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विकसित भारत @2047 हेतु SEZ का रणनीतिक पुनर्गठन

  • 05 May 2026
  • 209 min read

यह एडिटोरियल 03/05/2026 को द बिज़नेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित “CBIC clarification fixes one SEZ anomaly, ignores another concern” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह संपादकीय वैश्विक कर व्यवस्थाओं में हो रहे परिवर्तनों और DESH विधेयक जैसे घरेलू नीतिगत परिवर्तनों के बीच भारत के विशेष आर्थिक क्षेत्रों के संरचनात्मक रूपांतरण का मूल्यांकन करता है। यह उच्च-तकनीकी विकास के इंजन के रूप में विशेष आर्थिक क्षेत्रों को बनाए रखने के लिये आवश्यक राजवित्तीय चुनौतियों, विधायी आवश्यकताओं और रणनीतिक उपायों का बहुआयामी विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

प्रिलिम्स के लिये: RoDTEP, न्यूनतम वैकल्पिक करICEGATEPM गति शक्ति, OECD, आधार क्षरण और लाभ स्थानांतरण (BEPS)

मेन्स के लिये: SEZ में प्रोत्साहन के लिये उठाए गए प्रमुख कदम, SEZ से जुड़े मुद्दे, आवश्यक उपाय।

भारत के विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ), जिन्हें SEZ अधिनियम, 2005 के तहत शुरू किया गया था, प्रमुख निर्यात इंजन के रूप में उभरे हैं और हाल के वर्षों में भारत के कुल माल निर्यात में इनका योगदान एक तिहाई से अधिक रहा है। 270 से अधिक कार्यरत SEZ और 5,000 से अधिक स्वीकृत इकाइयों के साथ, ये सामूहिक रूप से 28 लाख से अधिक लोगों को रोज़गार प्रदान करते हैं, जो रोज़गार सृजन में इनकी भूमिका को दर्शाता है। IT/ITES, फार्मास्यूटिकल्स और इंजीनियरिंग उत्पादों जैसे क्षेत्रों के योगदान से SEZ का निर्यात सत्र 2023-24 में 160 अरब डॉलर से अधिक हो गया। केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड द्वारा हाल ही में जारी स्पष्टीकरण SEZ की प्रतिस्पर्द्धात्मकता और निवेशकों के विश्वास को बनाए रखने के लिये कर संबंधी अस्पष्टताओं को दूर करने की निरंतर आवश्यकता को उजागर करते हैं।

विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) क्या हैं? 

