भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र का पुनरुद्धार | 06 Apr 2026
यह एडिटोरियल 06/04/2026 को द हिंदू में प्रकाशित ‘Transforming India’s nuclear power landscape’ शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख भारत के वर्ष 2047 तक परमाणु ऊर्जा उत्पादन को 100 गीगावाट तक बढ़ाने के महत्त्वाकांक्षी प्रयास पर प्रकाश डालता है, जिसे विकसित भारत और नेट-ज़ीरो लक्ष्यों का एक प्रमुख स्तंभ माना जाता है। इसमें रेखांकित गया है कि इस परिकल्पना को साकार करने के लिये सशक्त प्रौद्योगिकी, वित्तपोषण और नियामक समर्थन की आवश्यकता होगी।
प्रिलिम्स के लिये: SHANTI अधिनियम (2025), केंद्रीय बजट 2025-26, स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर, जादूगोड़ा माइंस, प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर।
मेन्स के लिये: भारत द्वारा अपने परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को पुनर्जीवित करने के लिये किये गए प्रमुख सुधार, भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र के सामने प्रमुख चुनौतियाँ।
SHANTI अधिनियम (2025) के पारित होने से भारत की परमाणु ऊर्जा महत्त्वाकांक्षाओं को एक निर्णायक गति प्राप्त हुई है। इस अधिनियम के माध्यम से दशकों पुराने विधिक ढाँचों को निरस्त कर इस क्षेत्र को निजी तथा विदेशी निवेश के लिये खोला गया है। इस पहल का लक्ष्य वर्तमान 8,780 मेगावाट की स्थापित क्षमता को बढ़ाकर वर्ष 2047 तक 100 गीगावाट तक पहुँचाना। यह रणनीतिक प्रयास दो प्रमुख राष्ट्रीय अनिवार्यताओं पर आधारित है- ‘विकसित भारत’ का लक्ष्य तथा वर्ष 2070 तक शुद्ध शून्य (Net Zero) उत्सर्जन की प्राप्ति। वर्तमान परिदृश्य में भारत की लगभग 75% विद्युत उत्पादन क्षमता अभी भी तापीय ऊर्जा पर निर्भर है। ऐसे में परमाणु ऊर्जा कोयले के विकल्प के रूप में एक विश्वसनीय, निम्न-कार्बन और आधारभूत ऊर्जा स्रोत के रूप में उभरती है। हालाँकि, इस विधायी दृष्टिकोण को वास्तविक ऊर्जा उत्पादन (गीगावाट क्षमता) में परिवर्तित करने के लिये स्वदेशी प्रौद्योगिकी विकास, नवाचारी वित्तपोषण तंत्र तथा सुदृढ़ विनियामक ढाँचे की आवश्यकता होगी।
भारत ने अपने परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को पुनर्जीवित करने के लिये कौन-कौन से प्रमुख सुधार किये हैं?
- SHANTI अधिनियम के माध्यम से विधायी सामंजस्य: भारत में बदलाव के लिए परमाणु ऊर्जा के सतत दोहन और विकास (SHANTI) अधिनियम के लागू होने से दीर्घकालिक ‘नागरिक दायित्व’ गतिरोध का समाधान हुआ है, जिसने एक दशक से अधिक समय तक विदेशी सहयोग को बाधित किया था।
- भारतीय विधिक ढाँचे को अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाते हुए यह अधिनियम वैश्विक आपूर्तिकर्त्ताओं के लिये पूर्वानुमेय कानूनी वातावरण प्रदान करता है, साथ ही नागरिकों के लिये सुदृढ़ मुआवज़ा तंत्र सुनिश्चित करता है।
- परिणामस्वरूप, जैतापुर और कोव्वाडा जैसी प्रमुख परियोजनाओं को गति मिली है तथा भारत वर्ष 2047 तक 100 गीगावाट क्षमता के लक्ष्य की दिशा में अग्रसर है।
