भारतीय अर्थव्यवस्था
भारत की गिग इकॉनमी के स्वरूप का पुनर्निर्धारण
- 28 Apr 2026
- 174 min read
यह लेख 27 /04/2026 को द हिंदू में प्रकाशित 'Summer as a source of income shock for gig workers' शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख भारत की गिग इकॉनमी के तीव्र विकास के साथ-साथ भीषण गर्मी के बढ़ते खतरे को रेखांकित करता है, जो वर्कर्स को स्वास्थ्य एवं आजीविका के मध्य संतुलन स्थापित करने के लिये विवश करता है।
प्रिलिम्स के लिये: गिग इकॉनमी, सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26।
मेन्स के लिये: भारत में गिग इकॉनमी के विकास को गति देने वाले प्रमुख कारक, भारत की गिग इकॉनमी से जुड़े प्रमुख मुद्दे।
भारत की गिग इकॉनमी तीव्र गति से विस्तार कर रही है, जहाँ वर्तमान में 7.7 मिलियन से अधिक प्लेटफॉर्म वर्कर कार्यरत हैं और वर्ष 2030 तक इनके 23 मिलियन से अधिक होने का अनुमान है। लेकिन जैसे-जैसे ग्रीष्म ऋतु और अधिक भीषण होती जा रही है, डिलीवरी राइडर, ड्राइवर और कूरियर जैसे इस ज़रूरी कार्यबल को एक ऐसे खतरे का सामना करना पड़ रहा है, जिसे नीतिगत स्तर पर व्यापक रूप से अनदेखा किया गया है: अत्यधिक तापमान (extreme heat)। वेतनभोगी कर्मचारियों के विपरीत, गिग वर्कर बिना आय-हानि के कार्य से विराम नहीं ले सकते, जिससे उन्हें प्रतिदिन स्वास्थ्य और आय के बीच एक जोखिमपूर्ण संतुलन स्थापित करना पड़ता है। भारत की हीट एक्शन योजनाएँ (Heat Action Plans) मुख्यतः मृत्यु-दर को कम करने पर केंद्रित हैं, लेकिन लू के कारण इन वर्कर्स को होने वाले अप्रत्यक्ष मूक आय-आघातों (silent income shocks) को संबोधित नहीं करतीं। इसलिये भीषण गर्मी कोई अलग संकट नहीं है, बल्कि यह उस कार्यबल के लिये एक कठिन परीक्षा है जो पहले से ही नौकरी की सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा या बुनियादी सुरक्षा जाल के बिना काम कर रहा है।
गिग इकोनॉमी क्या है?
- परिचय: गिग इकॉनमी एक ऐसा श्रम बाज़ार है, जिसमें स्थायी नौकरियों के स्थान पर अल्पकालिक अनुबंध अथवा फ्रीलांस कार्य की प्रमुखता होती है।
- इस व्यवस्था में संगठन पारंपरिक पूर्णकालिक रोज़गार प्रदान करने के बजाय विशिष्ट कार्यों के लिये स्वतंत्र वर्कर्स को नियुक्त करते हैं।
- यह परिवर्तन मुख्यतः उन डिजिटल प्लेटफॉर्मों द्वारा संचालित है जो सेवा प्रदाताओं को सीधे उपभोक्ताओं से जोड़ते हैं, जैसे राइड-शेयरिंग ऐप, डिलीवरी सेवाएँ एवं फ्रीलांस मार्केटप्लेस।
- मुख्य विशेषताएँ
- अनुकूलन: वर्कर्स को प्रायः यह स्वतंत्रता होती है कि वे कब, कहाँ और कितना कार्य करेंगे।
- स्वतंत्र अनुबंध: इस व्यवस्था में वर्कर्स को पारंपरिक ‘कर्मचारी’ के बजाय ‘स्वतंत्र अनुबंधकर्त्ता’ के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, जिससे उन्हें अपने कर दायित्वों एवं कार्य-संबंधी संसाधनों का प्रबंधन स्वयं करना पड़ता है।
- कार्य-आधारित भुगतान: इसमें पारिश्रमिक आमतौर पर प्रति कार्य, परियोजना या 'गिग' के आधार पर दिया जाता है, न कि प्रति घंटा वेतन या वार्षिक आय के रूप में।
- प्रवेश में कम बाधाएँ: अनेक गिग कार्यों के लिये विशेष तकनीकी प्रशिक्षण की आवश्यकता न्यूनतम होती है और इन्हें प्रायः डिजिटल प्लेटफॉर्म/ऐप के माध्यम से शीघ्रता से प्रारंभ किया जा सकता है।
भारत में गिग इकोनॉमी के विकास को गति देने वाले प्रमुख कारक क्या हैं?
- डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) का प्रसार: आधार-आधारित पहचान, UPI द्वारा संचालित तत्काल भुगतान प्रणाली तथा 5G कनेक्टिविटी के एकीकृत उपयोग ने प्लेटफॉर्म-आधारित श्रम बाज़ारों में लेनदेन लागत को उल्लेखनीय रूप से कम कर दिया है।
- यह अवसंरचना वास्तविक समय में पहचान सत्यापन एवं तत्काल वित्तीय निपटान को संभव बनाती है, जो शहरी एवं ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में ऑन-डिमांड गिग्स की आधारशिला है।
- उदाहरण के लिये, मार्च 2026 में UPI ने प्रति माह 20 अरब से अधिक लेनदेन संसाधित किये, जबकि इंडिया स्किल्स रिपोर्ट 2026 के अनुसार डिजिटल सुगमता के कारण गिग वर्कर अब देश के कुल कार्यबल का लगभग 16% हो चुका है।
- परियोजना-आधारित भर्ती (व्हाइट-कॉलर गिगिंग): महामारी के बाद की कॉर्पोरेट रणनीतियाँ ‘एजाइल-लीन’ मॉडल की ओर अग्रसर हुई हैं, जहाँ निश्चित लागतों को अनुकूलित करने के लिये विशेष उच्च-कौशल कार्यों को स्थायी नियुक्तियों के बजाय स्वतंत्र सलाहकारों को आउटसोर्स किया जाता है।
- यह 'ह्यूमन क्लाउड' दृष्टिकोण कंपनियों को प्रति परियोजना के आधार पर एआई, साइबर सुरक्षा और डेटा साइंस में विशिष्ट विशेषज्ञता तक पहुँचने की अनुमति देता है, जिससे एक मज़बूत उच्च-कुशल गिग सेगमेंट को बढ़ावा मिलता है।
- वित्तीय वर्ष 2024-25 की औद्योगिक रिपोर्टों के अनुसार परियोजना-आधारित भर्ती में 38% की वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि CII-ETS के आँकड़ों के अनुसार भारत में लगभग 1.2 से 1.5 करोड़ फ्रीलांस पेशेवर सक्रिय हैं।
- वैश्विक कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रतिस्पर्द्धा ने ‘AI-गिग्स’ की एक नई श्रेणी को जन्म दिया है, जैसे—डेटा लेबलिंग, मानव फीडबैक आधारित पुनर्बलन अधिगम (RLHF) तथा प्रॉम्प्ट इंजीनियरिंग, जिनमें भारत एक वैश्विक बैकएंड के रूप में उभर रहा है।
- प्रगतिशील विनियामक मान्यता और सामाजिक सुरक्षा: नवीन श्रम संहिताओं (2026) के क्रियान्वयन ने गिग वर्कर्स की परिभाषा एवं सुरक्षा के लिये एक प्रारंभिक कानूनी ढाँचा प्रदान किया है, जिससे पूर्व में विद्यमान ‘अनौपचारिकता का जोखिम’ कम हुआ है।
- एग्रीगेटरों के लिये सामाजिक सुरक्षा कोष में योगदान को अनिवार्य बनाकर, सरकार अनुकूलन एवं सुरक्षा जाल के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास कर रही है।
- सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 के अंतर्गत, एग्रीगेटरों को अपने वार्षिक टर्नओवर का 1–2% (गिग/प्लेटफॉर्म वर्कर्स को किये गए या देय भुगतान के 5% की सीमा तक) इस कोष में योगदान करना अनिवार्य है, जिससे इन वर्कर्स के लिये विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं का वित्तपोषण संभव हो सके।
- 'इंस्टेंट-एवरीथिंग' (क्विक-कॉमर्स) के लिये उपभोक्ताओं की बढ़ती प्राथमिकता: क्विक-कॉमर्स और होम-सर्विस प्लेटफॉर्मों की तीव्र वृद्धि ने टियर-1 और टियर-2 शहरों में निम्न से मध्यम कुशल गिग लेबर की व्यापक, स्थानीय मांग उत्पन्न कर दी है।
