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भारत की खाद्य सुरक्षा पर पुनर्विचार

  • 01 May 2026
  • 203 min read

यह लेख 24 /04/2026 को द हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित 'India’s food security is largely dependent on the Persian Gulf' शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख भारत के रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन तथा आयातित उर्वरकों एवं हाइड्रोकार्बन पर इसकी गहन निर्भरता के मध्य विद्यमान संतुलन का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। साथ ही, यह भू-राजनीतिक एवं जलवायु संबंधी व्यवधानों के संदर्भ में भारत के पोषण भविष्य को सुरक्षित करने हेतु डिजिटल अवसंरचना से लेकर चक्रीय कृषि विज्ञान तक एक परिवर्तनकारी रोडमैप की रूपरेखा भी प्रस्तुत करता है।

प्रिलिम्स के लिये: पीएम-प्रणाम, एग्रीस्टैक, शून्य बजट प्राकृतिक खेती, जैव-पौधारोपण,  नैनो यूरिया

मेन्स के लिये: भारत में खाद्य सुरक्षा को सुदृढ़ करने के लिये सरकार द्वारा उठाये गए कदम तथा भारत में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में प्रमुख बाधाएँ 

 भारत की खाद्य सुरक्षा की संरचना विरोधाभासी प्रकृति की है। 33 करोड़ टन (2023-24) से अधिक के रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन के बावजूद, देश खाद्यान्न पर अत्यधिक निर्भर है। खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि हेतु आवश्यक कच्चे माल (DAP) का लगभग 56% तथा पोटाश की 100% आवश्यकता आयात के माध्यम से पूर्ण की जाती है, जिसका अधिकांश भाग होर्मुज़ जलडमरूमध्य के मार्ग से आता है। उर्वरक क्षेत्र का आयात बिल 24.3 अरब डॉलर (2021-22) रहा, जो अंतर्निहित कमज़ोरियों को स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है। अतः वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भारत की खाद्य सुरक्षा केवल घरेलू उत्पादन पर निर्भर नहीं, बल्कि वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं तथा भू-राजनीतिक कारकों पर भी व्यापक रूप से निर्भर हो गई है।

भारत ने खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिये क्या कदम उठाए हैं?