- केंद्रीय बजट 2025-26 में स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टरों (SMR) पर केंद्रित एक नए परमाणु ऊर्जा मिशन के लिये 20,000 करोड़ रुपये आवंटित किये गए हैं।
- भारतीय विधिक ढाँचे को अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाते हुए यह अधिनियम वैश्विक आपूर्तिकर्त्ताओं के लिये पूर्वानुमेय कानूनी वातावरण प्रदान करता है, साथ ही नागरिकों के लिये सुदृढ़ मुआवज़ा तंत्र सुनिश्चित करता है।
- तीन-चरणीय कार्यक्रम के दूसरे चरण का संचालन: कलपक्कम में 500 मेगावाट प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) में कोर लोडिंग की शुरुआत भारत के परमाणु कार्यक्रम के द्वितीय चरण के वास्तविक क्रियान्वयन का संकेत है।
- यह प्रौद्योगिकी डिप्लीटेड यूरेनियम को प्लूटोनियम में रूपांतरित करने में सहायक होती है, जिससे दीर्घकाल में भारत के विशाल थोरियम भंडार के प्रभावी उपयोग का मार्ग प्रशस्त होता है।
- यह उपलब्धि रिएक्टर के सक्रिय (reactor criticality) होने से पहले का एक महत्त्वपूर्ण कदम है, जो विश्व स्तर पर केवल कुछ देशों द्वारा ही हासिल की गई है।
- यह प्रौद्योगिकी डिप्लीटेड यूरेनियम को प्लूटोनियम में रूपांतरित करने में सहायक होती है, जिससे दीर्घकाल में भारत के विशाल थोरियम भंडार के प्रभावी उपयोग का मार्ग प्रशस्त होता है।
- परमाणु संयुक्त उद्यमों का रणनीतिक विविधीकरण: भारत तापीय ऊर्जा क्षेत्र से वित्तीय संसाधनों और तकनीकी विशेषज्ञता को एकत्र करने के लिये NPCIL और NTPC के बीच अश्विनी जैसे संयुक्त उद्यम बनाकर आंतरिक समन्वय का लाभ उठा रहा है।
- यह मल्टी-एजेंसी मॉडल सुनिश्चित करता है कि परियोजना प्रबंधन का भार साझा किया जाए, जिससे माही-बांसवाड़ा जैसी विशाल परियोजनाओं के निर्माण को गति मिलती है।
- स्वदेशी प्रौद्योगिकी का औद्योगीकरण: भारत ने अपने 700 मेगावाट प्रेसराइज़्ड हेवी वाटर रिएक्टर (PHWR) के ‘प्रयोगात्मक’ चरण से ‘फ्लीट-मोड’ तैनाती की ओर सफलतापूर्वक परिवर्तन किया है, जिससे मानकीकृत निर्माण तथा लागत में कमी सुनिश्चित हुई है।
- यह परिवर्तन अनेक स्थलों पर एक साथ विकास को संभव बनाता है, जिससे पूर्व दशकों में विद्यमान एकल-रिएक्टर निर्माण की बाधा प्रभावी रूप से समाप्त होती है।
- इसने एक मज़बूत घरेलू विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को भी प्रोत्साहित किया है, जिससे आपूर्ति शृंखला की सुदृढ़ता बढ़ी है तथा विदेशी आपूर्तिकर्त्ताओं पर निर्भरता में कमी आई है।
- वैश्विक आपूर्ति शृंखला तथा घरेलू ईंधन सुरक्षा का सुदृढ़ीकरण: भारत ने रूस के साथ गहन रणनीतिक संबंधों तथा पारंपरिक खानों में नए घरेलू भंडारों की खोज के संयोजन के माध्यम से अपनी यूरेनियम सुरक्षा को उल्लेखनीय रूप से सुदृढ़ किया है।
- कुडनकुलम इकाइयों के लिये दीर्घकालिक ईंधन चक्रों की सुनिश्चितता तथा घरेलू खनन के विस्तार द्वारा भारत ने अतीत के ‘परमाणु अलगाव’ संबंधी जोखिमों को कम किया है।
- साथ ही वर्ष 2024 में जादूगोड़ा खानों में नए भंडार की खोज से इस खदान की आयु में 50 वर्ष की वृद्धि हुई है।