- शहरीकरण और भारतीय मध्यम वर्ग के लिये समय की बढ़ती अवसर लागत एक ऐसे सेवा पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा दे रही है जो पूरी तरह से अनुकूलित, ऐप-आधारित कार्यबल पर निर्भर करता है।
- नीति आयोग का अनुमान है कि ज़ोमैटो, स्विगी और ज़ेप्टो जैसे प्लेटफॉर्मों के क्षेत्रीय बाज़ारों में विस्तार के कारण भारत में गिग वर्कफोर्स की संख्या वर्ष 2030 तक 23.5 मिलियन तक पहुँच जाएगी।
- शहरीकरण और भारतीय मध्यम वर्ग के लिये समय की बढ़ती अवसर लागत एक ऐसे सेवा पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा दे रही है जो पूरी तरह से अनुकूलित, ऐप-आधारित कार्यबल पर निर्भर करता है।
- 'क्रिएटर इकोनॉमी' का तेज़ी से विकास: भारत सोशल मीडिया-आधारित ‘सूक्ष्म-उद्यमिता’ के लिये विश्व के सबसे बड़े बाज़ारों में उभरकर सामने आया है, जहाँ कंटेंट क्रिएशन अब मात्र शौक न रहकर एक मुख्यधारा गिग प्रोफेशन का रूप ले चुका है।
- हाई-स्पीड 5G तथा क्षेत्रीय भाषाओं में कंटेंट उपभोग के लोकतंत्रीकरण ने टियर-2 एवं टियर-3 शहरों के रचनाकारों को ब्रांड साझेदारियों, ‘क्रिएटर-नेतृत्व वाले वाणिज्य’ तथा प्लेटफॉर्म भुगतान के माध्यम से अपने विशिष्ट प्रभाव का मुद्रीकरण करने में सक्षम बनाया है।
- वर्तमान में भारत की क्रिएटर इकोनॉमी का अनुमान ₹30,000 करोड़ से अधिक है, जो वार्षिक 25-30% की दर से बढ़ रही है, जिसमें सोशल मीडिया सेगमेंट लगभग 45% बाज़ार हिस्सेदारी रखता है।
- 'केयर-गिग्स' के माध्यम से महिला कार्यबल का एकीकरण: भारतीय गिग इकॉनमी शहरी श्रम भागीदारी में लैंगिक अंतर को कम करने के लिये एक महत्त्वपूर्ण माध्यम बन रही है, क्योंकि यह महिलाओं के ऊपर पड़ने वाले असमान देखभाल उत्तरदायित्व को ध्यान में रखते हुए ‘सूक्ष्म और अनुकूलित’ कार्य भूमिकाएँ प्रदान करती है।
- यद्यपि पारंपरिक गिग भूमिकाएँ अभी भी पुरुष-प्रधान हैं, फिर भी टेलीहेल्थ, ऑनलाइन शिक्षा एवं प्रोफेशनल होम-सैलून सेवाओं में एक सशक्त ‘पिंक-कॉलर’ गिग सेगमेंट विकसित हुआ है, जो महिलाओं को स्वायत्त एवं अनुकूलित तरीके से आर्थिक गतिविधियों में पुनः प्रवेश का अवसर प्रदान करता है।
- इसके अतिरिक्त, अर्बन कंपनी की ‘उड़ान’ पहल यह प्रदर्शित करती है कि दोपहिया वाहनों तक पहुँच बेहतर गतिशीलता के माध्यम से महिला गिग वर्कर्स की आय में लगभग 14% तक वृद्धि कर सकती है; यह पहल प्रशिक्षण, लाइसेंस एवं वित्तीय सहायता प्रदान कर कार्यकुशलता एवं आय के अवसरों का विस्तार करती है।
- यद्यपि पारंपरिक गिग भूमिकाएँ अभी भी पुरुष-प्रधान हैं, फिर भी टेलीहेल्थ, ऑनलाइन शिक्षा एवं प्रोफेशनल होम-सैलून सेवाओं में एक सशक्त ‘पिंक-कॉलर’ गिग सेगमेंट विकसित हुआ है, जो महिलाओं को स्वायत्त एवं अनुकूलित तरीके से आर्थिक गतिविधियों में पुनः प्रवेश का अवसर प्रदान करता है।
भारत की गिग इकोनॉमी से संबंधित प्रमुख मुद्दे क्या हैं?