  • जलवायु-अनुकूल आनुवंशिकी तथा फसल बायोफोर्टिफिकेशन: भारत सक्रिय रूप से फसलों का बायोफोर्टिफिकेशन कर रहा है तथा जलवायु-अनुकूल बीज किस्मों का प्रसार कर रहा है, ताकि अनियमित मौसम प्रतिरूपों तथा बढ़ते तापमान के प्रभाव से उत्पादन का उत्पादकता वर्द्धन सुनिश्चित किया जा सके।
    • यह आनुवंशिक परिवर्तन एक ओर मूलभूत पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करता है, वहीं दूसरी ओर जलवायु परिवर्तन से प्रेरित चरम अस्थिरता के विरुद्ध कृषि उत्पादन को स्थिर बनाता है।
    • भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने वर्ष 2024 में 61 फसलों में 109 उच्च उपज वाली, जलवायु-प्रतिरोधी किस्में जारी कीं, जो विशेष रूप से तीव्र सूखा एवं ऊष्मा सहनशीलता को लक्षित करती हैं।
    • फलस्वरूप, जलवायु-प्रतिरोधी किस्में अब गेहूँ की कुल बोई गई भूमि के 60% से अधिक क्षेत्र में विस्तार कर चुकी हैं, जिससे हालिया अत्यधिक ऊष्मा-तरंगों के दौरान उत्पादन हानि को प्रभावी रूप से कम किया जा सका है। 
  • एग्रीस्टैक के माध्यम से डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना: सरकार सटीक कृषि तथा लक्षित ऋण वितरण को सक्षम बनाने हेतु सुदृढ़ DPI के माध्यम से कृषि प्रशासन में संरचनात्मक परिवर्तन ला रही है।
    • यह डेटा-संचालित पारिस्थितिकी तंत्र सूचनात्मक विषमता को न्यूनतम करता है, सूक्ष्म स्तर पर संसाधन आवंटन का अनुकूलन करता है तथा सब्सिडी में विद्यमान प्रणालीगत क्षति को कम करता है।
    • 'एग्रीस्टैक' पहल के अंतर्गत, लाखों किसानों को डिजिटल ID प्रदान की गई हैं, जो डिजिटल भूमि अभिलेखों को गतिशील फसल बुवाई डेटा के साथ एकीकृत करती हैं।
    • इसके अतिरिक्त, केंद्रीय बजट 2026-27 में प्रारंभ किया गया बहुभाषी, AI-संचालित, वॉयस-फर्स्ट डिजिटल प्लेटफॉर्म ‘Bharat-VISTAAR’ का उद्देश्य सरकार के डेटा तथा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) से प्राप्त वैज्ञानिक इनपुट को एकीकृत कर किसानों को रीयल-टाइम, स्थान-विशिष्ट कृषि परामर्श प्रदान करना है। 
  • भू-राजनीतिक जोखिम को कम करने के लिये वैकल्पिक उर्वरक: खाद्य सुरक्षा को अस्थिर भू-राजनीतिक हाइड्रोकार्बन व्यवधानों से पृथक करने के उद्देश्य से भारत जैव-उर्वरकों तथा नैनो तकनीक की ओर संक्रमण को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित कर रहा है।
    • यह रणनीतिक परिवर्तन एक ओर क्षीण हो चुके मृदा पारिस्थितिक तंत्रों के पुनर्स्थापन में सहायक है, वहीं दूसरी ओर आयात-निर्भर उर्वरक सब्सिडी के भारी बोझ को कम करता है, जो राजकोषीय स्वास्थ्य पर दबाव डालता है।
    • PM-PRANAM योजना ने राज्यों को रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में कमी लाने हेतु प्रभावी रूप से प्रोत्साहित किया है, जिसके परिणामस्वरूप सहभागी क्षेत्रों में पारंपरिक यूरिया के उपयोग में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है।
      • उदाहरणार्थ, PM-PRANAM योजना के अंतर्गत, जो राज्य उपभोग में कमी लाते हैं, उन्हें सब्सिडी बचत के 50% के समतुल्य अनुदान प्रदान किया जाता है।
      • इसके अतिरिक्त, नैनो यूरिया तथा नैनो DAP के तीव्र घरेलू विस्तार ने पारंपरिक आयात के लाखों टन को प्रतिस्थापित किया है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार में अरबों रुपये की बचत सुनिश्चित हुई है। 
  • विकेंद्रीकृत सहकारी भंडारण नेटवर्क: फसल कटाई उपरांत संरचनात्मक कमज़ोरियों के निराकरण हेतु भारत स्थानीय सहकारी समितियों द्वारा संचालित विश्व का सबसे बड़ा विकेंद्रीकृत अनाज भंडारण नेटवर्क विकसित कर रहा है।
    • यह अवसंरचनात्मक सुधार संकटग्रस्त बिक्री को रोकने, परिवहन जनित बर्बादी को कम करने तथा उत्पादन केंद्रों के समीप भंडारण सुनिश्चित कर स्थानीय खाद्य संप्रभुता को सुदृढ़ करने में सहायक होगा।
