के लिये: एक्ट ईस्ट पॉलिसी, व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (सीईपीए), इंडो-पैसिफिक महासागर पहल।
मेन्स के लिये: भारत-दक्षिण कोरिया संबंधों का विकास, भारत के लिये महत्त्व, प्रमुख बाधाएँ, आवश्यक उपाय।
भारत–दक्षिण कोरिया संबंध, जिन्हें वर्ष 2015 में विशेष रणनीतिक साझेदारी का दर्जा प्रदान किया गया था, बदलते इंडो-पैसिफिक भू-राजनीतिक परिदृश्य के बीच पुनः गति प्राप्त कर रहे हैं। द्विपक्षीय व्यापार वर्ष 2024-25 में 27 अरब डॉलर से अधिक हो गया, जबकि विनिर्माण और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्रों में दक्षिण कोरियाई प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) वर्ष 2000 से अब तक 8 अरब डॉलर से अधिक हो चुका है। सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स, हुंडई मोटर कंपनी और LG इलेक्ट्रॉनिक्स सहित 600 से अधिक कोरियाई कंपनियाँ भारत में कार्यरत हैं, जिससे दक्षिण कोरिया 'मेक इन इंडिया' पहल का एक महत्त्वपूर्ण साझेदार बन गया है। चिप्स से शिप्स निर्माण (chips to shipbuilding) तक यह संबंध अब व्यापार-आधारित सहभागिता से आगे बढ़कर रणनीतिक प्रौद्योगिकी सहयोग एवं आपूर्ति-शृंखला समन्वय तक विस्तारित हो चुका है।
समय के साथ भारत-दक्षिण कोरिया संबंधों में किस प्रकार बदलाव आया?
भारत और दक्षिण कोरिया (रिपब्लिक ऑफ कोरिया–ROK) के बीच संबंध प्रारम्भ में दूरस्थ एवं वैचारिक रूप से सीमित संपर्क से विकसित होकर आज एक विशेष रणनीतिक साझेदारी का रूप ले चुके हैं।
- चरण I: शीत युद्ध और वाणिज्य दूतावास की शुरुआत (1950-1990 का दशक): मानवीय तटस्थता का युग
- कोरियाई युद्ध (1950–53): भारत ने तटस्थ मध्यस्थ की भूमिका निभाते हुए 60वीं पैराशूट फील्ड एम्बुलेंस तैनात की, जिसने लगभग 2,20,000 रोगियों का उपचार किया तथा युद्धबंदियों के प्रबंधन हेतु न्यूट्रल नेशन्स रिपैट्रिएशन कमीशन (NNRC) की अध्यक्षता की।
- औपचारिक संबंध: वर्ष 1962 में वाणिज्य दूतावास संबंध स्थापित किये गए, जिसके बाद दिसंबर 1973 में पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित हुए।
- आर्थिक सीमाएँ: इस अवधि के दौरान, भारत की बंद अर्थव्यवस्था और दक्षिण कोरिया का पश्चिमी गुट के साथ जुड़ाव होने के कारण संबंध सीमित व्यापार एवं सांस्कृतिक स्तर तक ही सीमित रहे।
- चरण II: चरण II: आर्थिक परिवर्तन (1991–2009) – ‘लुक ईस्ट’ एवं औद्योगिक प्रवेश का युग
- लुक ईस्ट नीति: वर्ष 1991 के आर्थिक सुधारों के साथ भारत की लुक ईस्ट नीति और दक्षिण कोरियाई चैबोल्स के नए बाज़ारों की खोज ने संबंधों को गति दी।
- बड़ी कंपनियों का प्रवेश: इस चरण में हुंडई, LG और सैमसंग ने भारतीय बाज़ार में प्रवेश किया, जिससे औद्योगिक सहयोग मज़बूत हुआ।
- नीति का संस्थागतकरण: वर्ष 1996 में, द्विपक्षीय सहयोग के लिये संयुक्त आयोग की स्थापना की गई, जिससे ध्यान 'राजनयिक औपचारिकता' से हटकर 'आर्थिक आवश्यकता' पर केंद्रित हो गया।
- चरण III: रणनीतिक परिपक्वता (2010-2022): व्यापार से सुरक्षा की ओर संक्रमण