- कानूनी अस्पष्टता एवं असंगत वर्गीकरण के जोखिम: प्लेटफॉर्म कंपनियों द्वारा प्रयुक्त ‘पार्टनर’ की श्रेणी गिग वर्कर्स को ओवरटाइम वेतन, नौकरी सुरक्षा तथा मनमानी बर्खास्तगी के विरुद्ध वैधानिक संरक्षण जैसे बुनियादी अधिकारों से वंचित कर देती है।
- यह वर्गीकरण एक विनियामक शून्य (regulatory vacuum) उत्पन्न करता है, जहाँ वर्कर उद्यमी के दायित्व वहन करते हैं, लेकिन कार्य निष्पादन में कर्मचारी की भाँति कठोर नियंत्रण में रहते हैं, जिससे ‘छद्म रोज़गार (disguised employment)’ की स्थिति उत्पन्न होती है।
- उदाहरण के लिये, वर्ष 2026 की भीषण गर्मी के दौरान, जब दिल्ली एवं राजस्थान में तापमान 50°C के समीप पहुँच गया, तब भी गिग वर्कर्स को अनिवार्य सवेतन अवकाश या किसी प्रकार का ‘हीट अलाउंस’ प्राप्त नहीं हुआ।
- अपारदर्शी एल्गोरिदम प्रबंधन और नियंत्रण: प्लेटफॉर्म एल्गोरिदम 'अदृश्य प्रबंधकों' के रूप में कार्य करते हैं, जो ब्लैक-बॉक्स लॉजिक के माध्यम से कार्य आवंटन, रूट मैपिंग और वेतन प्रोत्साहन को नियंत्रित करते हैं, जिसका वर्कर्स विरोध नहीं कर सकते।
- इससे एक उच्च दबाव वाला वातावरण बनता है जहाँ ग्राहक रेटिंग या कम स्वीकृति दरों के आधार पर ‘डीएक्टिवेशन’ (नौकरी समाप्ति) स्वतः हो सकती है और इसके विरुद्ध मानवीय अपील का प्रावधान लगभग नगण्य होता है।
- साथ ही वर्ष 2024 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा मानेसर स्थित एक अमेज़ॅन वेयरहाउस में कथित श्रम-विरोधी प्रथाओं पर स्वतः संज्ञान लिया गया, जहाँ बुनियादी विश्राम अवकाश एवं महिलाओं हेतु शौचालय सुविधाओं के अभाव जैसी अमानवीय स्थितियाँ उजागर हुईं।
- ऐसे उदाहरण श्रम अधिकारों के गंभीर उल्लंघन को दर्शाते हैं और इसी तरह की समस्याएँ अवैध रूप से बेचे जाने वाले गोदामों में भी बनी रहती हैं।
- आय की अस्थिरता एवं ‘कम वेतन’ का संकट: गिग वर्क से प्राप्त आय प्लेटफॉर्म प्रोत्साहनों तथा ईंधन कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति अत्यधिक संवेदनशील रहती है, जिसके कारण वर्कर्स के लिये मासिक आय का पूर्वानुमान करना कठिन हो जाता है।
- नियमित आय स्रोत के अभाव में ये वर्कर्स पारंपरिक बैंकिंग प्रणाली के लिये ‘ऋण हेतु अयोग्य’ बन जाते हैं, जिससे वे अपनी कार्य-संबंधी परिसंपत्तियों को बनाए रखने हेतु प्रायः उच्च ब्याज वाले अनौपचारिक ऋण चक्रों में फँस जाते हैं।
- आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, लगभग 40% गिग वर्कर्स की मासिक आय ₹15,000 से कम है, जिसके चलते वाहन उन्नयन जैसे उद्देश्यों के लिये ‘थिन-फाइल’ ऋण पहुँच एक प्रमुख बाधा बनी रहती है।
- सामाजिक सुरक्षा के कार्यान्वयन में अंतराल: सामाजिक सुरक्षा संहिता (2020) के लागू होने के बावजूद, भविष्य निधि और मातृत्व अवकाश जैसे लाभों का वास्तविक वितरण पंजीकरण और अंशदान चरण में ही रुका हुआ है।