- चक्रीय परमाणु अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन: भारत ने अपशिष्ट प्रबंधन में साधारण भंडारण से उच्च-प्रौद्योगिकी ‘पार्टिशनिंग’ की ओर संक्रमण कर विश्वस्तरीय प्रगति की है, जिसमें दीर्घजीवी रेडियोधर्मी अपशिष्ट (ऐक्टिनाइड्स) को तीव्र रिएक्टरों में दहन हेतु पृथक किया जाता है।
- यह रणनीति संभावित ‘अपशिष्ट’ को ‘संसाधन’ में परिवर्तित करती है, जिससे पर्यावरणीय प्रभाव में उल्लेखनीय कमी आती है तथा गहरे भू-वैज्ञानिक भंडारण स्थलों की आवश्यकता घटती है, जिन्हें सामान्यतः जन-विरोध का सामना करना पड़ता है।
- वर्ष 2026 के प्रारंभ में सरकार ने कहा कि वर्तमान निकट-सतही निपटान सुविधाएँ (NSDF) परमाणु ऊर्जा संयंत्रों द्वारा उत्पन्न रेडियोधर्मी अपशिष्ट के सुरक्षित प्रबंधन तथा भंडारण के लिये पर्याप्त क्षमता रखती हैं।
भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
- निरंतर भूमि अधिग्रहण और स्थानीय विरोध : विशाल सन्निहित भूमि पार्सलों का अधिग्रहण परमाणु परियोजनाओं के लिये एक प्रमुख बाधा बना हुआ है, जो प्रायः विस्थापन, पर्यावरणीय चिंताओं तथा सामुदायिक अविश्वास को जन्म देता है।
- उदाहरणतः, हरियाणा की गोरखपुर परमाणु परियोजना (GHAVP) की समय-सीमा निरंतर विरोध के कारण वर्ष 2032 तक विस्तारित हो चुकी है।
- मानकीकृत डिज़ाइनों के बावजूद, स्थानीय विरोध के कारण परियोजनाओं की ‘पहली ढलाई’ (first pour) में वर्षों की देरी हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप प्रारंभिक चरण में ही लागत में उल्लेखनीय वृद्धि हो जाती है।
- उच्च पूंजी गहनता और वित्तीय जोखिम: भारत में परमाणु परियोजनाओं को अत्यधिक अग्रिम पूंजी (capital-intensive) आवश्यकताओं और असाधारण रूप से लंबी प्रतिपूर्ति अवधि (gestation period) की ‘दोहरी मार’ का सामना करना पड़ता है, जिससे वे सौर या पवन ऊर्जा की तुलना में कम आकर्षक प्रतीत होते हैं।
- राज्य-आधारित वित्तपोषण पर निर्भरता ने एक प्रकार का ‘संप्रभु एकाधिकार’ उत्पन्न किया है, जिसने परियोजनाओं के तीव्र विस्तार को सीमित किया है।
- उदाहरण के लिये, वर्ष 2047 तक 100 गीगावाट क्षमता के लक्ष्य हेतु अनुमानित ₹15 लाख करोड़ के निवेश की आवश्यकता, नवाचारी वित्तीय मॉडल, निजी भागीदारी तथा अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की अनिवार्यता को रेखांकित करती है।
- निजी क्षेत्र के एकीकरण में जटिलता और नियामकीय कमियाँ: यद्यपि SHANTI अधिनियम (2025) ने निजी क्षेत्र के लिये अवसर खोले हैं, फिर भी विशेषकर स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) हेतु एक परिपक्व नियामक ढाँचे का अभाव ‘अपनी तरह का प्रथम जोखिम’ (FOAK risk) उत्पन्न करता है।
- स्पष्ट ‘समान अवसर’ नीति के अभाव में, जो गैर-सरकारी संस्थाओं के लिये बीमा दायित्व एवं परिचालन निगरानी को परिभाषित करती हो, निजी क्षेत्र अरबों डॉलर के निवेश से हिचकिचाता है।
- साथ ही, अधिनियम के अंतर्गत द्विस्तरीय लाइसेंस व्यवस्था- सरकारी लाइसेंस एवं AERB की पृथक सुरक्षा स्वीकृति, नियामकीय जटिलता को और बढ़ाती है।
- इसके अलावा, SHANTI अधिनियम एक द्विस्तरीय लाइसेंस व्यवस्था पेश करता है, जिसके तहत विकिरण जोखिम से जुड़ी किसी भी गतिविधि के लिये सरकारी लाइसेंस और AERB से पृथक सुरक्षा स्वीकृति दोनों की आवश्यकता होती है, जिससे नियामक जटिलता और बढ़ जाती है।