- CEPA और रणनीतिक साझेदार: वर्ष 2010 में इस संबंध को रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक उन्नत किया गया तथा व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA) लागू हुआ, जिससे व्यापार में तीव्र वृद्धि हुई।
- विशेष रणनीतिक साझेदारी (2015): भारतीय प्रधानमंत्री की सियोल यात्रा के दौरान, संबंधों को विशेष रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक उन्नत किया गया।
- ‘एक्ट ईस्ट’ एवं ‘NSP’ का अभिसरण: भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी तथा राष्ट्रपति मून जे-इन की न्यू सदर्न पॉलिसी (NSP) के बीच स्वाभाविक समन्वय एवं सामंजस्य स्थापित हुआ।
- चरण IV: एकीकृत भविष्य: 'चिप्स से शिप्स तक' एवं इंडो-पैसिफिक युग
- GPS रणनीति: दक्षिण कोरिया की वर्ष 2022 की इंडो-पैसिफिक रणनीति तथा उसका ग्लोबल पिवटल स्टेट (GPS) बनने का लक्ष्य, भारत के एक क्षेत्रीय नेतृत्वकर्त्ता के रूप में उभरने के साथ पूर्णतः सुसंगत है।
- राष्ट्रपति ली जे-म्यॉन्ग की यात्रा (अप्रैल 2026): इस यात्रा ने उच्च प्रौद्योगिकी आधारित सहयोग की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण बदलाव को चिह्नित किया। इसके प्रमुख क्षेत्र निम्नलिखित हैं-
- सेमीकंडक्टर: असेंबली आधारित उत्पादन से आगे बढ़कर सुदृढ़ एवं अनुकूलित चिप आपूर्ति-शृंखला का निर्माण।
- जहाज़ निर्माण: दक्षिण कोरियाई विशेषज्ञता के माध्यम से भारतीय शिपयार्डों का आधुनिकीकरण।
- AI एवं महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकी: उभरती प्रौद्योगिकियों पर केंद्रित एक आर्थिक सुरक्षा संवाद की स्थापना।
- व्यापार लक्ष्य: वर्ष 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 50 अरब डॉलर तक पहुँचाने का नया लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
भारत के लिये दक्षिण कोरिया का क्या महत्त्व है?
- सेमीकंडक्टर आपूर्ति शृंखला का अनुकूलन: भारत अपनी महत्त्वपूर्ण आपूर्ति शृंखलाओं के जोखिम को कम करने तथा पूर्ण तकनीकी संप्रभुता प्राप्त करने हेतु दक्षिण कोरिया की तकनीकी क्षमता का रणनीतिक रूप से लाभ उठा रहा है।
- यह गठबंधन भारत के औद्योगिक परिवर्तन को गति प्रदान करता है, जिससे वह उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली (उत्पादन) से एक उच्च-मूल्य, आत्मनिर्भर वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में रूपांतरित हो सके।
- राष्ट्रपति ली जे-म्यॉन्ग की अप्रैल 2026 की यात्रा के दौरान, भारत की 76,000 करोड़ रुपये की सेमीकंडक्टर PLI योजना के पूरक के रूप में ‘चिप्स से शिप्स’ ढाँचे को अत्यधिक प्राथमिकता दी गई।
- इसके परिणामस्वरूप, सैमसंग जैसी दक्षिण कोरियाई कंपनियाँ भारत के उभरते चिप निर्माण पारिस्थितिकी तंत्र में गहराई से एकीकृत होने हेतु नोएडा स्थित संयंत्र से परे अपने परिचालन का सक्रिय रूप से विस्तार कर रही हैं।
- समुद्री सुरक्षा तथा नौसेना अवसंरचना: यह द्विपक्षीय गठबंधन दक्षिण कोरिया की विश्व-अग्रणी जहाज़ निर्माण क्षमताओं को भारत की तटीय रणनीतिक आवश्यकताओं के साथ जोड़कर, हिंद-प्रशांत समुद्री सुरक्षा के लिये एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ का कार्य करता है।