- योगदान का भार (टर्नओवर का 1-2%) अक्सर प्लेटफॉर्मों को नए नियामकीय लागतों की भरपाई के लिये वर्कर्स के प्रोत्साहन को धीरे-धीरे कम करने के लिये प्रेरित करता है, जिससे कल्याणकारी लाभ निष्प्रभावी हो जाता है।
- परिणामस्वरूप, यह नीति परिवर्तनकारी हस्तक्षेप के बजाय प्रतीकात्मक उपाय बनकर रह जाने का जोखिम उत्पन्न करती है, जिसके कारण गिग वर्कर्स की आर्थिक एवं सामाजिक असुरक्षा बनी रहती है।
- योगदान का भार (टर्नओवर का 1-2%) अक्सर प्लेटफॉर्मों को नए नियामकीय लागतों की भरपाई के लिये वर्कर्स के प्रोत्साहन को धीरे-धीरे कम करने के लिये प्रेरित करता है, जिससे कल्याणकारी लाभ निष्प्रभावी हो जाता है।
- ‘क्विक-कॉमर्स’ के साथ बढ़ते सुरक्षा जोखिम: 10-मिनट डिलीवरी मॉडल के प्रसार ने शारीरिक जोखिमों को बढ़ा दिया है, क्योंकि एल्गोरिद्मिक प्रोत्साहन वर्कर्स को यातायात सुरक्षा की तुलना में गति को प्राथमिकता देने के लिये प्रेरित करते हैं।
- इस प्रतिस्पर्द्धात्मक दबाव के कारण सड़क दुर्घटनाओं में वृद्धि देखी गई है, जिसे इस तथ्य ने और गंभीर बना दिया है कि अनेक प्लेटफॉर्म यात्रा के दौरान दुर्घटनाओं हेतु समुचित बीमा कवरेज प्रदान नहीं करते।
- यद्यपि जनवरी 2026 में सरकार द्वारा प्रमुख प्लेटफॉर्मों को ‘10-मिनट डिलीवरी’ गारंटी रोकने के निर्देश दिये गए, फिर भी तीव्र बाज़ार प्रतिस्पर्द्धा एवं उपभोक्ता अपेक्षाएँ अब भी अल्ट्रा-फास्ट डिलीवरी के लिये अनौपचारिक दबाव बनाए रखती हैं, जिससे वर्कर्स का तनाव एवं सुरक्षा जोखिम यथावत बने रहते हैं
- डिजिटल लैंगिक विभाजन एवं वेतन असमानता: गिग इकॉनमी में कार्यरत महिलाओं को प्रायः ‘दोहरे बोझ’ का सामना करना पड़ता है, जहाँ कार्य का लचीलापन अपर्याप्त सुरक्षा अवसंरचना तथा वेतन असमानता से संतुलित हो जाता है।
- पक्षपातपूर्ण एल्गोरिदम एवं उच्च-स्तरीय स्मार्टफोन/वाहनों तक सीमित पहुँच महिलाओं को प्रायः कम वेतन वाली ‘पिंक-कॉलर’ भूमिकाओं (जैसे डेटा एंट्री, बुनियादी सौंदर्य सेवाएँ) तक सीमित कर देती है।
- यद्यपि महिला भागीदारी में वृद्धि हो रही है, फिर भी प्लेटफॉर्म एल्गोरिदम में निहित लैंगिक पूर्वाग्रह उन्हें देर रात के उच्च-आय वाले स्लॉट्स तक पहुँच से वंचित कर देते हैं।
- कौशल और 'प्लेटफॉर्म लॉक-इन': डिलीवरी या ड्राइविंग जैसी अधिकांश निम्न एवं मध्यम कौशल वाली गिग नौकरियों में कैरियर उन्नयन या कौशल विविधीकरण के अवसर अत्यंत सीमित होते हैं।
- वर्तमान परिदृश्य में लगभग 47% गिग वर्क मध्यम कौशल, 22% उच्च कौशल तथा 31% निम्न कौशल क्षेत्रों में केंद्रित है, जो संरचनात्मक असंतुलन को दर्शाता है।
- वर्कर्स प्रायः स्वयं को एक ही प्लेटफॉर्म तक सीमित (‘लॉक-इन’) स्थिति में पाते हैं, क्योंकि उनका प्रतिष्ठा स्कोर (reputation scores) एवं वर्क रिकॉर्ड को अन्य प्लेटफॉर्मों पर स्थानांतरित नहीं किया जा सकता है, जिसका अर्थ है कि वे शून्य से शुरुआत किये बिना आसानी से बेहतर अवसरों पर स्विच नहीं कर सकते हैं।
भारत अपनी गिग इकोनॉमी को सुदृढ़ करने के लिये कौन-से उपाय अपना सकता है?
