अंतर्राष्ट्रीय संबंध
21वीं सदी के लिये बहुपक्षवाद की पुनर्कल्पना
- 25 Apr 2026
- 207 min read
यह एडिटोरियल 24/04/2026 को द हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित 'Renewing the missing spirit of multilateralism' शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख वैश्विक संकटों और बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण बहुपक्षीय प्रणाली पर बढ़ते दबाव को दर्शाता है।
प्रिलिम्स के लिये: संयुक्त राष्ट्र, सुरक्षा परिषद, पेरिस समझौता, ब्लेचली घोषणा, अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन।
मेन्स के लिये: वैश्विक चुनौतियों के समाधान में बहुपक्षवाद की भूमिका, वैश्विक चुनौतियों से निपटने में बहुपक्षीय संस्थानों की प्रभावशीलता में बाधा डालने वाले प्रमुख मुद्दे।
जलवायु परिवर्तन से लेकर महामारियों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के व्यवधान तक, सीमाओं से परे संकटों के इस युग में कोई भी एक राष्ट्र वैश्विक चुनौतियों का अकेले सामना नहीं कर सकता। लगभग 80 वर्ष पुराने संयुक्त राष्ट्र इस तथ्य का प्रमाण है कि बहुपक्षवाद प्रभावी रहा है: गरीबी में भारी कमी आई है, जीवन प्रत्याशा में वृद्धि हुई है और एक महाशक्ति युद्ध को टाला गया है। फिर भी वर्तमान परिदृश्य में यह व्यवस्था महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता, विखंडित सुरक्षा परिषद, प्रतिस्पर्द्धी बहुपक्षीय गुटों के उदय तथा ग्लोबल नॉर्थ और साउथ के बीच बढ़ते अविश्वास के कारण गंभीर दबाव में है, जिससे यह प्रश्न उभरता है कि क्या बहुपक्षवाद अपना महत्त्व खो रहा है। बहुपक्षवाद एवं कूटनीति का अंतर्राष्ट्रीय दिवस (24 अप्रैल) के परिप्रेक्ष्य में, भारत, जो बहुपक्षीय व्यवस्था का एक दीर्घकालिक स्तंभ तथा लोकतांत्रिक वैधता से संपन्न एक उभरती हुई शक्ति है, एक महत्त्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है— जहाँ वह एक ओर वर्तमान व्यवस्था का हितधारक है, वहीं दूसरी ओर इसके पुनर्निर्माण का संभावित सूत्रधार भी बन सकता है।
वैश्विक चुनौतियों के समाधान में बहुपक्षवाद ने क्या भूमिका निभाई है?
- जलवायु कार्रवाई और पर्यावरण शासन : बहुपक्षवाद विविध राष्ट्रीय नीतियों को वैज्ञानिक वैश्विक सीमाओं के साथ एकीकृत करके सामूहिक पर्यावरणीय कार्रवाई को आगे बढ़ाने के लिये अपरिहार्य तंत्र के रूप में कार्य करता है।
- यह ग्लोबल नॉर्थ और साउथ के बीच जवाबदेही और समान रूप से बोझ साझा करने को संस्थागत रूप देता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि स्थानीय जलवायु प्रभावों को वैश्विक संसाधनों के संयोजन के माध्यम से कम किया जाए।
- पेरिस समझौता एक मूलभूत बहुपक्षीय ढाँचा है जिसने वैश्विक जलवायु नीति को स्वैच्छिक 'टॉप टू बॉटम' लक्ष्यों से सार्वभौमिक जवाबदेही की 'बॉटम टू टॉप' प्रणाली में बदल दिया है।
- इसके अतिरिक्त COP30 (2025) के 'मुतिराओ निर्णय' (Mutirão Decision) ने 190 देशों से जुड़ी 480 से अधिक पहलों को सक्रिय किया।
- यह व्यवस्थित दृष्टिकोण सतत ऊर्जा अर्थव्यवस्थाओं की ओर संक्रमण को गति देने के साथ-साथ पारिस्थितिकी रूप से सबसे कमज़ोर आबादी की सुरक्षा के लिये महत्त्वपूर्ण है।
- वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा: अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य संकटों के लिये बहुपक्षीय ढाँचों की आवश्यकता होती है ताकि जीनोमिक जानकारी को तेज़ी से साझा किया जा सके, संसाधनों का समान वितरण हो सके और समन्वित जैविक रोकथाम रणनीतियों को लागू किया जा सके।
- महामारी संबंधी जानकारियों को केंद्रीकृत करके और क्रय प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करके, अंतर्राष्ट्रीय संस्थान तेज़ी से उत्परिवर्तित होने वाले रोगजनकों के कारण होने वाली गंभीर सामाजिक-आर्थिक बाधाओं को कम करते हैं।