    • भारत सरकार द्वारा सहकारी क्षेत्र में 'विश्व की सबसे बड़ी अनाज भंडारण योजना' का सक्रिय क्रियान्वयन किया जा रहा है, जिसका लक्ष्य 700 लाख मीट्रिक टन (LMT) की स्थानीय भंडारण क्षमता स्थापित करना है।
    • प्रायोगिक क्षेत्रों में, इस स्थानीय भंडारण मॉडल ने पहले ही फसल कटाई उपरांत हानि को कम किया है (जैसे, बालाघाट, मध्य प्रदेश) तथा गोदाम रसीद वित्तपोषण के माध्यम से किसानों को प्राप्त मूल्य में वृद्धि सुनिश्चित की है। 
  • पोषक खाद्यान्न एवं पारिस्थितिकी खेती को मुख्यधारा में लाना: भारत सूखा-रोधी एवं अत्यधिक पौष्टिक बाजरा (श्री अन्न) को खाद्य सुरक्षा के प्रमुख आधार के रूप में पुनर्जीवित करते हुए अपनी जल-गहन कृषि प्रणाली का पुनर्गठन कर रहा है।
    • यह पारिस्थितिकी परिवर्तन जहाँ जल संसाधनों की न्यूनतम आवश्यकता सुनिश्चित करता है, वहीं देशव्यापी प्रच्छन्न भुखमरी तथा सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी को भी प्रभावी रूप से संबोधित करता है।
    • हालिया प्रगति के परिणामस्वरूप, बाजरा खरीद में 15 गुना से अधिक वृद्धि दर्ज की गई है तथा बाजरा उत्पादों का मूल्य 2021-22 से 2024-25 के मध्य छह गुना बढ़ा है।
    • पीएम पोषण  जैसे राज्य पोषण कार्यक्रमों में इसके रणनीतिक एकीकरण ने कृषि मूल्य को प्रोत्साहन प्रदान किया है, जिससे शुष्क भूमि कृषि पुनः आर्थिक रूप से व्यवहार्य बन रही है। 
  • जल-स्थिरता हेतु सटीक सूक्ष्म सिंचाई: भूजल क्षरण की तीव्रता को ध्यान में रखते हुए, राज्य प्रति बूंद अधिक फसल सुनिश्चित करने के लिये सटीक जल प्रबंधन तंत्रों पर व्यापक सब्सिडी प्रदान कर रहा है।
    • भारत के जल-संकटग्रस्त कृषि क्षेत्रों में दीर्घकालिक उत्पादकता बनाए रखने हेतु मांग-पक्षीय जल प्रबंधन अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध हो रहा है।
    • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) के अंतर्गत सूक्ष्म सिंचाई कोष ने लाखों हेक्टेयर भूमि को उन्नत ड्रिप एवं स्प्रिंकलर प्रणालियों के अंतर्गत लाने में सफलता प्राप्त की है।
    • इन प्रौद्योगिकियों को अपनाने वाले क्षेत्रों में जल उपयोग में 30-40% तक की निरंतर कमी तथा उत्पादकता वृद्धि दर्ज की गई है (नीति आयोग के अनुमानों के अनुसार)।
  • खाद्य प्रसंस्करण विस्तार के माध्यम से मूल्यवर्द्धन: भारत अपनी कृषि अर्थव्यवस्था को कच्चे उत्पादन से मूल्यवर्द्धित प्रसंस्करण की दिशा में संरचनात्मक रूप से रूपांतरित कर रहा है, जिससे मूल्य व्यवधानों को अवशोषित किया जा सके।
    • प्रसंस्करण क्षमता के त्वरित विस्तार से नाशवान वस्तुओं की आपूर्ति शृंखला बाधाएँ कम होती हैं तथा एक सुदृढ़, स्थानीयकृत ग्रामीण विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण होता है।
    • खाद्य प्रसंस्करण हेतु 10,900 करोड़ रुपये की उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना ने कोल्ड चेन तथा प्रसंस्करण अवसंरचना में व्यापक निजी निवेश को आकर्षित किया है।
    • भारत की बढ़ती वैश्विक उपस्थिति इस तथ्य से परिलक्षित होती है कि प्रसंस्कृत खाद्य निर्यात की हिस्सेदारी 2014-15 के 13.7% से बढ़कर 2024-25 में 20.4% हो गई है।
  • जलवायु-अनुकूल पैरामीट्रिक फसल बीमा: जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न वित्तीय जोखिमों से कृषि समुदाय की सुरक्षा हेतु भारत ने अपने कृषि बीमा ढाँचे में व्यापक सुधार किये हैं।
    • उन्नत उपग्रह इमेजरी तथा ड्रोन-आधारित उपज आकलन के उपयोग से दावों के त्वरित निपटान को सुनिश्चित किया गया है, जिससे आपदा उपरांत ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आवश्यक तरलता बनी रहती है।
    • संशोधित प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) अब AI-संचालित उपज मूल्यांकन का उपयोग करती है, जिससे दावा निपटान अवधि कई महीनों से घटकर कुछ ही सप्ताहों तक सीमित हो गई है।
    • असमयिक मौसमीय आपदाओं के बावजूद ग्रामीण खपत को स्थिर बनाए रखने हेतु लाखों किसानों को 1.8 लाख करोड़ रुपये से अधिक के दावों का प्रभावी वितरण किया गया है।