- तृतीय चरण में थोरियम उपयोग में प्रौद्योगिकीय विलंब: भारत का ‘तृतीय चरण’ थोरियम उपयोग का लक्ष्य वर्तमान वास्तविकता की अपेक्षा अभी भी एक दूरस्थ प्रौद्योगिकीय क्षितिज बना हुआ है, जिससे आयातित यूरेनियम पर महँगी निर्भरता बनी हुई है।
- हालाँकि, भारत में विश्व के सबसे बड़े थोरियम भंडारों में से एक है, जिसका अनुमान 457,000 से 508,000 टन के बीच है, जो मुख्य रूप से केरल, तमिलनाडु और ओडिशा की मोनाजाइट रेत में केंद्रित है।
- प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) से वाणिज्यिक स्तर के रिएक्टरों की ओर संक्रमण अपेक्षित गति से धीमा रहा है, जिसके कारण देश के विशाल थोरियम भंडार तात्कालिक ऊर्जा मिश्रण में पर्याप्त रूप से उपयोग नहीं हो पा रहे हैं।
- आपूर्ति शृंखला की अस्थिरता एवं भू-राजनीतिक असुरक्षा: बड़े पैमाने पर लाइट वाटर रिएक्टर (LWR) प्रौद्योगिकी तथा संवर्द्धित ईंधन के लिये सीमित वैश्विक भागीदारों, विशेषकर रूस पर अत्यधिक निर्भरता भारत के लिये एक रणनीतिक जोखिम उत्पन्न करती है।
- वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में व्यवधान या अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण महत्त्वपूर्ण घटकों की आपूर्ति में विलंब हो सकता है, जिनका घरेलू निर्माण अभी ‘मेक इन इंडिया’ के अंतर्गत पूर्णतः विकसित नहीं हुआ है।
- उदाहरण के लिये, कुडनकुलम यूनिट 3 और 4 का निर्माण रूस-यूक्रेन संघर्ष के कारण विलंबित हुआ, जिसने स्थानीय कारकों के साथ-साथ रूस से महत्त्वपूर्ण घटकों की समय पर आपूर्ति को प्रभावित किया।
- विशेषीकृत मानव पूंजी की कमी: 100 गीगावाट के लक्ष्य की ओर तेज़ी से विस्तार, वर्तमान में उपलब्ध उच्च-कुशल मानव संसाधन की तुलना में अधिक तीव्र है, जिससे एक ‘प्रतिभा की कमी’ उत्पन्न हो रही है। यह ‘प्रतिभा अंतराल’ (talent gap) न केवल परियोजनाओं की समय-सीमा को प्रभावित करता है, बल्कि परिचालन सुरक्षा मानकों के लिये भी चुनौती उत्पन्न करता है।
- भारत की वर्तमान प्रशिक्षण व्यवस्था प्रतिवर्ष मात्र 300 पूर्णतः प्रशिक्षित परमाणु वैज्ञानिक एवं इंजीनियर ही तैयार कर पाती है।
- यद्यपि नीतिगत समर्थन तथा वित्तपोषण सुनिश्चित हो चुका है, फिर भी इस स्तर के रिएक्टर समूह के प्रबंधन हेतु लगभग 38,000 विशेषीकृत कर्मियों की आवश्यकता है, जो वर्तमान स्नातक उत्पादन दर से कहीं अधिक है।
- जल संकट तथा तापीय भार संबंधी सीमाएँ: तटीय संवेदनशीलताओं से बचने के लिये भारत जब आंतरिक (inland) परमाणु स्थलों की ओर अग्रसर हो रहा है, तब यह क्षेत्र गंभीर ताज़े जल संकट से टकरा रहा है, क्योंकि परमाणु संयंत्रों को शीतलन के लिये विशाल एवं निरंतर जल की आवश्यकता होती है।
- वर्ष 2025 में बढ़ते ग्रीष्मकालीन तापमान तथा अनियमित मानसून के कारण ‘थर्मल थ्रॉटलिंग’ की स्थिति उत्पन्न हुई है, जिसमें संयंत्रों को अपनी ऊर्जा उत्पादन क्षमता घटानी पड़ी, क्योंकि स्रोत जल या तो अत्यधिक गर्म था अथवा रिएक्टरों को प्रभावी रूप से ठंडा करने के लिये पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं था।
भारत अपने परमाणु क्षेत्र को सुदृढ़ करने के लिये कौन-से उपाय अपना सकता है?