- उदाहरण के लिये, महामारी कोष ने कम आय वाले देशों की सहायता के लिये अरबों डॉलर एकत्र किये।
- WHO के नेतृत्व वाली COVAX सुविधा ने 146 अर्थव्यवस्थाओं को लगभग 2 अरब कोविड-19 वैक्सीन खुराकों का सफल वितरण कर संयुक्त अंतर्राष्ट्रीय खरीद की लॉजिस्टिक्स दक्षता को प्रदर्शित किया है।
- मैक्रोइकोनॉमिक स्थिरता एवं ऋण समाधान: परस्पर जुड़ी वैश्विक वित्तीय संरचनाओं के युग में बहुपक्षीय संस्थाएँ समन्वित वैश्विक मंदी तथा क्रमिक संप्रभु ऋण चूक के विरुद्ध एक महत्त्वपूर्ण शॉक एब्जॉर्बर के रूप में कार्य करती हैं।
- ये संस्थाएँ आपातकालीन तरलता उपलब्ध कराती हैं, मानकीकृत मौद्रिक प्रोटोकॉल लागू करती हैं तथा अति मुद्रास्फीति से प्रभावित बाज़ारों एवं संकटग्रस्त विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को स्थिर करने हेतु जटिल ऋण पुनर्गठन में मध्यस्थता करती हैं।
- यह संरचनात्मक हस्तक्षेप क्षेत्रीय आर्थिक संकटों को वैश्विक वित्तीय संकटों में परिवर्तित होने से रोकता है, साथ ही घरेलू संरचनात्मक सुधारों को भी प्रोत्साहित करता है।
- IMF एवं विश्व बैंक ने ऊर्जा मूल्य व्यवधानों से सर्वाधिक प्रभावित विकासशील देशों के लिये संयुक्त रूप से 150 अरब डॉलर तक की नई वित्तीय सहायता प्रदान करने का वचन दिया है तथा सात वर्ष के अंतराल के बाद वेनेजुएला की कार्यवाहक सरकार के साथ पुनः जुड़ाव स्थापित किया है।
- उभरती प्रौद्योगिकियों एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता का संचालन: तीव्र गति से विकसित हो रही अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों के प्रभावी प्रबंधन हेतु नैतिक सुरक्षा मानकों, अंतरसंचालनीय डिजिटल मानकों तथा सुदृढ़ साइबर सुरक्षा ढाँचों की स्थापना के लिये चुस्त बहुपक्षीय शासन आवश्यक है।
- ऐसे सहयोगात्मक ढाँचे खंडित डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र को रोकते हैं तथा स्वायत्त हथियार प्रणालियों, राज्य-प्रायोजित साइबर युद्ध एवं एल्गोरिथ्मिक पूर्वाग्रहों से उत्पन्न असममित जोखिमों को न्यूनतम करते हैं।
- ब्लेचली घोषणा-पत्र के अंतर्गत अमेरिका एवं चीन जैसे भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों सहित 28 देशों ने अत्याधुनिक AI के अस्तित्वगत जोखिमों से निपटने हेतु एक अभूतपूर्व बहुपक्षीय सहमति स्थापित की।
- इसके अतिरिक्त, इंडिया AI इम्पैक्ट समिट (फरवरी 2026) ‘जोखिम’ केंद्रित दृष्टिकोण से आगे बढ़कर ‘तैनाती एवं प्रभाव’ आधारित शासन मॉडल की ओर संक्रमण का एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है।
- वैश्विक साझा संसाधनों का शासन—बाह्य अंतरिक्ष: बहुपक्षवाद अंतरिक्ष के शस्त्रीकरण को नियंत्रित करने एवं इसे मानवता की साझा संपदा के रूप में सुरक्षित बनाए रखने हेतु एक अनिवार्य ढाँचा प्रदान करता है।
- इन सामूहिक नियमों के अभाव में पृथ्वी की निम्न कक्षा (LEO) का तीव्र व्यावसायीकरण इसे एक अव्यवस्थित एवं अनुपयोगी कक्षीय मलबे के कब्रिस्तान में परिवर्तित कर सकता है।
- अंतरिक्ष में बहुपक्षीय सहयोग केसलर सिंड्रोम के विरुद्ध एक प्राथमिक सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करता है, साथ ही कक्षीय स्लॉट एवं रेडियो आवृत्तियों तक समान पहुँच सुनिश्चित करता है।
- यद्यपि वर्ष 1967 की बाह्य अंतरिक्ष संधि अंतरिक्ष का मूलभूत ‘संविधान’ बनी हुई है, तथापि आधुनिक शासन व्यवस्था को आर्टेमिस समझौते जैसे व्यावहारिक बहुपक्षीय ढाँचों द्वारा आकार दिया जा रहा है।
- वैश्विक जैव विविधता एवं पारिस्थितिकी तंत्रों का पुनरुद्धार: बहुपक्षीय ढाँचे देशों को प्रकृति की बहाली एवं संरक्षण हेतु सत्यापन-योग्य लक्ष्यों से संबद्ध करते हुए जैव विविधता को एक ‘राष्ट्रीय संसाधन’ से परिवर्तित कर ‘वैश्विक संपत्ति’ के रूप में स्थापित करते हैं।