- पोर्टेबल बेनिफिट ढाँचे का कार्यान्वयन: भारत को नियोक्ता-आधारित सामाजिक सुरक्षा से आगे बढ़ते हुए एक पृथक, पोर्टेबल लाभ प्रणाली अपनानी चाहिये, जिसमें बीमा, पेंशन और स्वास्थ्य सेवाओं के अधिकार किसी विशिष्ट मंच के बजाय वर्कर की डिजिटल पहचान (UAN- सार्वभौमिक खाता संख्या) से लिंक्ड हों।
- यह 'बैकपैक' मॉडल वर्कर्स को स्विगी, उबर और अर्बन कंपनी जैसे कई एग्रीगेटरों में एक साथ क्रेडिट जमा करने में सहायता करता है।
- एक केंद्रीकृत गिग-वेलफेयर क्लियरिंग हाउस बनाकर, राज्य यह सुनिश्चित कर सकता है कि विभिन्न 'मिनी-गिग्स' से प्राप्त खंडित योगदान एक सार्थक सुरक्षा संजाल में एकत्रित हो जाऍं, जिससे किसी कार्यकर्त्ता के प्लेटफॉर्म बदलने पर मिलने वाले लाभों का नुकसान रोका जा सके।
- एल्गोरिदम पारदर्शिता और 'उचित प्रक्रिया' जनादेश: 'एल्गोरिदम बॉसवाद' का मुकाबला करने के लिये, सरकार को स्वचालित निर्णयों के संबंध में स्पष्टीकरण के अधिकार को अनिवार्य करना चाहिये जो किसी कर्मचारी की आजीविका को प्रभावित करते हैं, जैसे कि 'शैडो बैनिंग' या निष्क्रियता।
- प्लेटफॉर्मों को विधिक रूप से एक मानवीय हस्तक्षेप वाली शिकायत निवारण प्रणाली प्रदान करने तथा कार्य वितरण एवं गतिशील मूल्य निर्धारण को नियंत्रित करने वाले मापदंडों का पारदर्शी रूप से खुलासा करने के लिये बाध्य किया जाना चाहिये।
- यह 'ब्लैक-बॉक्स ऑडिट' ढाँचा यह सुनिश्चित करेगा कि एल्गोरिदम अनजाने में लिंग, क्षेत्र या डिवाइस के प्रकार के आधार पर भेदभाव न करें, जिससे कार्यबल में स्वायत्तता और प्रक्रियात्मक न्याय की भावना पुनःस्थापित हो सके।
- डेटा-आधारित सामूहिक सौदाकारी का संस्थागतकरण: चूँकि पारंपरिक यूनियन गिग लेबर की विखंडित प्रकृति से जूझती हैं, इसलिये भारत डेटा-साझाकरण जनादेश द्वारा सशक्त डिजिटल वर्कर काउंसिल या सहकारी समितियों के निर्माण को सुविधाजनक बना सकता है।
- अकाउंट एग्रीगेटर (AA) फ्रेमवर्क के माध्यम से वर्कर्स को अपनी कमाई और प्रदर्शन डेटा को 'एकत्र' करने की अनुमति देकर, ये समूह वैश्विक तकनीकी अभिकर्त्ताओं के साथ बेहतर आधार दरों एवं प्रोत्साहन संरचनाओं पर वार्ता करने के लिये आवश्यक सूचना समरूपता प्राप्त कर सकते हैं।
- 'विरोधी संघवाद' से 'सहयोगी डेटा संप्रभुता' की ओर यह परिवर्तन वर्कर्स को अपने सामूहिक डेटा को बाज़ार-आधारित वार्ताओं के लिये एक रणनीतिक संपत्ति के रूप में मानने के लिये सशक्त बनाएगा।
- जलवायु-अनुकूल श्रम मानकों का एकीकरण: भीषण हीट-वेव्स और शहरी बाढ़ को देखते हुए, राज्य को गिग इकॉनमी की योजनाओं में पर्यावरण-श्रम सुरक्षा उपायों को एकीकृत करना चाहिये।
- इसमें 'हीट-स्टॉप' प्रोटोकॉल (पीक ऑवर के दौरान अनिवार्य ब्रेक) को अनिवार्य बनाना और प्लेटफॉर्मों को विश्राम-बुनियादी ढाँचे (ग्रीन ज़ोन), शीतलन, जलयोजन और चार्जिंग सुविधाओं वाले भौतिक केंद्रों में निवेश करने के लिये प्रोत्साहित करना शामिल है।
- जलवायु-सुरक्षित कार्य परिस्थितियों के प्रावधान को प्लेटफॉर्म टैक्स प्रोत्साहनों से जोड़कर, भारत यह सुनिश्चित कर सकता है कि गिग इकॉनमी की 'समुत्थानशीलता' जीवन-घातक पर्यावरणीय चरम सीमाओं में काम करने की 'विवशता' में परिणत न हो जाए।
- 'कौशल-पोर्टेबिलिटी' पासपोर्ट के माध्यम से संप्रभु कौशल विकास: 'कम कौशल के जाल' को रोकने के लिये, सरकार एक गिग-टू-कॅरियर ब्रिज कार्यक्रम शुरू कर सकती है, जो नौकरी के दौरान अधिगम को रिकॉर्ड करने के लिये ब्लॉकचेन-सत्यापित डिजिटल प्रमाणपत्रों का उपयोग करता है।