भारत में खाद्य सुरक्षा को बाधित करने वाले प्रमुख कारक कौन-से हैं?

  • जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पादन अस्थिरता: चरम मौसमीय अनियमितताएँ तथा तेज़ी से परिवर्तित होते मानसूनी पैटर्न पारंपरिक बुवाई चक्रों को गंभीर रूप से बाधित कर रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप समग्र कृषि उत्पादन में कमी आ रही है।
    • यह जलवायु-जनित अस्थिरता दीर्घकालिक आधारभूत उत्पादन क्षमता के लिये जोखिम उत्पन्न करती है, जिससे पूर्वानुमानित खाद्य खरीद की प्रासंगिकता तेज़ी से कमज़ोर हो रही है।
    • अनुमानों के अनुसार, तापमान में 2.5 से 4.9 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि से गेहूँ की पैदावार में 41-52% तथा चावल में 32-40% तक की गिरावट संभव है।
  • भू-राजनीतिक उर्वरक निर्भरता: आयातित हाइड्रोकार्बन-आधारित उर्वरकों पर भारत की संरचनात्मक निर्भरता पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक व्यवधानों तथा आपूर्ति शृंखला व्यवधानों के प्रति व्यापक प्रणालीगत भेद्यता उत्पन्न करती है।
    • आयातित मुद्रास्फीति से कृषि लागत में प्रत्यक्ष वृद्धि होती है, जिससे कृषि की आर्थिक व्यवहार्यता प्रभावित होती है तथा राजकोषीय घाटा में तीव्र वृद्धि होती है।
    • हाल ही में वर्ष 2026 में अमेरिका-ईरान तनाव ने यह स्पष्ट किया कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य में संभावित व्यवधान से खाड़ी क्षेत्र से आपूर्ति होने वाली अमोनिया का 80% से अधिक भाग जोखिम में पड़ सकता है।
    • प्राकृतिक गैस की सीमित उपलब्धता के कारण मार्च 2026 में भारत के यूरिया उत्पादन में 0.8 मिलियन टन (लगभग 30% कमी) की गिरावट दर्ज की गई, जिससे भविष्य में आपूर्ति संकट की आशंका बढ़ी है।
    • यदि वैश्विक कीमतें उच्च बनी रहती हैं, तो वर्ष 2026-27 के लिये उर्वरक सब्सिडी (लगभग 18.38 बिलियन डॉलर) बढ़कर लगभग 21.5 बिलियन डॉलर तक पहुँच सकती है। 
  • भूजल का भीषण ह्रास: सब्सिडी युक्त बिजली तथा जल-गहन फसलों के पक्ष में असंतुलित खरीद नीतियों के कारण प्रमुख खाद्य उत्पादक क्षेत्रों में भूजल भंडारों का तीव्र ह्रास हुआ है।
    • यह अस्थिर जल दोहन प्रक्रिया भारत के सर्वाधिक उत्पादक अन्न भंडार क्षेत्रों के मूलभूत कृषि अस्तित्व के लिये गंभीर खतरा उत्पन्न करती है।
    • हालिया उपग्रह जल विज्ञान आँकड़ों के अनुसार हरियाणा, पंजाब तथा राजस्थान में भूजल दोहन का स्तर 100% से अधिक पहुँच चुका है।
      • इसके अतिरिक्त, जल शक्ति मंत्रालय के 2017 आकलन के अनुसार, देश की 6,881 मूल्यांकन इकाइयों (ब्लॉक/तालुका) में से 1,186 इकाइयाँ अत्यधिक दोहन की श्रेणी में हैं, जो लगभग 17% है, अर्थात प्रत्येक छह में से एक इकाई में तत्काल मरुस्थलीकरण का जोखिम विद्यमान है।
  • कटाई-पश्चात लॉजिस्टिक्स संबंधी कमी: हालिया स्थानीयकृत भंडारण प्रयासों के बावजूद, भारत का अत्यधिक खंडित कोल्ड-चेन बुनियादी ढाँचा नाशवान वस्तुओं की फसल कटाई के बाद बड़े पैमाने पर गिरावट का कारण बनता रहता है। 
    • यह लॉजिस्टिक अवरोध खाद्य मुद्रास्फीति को बढ़ाता है, तीव्र मौसमी अभाव उत्पन्न करता है तथा  अंततः किसानों को मिलने वाले मूल्य को बुरी तरह प्रभावित करती है। 
    • प्रणालीगत कोल्ड-चेन कमियों के परिणामस्वरूप प्रतिवर्ष ₹1.5 ट्रिलियन से अधिक की कटाई-पश्चात हानि होती है, जो विशेष रूप से बागवानी उत्पादों को प्रभावित करती है।
    • हालिया बाज़ार आँकड़े दर्शाते हैं कि टमाटर की फसलें परिवहन के दौरान नियमित रूप से नष्ट हो जाती हैं, जिससे खुदरा मूल्यों में अचानक तीव्र वृद्धि होती है। 