- यह दृष्टिकोण सामूहिक विलुप्ति संकट के विरुद्ध एक एकीकृत वित्तीय एवं वैज्ञानिक मोर्चा निर्मित करता है, जो साधारण प्रतिबद्धताओं से आगे बढ़कर प्रमाण-आधारित जवाबदेही सुनिश्चित करता है।
- नई जैव विविधता वित्त रणनीति सरकारों एवं वित्तीय संस्थानों से अंतर्राष्ट्रीय वित्तपोषण बढ़ाने का आह्वान करती है, जिसका लक्ष्य विकासशील देशों के लिये 2025 तक प्रति वर्ष 20 अरब डॉलर तथा 2030 तक 30 अरब डॉलर उपलब्ध कराना है।
- इसके अतिरिक्त, कैली फंड की स्थापना का उद्देश्य डिजिटल अनुक्रम सूचना (DSI) के उपयोग से उत्पन्न लाभों का निष्पक्ष एवं समान वितरण सुनिश्चित करना है, जिसमें ऐसे डेटा का व्यावसायिक उपयोग करने वाली निजी कंपनियों का योगदान भी शामिल है।
- प्लास्टिक प्रदूषण के व्यवस्थित युग का अंत: बहुपक्षवाद वर्तमान में प्लास्टिक उत्पादन एवं निपटान के संपूर्ण जीवनचक्र पर पहली बार कानूनी रूप से बाध्यकारी नियंत्रण लागू कर वैश्विक विनिर्माण प्रणाली में एक ऐतिहासिक संरचनात्मक परिवर्तन ला रहा है।
- यह ढाँचा खंडित राष्ट्रीय अपशिष्ट नीतियों तथा एकीकृत वैश्विक चक्रीय अर्थव्यवस्था के मध्य विद्यमान अंतर को समाप्त करते हुए उद्योगों को वैश्विक अनुपालन हेतु बाध्य करता है।
- संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा (UNEA 5.2) के निर्देशात्मक ढाँचे के अंतर्गत, राष्ट्र वर्तमान में एक ऐतिहासिक वैश्विक प्लास्टिक संधि पर वार्ता कर रहे हैं, जिसका उद्देश्य प्लास्टिक प्रदूषण के उन्मूलन हेतु एक कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतर्राष्ट्रीय तंत्र की स्थापना करना है।
वैश्विक चुनौतियों के समाधान में बहुपक्षीय संस्थानों की प्रभावशीलता को बाधित करने वाले प्रमुख मुद्दे क्या हैं?
- संस्थागत पक्षाघात एवं वीटो गतिरोध: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) स्थायी सदस्यों (P5) द्वारा वीटो के दुरुपयोग के कारण अपने मूल जनादेश के प्रभावी निर्वहन में क्रमशः अक्षम होती जा रही है।
- इसके परिणामस्वरूप उच्च-जोखिम वाले संघर्षों पर आम सहमति का पूर्ण विघटन हुआ है, जिससे वैश्विक सुरक्षा का यह केंद्रीय स्तंभ निवारक के स्थान पर अधिक प्रतिक्रियात्मक स्वरूप ग्रहण कर चुका है।
- P5 देशों के मध्य गहरे वैचारिक मतभेदों ने UNSC को एक प्रभावी सामूहिक सुरक्षा तंत्र के बजाय महाशक्तियों की प्रतिस्पर्द्धा के मंच में परिवर्तित कर दिया है।
वर्ष 2024 में वीटो के प्रयोग में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई, जहाँ 7 मसौदा प्रस्तावों को अवरुद्ध किया गया (कुल 8 वीटो: रूस–4, अमेरिका–3, चीन–1), जो वर्ष 1986 के पश्चात सर्वाधिक है। - रूस–यूक्रेन युद्ध के समाधान में विफलता, मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव (इज़रायल–ईरान) तथा वेनेजुएला में हस्तक्षेपवादी संकट जैसे उदाहरण इस संस्था के संस्थागत अप्रासंगिकता की ओर बढ़ते चिंताजनक प्रवृत्ति को रेखांकित करते हैं।
- संरचनात्मक वित्तीय कमी एवं ‘डोनर स्क्वीज़’: प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में बढ़ते घरेलू लोकलुभावनवाद तथा विदेशी सहायता (ODA) में कटौती की प्रवृत्ति के कारण बहुपक्षीय संगठन एक अभूतपूर्व तरलता संकट का सामना कर रहे हैं।
- यह व्यवस्था अब ‘कम संसाधनों से अधिक कार्य’ के सिद्धांत से हटकर ‘कम संसाधनों से कम कार्य’ की वास्तविकता की ओर अग्रसर है, जिससे आवश्यक मानवीय एवं विकासात्मक कार्यक्रम जोखिम में पड़ रहे हैं।
- बहुपक्षीय विकास प्रणाली में कुल योगदान में लगभग 15% की गिरावट दर्ज की गई, जो वर्ष 2023 के 107.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर से घटकर वर्ष 2024 में 91.3 बिलियन अमेरिकी डॉलर रह गया।