- यह 'स्किल पासपोर्ट' प्लेटफॉर्म-विशिष्ट रेटिंग (जैसे: लॉजिस्टिक्स या ग्राहक सेवा में '5-स्टार' रेटिंग) को राष्ट्रीय कौशल योग्यता फ्रेमवर्क (NSQF) क्रेडिट में परिवर्तित करेगा, जिसे औपचारिक नियोक्ताओं द्वारा मान्यता प्राप्त होगी।
- उर्ध्वगामी गतिशीलता के लिये एक औपचारिक मार्ग बनाकर, गिग वर्क को 'निष्क्रिय जीवनयापन के मार्ग' से एक मान्यता प्राप्त शिक्षुता अवधि में बदला जा सकता है जो युवाओं को औपचारिक अर्थव्यवस्था में उच्च-मूल्य वाली तकनीकी या प्रबंधकीय भूमिकाओं के लिये तैयार करती है।
- फिनटेक के नेतृत्व में 'कैश-फ्लो आधारित' क्रेडिट लोकतंत्रीकरण: गिग वर्कर्स की क्रेडिट-अदृश्यता की समस्या को हल करने के लिये, इंडिया स्टैक का लाभ उठाकर पारंपरिक संपार्श्विक या स्थिर वेतन पर्ची के बजाय रियल-टाइम प्लेटफॉर्म आय के आधार पर 'गिग-क्रेडिट' स्कोर बनाया जा सकता है।
- बैंकों और गैर-सरकारी वित्तीय संस्थानों (NBFC) को ओपन क्रेडिट इनेबलमेंट नेटवर्क के माध्यम से 'माइक्रो-इक्विटी' और 'एसेट-फाइनेंसिंग' (जैसे कम ब्याज वाले EV ऋण) की पेशकश करने के लिये प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।
- इससे वर्कर्स को अपने उत्पादन के साधनों, जैसे इलेक्ट्रिक वाहन या उच्च-स्तरीय लैपटॉप का स्वामित्व प्राप्त करने की अनुमति मिलेगी— जिससे वे प्रभावी रूप से 'किराए पर काम करने वाले मजदूरों' से मूल्यवान संपत्तियों वाले 'सूक्ष्म उद्यमियों' में परिवर्तित हो जाएंगे।
- सहकारी-समूहकर्त्ताओं के लिये नियामक सैंडबॉक्सिंग: सरकार को प्लेटफॉर्म सहकारी समितियों, अर्थात श्रमिक-स्वामित्व वाले ऐप्स, जहाँ वर्कर स्वयं इक्विटी रखते हैं तथा कमीशन संरचनाओं का निर्धारण करते हैं, के लिये राजकोषीय एवं नियामक 'सुरक्षित आश्रय' प्रदान करना चाहिये।
- गिग वर्कर्स के इन 'विकेंद्रीकृत स्वायत्त संगठनों' (DAO) को पहले 5 वर्षों के लिये कॉर्पोरेट टैक्स हॉलिडे की पेशकश करके, भारत वैश्विक एकाधिकार के खिलाफ स्थानीय प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ावा दे सकता है।
- यह उपाय 'बाज़ार-आधारित औपचारिकीकरण' को बढ़ावा देगा, जहाँ प्रतिभा को बनाए रखने का दबाव वैश्विक एग्रीगेटरों को श्रमिक-स्वामित्व वाले विकल्पों द्वारा प्रदान किये गए अधिक उचित वेतन एवं स्वामित्व मॉडल से मेल खाने के लिये विवश करता है।
निष्कर्ष:
भारत की गिग इकॉनमी एक महत्त्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है, जहाँ तीव्र विस्तार के साथ-साथ सुदृढ़ संरक्षण उपायों और समावेशी नीतियों का समन्वय अनिवार्य है। मुख्य चुनौती समुत्थानशीलता और निष्पक्षता के बीच संतुलन बनाने में है, यह सुनिश्चित करना कि नवाचार वर्कर्स की गरिमा एवं सुरक्षा की कीमत पर न हो। जैसे-जैसे जलवायु जोखिम और मंच-आधारित असुरक्षाएँ तीव्र होती जा रही हैं, सामाजिक सुरक्षा, पारदर्शिता और जलवायु-सहिष्णुता का एकीकरण अत्यावश्यक होता जा रहा है। अंततः एक सतत गिग इकॉनमी को सुविधा-आधारित मॉडल से आगे बढ़कर समतामूलक और मानवीय विकास के मॉडल में रूपांतरित होना होगा।
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दृष्टि मेन्स का प्रश्न: “भारत में गिग इकॉनमी के तीव्र विस्तार ने श्रम कल्याण ढाँचों के विकास को पीछे छोड़ दिया है।” सामाजिक सुरक्षा, कार्य परिस्थितियों और एल्गोरिदम नियंत्रण तथा जलवायु तनाव जैसे उभरते जोखिमों के संदर्भ में गिग वर्कर्स द्वारा सामना की जाने वाली चुनौतियों का विश्लेषण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
1. गिग इकॉनमी क्या है और भारत में यह तीव्र गति से क्यों बढ़ रही है?