  • भूमि स्वामित्व का अत्यधिक विखंडन: कृषि भूमि के निरंतर पीढ़ीगत उपविभाजन के परिणामस्वरूप अति-विखंडित एवं आर्थिक रूप से अव्यवहार्य सूक्ष्म जोतों का विस्तार हुआ है, जो स्वाभाविक रूप से आधुनिक मशीनीकरण को अपनाने में बाधक हैं।
    • यह संरचनात्मक विखंडन अर्थव्यवस्थाओं को अवरुद्ध करता है, संस्थागत ऋण तक पहुँच को गंभीर रूप से सीमित करता है तथा किसानों को ऋण के दुष्चक्र में फँसा देता है।
    • नवीनतम कृषि जनगणना के अनुसार, 86% से अधिक किसान अब लघु एवं सीमांत श्रेणी में आते हैं, जिनके पास दो हेक्टेयर से कम भूमि उपलब्ध है।
    • ये सूक्ष्म जोतें 10,000 रुपये से अधिक मासिक अधिशेष उत्पन्न करने में संघर्ष करती हैं, जिसके परिणामस्वरूप लाखों किसान मौसमी इनपुट की पूर्ति हेतु अनौपचारिक उच्च ब्याज ऋण लेने के लिये विवश होते हैं। 
  • प्रतिक्रियात्मक एवं प्रतिबंधात्मक व्यापार नीतियाँ: अचानक निर्यात प्रतिबंधों तथा स्थानीय स्टॉक सीमाओं के माध्यम से बार-बार राज्य हस्तक्षेप से घरेलू बाज़ार संरचना विकृत होती है तथा वैश्विक निर्यात विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
    • ये प्रतिक्रियात्मक नियंत्रण उपाय प्राकृतिक मूल्य निर्धारण तंत्र को दबाते हैं, निजी पूंजी निवेश को हतोत्साहित करते हैं तथा ग्रामीण क्रय शक्ति में कमी लाते हैं।
    • उदाहरण के लिये वर्ष 2023 से 2025 के मध्य गैर-बासमती चावल पर लगाए गए अचानक तथा दीर्घकालिक निर्यात प्रतिबंधों ने भारतीय निर्यातकों के महत्त्वपूर्ण वैश्विक बाज़ार हिस्से को समाप्त कर दिया। 
  • मृदा क्षरण तथा पारिस्थितिकीय पतन: दशकों से रासायनिक-गहन कृषि पद्धतियों ने भारत के प्रमुख कृषि क्षेत्रों में मृदा जैविक कार्बन को गंभीर रूप से क्षीण कर दिया है तथा महत्त्वपूर्ण सूक्ष्मजीवी पारिस्थितिकी तंत्रों को नष्ट कर दिया है।
    • यह प्रणालीगत पारिस्थितिकीय पतन घटते हुए सीमांत प्रतिफलों का दुष्चक्र उत्पन्न करता है, जिसके कारण स्थिर पैदावार को बनाए रखने के लिये भी घातीय रूप से अधिक इनपुट की आवश्यकता होती है। 
    • सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की एक रिपोर्ट भारत में व्यापक मृदा पोषक तत्त्वों की कमी को रेखांकित करती है, जहाँ अधिकांश मृदाओं में जैविक कार्बन तथा प्रमुख मैक्रो-पोषक तत्त्वों का स्तर निम्न से मध्यम है।
    • वर्ष 2015–19 के दौरान 50 मिलियन से अधिक मृदा नमूनों के विश्लेषण से गंभीर कमी उजागर हुई—लगभग 85% में जैविक कार्बन, 97% में नाइट्रोजन, 83% में फॉस्फोरस तथा 71% में पोटेशियम की कमी पाई गई।
      • ये निष्कर्ष अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता तथा जैविक विकल्पों के अपर्याप्त उपयोग से प्रेरित बिगड़ती मृदा गुणवत्ता की ओर संकेत करते हैं। 
  • पोषण असंतुलन एवं प्रच्छन्न भुखमरी: स्थापित न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) ढाँचा कैलोरी-प्रधान अनाजों को प्रोत्साहित करता है, जिससे आवश्यक प्रोटीन एवं सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की उपेक्षा होती है। 
    • इस नीतिगत प्रोत्साहन के परिणामस्वरूप एकल फसल प्रणाली का वर्चस्व बढ़ता है, जिससे आहार विविधता प्रभावित होती है तथा व्यापक स्तर पर प्रच्छन्न भुखमरी एवं दीर्घकालिक कुपोषण बना रहता है।
    • जहाँ गेहूँ एवं चावल PDS आवंटन का प्रमुख हिस्सा हैं, वहीं आवश्यक दलहन एवं तिलहन का संरचनात्मक रूप से कम क्रय किया जाता है तथा इनकी आपूर्ति आयात निर्भर बनी रहती है।
    • फलस्वरूप, हालिया राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षणों से संकेत मिलता है कि 50% से अधिक ग्रामीण महिलाएँ एनीमिया से ग्रस्त हैं, जो कृषि उत्पादन को पोषण सुरक्षा में रूपांतरित करने में गंभीर नीतिगत विफलता को दर्शाता है।