- इसी प्रकार, संयुक्त राष्ट्र विकास प्रणाली (UNDS) को प्राप्त वित्तपोषण वर्ष 2024 में घटकर 40.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर रह गया, जिसमें वर्ष 2024 में 9.8% तथा 2023 में 2.8% की गिरावट सम्मिलित है।
- ‘मिनिलैटरलिज़्म’ का उदय एवं खंडित शासन: सार्वभौमिक संस्थानों की धीमी नौकरशाही प्रक्रियाओं के संदर्भ में, राज्य अपने विशिष्ट राष्ट्रीय हितों की पूर्ति के लिये छोटे-समूह आधारित ‘मिनिलैटरल’ गठबंधनों (जैसे I2U2 तथा QUAD) की ओर क्रमशः आकर्षित होते जा रहे हैं।
- यद्यपि ये व्यवस्थाएँ गति एवं चपलता प्रदान करती हैं, फिर भी ये प्रायः सार्वभौमिक मानदंडों की उपेक्षा करती हैं, जिससे खंडित वैश्विक शासन संरचना का निर्माण होता है, जिसमें व्यापक वैधता का अभाव रहता है।
- लघुपक्षीयवाद में साझा हितों को सार्वभौमिक मूल्यों पर वरीयता दी जाती है तथा गतिरोध से बचने के लिये पारंपरिक संयुक्त राष्ट्र ढाँचे के बाहर कार्यरत ‘इच्छुक देशों के गठबंधन’ का निर्माण किया जाता है।
- प्रतिनिधित्व का अंतर एवं वैधता संकट: वैश्विक शक्ति संतुलन एवं ‘ब्रेटन वुड्स’ संस्थानों (IMF एवं विश्व बैंक) की शासन संरचनाओं के मध्य एक निरंतर बढ़ती हुई असमानता परिलक्षित होती है।
- उभरती अर्थव्यवस्थाएँ इन संस्थानों को पश्चिमी प्रभाव के ऐतिहासिक उपकरणों के रूप में देखने लगी हैं, जिससे एक गहन वैधता संकट उत्पन्न हो रहा है, जो वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्थाओं के उद्भव को प्रेरित करता है।
- आलोचकों के अनुसार, वैश्विक जनसंख्या में मात्र 4.22% हिस्सेदारी होने के बावजूद अमेरिका के पास IMF में 16.49% मतदान शक्ति है, जो 85% अनुमोदन आवश्यकता के कारण उसे प्रभावी वीटो शक्ति प्रदान करती है।
- इस परिप्रेक्ष्य में यह आशंका व्यक्त की जाती है कि IMF के निर्णय अत्यधिक रूप से अमेरिकी नीतिगत प्रभाव से संचालित होते हैं।
- मानक सहमति एवं अंतर्राष्ट्रीय कानून का क्षरण: सार्वभौमिक ‘नियम-आधारित व्यवस्था’ क्रमशः कमज़ोर होती जा रही है, क्योंकि राज्य अंतर्राष्ट्रीय कानून के प्रति एक ‘बुफे-शैली’ दृष्टिकोण अपनाते हुए केवल उन्हीं मानदंडों का अनुपालन कर रहे हैं, जो उनके तात्कालिक राष्ट्रीय हितों के अनुरूप हैं।
- इस प्रकार के चयनात्मक अनुपालन ने अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) एवं अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) के नैतिक अधिकार को गंभीर रूप से कमज़ोर कर दिया है, जिससे बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में प्रभावी प्रवर्तन लगभग असंभव हो गया है।
- वर्ष 2025 के अंत में माली, बुर्किना फासो एवं नाइज़र के सैन्य शासकों द्वारा ICC से संयुक्त रूप से हटने की घोषणा, वैश्विक न्यायिक निरीक्षण की कथित निष्पक्षता में गिरावट के स्पष्ट संकेत के रूप में देखी जा रही है।
- डिजिटल संप्रभुता का विभाजन एवं प्रौद्योगिकी विखंडन: बहुपक्षवाद कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), साइबर युद्ध एवं डिजिटल अर्थव्यवस्था के तीव्र विकास के साथ प्रभावी समन्वय स्थापित करने में असफल रहा है,
- जिसके परिणामस्वरूप एक ‘विभाजित डिजिटल नेटवर्क’ उभर रहा है, जहाँ प्रौद्योगिकी शासन वैश्विक मानकों के बजाय राष्ट्रीय सुरक्षा प्राथमिकताओं द्वारा संचालित हो रहा है।
- उभरती प्रौद्योगिकियों के लिये एक एकीकृत वैश्विक नियामक ढाँचे के अभाव में निजी निगमों एवं शक्तिशाली राष्ट्रों को मानवाधिकार एवं गोपनीयता के भविष्य को प्रभावित करने की व्यापक छूट प्राप्त हो रही है।
- वर्ष 2026 तक, एक समग्र वैश्विक AI संधि के अभाव के कारण अमेरिका, यूरोपीय संघ एवं चीन में तीन पृथक एवं गैर-अंतरसंचालनीय नियामक व्यवस्थाएँ विकसित हो चुकी हैं, जो प्रौद्योगिकी विखंडन को और अधिक गहरा करती हैं।
बहुपक्षवाद को पुनर्जीवित करने में भारत क्या भूमिका निभा सकता है?