- ESG और जलवायु वित्त में ‘परमाणु ऊर्जा को हरित ऊर्जा के रूप में’ मुख्य धारा में लाना: कम लागत वाली अंतर्राष्ट्रीय जलवायु पूंजी को अनलॉक करने के लिये भारत को औपचारिक रूप से परमाणु ऊर्जा को अपने घरेलू हरित वर्गीकरण और संप्रभु हरित बॉण्ड ढाँचे में एकीकृत करना होगा।
- परमाणु परियोजनाओं को ‘स्वच्छ ऊर्जा’ परिसंपत्तियों के रूप में वर्गीकृत करके, यह क्षेत्र पारंपरिक उच्च-ब्याज ऋण जाल से बच सकता है और पर्यावरण, सामाजिक तथा शासन (ESG ) पर केंद्रित पेंशन फंडों को आकर्षित कर सकता है।
- इस वित्तीय पुनर्गठन से पूंजी की भारित औसत लागत (WACC) कम हो जाएगी, जिससे परमाणु ऊर्जा पर लगने वाला शुल्क दीर्घकालिक सौर-सह-भंडारण हाइब्रिड परियोजनाओं की तुलना में प्रतिस्पर्द्धी बन जाएगा।
- ‘प्लग-एंड-प्ले’ परमाणु पार्क मॉडल का क्रियान्वयन: सरकार को परियोजना-आधारित भूमि अधिग्रहण से हटकर ‘परमाणु पार्क’ मॉडल की ओर संक्रमण करना चाहिये, जिसमें केंद्र सरकार डेवलपर्स को निविदा जारी करने से पूर्व ही सभी पर्यावरणीय, CRZ तथा भूकंपीय स्वीकृतियों सहित स्थलों को पूर्व-स्वीकृत कर दे।
- अल्ट्रा मेगा सोलर पार्कों की तर्ज़ पर ‘विशेष परमाणु क्षेत्र’ (SNZ) विकसित किये जाएँ, जहाँ परिवहन, जल एवं अन्य आवश्यक अवसंरचना पूर्व-स्थापित हो।
- यह निजी क्षेत्र तथा NPCIL दोनों के लिये ‘फर्स्ट-पोर’ चरण की अनिश्चितता को दूर करता है, जिससे पूर्व-निर्माण गर्भावधि अवधि में उल्लेखनीय कमी आती है।
- ‘न्यूक्लियर टियर-II’ औद्योगिक आपूर्ति शृंखला को प्रोत्साहन देना: आपूर्ति शृंखला में ‘कुछ ही उत्पादकों पर निर्भरता’ को समाप्त करने हेतु, भारत को न्यूक्लियर-ग्रेड उच्च-सटीकता घटकों के निर्माण में सक्षम MSME के लिये विशेष PLI योजना लागू करनी चाहिये।
- अंतर्राष्ट्रीय गुणवत्ता प्रमाणन (जैसे ASME N-स्टांप) तथा उन्नत धातुकर्म अनुसंधान हेतु लागत सब्सिडी प्रदान कर एक विकेंद्रीकृत, सुदृढ़ विक्रेता आधार विकसित किया जा सकता है।
- यह ‘मिड-टियर’ आपूर्ति शृंखला का स्वदेशीकरण सुनिश्चित करता है, जिससे ‘फ्लीट-मोड’ निर्माण कुछ बड़े औद्योगिक समूहों की सीमित क्षमता के कारण बाधित न हो।
- अंतर्राष्ट्रीय गुणवत्ता प्रमाणन (जैसे ASME N-स्टांप) तथा उन्नत धातुकर्म अनुसंधान हेतु लागत सब्सिडी प्रदान कर एक विकेंद्रीकृत, सुदृढ़ विक्रेता आधार विकसित किया जा सकता है।
- ‘न्यूक्लियर-हाइड्रोजन’ तथा औद्योगिक भाप समन्वय का परिचालन: परमाणु संयंत्रों को ‘बहु-उत्पाद ऊर्जा केंद्रों’ के रूप में पुनः परिकल्पित किया जाना चाहिये, जो हरित हाइड्रोजन उत्पादन तथा औद्योगिक लवण-निर्मूलन के लिये उच्च-ताप भाप का सह-उत्पादन करें।
- परमाणु स्थलों के साथ इलेक्ट्रोलाइज़र्स को सह-स्थित करके भारत ऑफ-पीक बेसलोड ऊर्जा का उपयोग कार्बन-न्यूट्रल ईंधन उत्पादन के लिये कर सकता है, जिससे संयंत्रों का क्षमता उपयोग गुणांक (CUF) बेहतर होता है।