  • परिचय: विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) एक विशेष रूप से सीमांकित शुल्क-मुक्त क्षेत्र है, जिसे व्यापारिक परिचालन, शुल्कों तथा सीमा-शुल्कों के उद्देश्यों से विदेशी क्षेत्र के समान माना जाता है। 
    • संक्षेप में, यह एक ऐसा भौगोलिक क्षेत्र है जिसके आर्थिक कानून किसी देश के सामान्य आर्थिक कानूनों की तुलना में अधिक उदार हैं।
    • एक विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) का प्राथमिक लक्ष्य विदेशी निवेश बढ़ाना, रोज़गार सृजित करना और प्रशासन में सुधार करना है। 
      • इन क्षेत्रों में व्यवसायों को स्थापित करने के लिये प्रोत्साहित करने हेतु सरकारें निवेश, कराधान, व्यापार, कोटा, सीमा शुल्क और श्रम नियमों के संबंध में वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करती हैं।
  • SEZ की प्रमुख विशेषताएँ
    • भौगोलिक रूप से परिभाषित: ये भौतिक रूप से बाड़ से घिरे क्षेत्र हैं जिनमें प्रवेश और निकास के लिये निर्धारित बिंदु होते हैं।
    • सिंगल-विंडो क्लीयरेंस: प्रशासनिक प्रक्रियाओं को प्रायः इस प्रकार सुव्यवस्थित किया जाता है कि उद्योगों को सभी आवश्यक अनुमतियाँ एक ही स्थान से प्राप्त हो सकें, जिससे अनावश्यक प्रशासनिक जटिलताओं में कमी आती है। 
    • कर प्रोत्साहन: विशेष आर्थिक क्षेत्रों (SEZ) में स्थित इकाइयों को प्रायः आयकर से छूट, बिक्री कर से छूट और कच्चे माल या पूंजीगत वस्तुओं के आयात पर शून्य सीमा शुल्क का लाभ मिलता है।
    • उदार श्रम कानून: सामान्यतः, विशेष आर्थिक क्षेत्रों (SEZ) के भीतर श्रम विनियम घरेलू अर्थव्यवस्था के अन्य भागों की तुलना में अधिक लचीले होते हैं, ताकि उच्च उत्पादकता सुनिश्चित की जा सके। 
  • भारत में विनियमन: निर्यात को बढ़ावा देने के लिये निर्यात प्रसंस्करण क्षेत्र (EPZ) मॉडल को अपनाने वाले पहले एशियाई देशों में भारत भी शामिल था, जिसने वर्ष 1965 में कांडला में एशिया का पहला EPZ स्थापित किया।
    • विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) मुख्य रूप से विशेष आर्थिक क्षेत्र अधिनियम, 2005 और SEZ नियम, 2006 द्वारा शासित होते हैं, जो उनकी स्थापना एवं संचालन के लिये एक व्यापक विधिक ढाँचा प्रदान करते हैं। 
      • नियामक व्यवस्था का नेतृत्व केंद्रीय स्तर पर बोर्ड ऑफ अप्रूवल (BoA) करता है, जो निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था के रूप में कार्य करता है।
    • भारत की वर्तमान विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) नीति का अध्ययन करने के लिये वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय द्वारा जून 2018 में बाबा कल्याणी समिति का गठन किया गया था।
    • विशेष आर्थिक क्षेत्रों में निवेश आकर्षित करने हेतु इकाइयों को प्रदान की जाने वाली प्रोत्साहनात्मक सुविधाओं में निम्नलिखित सम्मिलित हैं—   
      • विशेष आर्थिक क्षेत्र इकाइयों के विकास, संचालन और अनुरक्षण हेतु वस्तुओं का शुल्क-मुक्त आयात अथवा घरेलू क्रय।
      • केंद्रीय विक्रय कर, सेवा कर तथा राज्य विक्रय कर से छूट। अब ये सभी वस्तु एवं सेवा कर में समाहित हो चुके हैं तथा ‘एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम, 2017’ के अंतर्गत विशेष आर्थिक क्षेत्रों को की जाने वाली आपूर्ति शून्य-दर श्रेणी में रखी गई है।
      • संबंधित राज्य सरकारों द्वारा अधिसूचित अन्य उपकरों से छूट।
      • केंद्र और राज्य स्तर की स्वीकृतियों के लिये एकल विंडो क्लीयरेंस।

भारत में SEZ की आकर्षण क्षमता बढ़ाने के लिये भारत ने कौन-कौन सी प्रमुख पहलें की हैं?