भारत एक महत्त्वपूर्ण सेतु निर्माता के रूप में उभरा है। इसकी भूमिका को प्रायः न केवल इसके आकार से, बल्कि 'विश्व बंधु' (विश्व का मित्र) के रूप में इसकी अनूठी स्थिति से भी परिभाषित किया जाता है।
- 'सुधारित बहुपक्षवाद' का समर्थन करना: भारत की प्राथमिक भूमिका 21वीं सदी की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करने के लिये 20वीं सदी की संस्थाओं (संयुक्त राष्ट्र, IMF, विश्व बैंक) के संरचनात्मक सुधार की वकालत करना है।
- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार: परिषद की वैधता को पुनर्स्थापित करने के लिये अल्पप्रतिनिधित्व वाले क्षेत्रों (अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और स्वयं भारत) के लिये स्थायी प्रतिनिधित्व पर ज़ोर देना चाहिये।
- 'ग्लोबल साउथ' की आवाज़: अपनी अध्यक्षता के दौरान अफ्रीकी संघ को G20 में एकीकृत करके भारत ने यह सिद्ध कर दिया कि वह बहुपक्षवाद को एक विशिष्ट क्लब से अधिक समावेशी मंच में परिणत कर सकता है।
- डिजिटल गवर्नेंस के लिये वैश्विक मानदंड स्थापित करना: भारत एक 'मानव-केंद्रित' डिजिटल व्यवस्था बनाने में अग्रणी के रूप में अपनी स्थिति मज़बूत कर रहा है।
- डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI): 'इंडिया स्टैक' (UPI, आधार) का निर्यात करके, भारत पश्चिम के 'बिग टेक' एकाधिकार और पूर्व के 'क्लोज्ड नेट' मॉडल के लिये एक बहुपक्षीय विकल्प प्रदान करता है।
- AI गवर्नेंस: वैश्विक कृत्रिम बुद्धिमत्ता साझेदारी (GPAI) में केंद्रीय भूमिका निभाते हुए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिये कि AI का विकास नैतिक मानकों के अनुरूप बना रहे तथा विकासशील देशों के लिये सुलभ एवं समावेशी हो।
- हरित परिवर्तन का नेतृत्व: जलवायु बहुपक्षवाद में भारत एक 'नियम मानने वाले' देश से 'नियम बनाने वाले' देश में परिवर्तित हो गया है।
- अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA): ऐसे विशेषीकृत, कार्रवाई-उन्मुख बहुपक्षीय निकायों का निर्माण करना चाहिये जो पारंपरिक प्रशासनिक बाधाओं को दरकिनार कर सकें।
- अंतर्राष्ट्रीय जैव ईंधन गठबंधन: सतत ऊर्जा के लिये वैश्विक मानक बनाने हेतु अपने घरेलू बाज़ार का लाभ उठाना चाहिये।
- 'सर्वसम्मति निर्माता' के रूप में कार्य करना: ध्रुवीकृत दुनिया (पूर्व बनाम पश्चिम / उत्तर बनाम दक्षिण) में, भारत एक कूटनीतिक 'निर्णायक शक्ति' के रूप में कार्य करता है।
- रणनीतिक स्वायत्तता: क्वाड से लेकर BRICS तक, सभी पक्षों से संवाद करने की भारत की क्षमता, पारंपरिक बहुपक्षीय चैनलों के विफल होने पर संवाद को सुगम बनाने में सहायक होती है।
- मुद्दे-आधारित गठबंधन: भारत 'मिनिलैटरलिज़्म' (जैसे: I2U2 या क्वाड) को संयुक्त राष्ट्र के प्रतिस्थापन के रूप में नहीं, बल्कि समुद्री सुरक्षा और आपूर्ति शृंखला की समुत्थानशीलता में परिणाम देने के लिये एक कार्यात्मक पूरक के रूप में बढ़ावा देता है।
- वैश्विक स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा को पुनर्परिभाषित करना: भारत बहुपक्षीय प्रणाली की बुनियादी मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति में विद्यमान कमियों को दूर करने हेतु ‘विश्व की औषधालय’ के रूप में अपनी स्थिति तथा अपनी कृषि क्षमता का प्रभावी उपयोग कर रहा है।
- वैक्सीन मैत्री और ट्रिप्स छूट: महामारी के दौरान, विश्व व्यापार संगठन (WTO) में टीकों पर पेटेंट छूट के लिये भारत के प्रयासों ने 'ग्लोबल नॉर्थ' पूर्वाग्रह को चुनौती दी और एक बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली की अनुशंसा की जो कॉर्पोरेट मुनाफे पर सार्वजनिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देती है।
- पोषण संबंधी बहुपक्षवाद: संयुक्त राष्ट्र को 'अंतर्राष्ट्रीय कदन्न वर्ष' घोषित करने के लिये प्रेरित करके, भारत ने वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिये एक नए एजेंडे को सफलतापूर्वक आगे बढ़ाया है जो जलवायु-अनुकूल फसलों पर केंद्रित है और खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के अनुसरण के लिये एक स्थायी मॉडल प्रस्तुत करता है।
21वीं सदी में बहुपक्षवाद को मज़बूत करने के लिये कौन-से उपाय अपनाए जा सकते हैं?
- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का न्यायसंगत पुनर्गठन: वैश्विक शांति प्रवर्तन की घटती वैधता को पुनःस्थापित करने के लिये, UNSC को 1945 के 'विजेताओं के क्लब' से वर्ष 2026 के लिये तैयार 'सप्तकोणीय' शक्ति मॉडल में परिवर्तन से गुज़रना होगा।
- इसमें जनसांख्यिकीय और आर्थिक प्रतिनिधित्व के अंतर को समाप्त करने के लिये अल्पप्रतिनिधित्व वाले क्षेत्रों, विशेष रूप से अफ्रीका और G4 देशों के लिये स्थायी सीटों की एक नई श्रेणी का तत्काल सृजन शामिल है।
- इस उपाय को मज़बूत करने के लिये एक अनिवार्य 'वीटो औचित्य प्रक्रिया' की आवश्यकता है, जिसमें एक 'समीक्षा खंड' भी शामिल हो, जो वैश्विक सार्वजनिक वस्तुओं में योगदान के आधार पर प्रत्येक 15 वर्ष में स्थायी स्थिति का पुनर्मूल्यांकन करे।
- वैश्विक वित्तीय संरचनाओं का आमूल लोकतंत्रीकरण: ग्लोबल नॉर्थ एवं साउथ के बीच विश्वास की कमी को दूर करने के लिये, बहुपक्षवाद को प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व से आगे बढ़कर अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों (IFI) के मौलिक सुधार की ओर बढ़ने की आवश्यकता है।
- 21वीं सदी की आर्थिक वास्तविकताओं को परिलक्षित करने हेतु मतदान भार का पुनर्संतुलन करते हुए तथा ‘जलवायु-अनुकूल ऋण खंडों’ का समावेशन कर, यह प्रणाली राष्ट्रीय संप्रभुता का उल्लंघन किये बिना आवश्यक वार्षिक SDG वित्तपोषण सुनिश्चित कर सकती है।
- ऐसा उपाय बहुपक्षवाद को ऋणदाता-ऋणी पदानुक्रम से बदलकर वैश्विक सार्वजनिक हितों के लिये एक क्षैतिज साझेदारी में परिवर्तित कर देता है।
- सार्वभौमिक निकायों के साथ 'मिनिलैटरल' तालमेल को संस्थागत रूप देना: मुद्दे-आधारित, लचीले गठबंधनों या 'मिनिललैटरलिज़्म' के उदय को एक खतरे के रूप में नहीं बल्कि संयुक्त राष्ट्र के लिये एक मॉड्यूलर सुदृढ़ीकरण के रूप में देखा जाना चाहिये।
- बहुपक्षवाद को सशक्त करने के लिये एक औपचारिक ‘इंटरफेस तंत्र’ स्थापित करना आवश्यक है, जिसके माध्यम से अफ्रीकी संघ, ASEAN और BRICS+ जैसे क्षेत्रीय समूह सीधे संयुक्त राष्ट्र महासभा तक नीतिगत सहमति पहुँचाने में सक्षम हों।
- यह 'ग्लोकल' (Glocal) दृष्टिकोण सुनिश्चित करता है कि सुरक्षा या व्यापार के लिये स्थानीय समाधानों को बड़े पैमाने पर लागू किया जाए, जिससे वैश्विक शासन का प्रतिस्पर्द्धी ध्रुवों में विखंडन रोका जा सके।
- वैश्विक डिजिटल कॉमन्स का मानक शासन: अति-कनेक्टिविटी के युग में, खंडित 'स्प्लिंटरनेट' को रोकने के लिये बहुपक्षवाद को 'डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI)' तक अपने अधिकार क्षेत्र का विस्तार करना चाहिये।
- व्यावहारिक कार्यान्वयन में एक वैश्विक डिजिटल समझौते का अंगीकरण शामिल है जो डेटा सॉवरेनिटी, AI सुरक्षा और सीमा पार डिजिटल पहचान के लिये अंतर-संचालनीय मानक स्थापित करता है।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर एक अंतर्राष्ट्रीय स्वतंत्र वैज्ञानिक पैनल की स्थापना IPCC की सफलता को प्रतिबिंबित करेगी, जो आभासी क्षेत्र में सामूहिक नीति-निर्माण के लिये एक तटस्थ, साक्ष्य-आधारित आधार प्रदान करेगी।
- एक 'बहुकेंद्रित' शांति और सुरक्षा ढाँचे की ओर संक्रमण: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के गतिरोध के कारण बहुकेंद्रित शांति स्थापना की ओर परिवर्तन आवश्यक हो गया है, जहाँ सुरक्षा का भार विभिन्न भू-राजनीतिक अभिनेताओं के बीच अधिक समान रूप से साझा किया जाता है।