- यह सहयोग एक भू-राजनीतिक सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करता है, जिसका उद्देश्य महत्त्वपूर्ण समुद्री संचार मार्गों (SLOC) को किसी भी प्रकार के एकाधिकार नियंत्रण से सुरक्षित रखना है।
- वर्ष 2026 के ‘भविष्य-उन्मुख साझेदारी’ रोडमैप का लक्ष्य दक्षिण कोरिया की उन्नत समुद्री इंजीनियरिंग विशेषज्ञता के माध्यम से भारतीय शिपयार्डों का आधुनिकीकरण करना है।
- यह बुनियादी ढाँचा संवर्द्धन प्रयास दक्षिण चीन सागर में बढ़ते संयुक्त नौसैनिक अभ्यासों तथा साझा खुफिया ढाँचे पर आधारित है।
- रक्षा विनिर्माण का स्वदेशीकरण: भारत-दक्षिण कोरिया रक्षा संबंध अब एक पारंपरिक लेन-देन आधारित क्रेता–विक्रेता मॉडल से विकसित होकर एक रणनीतिक सह-विकास एवं स्थानीयकृत विनिर्माण ढाँचे में रूपांतरित हो चुके हैं।
- यह परिवर्तन सीधे तौर पर ‘मेक इन इंडिया’ पहल को सशक्त बनाता है तथा पारंपरिक एवं अनिश्चित रक्षा आपूर्तिकर्त्ताओं पर नई दिल्ली की निर्भरता को उल्लेखनीय रूप से कम करता है।
- दक्षिण कोरिया की हनवा डिफेंस और भारत की एल एंड टी (L&T) द्वारा K-9 वज्र स्व-चालित हॉवित्जर का स्थानीय उत्पादन इस सहयोग का एक प्रमुख मानदंड (benchmark) है।
- आर्थिक एकीकरण और व्यापार पुनर्संतुलन: दोनों देश पारस्परिक विकास सुनिश्चित करने तथा भारत के ऐतिहासिक द्विपक्षीय व्यापार घाटे को संरचनात्मक रूप से कम करने हेतु अपने आर्थिक संबंधों का सक्रिय पुनर्गठन कर रहे हैं।
- यह आर्थिक एकीकरण वैश्विक आपूर्ति शृंखला में आने वाले व्यवधानों एवं बाज़ार अस्थिरता के विरुद्ध एक साझा व्यापक आर्थिक सुरक्षा कवच का निर्माण करता है।
- भारत और दक्षिण कोरिया ने हाल ही में वर्ष 2030 तक 50 अरब डॉलर द्विपक्षीय व्यापार लक्ष्य प्राप्त करने की एक महत्त्वाकांक्षी योजना की घोषणा की है।
- यह लक्ष्य मुख्यतः व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (CEPA) के उन्नयन हेतु चल रही तीव्र वार्ताओं पर आधारित है, जिसके वर्ष 2027 तक पूर्ण होने की संभावना है।
- हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भू-राजनीतिक अभिसरण: भारत के ‘विकसित भारत’ के रूप में उदय तथा दक्षिण कोरिया के स्वयं को ‘वैश्विक प्रमुख राज्य’ के रूप में स्थापित करने के सिद्धांत के बीच एक सशक्त रणनीतिक अभिसरण परिलक्षित होता है।
- ये दोनों राष्ट्र मिलकर एशिया में क्षेत्रीय वर्चस्व एवं एकतरफा क्षेत्रीय विस्तार के विरुद्ध एक स्थिर लोकतांत्रिक प्रतिसंतुलन के रूप में कार्य करते हैं।
- अप्रैल 2026 की उच्च स्तरीय वार्ता में स्पष्ट रूप से एक स्वतंत्र, खुली एवं नियम-आधारित इंडो-पैसिफिक संरचना के लिये साझा दृष्टिकोण की पुष्टि की गई।
- यह गठबंधन औपचारिक रूप से दक्षिण कोरिया के राजनयिक ढाँचे को भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ के साथ समेकित करता है, जिससे साझा लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित एक एकीकृत मंच निर्मित होता है।