गिग इकॉनमी एक ऐसा श्रम बाज़ार है जो अल्पकालिक, कार्य-आधारित रोज़गार पर आधारित होता है, जिसे डिजिटल मंचों के माध्यम से संचालित किया जाता है। भारत में इसके विस्तार के प्रमुख कारण हैं— डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (आधार, UPI), मांग-आधारित सेवाओं की बढ़ती आवश्यकता, मंच-आधारित व्यावसायिक मॉडल तथा विभिन्न कौशल स्तरों पर लचीले रोज़गार के अवसर।
2. जलवायु परिवर्तन और अत्यधिक गर्मी भारत में गिग वर्कर्स को किस प्रकार प्रभावित करते हैं?
दिहाड़ी गिग वर्कर्स भीषण गर्मी के दौरान स्वास्थ्य जोखिमों तथा आय हानि—दोनों के दोहरे दबाव का सामना करते हैं, क्योंकि उनके पास सवैतनिक अवकाश, बीमा अथवा हीट-सुरक्षा उपायों का अभाव होता है। वेतनभोगी कर्मचारियों के विपरीत, वे आय खोए बिना कार्य से अवकाश नहीं ले सकते; परिणामतः हीटवेव केवल एक पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि एक उपेक्षित आर्थिक संवेदनशीलता के रूप में उभरती है।
3. भारत में गिग वर्कर्स को किन प्रमुख चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?
प्रमुख मुद्दों में सामाजिक सुरक्षा की कमी, आय में अस्थिरता, एल्गोरिदम नियंत्रण, रोज़गार की स्थिति में विधिक अस्पष्टता, सुरक्षा जोखिम (विशेष रूप से त्वरित व्यापार में), लैंगिक असमानताएँ और कौशल विकास के सीमित अवसर शामिल हैं।
4. सामाजिक सुरक्षा संहिता (2020) का गिग वर्कर्स पर सीमित प्रभाव क्यों रहा है?
यद्यपि यह कानूनी रूप से गिग वर्कर्स को मान्यता देता है, फिर भी कार्यान्वयन में कमियाँ बनी हुई हैं। फिर भी क्रियान्वयन में अंतर बना हुआ है। लाभ अभी भी पंजीकरण स्तर पर ही सीमित हैं तथा मंचों के योगदान से प्रोत्साहनों में कमी आ जाती है, जिससे अपेक्षित कल्याणकारी परिणाम कमज़ोर पड़ जाते हैं।
5. भारत की गिग इकॉनमी को मज़बूत करने के लिये कौन-से नीतिगत उपाय किये जा सकते हैं?
भारत पोर्टेबल सामाजिक सुरक्षा प्रणालियों को अपना सकता है, एल्गोरिदम पारदर्शिता सुनिश्चित कर सकता है, डिजिटल सामूहिक सौदाकारी को सक्षम कर सकता है, जलवायु-संवेदनशील श्रम मानकों को लागू कर सकता है, कौशल गतिशीलता को बढ़ावा दे सकता है तथा गिग वर्क को अधिक सुरक्षित एवं संधारणीय बनाने के लिये फिनटेक-आधारित ऋण अभिगम्यता का विस्तार कर सकता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न 1. भारत में नियोजित अनियत मज़दूरों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये- (2021)
- सभी अनियत मज़दूर, कर्मचारी भविष्य निधि सुरक्षा के हकदार हैं।
- सभी अनियत मज़दूर नियमित कार्य-समय एवं समयोपरि भुगतान के हकदार हैं।
- सरकार अधिसूचना के द्वारा यह विनिर्दिष्ट कर सकती है कि कोई प्रतिष्ठान या उद्योग केवल अपने बैंक खातों के माध्यम से मज़दूरी का भुगतान करेगा।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (d)
मेन्स
प्रश्न 1. भारत में महिलाओं के सशक्तीकरण की प्रक्रिया में 'गिग इकोनॉमी' की भूमिका का परीक्षण कीजिये। (2021)