- इस स्तंभ को मज़बूत करने के लिये 'UN80 इनिशिएटिव' सुधारों को लागू करना आवश्यक है, विशेष रूप से सामूहिक अत्याचारों के मामलों में 'वीटो-संयम' सिद्धांत पर ध्यान केंद्रित करना तथा कम प्रतिनिधित्व वाले क्षेत्रों में स्थायी सीटों का विस्तार करना।
- व्यावहारिक रूप से इसमें 'शांति निर्माण केंद्र' बनाना शामिल है जो क्षेत्रीय संगठनों को संयुक्त राष्ट्र के निर्धारित योगदान से अनिवार्य वित्तीय सहायता के साथ प्रारंभिक मध्यस्थता प्रयासों का नेतृत्व करने के लिये सशक्त बनाते हैं। यह विकेंद्रीकरण सुनिश्चित करता है कि बहुपक्षीय सुरक्षा प्रतिक्रियाएँ तीव्र हों, सांस्कृतिक रूप से अधिक सूक्ष्म हों तथा महाशक्तियों के गतिरोध से कम प्रभावित हों।
- संप्रभु निर्णय लेने की प्रक्रिया में 'भविष्य की पीढ़ियों' को एकीकृत करना: वैश्विक जलवायु और जैव सुरक्षा प्रयासों को प्रभावित करने वाले अल्पकालिक दृष्टिकोण से निपटने के लिये, बहुपक्षवाद को अंतर-पीढ़ीगत न्याय को एक विधिक एवं प्रक्रियात्मक मानदंड के रूप में अपनाने की आवश्यकता है।
- राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय निकायों के भीतर 'दूरदर्शिता शासन' उपकरणों को संस्थागत रूप देकर, राज्य 'GDP से परे' एक ऐसे मीट्रिक की ओर बढ़ सकते हैं, जो दीर्घकालिक पारिस्थितिक स्थिरता एवं सामाजिक पूंजी को महत्त्व देता है।
- यह उपाय सुनिश्चित करता है कि बहुपक्षीय समझौते केवल वर्तमान संकटों पर प्रतिक्रियात्मक न हों, बल्कि संरचनात्मक रूप से इस तरह से तैयार किये गए हों कि आने वाली पीढ़ियों के हितों की रक्षा की जा सके।
- विज्ञान-कूटनीति और प्रौद्योगिकी-अंतरण जनादेश को मज़बूत करना: वैश्विक व्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिये बौद्धिक संपदा संरक्षणवाद से हटकर जीवन रक्षक प्रौद्योगिकियों और हरित नवाचारों के लिये 'वैश्विक साझा संसाधन' दृष्टिकोण की ओर संक्रमण की आवश्यकता है।
- व्यावहारिक सुदृढ़ीकरण में एक बहुपक्षीय प्रौद्योगिकी बैंक का निर्माण शामिल है जो विकासशील देशों को डीकार्बोनाइज़ेशन पेटेंट के अंतरण पर सब्सिडी देकर 'न्यायपूर्ण संक्रमण' को सुगम बनाता है।
- विश्व व्यापार संगठन (WTO) के तहत व्यापार लाभों को 'प्रौद्योगिकी साझाकरण समझौतों' से जोड़कर, अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में प्रतिस्पर्द्धा की तुलना में सहयोग को प्रोत्साहित कर सकती है।
निष्कर्ष:
परस्पर संबद्ध वैश्विक संकटों के इस युग में बहुपक्षवाद अपरिहार्य बना हुआ है, फिर भी संरचनात्मक असमानताओं, भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और संस्थागत जड़ता के कारण इसकी प्रभावशीलता लगातार सीमित होती जा रही है। इसलिये वैधता, समावेशिता और जवाबदेही को पुनःस्थापित करने के लिये सुधार वैकल्पिक नहीं बल्कि आवश्यक है। भारत, अपनी समन्वय क्षमता और 'सुधारित बहुपक्षवाद' के प्रति प्रतिबद्धता के साथ इस परिवर्तन में उत्प्रेरक भूमिका निभा सकता है। वैश्विक शासन को समकालीन वास्तविकताओं के अनुरूप ढालकर और सहकारी ढाँचों को मज़बूत करके, बहुपक्षवाद एक तनावपूर्ण प्रणाली से विकसित होकर वैश्विक जनहित का एक समुत्थानशील साधन बन सकता है।
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दृष्टि मेन्स का प्रश्न: “न्यायसंगत वैश्विक व्यवस्था के लिये सुधारित बहुपक्षवाद आवश्यक है।” भारत की विदेश नीति के संदर्भ में इसका विश्लेषण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. बहुपक्षवाद क्या है और आज यह क्यों महत्त्वपूर्ण है?