  • एकमुश्त रियायती घरेलू टैरिफ (DTA) क्षेत्र विक्रय सुधार: रणनीतिक नीतिगत परिवर्तनों के माध्यम से अब क्षमता के अल्प-उपयोग की समस्या को कम किया जा रहा है, जिसके अंतर्गत पात्र विशेष आर्थिक क्षेत्र विनिर्माण इकाइयों को रियायती सीमा शुल्क दरों पर घरेलू टैरिफ क्षेत्र में अपने उत्पाद बेचने की अनुमति (1 अप्रैल 2026 से 31 मार्च 2027 तक प्रभावी) दी गई है।
    • यह व्यवस्था वैश्विक व्यापार अस्थिरता के विरुद्ध कॉर्पोरेट स्थिरता को सुदृढ़ करती है और निर्यातोन्मुखी ढाँचे को बनाए रखते हुए एक महत्त्वपूर्ण घरेलू बाज़ार सुरक्षा-कवच प्रदान करती है। 
    • केंद्रीय बजट 2026-27 में पेश किया गया यह लक्षित सुधार, वर्तमान वैश्विक आपूर्ति शृंखला व्यवधानों के प्रतिकूल प्रभावों को सीधे तौर पर संबोधित करता है। 
  • SEZ पारिस्थितिकी तंत्रों में RoDTEP लाभों का विस्तार: निर्यातित उत्पादों पर शुल्क और करों की छूट (RoDTEP) योजना में SEZ को एकीकृत करने से अंतर्निहित स्थानीय कर-भार (Levies) को संरचनात्मक रूप से निष्प्रभावी किया गया, ताकि वैश्विक स्तर पर समान प्रतिस्पर्द्धा सुनिश्चित हो सके। 
    • पूर्व में अप्रतिपूर्ति राज्य एवं स्थानीय करों को सम्मिलित करने से लागत संबंधी बाधाएँ कम हुईं और विशेष आर्थिक क्षेत्र निर्यातों की मूल्य प्रतिस्पर्द्धात्मकता में सुधार (यह व्यवस्था 31 मार्च 2026 तक प्रभावी रही) हुआ। 
    • यह महत्त्वपूर्ण नीति सीधे तौर पर वर्तमान में मौजूद 7.86 लाख करोड़ रुपये के SEZ निवेश का समर्थन करती है, जिससे वैश्विक निर्यातकों के लिये कार्यशील पूंजी चक्र स्थिर बना रहता है।
  • लक्षित सेमीकंडक्टर और हाई-टेक सीमांकन: सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक घटकों के लिये विशेष रूप से अवसंरचनात्मक ढाँचे में संशोधन करने से SEZ पारंपरिक आईटी हब से तकनीकी संप्रभुता के महत्त्वपूर्ण केंद्रों में परिवर्तित हो जाते हैं। 
    • यह अनुकूलित राजकोषीय प्रोत्साहनों, भूमि संबंधी नियमों में शिथिलता तथा लचीले घरेलू टैरिफ क्षेत्र विक्रय के माध्यम से राष्ट्रीय सुरक्षा आवश्यकताओं के साथ क्षेत्रीय नियोजन का सहज समन्वय करता है। 
    • जून 2025 में, सरकार ने सानंद (गुजरात) और धारवाड़ (कर्नाटक) में दो नए सेमीकंडक्टर SEZ को अधिसूचित करके इसे लागू किया। 
    • इन अत्यधिक विशिष्ट क्षेत्रों से प्रौद्योगिकी आयात पर निर्भरता में भारी कमी आने और उच्च-कुशल रोज़गार सृजित होने की संभावना है।
  • सूचना प्रौद्योगिकी/सूचना प्रौद्योगिकी समर्थित सेवाओं (IT/ITES) के सीमांकन के माध्यम से वाणिज्यिक अचल संपत्ति का पुनरुद्धार: सरकार ने विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) नियमों में संशोधन करके IT/ITES (सूचना प्रौद्योगिकी/सूचना प्रौद्योगिकी समर्थित सेवाएँ) SEZ में निर्मित क्षेत्र के एक हिस्से को गैर-प्रसंस्करण क्षेत्र के रूप में सीमांकित करने की अनुमति दी है।
    • यह स्थानिक लचीलापन घरेलू और निर्यात-उन्मुख फर्मों के सहजीवी सह-स्थान को सक्षम बनाता है, जिससे पृथक परिसरों के स्थान पर एक जीवंत एवं एकीकृत वाणिज्यिक पारितंत्र विकसित होता है।   
    • इस उपाय ने महामारी के बाद वाणिज्यिक रियल एस्टेट क्षेत्र को संरचनात्मक रूप से स्थिर किया, जिससे SEZ में अवसंरचनात्मक निवेश पर अधिकतम रिटर्न प्राप्त हुआ।
  • सीमा शुल्क वापसी स्पष्टीकरणों के माध्यम से व्यापार सुगमता: घरेलू टैरिफ क्षेत्र निकासी को ‘आयातित वस्तुओं’ के रूप में विधिक व्याख्या प्रदान कर शुल्क वापसी से संबंधित दीर्घकालिक वाद-विवादों का समाधान किया गया और संस्थागत कार्यशील पूँजी चक्र को तीव्र बनाया गया। 
    • यह प्रशासनिक सरलीकरण सुनिश्चित करता है कि विशेष आर्थिक क्षेत्रों से प्राप्त वस्तुओं का पुनः निर्यात करने वाले घरेलू व्यवसाय तकनीकी वैधानिक अस्पष्टताओं के कारण अनुचित रूप से दंडित न हों। 
    • अप्रैल 2026 में जारी CBIC के विशिष्ट निर्देश में, SEZ से DTA को भेजे जाने वाले शुल्क-भुगतान वाली वस्तुओं पर धारा 74 के तहत ड्रॉबैक दावों को स्पष्ट रूप से वैध ठहराया गया है। 