- महत्त्वपूर्ण एवं उभरती प्रौद्योगिकियों (CET) में प्रभुत्व: महत्त्वपूर्ण एवं उभरती प्रौद्योगिकियों पर सहयोग यह सुनिश्चित करता है कि दोनों राष्ट्र तेज़ी से विकसित हो रही डिजिटलीकृत 21वीं सदी की वैश्विक अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्द्धी एवं सुरक्षित बने रहें।
- यह साझा तकनीकी सुरक्षा कवच शत्रुतापूर्ण साइबर खतरों तथा भविष्य-उन्मुख प्रौद्योगिकियों के विदेशी एकाधिकार से रक्षा हेतु निर्मित किया गया है।
- दोनों देशों ने ‘भारत-कोरिया डिजिटल ब्रिज’ को आगे बढ़ाया, जिसमें AI, डेटा गवर्नेंस एवं डिजिटल व्यवसायों में सहयोग पर विशेष ध्यान दिया गया, साथ ही सेमीकंडक्टर जैसी सक्षम प्रौद्योगिकियों की भूमिका को भी मान्यता दी गई।
- अप्रैल 2026 की उच्च स्तरीय वार्ता में दोनों नेताओं ने AI के साझा दृष्टिकोण की सराहना की, जो ‘सभी के लिये AI’ एवं ‘MANAV’ सिद्धांतों द्वारा निर्देशित है, तथा जिसमें सुलभता, समावेशिता एवं नवाचार पर ज़ोर दिया गया है।
- स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण एवं हरित गतिशीलता: दक्षिण कोरियाई औद्योगिक समूह भारत के घरेलू स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण को तीव्र करने तथा इसके महत्त्वाकांक्षी सतत गतिशीलता लक्ष्यों को प्राप्त करने में एक आधारभूत भूमिका निभा रहे हैं।
- उनके स्थानीय निवेश यह सुनिश्चित करते हैं कि भारत इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) के क्षेत्र में प्रभुत्व तथा हरित अवसंरचना की वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा में पीछे न रह जाए।
- हुंडई एवं किआ (Kia) जैसी ऑटोमोबाइल कंपनियाँ, जिनका वर्तमान में भारतीय कार बाज़ार में एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है, अरबों डॉलर के निवेश के माध्यम से इस परिवर्तन को आगे बढ़ा रही हैं।
- हाल ही में, हुंडई मोटर कंपनी और टीवीएस मोटर कंपनी ने भारत एवं अन्य बाज़ारों में इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर के विकास तथा व्यावसायीकरण हेतु एक संयुक्त विकास समझौता (JDA) किया है।
- यह साझेदारी हुंडई की इलेक्ट्रिक मोबिलिटी एवं डिज़ाइन विशेषज्ञता को टीवीएस मोटर के स्थापित थ्री-व्हीलर प्लेटफॉर्म तथा बाज़ार समझ के साथ एकीकृत करती है।
- सॉफ्ट पावर और सभ्यतागत संपर्क: सांस्कृतिक कूटनीति जन-स्तरीय सद्भावना की एक सुदृढ़ नींव निर्मित करती है, जो प्रभावी रूप से भू-राजनीतिक एवं आर्थिक साझेदारी को कूटनीतिक तनाव से सुरक्षित रखती है।
- यह ज़मीनी स्तर की कनेक्टिविटी दोनों समुदायों के बीच प्रतिभा की निर्बाध आवागमन, पर्यटन तथा सीमा-पार नवाचार को प्रोत्साहित करती है।
- रानी हेओ ह्वांग-ओक की ऐतिहासिक कथा अयोध्या एवं कोरिया के बीच सभ्यतागत संबंधों को सुदृढ़ करती है, जिसे दोनों सरकारों द्वारा सक्रिय रूप से प्रोत्साहित किया जाता है।
- साथ ही, भारत में ‘हैल्यू’ (कोरियाई वेव) के तीव्र विस्तार ने सांस्कृतिक पर्यटन, भाषा अधिग्रहण तथा छात्र विनिमय कार्यक्रमों को महत्त्वपूर्ण रूप से बढ़ावा दिया है।
भारत–दक्षिण कोरिया संबंधों के पूर्ण विकास में बाधा डालने वाले मुख्य कारक कौन-से हैं?