खाद्य सुरक्षा बनाम पोषण सुरक्षा

मापदंड

खाद्य सुरक्षा

पोषण सुरक्षा

मूल प्रतिमान

भुखमरी को रोकने के लिये भोजन की उपलब्धता, सुलभता और वहनीयता पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।

यह समग्र मानव स्वास्थ्य सुनिश्चित करने के लिये पोषक तत्त्वों के अवशोषण और जैविक उपयोग पर ध्यान केंद्रित करता है।

प्राथमिक मीट्रिक

मात्रा और कैलोरी: दैनिक ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये पर्याप्त कार्बोहाइड्रेट/कैलोरी का सेवन सुनिश्चित करना।

गुणवत्ता और विविधता: प्रोटीन, विटामिन और आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्त्वों (आयरन, जिंक, आयोडीन) का संतुलित सेवन सुनिश्चित करना।

प्रणालीगत क्षेत्र 

संकीर्ण (कृषि एवं आर्थिक): यह कृषि उत्पादन, आपूर्ति शृंखला लॉजिस्टिक्स, बाज़ार मूल्य निर्धारण और सार्वजनिक वितरण प्रणालियों (PDS) पर निर्भर करता है।

व्यापक (बहुक्षेत्रीय): इसके लिये खाद्य सुरक्षा के साथ-साथ पर्याप्त स्वास्थ्य सेवा, मातृ देखभाल तथा जल, स्वच्छता और साफ़-सफाई (WASH) अवसंरचना की आवश्यकता है।

प्राथमिक घाटा

प्रत्यक्ष भुखमरी: यह भुखमरी, कैलोरी की तीव्र कमी और शारीरिक भोजन की कमी के रूप में प्रकट होती है।

'प्रच्छन्न भुखमरी: यह एनीमिया, बौनापन, दुर्बलता और कमज़ोर प्रतिरक्षा प्रणाली के रूप में प्रकट होती है, यहाँ तक कि उन व्यक्तियों में भी जो पर्याप्त कैलोरी का सेवन करते हैं।

प्रमुख नीतिगत हस्तक्षेप

न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), रियायती अनाज वितरण (जैसे भारत में PMGKAY), बफर स्टॉक बनाए रखना।

फसलों का जैव संवर्द्धन, मध्याह्न भोजन में आहार विविधता लाना, स्वच्छता अभियान (स्वच्छ भारत) और लक्षित पूरक आहार कार्यक्रम।

भारत में खाद्य सुरक्षा को सुदृढ़ करने के लिये कौन-से उपाय आवश्यक हैं?