      • नियामक बाधाओं को दूर करके, यह एकल-खिड़की स्पष्टीकरण अवरुद्ध कॉर्पोरेट पूंजी में लाखों डॉलर को अनलॉक करता है, जिससे व्यापार सुगमता में उल्लेखनीय रूप से सुधार होता है।
  • निर्यात संवर्द्धन मिशन के साथ रणनीतिक एकीकरण: डिजिटल रूप से संचालित EPM के भीतर SEZ को स्थापित करने से राष्ट्रीय दृष्टिकोण खंडित राजकोषीय प्रोत्साहनों से हटकर एक एकीकृत, परिणाम-आधारित संस्थागत तंत्र की ओर स्थानांतरित होता है। 
    • यह कुशलतापूर्वक स्थानीयकृत SEZ विकास को व्यापक 'विकसित भारत @2047' दृष्टिकोण के साथ संरेखित करता है, जिसके लिये यह अनुकूलनीय वित्तीय सहायता और केंद्रीकृत डिजिटल व्यापार अवसंरचना प्रदान करता है। 
    • वित्तीय वर्ष 2025–31 की अवधि हेतु 25,060 करोड़ रुपये के प्रावधान के साथ प्रारंभ किये गये इस मिशन ने विशेष आर्थिक क्षेत्र परिचालनों को व्यापक वैश्विक बाज़ार पहुँच ढाँचे में एकीकृत किया। 
    • इस समन्वित तालमेल ने वित्त वर्ष 2025-26 की पहली छमाही में भारत द्वारा 418.91 बिलियन अमेरिकी डॉलर के अब तक के उच्चतम कुल निर्यात को दर्ज करने में प्रत्यक्ष रूप से योगदान दिया।
  • विशेषीकृत व्यापार क्षेत्रों (SEZ) के भीतर ई-कॉमर्स निर्यात केंद्रों को सक्षम बनाना: ई-कॉमर्स निर्यात केंद्रों को एकीकृत करके SEZ को उभरती डिजिटल अर्थव्यवस्था का लाभ उठाने के लिये पुनर्स्थापित करना, विशेषीकृत व्यापार क्षेत्रों की मूलभूत उपयोगिता का आधुनिकीकरण करता है। 
    • यह दूरदर्शी ढाँचा त्वरित सीमा शुल्क निकासी, एकीकृत भंडारण और सरलीकृत डाक व्यवस्था की सुविधा प्रदान करता है, जिसे विशेष रूप से MSME के ​​सीमा पार B2C व्यापार के लिये तैयार किया गया है। 
    • फ्री ट्रेड वेयरहाउसिंग ज़ोन (FTWZ) के परिचालन दिशानिर्देशों से प्रेरित यह तंत्र छोटे उद्यमों को शुल्क-मुक्त क्षेत्रों से सीधे वैश्विक बाज़ारों में प्रवेश करने में सक्षम बनाता है। 
    • भारत की मज़बूत डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का उपयोग करते हुए ये केंद्र पारंपरिक वस्तु-प्रधान विशेष आर्थिक क्षेत्र उत्पादन को उच्च-गति वैश्विक खुदरा क्षेत्र की ओर रणनीतिक रूप से विविधीकृत करते हैं। 
  • ESG अनुपालन और नवीकरणीय ऊर्जा अवसंरचना का एकीकरण: SEZ डेवलपर्स को स्वायत्त रूप से नवीकरणीय ऊर्जा ग्रिड स्थापित करने की अनुमति देकर इन परिसरों को वैश्विक मानकों के अनुरूप हरित विनिर्माण केंद्रों में रूपांतरित किया जा रहा है। 
    • सख्त पर्यावरणीय, सामाजिक और शासन (ESG) मानकों के अनुरूप ऊर्जा अवसंरचना विकसित करने से उन प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों को आकर्षित किया जा रहा है, जो शून्य-कार्बन वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को अनिवार्य मानते हैं। 
    • सामान्य SEZ क्षेत्रों में समर्पित सौर प्रतिष्ठानों के लिये लक्षित दिशानिर्देशों के माध्यम से औपचारिक रूप से लागू किया गया यह प्रणालीगत उन्नयन राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन का प्रत्यक्ष समर्थन करता है। 
    • यह विनिर्माताओं के परिचालन व्ययों में तीव्र कमी लाते हुए 31 लाख से अधिक प्रत्यक्ष विशेष आर्थिक क्षेत्र कर्मचारियों के लिये एक सतत और पर्यावरण-अनुकूल कार्यपरिवेश उपलब्ध कराती है। 
  • DESH ढाँचे की ओर संक्रमण: पुराने SEZ अधिनियम से उद्यम और सेवा केंद्रों के विकास (DESH) दर्शन की ओर संक्रमण 'राज्य-साझेदारी' की ओर एक परिवर्तन को दर्शाता है।
    • राज्यों को समान भागीदार बनाकर, सरकार यह सुनिश्चित कर रही है कि स्थानीय श्रम कानून और राज्य-स्तरीय प्रोत्साहन केंद्रीय लक्ष्यों के साथ अधिक प्रभावी ढंग से समन्वित हों। 
    • यह नया ढाँचा ‘क्षेत्रों’ की अपेक्षा ‘केंद्रों’ पर अधिक बल देता है तथा संकीर्ण कर-प्रोत्साहन आधारित निर्यात लक्ष्यों के स्थान पर व्यापक आर्थिक विकास एवं राज्य-स्तरीय सहयोग को प्राथमिकता प्रदान करता है। 