- संरचनात्मक व्यापार घाटा एवं विषमता: एक व्यापक एवं संरचनात्मक रूप से विषम व्यापार असंतुलन आपसी विश्वास को गंभीर रूप से प्रभावित करता है तथा मुक्त व्यापार विस्तार के संदर्भ में भारत में घरेलू राजनीतिक प्रतिरोध को जन्म देता है।
- दक्षिण कोरिया की अत्यधिक संरक्षणवादी गैर-टैरिफ बाधाएँ विशेष रूप से फार्मास्यूटिकल्स, कृषि निर्यात एवं आईटी सेवाओं में भारत के प्रतिस्पर्द्धात्मक लाभों को सीमित करती हैं।
- वर्ष 2010 में द्विपक्षीय व्यापार समझौते के लागू होने के पश्चात भारत का दक्षिण कोरिया के साथ व्यापार घाटा और अधिक बढ़ गया।
- वित्त वर्ष 2021-22 के बाद भारत के कोरिया को निर्यात में गिरावट दर्ज की गई, जिसमें पेट्रोलियम उत्पादों, एल्युमीनियम एवं उसके उत्पादों, तथा लोहा एवं इस्पात के निर्यात में प्रमुख कमी देखी गई।
- परिणामस्वरूप, अप्रैल 2026 में प्रस्तावित CEPA उन्नयन वार्ता में नई दिल्ली की ओर से इन गैर-टैरिफ बाधाओं को दूर करने तथा भारतीय निर्यात को बढ़ावा देने की सख्त मांगों पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित किया गया है।
- रक्षा नौकरशाही एवं विश्वास की कमी: उन्नत रणनीतिक साझेदारियों के बावजूद, कठोर नौकरशाही बाधाएँ तथा महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के प्रति पारस्परिक अनिच्छा संयुक्त रक्षा विनिर्माण को गंभीर रूप से बाधित करती है।
- विभिन्न खरीद प्रोटोकॉल एवं संवेदनशील बौद्धिक संपदा को साझा करने में दक्षिण कोरिया की झिझक इस गठबंधन को केवल मूलभूत हार्डवेयर लेन-देन तक सीमित रखती है, जिससे यह उन्नत सह-विकास की दिशा में पर्याप्त प्रगति नहीं कर पाता।
- यद्यपि K-9 वज्र होवित्जर एक उल्लेखनीय सफलता है, तथापि दक्षिण कोरिया की कांगनाम कॉर्पोरेशन के साथ माइनस्वीपर विकास परियोजना जैसी कई अन्य योजनाएँ नौकरशाही विलंब एवं मूल्य विवादों के कारण बाधित रही हैं।
- लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिये आपूर्ति शृंखला एकीकरण में स्थिरता: भारत में विद्यमान लालफीताशाही, जटिल भूमि अधिग्रहण कानून तथा अप्रत्याशित कराधान नीतियाँ दक्षिण कोरिया के मध्यम आकार के उद्यमों द्वारा किए जाने वाले बड़े पैमाने के पूंजी निवेश को बाधित करती हैं।
- जहाँ सैमसंग एवं हुंडई जैसी चाइबोल कंपनियाँ उपभोक्ता बाज़ारों पर प्रभुत्व रखती हैं, वहीं कोरियाई घटक निर्माताओं का व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र भारत की खंडित घरेलू आपूर्ति शृंखलाओं में प्रभावी रूप से एकीकृत होने के लिये संघर्ष कर रहा है।
- वर्ष 2023 के हालिया आर्थिक संवाद आकलन ने यह स्पष्ट किया कि भारत की उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं के साथ कोरिया का सीमित एकीकरण सीधे तौर पर इष्टतम विनिर्माण क्षमता को बाधित करता है।
- हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भू-राजनीतिक विषमता: क्वाड के अंतर्गत भारत की सक्रिय बहु-संरेखण नीति तथा सुदृढ़ सहभागिता स्पष्ट रूप से चीन-विरोधी सुरक्षा गठबंधनों के प्रति दक्षिण कोरिया के पारंपरिक सावधानीपूर्ण दृष्टिकोण के विपरीत परिलक्षित होती है।
- उत्तर कोरिया की अप्रत्याशित रणनीतिक प्रकृति से भौगोलिक निकटता तथा बीजिंग के साथ गहरे आर्थिक संबंधों के कारण सियोल को हिंद-प्रशांत समुद्री सुरक्षा ढाँचे में अत्यंत संतुलित एवं सावधानीपूर्ण रुख अपनाना पड़ता है।
- यद्यपि दक्षिण कोरिया ने हाल ही में अप्रैल 2026 में इंडो-पैसिफिक महासागर पहल (IPOI) में सम्मिलित होने पर सहमति व्यक्त की है, तथापि वह अत्यधिक विवादित भू-राजनीतिक क्षेत्रों में व्यापक संयुक्त नौसैनिक अभियानों के संचालन को लेकर अभी भी संकोच करता है।
- असममित सॉफ्ट पावर एवं प्रतिभा गतिशीलता: भारत में ‘हैल्यू’ वेव की बढ़ती लोकप्रियता के बावजूद, संरचनात्मक भाषाई बाधाएँ तथा सीमित संस्थागत शैक्षणिक संपर्क गहरी जड़ें जमा चुकी सभ्यतागत कूटनीति के विकास में अवरोध उत्पन्न करते हैं।
- वर्तमान में लोगों के बीच आदान-प्रदान मुख्यतः मनोरंजन उपभोग तक सीमित है, जो पर्याप्त पेशेवर गतिशीलता या संयुक्त वैज्ञानिक अनुसंधान में रूपांतरित नहीं हो पाता।
- इसके अतिरिक्त, जटिल वीजा प्रक्रियाएँ तथा व्यापक पारस्परिक योग्यता मान्यता का अभाव निरंतर कुशल भारतीय आईटी पेशेवरों को दक्षिण कोरिया के उच्च-तकनीकी कार्यबल में सहज एकीकरण से वंचित रखता है।
- संयुक्त वित्तीय एवं डॉलर-विरोधी तंत्रों का अभाव: सुव्यवस्थित, संप्रभु-समर्थित वित्तपोषण गलियारों की अनुपस्थिति दोनों देशों के बीच पूंजी-गहन रणनीतिक अवसंरचना परियोजनाओं के क्रियान्वयन को उल्लेखनीय रूप से धीमा कर देती है।
- द्विपक्षीय लेन-देन हेतु अमेरिकी डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता दोनों अर्थव्यवस्थाओं को भू-राजनीतिक संकटों के दौरान विनिमय दर अस्थिरता एवं व्यापक आर्थिक अस्थिरता के जोखिम के प्रति संवेदनशील बनाती है।
भारत-दक्षिण कोरिया संबंधों को मज़बूत करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?