  • विकेंद्रीकृत जैव-इनपुट ग्रिड और चक्रीय कृषि विज्ञान: आयातित, हाइड्रोकार्बन-आधारित सिंथेटिक उर्वरकों से स्थानीय, चक्रीय पोषक तत्त्व चक्रों में परिवर्तन के लिये ग्राम-स्तर पर 'जैव-संसाधन केंद्र' स्थापित करना आवश्यक है। 
    • ये ग्रिड मृदा में जैविक कार्बन को पुनर्स्थापित करने के लिये एरोबिक कम्पोस्टिंग, माइक्रोबियल इनोक्यूलेंट और किण्वित तरल खाद का उपयोग करते हैं, जबकि केंद्रीकृत सब्सिडी के वित्तीय बोझ को काफी हद तक कम करते हैं। 
    • जैविक अपशिष्ट से पोषक तत्त्वों की पुनर्प्राप्ति का प्रबंधन करने के लिये स्थानीय सहकारी समितियों को सशक्त बनाकर, भारत 'आत्मनिर्भर कृषि' (खाद्य और फाइबर उत्पादन में पूर्ण राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता की स्थिति) को बढ़ावा दे सकता है, जो वैश्विक आपूर्ति शृंखला के आघात के प्रति समुत्थानशील हो।
  • एकीकृत डिजिटल मृदा-स्वास्थ्य निगरानी और परिशुद्ध मात्रा निर्धारण: वास्तविक समय, सेंसर-आधारित मृदा निगरानी प्रणालियों को बड़े पैमाने पर लागू करने से स्थल-विशिष्ट पोषक तत्त्व अनुप्रयोग संभव हो सकेगा, जो पारंपरिक मृदा स्वास्थ्य कार्डों की सामान्य सिफारिशों से कहीं आगे होगा। 
    • एग्रीस्टैक फ्रेमवर्क के साथ इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) उपकरणों का एकीकरण ‘परिवर्ती दर प्रौद्योगिकी’ को सक्षम बनाता है, जो उर्वरक उपयोग दक्षता को अनुकूलित करती है तथा नाइट्रेट के भूजल में रिसाव को रोकती है। 
    • यह अति-स्थानीय डेटा फीडबैक लूप सुनिश्चित करता है कि परिशुद्ध सिंचाई और उर्वरीकरण तनावग्रस्त अन्न उत्पादक क्षेत्रों में मानक व्यवहार बन जाएँ। 
  • जलवायु-स्मार्ट पैरामीट्रिक बीमा और पूर्वानुमानात्मक फिनटेक: उपग्रह-आधारित मौसम सूचकांकों के आधार पर स्वतः भुगतान प्रारंभ करने वाले पैरामीट्रिक बीमा उत्पादों का विस्तार लघु कृषकों को दुर्लभ और विनाशकारी जलवायु घटनाओं से उत्पन्न वित्तीय संकट से सुरक्षित कर सकता है। 
    • भविष्यसूचक एआई-संचालित जोखिम मॉडलिंग के साथ इन उपकरणों को एकीकृत करके, वित्तीय संस्थान 'जलवायु-लिंक्ड क्रेडिट' की पेशकश कर सकते हैं, जहाँ संधारणीय कृषि पद्धतियों को अपनाने के आधार पर ब्याज दरों को गतिशील रूप से समायोजित किया जाता है।   
    • इससे गंभीर अल नीनो चक्रों या असामयिक वर्षा की विसंगतियों के दौरान भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में प्रणालीगत तरलता सुनिश्चित होती है।
  • आहार विविधता के लिये बहुस्तरीय 'न्यूट्रि-शेड' योजना: 'न्यूट्रि-शेड (पोषण-क्षेत्र)' रणनीतियों के क्रियान्वयन में फसल विविधीकरण का क्षेत्रीयकरण सम्मिलित है, जिससे स्थानीय उत्पादन को निवासरत जनसंख्या की विशिष्ट पोषणीय कमियों के अनुरूप बनाया जा सके। 
    • इससे ध्यान कैलोरी-केंद्रित एकल फसल प्रणाली से हटकर ‘जैव-विविध खाद्य टोकरी’ की ओर स्थानांतरित होता है, जिसमें सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत कदन्न (मोटे अनाज), दलहन और जैव-संपोषित कंद फसलें सम्मिलित हों। 
    • इन पौष्टिक अनाजों के लिये स्थानीयकृत क्रय-चक्र निर्मित कर राज्य एक साथ अवरुद्ध वृद्धि और क्षीणता जैसी समस्याओं से निपट सकता है तथा लंबी दूरी की खाद्य आपूर्ति से उत्पन्न कार्बन उत्सर्जन को कम कर सकता है। 
  • ऊर्जा केंद्रों के रूप में एकत्रित किसान उत्पादक संगठन (FPO): FPO को 'कृषि-ऊर्जा सहकारी समितियों' में परिवर्तित करने से किसानों को सौर-कृषि (एग्रीवोल्टिक्स) को पारंपरिक खेती के साथ एकीकृत करने की अनुमति मिलती है, जिससे आय का एक दोहरा स्रोत निर्मित होता है और फसल विफलता का जोखिम कम होता है। 
    • ये ऊर्जा-स्वायत्त केंद्र स्थानीय शीत-भंडारण इकाइयों और प्राथमिक प्रसंस्करण मशीनों को ऊर्जा उपलब्ध करा सकते हैं, जिससे आपूर्ति शृंखला के मध्यवर्ती चरण में विद्यमान ‘अवसंरचनात्मक अंतर’ को प्रभावी ढंग से समाप्त किया जा सकता है। 
    • यह विकेंद्रीकृत औद्योगिकीकरण मूल्यवर्द्धन को ग्राम अर्थव्यवस्था के भीतर बनाए रखता है, संकट-प्रेरित पलायन को सीमित करता है तथा शीघ्र नष्ट होने वाली बागवानी उपज की शेल्फ लाइफ (भंडारण-आयु) बढ़ाता है। 
  • सामुदायिक नेतृत्व वाली जलभृत मानचित्रण के माध्यम से जल-शासन: प्रतिस्पर्द्धी भूजल निष्कर्षण से 'सामुदायिक रूप से प्रबंधित जलभृत इकाइयों' की ओर संक्रमण उच्च उपज वाले क्षेत्रों की दीर्घकालिक जल-संवहनीयता के लिये महत्त्वपूर्ण है। 
    • पंचायत स्तर पर सहभागी भू-स्थानिक मानचित्रण और जल-बजट निर्धारण के माध्यम से समुदाय ‘फसल-जल संरेखण’ लागू कर सकते हैं, जिससे अत्यधिक जल-उपभोगी फसलों की खेती गंभीर संकटग्रस्त क्षेत्रों में रोकी जा सके। 
    • अनिवार्य सूक्ष्म सिंचाई द्वारा समर्थित यह ज़मीनी स्तर की जल-संप्रभुता, भारत के सबसे उत्पादक कृषि क्षेत्रों के आसन्न मरुस्थलीकरण को रोकने का एकमात्र व्यवहार्य मार्ग है।
  • लचीले शहरी-अर्द्ध-शहरी खाद्य सुरक्षा समूह: टियर-1 और टियर-2 शहरों के आसपास 'अर्द्ध-शहरी कृषि क्षेत्र' और ऊर्ध्वाधर कृषि समूहों का विकास आपूर्ति शृंखला में व्यवधान तथा अस्थिर ईंधन लागत के खिलाफ एक सुरक्षा कवच का निर्माण कर सकता है। 
    • ये ‘लघु खाद्य शृंखलाएँ’ अखाद्य फसलों के लिये परिशोधित शहरी अपशिष्ट जल तथा पत्तेदार सब्जियों हेतु जल-कृषि प्रणाली का उपयोग करती हैं, जिससे न्यूनतम लॉजिस्टिक बाधाओं के साथ ताज़ा उत्पादों की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित होती है। 
    • शहरी-कृषि का यह एकीकरण 'फूड-माइल' के प्रभाव को कम करता है और मौसमी जलवायु तनाव या परिवहन हड़तालों के दौरान खुदरा मूल्य अस्थिरता को स्थिर करता है।
  • रणनीतिक संप्रभु 'पोटाश और फॉस्फेट' भंडार: 'उर्वरक भू-राजनीति' के जाल से निपटने हेतु, भारत को पश्चिम एशियाई अस्थिरता से बचाव के लिये अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार के समान एक संप्रभु रणनीतिक उर्वरक भंडार स्थापित करना चाहिये।
    • खनिज-समृद्ध देशों में संयुक्त उद्यमों के माध्यम से 'संपत्तियों में इक्विटी' के साथ मिलकर, यह रॉक फॉस्फेट और पोटाश जैसे कच्चे माल के निर्बाध प्रवाह को सुनिश्चित करता है।
    • फॉस्फोरिक एसिड के घरेलू उत्पादन में तेज़ी के साथ-साथ यह रणनीतिक भंडारण, भारत की दीर्घकालिक कृषि इनपुट सुरक्षा के लिये आवश्यक 'भू-राजनीतिक कवच' प्रदान करता है।