- ग्रिड-विद्युत से परे राजस्व स्रोतों का यह विविधीकरण परमाणु परियोजनाओं को अधिक वित्तपोषण-योग्य बनाता है तथा इन्हें राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के अनुरूप भी स्थापित करता है।
- राष्ट्रीय परमाणु प्रतिभा आपूर्ति प्रणाली की स्थापना: विशेषीकृत मानव संसाधन की संभावित कमी को दूर करने हेतु सरकार को DAE तथा प्रमुख तकनीकी संस्थानों (IITs/NIT) के बीच संयुक्त उपक्रमों पर आधारित ‘द्वि-पथ’ (Dual-Track) शिक्षा मॉडल स्थापित करना चाहिये।
- इसमें ‘कार्य-अध्ययन’ (Work-Study) कार्यक्रम सम्मिलित होंगे, जहाँ विद्यार्थियों की पूर्व-भर्ती कर उन्हें सक्रिय रिएक्टर परिवेश में प्रशिक्षित किया जाएगा, जिससे प्रमाणित परमाणु परिचालकों तथा सुरक्षा अभियंताओं की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित हो सके।
- एक समर्पित’ ‘परमाणु सिविल सेवा’ अथवा विशेषीकृत संवर्ग का सृजन परियोजना प्रबंधन का व्यावसायीकरण करेगा तथा तकनीकी ‘ब्रेन ड्रेन’ को विदेशी बाज़ारों की ओर जाने से कम करेगा।
- केंद्र-राज्य ‘परमाणु-क्रय दायित्व’ (NPO) का समन्वयन: नवीकरणीय क्रय दायित्व (RPO) की सफलता के अनुरूप, केंद्र सरकार को ऊर्जा-गहन उद्योगों तथा राज्य DISCOM के लिये ‘परमाणु क्रय दायित्व’ अनिवार्य करना चाहिये।
- यह निश्चित दर पर सुनिश्चित ‘ऑफ-टेक’ प्रदान करेगा, जिससे परमाणु डेवलपर्स को अल्पकालिक विद्युत विनिमय बाज़ार की मूल्य अस्थिरता से सुरक्षा मिलेगी।
- इस प्रकार का ‘नीतिगत संरक्षण’ यह सुनिश्चित करता है कि परमाणु ऊर्जा की दीर्घकालिक, विश्वसनीय प्रकृति को अनियमित तथा अपेक्षाकृत कम लागत वाली परिवर्ती नवीकरणीय ऊर्जा की तुलना में वित्तीय रूप से उचित महत्त्व मिले।
निष्कर्ष:
भारत का परमाणु ऊर्जा क्षेत्र एक महत्त्वपूर्ण संक्रमण बिंदु पर स्थित है, जहाँ साहसिक विधायी सुधारों तथा प्रौद्योगिकीय प्रगति ने विस्तार के लिये एक मज़बूत आधार निर्मित किया है। हालाँकि, वर्ष 2047 तक 100 GW के महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य की प्राप्ति इस बात पर निर्भर करेगी कि वित्तीय, नियामकीय तथा क्षमता संबंधी बाधाओं का समाधान नवोन्मेषी नीतियों तथा संस्थागत समन्वय के माध्यम से कितनी प्रभावशीलता से किया जाता है। स्वदेशी क्षमताओं, वैश्विक साझेदारियों तथा सतत वित्तपोषण के संतुलित संयोजन के माध्यम से परमाणु ऊर्जा को भारत के स्वच्छ, सुरक्षित तथा सुदृढ़ ऊर्जा भविष्य के एक प्रमुख आधार-स्तंभ के रूप में स्थापित किया जा सकता है।
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दृष्टि मेन्स का प्रश्न: ‘भारत की परमाणु ऊर्जा की प्रगति नीतिगत उद्देश्य से संरचनात्मक परिवर्तन की ओर संक्रमण को दर्शाती है।’ भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र के पुनरुद्धार हेतु किये गए प्रमुख सुधारों का परीक्षण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. भारत के परमाणु क्षेत्र में SHANTI अधिनियम (2025) का क्या महत्त्व है?