- तकनीकी-औद्योगिक 'गीगा-कॉरिडोर' का संस्थागतकरण: एक समर्पित द्विपक्षीय सेमीकंडक्टर और ग्रीन-टेक कॉरिडोर की स्थापना से नियामक स्वीकृतियों को सुव्यवस्थित किया जा सकेगा तथा गहन तकनीक के स्थानीयकरण के लिये सरकार समर्थित वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान किये जा सकेंगे।
- इसमें दक्षिण कोरिया की 'प्रेसिजन इंजीनियरिंग' को भारत की 'डिजिटल स्केल' के साथ एकीकृत करना शामिल है ताकि अगली पीढ़ी की निर्माण इकाइयों एवं हाइड्रोजन ईंधन पारिस्थितिकी तंत्र का सह-निर्माण किया जा सके।
- विशेषीकृत आर्थिक सुरक्षा क्लस्टर बनाकर, दोनों देश महत्त्वपूर्ण आपूर्ति शृंखलाओं को भू-राजनीतिक अस्थिरता से बचा सकते हैं तथा उच्च स्तरीय औद्योगिक पूंजी के निर्बाध प्रवाह को सुनिश्चित कर सकते हैं।
- व्यापार संतुलन के लिये 'CEPA 2.0' में उन्नयन: व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (CEPA) का एक व्यापक, मिशन-मोड पुनर्मूल्यांकन लगातार गैर-टैरिफ बाधाओं को दूर करने और संरचनात्मक व्यापार विषमताओं को ठीक करने के लिये आवश्यक है।
- इस 'नए युग के CEPA' में मज़बूत 'उत्पत्ति के नियम' प्रोटोकॉल को शामिल किया जाना चाहिये ताकि तृतीय पक्ष द्वारा डंपिंग को रोका जा सके, साथ ही भारतीय फार्मास्यूटिकल्स एवं IT-सक्षम सेवाओं के लिये तरजीही बाज़ार पहुँच को सुविधाजनक बनाया जा सके।
- वनस्पति-स्वास्थ्य मानकों तथा डिजिटल व्यापार मानदंडों के सामंजस्य को प्राथमिकता देने से अधिक संतुलित और तीव्र वाणिज्यिक आदान-प्रदान को बढ़ावा मिलेगा।
- संयुक्त रक्षा सह-उत्पादन का सुदृढ़ीकरण: क्रेता–विक्रेता संबंध से आगे बढ़कर रक्षा-औद्योगिक सह-विकास केंद्र की स्थापना हेतु मानवरहित प्रणालियों और वायु-अंतरिक्ष अभियांत्रिकी के लिये संयुक्त अनुसंधान एवं विकास प्रयोगशालाओं की स्थापना आवश्यक है।
- संवेदनशील प्रौद्योगिकियों (पनडुब्बियों के लिये AIP, इंजन कोर तकनीक) के 'रणनीतिक स्तरीय अंतरण' को लागू करने से भारतीय रक्षा गलियारे दक्षिण कोरियाई डिज़ाइन वाले हार्डवेयर के लिये वैश्विक निर्यात केंद्र बन सकेंगे।
- तत्काल डेटा-साझाकरण समझौतों के माध्यम से समुद्री क्षेत्र जागरूकता (MDA) को सुदृढ़ करने से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दोनों की सुरक्षा प्रदाता के रूप में भूमिका और मज़बूत होगी।
- 'महत्त्वपूर्ण खनिज' रणनीतिक गठबंधन का निर्माण: संयुक्त विदेशी अधिग्रहणों के माध्यम से दुर्लभ पृथ्वी तत्वों (REE) और महत्त्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति सुनिश्चित करना उनके EV एवं इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्रों की दीर्घकालिक संधारणीयता के लिये महत्त्वपूर्ण है।
- एक साझा द्विपक्षीय खनिज सुरक्षा साझेदारी तीसरे देशों (जैसे अफ्रीका या लैटिन अमेरिका) में संयुक्त निवेश को सक्षम बनाएगी, जिससे प्रतिकूल एकाधिकारों और संसाधन-राष्ट्रवाद को दरकिनार किया जा सके।