बहुपक्षवाद का तात्पर्य संयुक्त राष्ट्र, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन जैसी संस्थाओं के माध्यम से कई देशों के बीच सहयोग से वैश्विक मुद्दों का समाधान करना है। यह आज के समय में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि जलवायु परिवर्तन, महामारी एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता के प्रबंधन जैसी चुनौतियाँ अंतर्राष्ट्रीय हैं और किसी एक राष्ट्र द्वारा इनका प्रबंधन नहीं किया जा सकता है।
2. 21वीं सदी में बहुपक्षवाद संकट का सामना क्यों कर रहा है?
यह महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के वीटो की निष्क्रियता, वित्त पोषण में गिरावट (वर्ष 2024 में 15% की गिरावट के साथ 91.3 बिलियन डॉलर तक) और IMF जैसे संस्थानों में वैधता की कमी के कारण दबाव में है, जहाँ मतदान शक्ति विकसित देशों की ओर झुकी हुई है।
3. बहुपक्षवाद ने वैश्विक शासन में किस प्रकार योगदान दिया है?
इसने जलवायु समझौतों (पेरिस समझौता), महामारी से निपटने (COVAX द्वारा लगभग 2 अरब खुराक की आपूर्ति), वित्तीय स्थिरता (IMF का समर्थन) और वैश्विक साझा संसाधनों के शासन (बाह्य अंतरिक्ष संधि) को सक्षम बनाया है, जिससे समन्वित वैश्विक कार्रवाई सुनिश्चित हुई है।
4. बहुपक्षवाद को मज़बूत करने में भारत क्या भूमिका निभा सकता है?
भारत ग्लोबल नॉर्थ और साउथ के बीच एक सेतु की भूमिका निभाता है, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सुधारों की अनुशंसा करता है, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (इंडिया स्टैक) को बढ़ावा देता है, ISA जैसी जलवायु पहलों का नेतृत्व करता है, और G20 विस्तार (AU इन्क्लूज़न) जैसे समावेशी मंचों को आगे बढ़ाता है।
5. बहुपक्षीय संस्थानों को पुनर्जीवित करने के लिये किन सुधारों की आवश्यकता है?
प्रमुख सुधारों में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का विस्तार, IMF कोटा सुधार, वीटो के उपयोग का विनियमन, लघु पार्श्व समूहों का एकीकरण, डिजिटल शासन ढाँचे को मज़बूत करना और सतत वित्तपोषण तंत्र को बढ़ावा देना शामिल है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ)
प्रिलिम्स:
प्रश्न 1. संयुक्त राष्ट्र महासभा के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2022)
- UN महासभा, गैर-सदस्य राज्यों को प्रेक्षक स्थिति प्रदान कर सकती है।
- अंत:सरकारी संगठन UN महासभा में प्रेक्षक स्थिति पाने का प्रयत्न कर सकते हैं।
- UN महासभा में स्थायी प्रेक्षक UN मुख्यालय में मिशन बनाए रख सकते हैं।
उपर्युक्त कथनों में कौन-से सही हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (d)
प्रश्न 2. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2019)
1. भ्रष्टाचार के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन [यूनाइटेड नेशन्स कन्वेंशन अगेंस्ट करप्शन (UNCAC)] का ‘भूमि, समुद्र और वायुमार्ग से प्रवासियों की तस्करी के विरुद्ध एक प्रोटोकॉल’ होता है।
2. UNCAC अब तक का सबसे पहला विधित: बाध्यकारी सार्वभौम भ्रष्टाचार-निरोधी लिखत है।
3. राष्ट्र-पार संगठित अपराध के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन अगेंस्ट ट्रांसनैशनल ऑर्गेनाइज़्ड क्राइम (UNTOC)] की एक विशिष्टता ऐसे एक विशिष्ट अध्याय का समावेशन है, जिसका लक्ष्य उन संपत्तियों को उनके वैध स्वामियों को लौटाना है जिनसे वे अवैध तरीके से ले ली गई थीं।
4. मादक द्रव्य और अपराध विषयक संयुक्त राष्ट्र कार्यालय ख्यूनाइटेड नेशंस ऑफिस ऑन ड्रम्स एंड क्राइम (UNODC)] संयुक्त राष्ट्र के सदस्य राज्यों द्वारा UNCAC और UNTOC दोनों के कार्यान्वयन में सहयोग करने के लिये अधिदेशित है।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(a) केवल 1 और 3
(b) केवल 2, 3 और 4
(c) केवल 2 और 4
(d) 1, 2, 3 और 4
उत्तर: (c)
मेन्स
प्रश्न 1. कोविड-19 महामारी के दौरान वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान करने में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लू.एच.ओ.) की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिये।(2020)
प्रश्न 2. संयुक्त राष्ट्र आर्थिक एवं सामाजिक परिषद (ECOSOC) के प्रमुख कार्य क्या हैं? इसके साथ संलग्न विभिन्न प्रकार्यात्मक आयोगों को स्पष्ट कीजिये। (2017)