SHANTI अधिनियम दीर्घकाल से लंबित नागरिक दायित्व (civil liability) संबंधी समस्या का समाधान करता है, जिससे भारत की रूपरेखा वैश्विक अभिसमयों के अनुरूप हो जाती है तथा निजी एवं विदेशी निवेश आकर्षित होता है। यह सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए एक पूर्वानुमेय विधिक वातावरण निर्मित करता है तथा जैतापुर एवं कोव्वाडा जैसी अवरुद्ध परियोजनाओं को गति प्रदान करता है।
2. PHWR की 'फ्लीट-मोड' तैनाती से भारत के परमाणु कार्यक्रम को क्या लाभ होता है?
फ्लीट-मोड तैनाती रिएक्टर डिज़ाइन का मानकीकरण करती है, निर्माण लागत को कम करती है तथा अनेक स्थलों पर एक साथ विकास को संभव बनाती है। यह घरेलू विनिर्माण को सुदृढ़ करती है तथा अर्थव्यवस्था के माध्यम से दक्षता में वृद्धि करती है।
3. भारत की परमाणु ऊर्जा क्षमता के विस्तार में प्रमुख वित्तीय चुनौतियाँ क्या हैं?
परमाणु परियोजनाओं में प्रारंभिक पूंजी लागत बहुत अधिक होती है और निर्माण अवधि लंबी होती है, जिससे वे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की तुलना में कम आकर्षक साबित होती हैं। 100 गीगावाट के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये भारी निवेश की आवश्यकता है, जिसके लिये निजी भागीदारी और नवीन वित्तपोषण तंत्रों की आवश्यकता होगी।
4. ऊर्जा सुरक्षा के लिये भारत का तीन चरण वाला परमाणु कार्यक्रम क्यों महत्त्वपूर्ण है?
इस कार्यक्रम का उद्देश्य चरणबद्ध तरीके से सीमित यूरेनियम और विशाल थोरियम भंडारों का उपयोग करना है। द्वितीय चरण (PFBR) में प्रगति अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह प्लूटोनियम उत्पादन को सक्षम बनाता है, जो तृतीय चरण में बड़े पैमाने पर थोरियम उपयोग का आधार बनेगा।
5. भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र के विकास को बढ़ावा देने के लिये कौन-से उपाय किये जा सकते हैं?
प्रमुख उपायों में परमाणु ऊर्जा को हरित वित्त ढाँचे में एकीकृत करना, परमाणु पार्कों का विकास करना, घरेलू आपूर्ति शृंखलाओं को मज़बूत करना, परमाणु-हाइड्रोजन समन्वय को बढ़ावा देना और विस्तार का समर्थन करने के लिये कुशल कार्यबल का निर्माण करना शामिल है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ)
प्रिलिम्स:
प्रश्न 1. भारत में, क्यों कुछ परमाणु रिएक्टर ‘आई. ए. ई. ए. सुरक्षा उपायों’ के अधीन रखे जाते हैं जबकि अन्य इस सुरक्षा के अधीन नहीं रखे जाते? (2020)
(a) कुछ यूरेनियम का प्रयोग करते हैं और अन्य थोरियम का
(b) कुछ आयातित यूरेनियम का प्रयोग करते हैं और अन्य घरेलू आपूर्ति का
(c) कुछ विदेशी उद्यमों द्वारा संचालित होते हैं और अन्य घरेलू उद्यमों द्वारा
(d) कुछ सरकारी स्वामित्व वाले होते हैं और अन्य निजी स्वामित्व वाले
उत्तर: (b)
मेन्स
प्रश्न 1. ऊर्जा की बढ़ती हुई ज़रूरतों के परिप्रेक्ष्य में क्या भारत को अपने नाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रम का विस्तार करना जारी रखना चाहिये? नाभिकीय ऊर्जा से संबंधित तथ्यों एवं भयों की विवेचना कीजिये। (2018)