- यह ‘संसाधन-से-उपभोक्ता’ एकीकरण सुनिश्चित करता है कि दोनों देशों के पास 21वीं सदी की हरित अर्थव्यवस्था में नेतृत्व के लिये आवश्यक कच्चे माल की संप्रभुता हो।
- डिजिटल-वित्तीय एकीकरण को गति देना: राष्ट्रीय डिजिटल भुगतान संरचनाओं के अंतर्संयोजन तथा स्थानीय मुद्रा निपटान (LCS) ढाँचे की स्थापना से लेन-देन लागत में उल्लेखनीय कमी आएगी और अमेरिकी डॉलर विनिमय दर की अस्थिरता का प्रभाव कम होगा।
- 'डीप-टेक' स्टार्टअप्स के लिये विशेष रूप से एक द्विपक्षीय वेंचर कैपिटल फंड बनाने से सियोल की हार्डवेयर विशेषज्ञता और बंगलूरू के सॉफ्टवेयर इकोसिस्टम के बीच आपसी सहयोग को बढ़ावा मिलेगा।
- समुद्री और स्मार्ट-सिटी क्षेत्रों में पूंजी-गहन अवसंरचना परियोजनाओं को बड़े पैमाने पर लागू करने के लिये इस तरह के वित्तीय जोखिम-कम करने वाले तंत्र महत्त्वपूर्ण हैं।
- 'इंडो-पैसिफिक ब्लू इकोनॉमी' सहयोग का विस्तार: दोनों देशों को गहन समुद्री बंदरगाहों, अपतटीय पवन ऊर्जा और समुत्थानशील तटीय शहरों के सतत विकास पर केंद्रित एक समुद्री अवसंरचना साझेदारी को क्रियान्वित करना चाहिये।
- दक्षिण कोरिया की स्मार्ट-पोर्ट तकनीक का लाभ उठाकर भारतीय बंदरगाह लॉजिस्टिक्स का आधुनिकीकरण करने से हिंद महासागर के पार एक 'ब्लू-सिल्क' कनेक्टिविटी पुल का निर्माण होगा।
- क्षेत्रीय तटीय राज्यों में आपदा प्रतिरोधी अवसंरचना (DRI) का संयुक्त रूप से विकास करने से वैश्विक साझा संसाधनों में जिम्मेदार हितधारकों के रूप में उनके संयुक्त नेतृत्व की छवि प्रदर्शित होगी।
- प्रतिभा की गतिशीलता और कौशल प्रमाणीकरण में सामंजस्य स्थापित करना: व्यावसायिक योग्यताओं के लिये पारस्परिक मान्यता समझौते (MRA) को लागू करने से नर्सिंग, इंजीनियरिंग और साइबर सुरक्षा के क्षेत्रों में उच्च कुशल श्रम के निर्बाध प्रवाह को गति मिलेगी।
- दक्षिण कोरियाई तकनीकी विशेषज्ञों द्वारा प्रबंधित भारत में उन्नत विनिर्माण के लिये उत्कृष्टता केंद्र स्थापित करने से वैश्विक औद्योगिक मानकों के अनुरूप भविष्य के लिये तैयार कार्यबल का निर्माण होगा।
- यह 'स्किल-ब्रिज' पहल भारत के जनांकिकीय लाभांश को विश्व स्तर पर दक्षिण कोरियाई उद्यमों के लिये एक उच्च-उत्पादकता वाली संपत्ति में परिणत कर देगी।
- 'सभ्यतागत सॉफ्ट-पावर' सामंजस्य का संवर्द्धन: 'K-वेव' से परे, दोनों सरकारों को दीर्घकालिक रणनीतिक संरेखण और ट्रैक-टू कूटनीति को बढ़ावा देने के लिये अकादमिक एवं थिंक-टैंक समूहों में निवेश करना चाहिये।
- 'बौद्ध सर्किट पर्यटन' को बढ़ावा देना तथा विश्व स्तरीय विरासत अवसंरचना के माध्यम से अयोध्या-गिमहे के ऐतिहासिक संबंध को पुनर्जीवित करना, मनोवैज्ञानिक-सांस्कृतिक बंधन को और गहरा करेगा।
- युवा नेतृत्व फैलोशिप को संस्थागत रूप देकर, नीति निर्माताओं की अगली पीढ़ी एक स्थिर, समृद्ध और बहुध्रुवीय एशियाई व्यवस्था के लिये एक साझा दृष्टिकोण का निर्माण कर सकती है।