निष्कर्ष: 

भारत की वास्तविक खाद्य संप्रभुता की दिशा में प्रगति के लिये 'हर कीमत पर अधिक उत्पादन' दृष्टिकोण से हटकर पारिस्थितिकी रूप से सुदृढ़ तथा भू-राजनीतिक रूप से स्वतंत्र कृषि मॉडल की ओर रणनीतिक परिवर्तन आवश्यक है। डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना को विकेंद्रीकृत हरित ऊर्जा तथा चक्रीय पोषक तत्त्व चक्रों के साथ एकीकृत करके, राष्ट्र कैलोरी अधिशेष और पोषण सुरक्षा के मध्य विद्यमान अंतर को कम कर सकता है। अंततः, जलवायु परिवर्तन एवं वैश्विक आपूर्ति व्यवधानों के विरुद्ध कृषि क्षेत्र को सुदृढ़ बनाना ही भारत को एक स्थिर वैश्विक खाद्य शक्ति के रूप में स्थापित करेगा।

दृष्टि मेन्स प्रश्न 

भारत में 'उर्वरक-खाद्य विरोधाभास' का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिये तथा विश्लेषण कीजिये कि फारस की खाड़ी पर अत्यधिक आयात निर्भरता किस प्रकार भारत के कृषि क्षेत्र की रणनीतिक स्वायत्तता को कमज़ोर करती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. पीएम-प्रणाम योजना क्या है?
यह एक सरकारी पहल है, जिसके अंतर्गत राज्यों को रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में कमी लाने हेतु प्रोत्साहित किया जाता है और बचाई गई सब्सिडी के 50% के बराबर राशि स्थानीय विकासात्मक परिसंपत्तियों के लिये अनुदान के रूप में प्रदान की जाती है। 

2. 'एग्रीस्टैक' क्या है?
यह एक डिजिटल आधारभूत संरचना है, जो किसानों को विशिष्ट पहचान (ID) प्रदान करती है तथा भूमि अभिलेखों एवं फसल डेटा को जोड़कर ऋण, बीमा तथा वैयक्तिकृत कृषि सेवाओं को सुगम बनाती है। 

3. भारतीय खाद्य सुरक्षा के लिये होर्मुज़ जलडमरूमध्य महत्त्वपूर्ण क्यों है?
यह एक महत्त्वपूर्ण समुद्री संकीर्ण मार्ग (choke point) है, जिसके माध्यम से भारत के आयातित प्राकृतिक गैस, अमोनिया तथा फॉस्फेट (जो उर्वरक उत्पादन के लिये आवश्यक हैं) का अधिकांश परिवहन होता है। 

4. श्री अन्न क्या हैं?
यह भारत सरकार द्वारा मोटे अनाज (millets) के लिये किया गया ब्रांडिंग प्रयास है, जिन्हें सूखा-प्रतिरोधी, जलवायु-अनुकूल तथा अत्यधिक पौष्टिक ‘सुपरफूड’ के रूप में मुख्यधारा में लाने का लक्ष्य है। 

5. पैरामीट्रिक फसल बीमा क्या है?
यह एक ऐसी बीमा प्रणाली है, जिसमें भुगतान विशिष्ट मौसमीय मानकों (जैसे वर्षा स्तर) के आधार पर किया जाता है, जिन्हें सेंसर या उपग्रह द्वारा मापा जाता है, न कि व्यक्तिगत रूप से क्षति के मैन्युअल आकलन के आधार पर। 

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रिलिम्स

प्रश्न 1. जलवायु-अनुकूल कृषि (क्लाइमेट-स्मार्ट एग्रीकल्चर) के लिये भारत की तैयारी के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये-

  1. भारत में ‘जलवायु-स्मार्ट ग्राम (क्लाइमेट-स्मार्ट विलेज)’ दृष्टिकोण, अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान कार्यक्रम-जलवायु परिवर्तन, कृषि एवं खाद्य सुरक्षा (सी.सी.ए.एफ.एस.) द्वारा संचालित परियोजना का एक भाग है।
  2.   सी.सी.ए.एफ.एस. परियोजना, अंतर्राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान हेतु परामर्शदात्री समूह (सी.जी.आई.ए.आर.) के अधीन संचालित किया जाता है, जिसका मुख्यालय प्राँस में है।
  3.   भारत में स्थित अंतर्राष्ट्रीय अर्द्धशुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान (आई.सी.आर.आई.एस.ए.टी.), सी.जी.आई.ए.आर. के अनुसंधान केंद्रों में से एक है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?

(a) केवल 1 और 2           
(b)  केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर:(d)


प्रश्न 2. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के तहत किये गए प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2018)

  1. केवल 'गरीबी रेखा से नीचे (BPL)' की श्रेणी में आने वाले परिवार ही सब्सिडी वाले खाद्यान्न प्राप्त करने के पात्र हैं।
  2.  राशन कार्ड जारी करने के उद्देश्य से घर की सबसे बड़ी महिला, जिसकी आयु 18 वर्ष या उससे अधिक है, घर की मुखिया होगी।
  3.  गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं को गर्भावस्था के दौरान और उसके बाद छह महीने तक प्रति दिन 1600 कैलोरी का 'टेक-होम राशन' मिलता है

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2
(c) केवल 1 और 3
(d) केवल 3

उत्तर: (b)


मेन्स

प्रश्न 1. प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के साथ मूल्य  सब्सिडी के स्थान पर भारत में सब्सिडी का परिदृश्य किस प्रकार बदल सकता है? चर्चा कीजिये। (2015)

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