निष्कर्ष:
भारत-दक्षिण कोरिया की ‘विशेष रणनीतिक साझेदारी’ ने पारंपरिक व्यापारिक संबंधों से आगे बढ़कर हिंद-प्रशांत क्षेत्रीय स्थिरता एवं उच्च-प्रौद्योगिकी अनुकूलन (high-tech resilience) का एक महत्त्वपूर्ण आधार बन चुकी है। भारत की विशाल जनांकिकीय क्षमता एवं डिजिटल विस्तार तथा दक्षिण कोरिया की विनिर्माण एवं सेमीकंडक्टर विशेषज्ञता के समन्वय से ये दोनों देश लोकतांत्रिक आपूर्ति शृंखलाओं के एक नए युग का नेतृत्व कर सकते हैं। हालाँकि, 50 अरब डॉलर के व्यापार लक्ष्य तथा ‘चिप्स से शिप्स’ तक की परिकल्पना को साकार करने हेतु CEPA में प्रणालीगत सुधार एवं रक्षा क्षेत्र में सह-उत्पादन की आवश्यकता है। अंततः यह साझेदारी केवल एक आर्थिक आवश्यकता नहीं है, बल्कि बहुध्रुवीय एशिया के संदर्भ में एक सभ्यतागत एवं भू-राजनीतिक अनिवार्यता भी है।
|
दृष्टि मेन्स प्रश्न ‘चिप्स टू शिप्स की ओर संक्रमण’ भारत-दक्षिण कोरिया संबंधों में एक मौलिक परिवर्तन का संकेत है, जो क्रेता-विक्रेता संबंधों से आगे बढ़कर एक रणनीतिक प्रौद्योगिकी साझेदारी की दिशा में अग्रसर है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उभरती भू-राजनीतिक चुनौतियों के संदर्भ में इस कथन का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. 'चिप्स टू शिप्स' दृष्टिकोण क्या है?
यह सेमीकंडक्टर विनिर्माण (चिप्स) से लेकर उन्नत समुद्री और नौसैनिक अवसंरचना (जहाज़ों) तक द्विपक्षीय संबंधों के विस्तार को दर्शाता है।
2. वर्ष 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार का लक्ष्य क्या है?
दोनों देशों ने वर्ष 2030 तक 50 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार का एक महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है।
3. दक्षिण कोरिया की कौन-सी रक्षा प्रणाली 'मेक इन इंडिया' की पहचान है?
K-9 वज्र स्व-चालित हॉवित्जर, जिसे हनवा डिफेंस एवं L&T के सहयोग से संयुक्त रूप से निर्मित किया गया है।
4. ‘ग्लोबल पिवटल स्टेट (GPS)’ रणनीति क्या है?
यह दक्षिण कोरिया की वह विदेश नीति अवधारणा है, जिसके अंतर्गत वह स्वयं को एक सक्रिय एवं प्रभावशाली वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करते हुए इंडो-पैसिफिक सुरक्षा एवं वैश्विक मामलों में अधिक निर्णायक भूमिका निभाना चाहता है।
5. रानी हेओ ह्वांग-ओक का क्या महत्त्व है?
उन्हें अयोध्या से संबंधि एक पौराणिक राजकुमारी माना जाता है, जिनका विवाह कोरियाई राजा से हुआ था। यह कथा भारत–कोरिया के बीच ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक संबंधों की नींव का प्रतीक मानी जाती है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ)
मेन्स
प्रश्न शीत युद्ध के बाद के अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य के संदर्भ में भारत की लुक ईस्ट नीति के आर्थिक और रणनीतिक आयामों का मूल्यांकन कीजिये। (2016)