भारत में विशेष आर्थिक क्षेत्रों के सामने प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?

  • भूमि का अल्प-उपयोग और स्थानिक अनम्यता: कठोर अधिसूचना-निरसन नियमों तथा अनम्य स्थानिक क्षेत्रीकरण ढाँचों ने अधिग्रहित विशाल भू-भागों को अनुत्पादक और बेकार पड़ी हुई अवसंरचनात्मक परिसंपत्तियों में परिवर्तित कर दिया है। 
    • यह संरचनात्मक अनम्यता रिक्त प्रसंस्करण क्षेत्रों को समेकित, बहुउद्देशीय घरेलू आर्थिक गलियारों में त्वरित रूप से पुनर्प्रयोजित करने से रोकती है। 
    • भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के एक लेखापरीक्षण (यद्यपि पुराना) में पाया गया कि 5,402 हेक्टेयर (14 प्रतिशत) क्षेत्र को आवृत करने वाले 52 विशेष आर्थिक क्षेत्रों की अधिसूचना निरस्त कर उन्हें वाणिज्यिक उपयोग हेतु परिवर्तित कर दिया गया, जो नीतिगत विचलन को दर्शाता है। 
      • यह मुद्दा और भी गंभीर हो सकता है, क्योंकि 46 SEZ को ऑडिट के लिये प्रस्तुत नहीं किया गया और एक के रिकॉर्ड अधूरे थे, जो SEZ भूमि उपयोग में पारदर्शिता एवं शासन संबंधी गंभीर कमियों की ओर संकेत करते हैं।
    • व्यापक विधायी सुधारों में देरी के कारण डेवलपर्स इन विशाल, अनसुलझे रियल एस्टेट भूखंडों का व्यावसायिक रूप से मुद्रीकरण करने में असमर्थ बने हुए हैं।
  • मूलभूत राजकोषीय श्रेष्ठता का क्षरण: न्यूनतम वैकल्पिक कर (MAT) का संस्थागत अधिरोपण और सनसेट क्लॉज़ का कड़ाई से प्रवर्तन ने व्यवस्थित रूप से उस मूलभूत कर मध्यस्थता को समाप्त कर दिया है जिसने मूल रूप से विदेशी पूंजी को आकर्षित किया था। 
    • परिणामस्वरूप, निवेशक अब स्वाभाविक रूप से घरेलू टैरिफ क्षेत्रों को प्राथमिकता देते हैं, जिससे पारंपरिक SEZ मॉडल नये उद्यमों की स्थापना के लिये राजकोषीय दृष्टि से अल्प-प्रतिस्पर्द्धी हो गया है। 
    • वर्ष 2019 में नई विनिर्माण इकाइयों के लिये 15% की रियायती कॉर्पोरेट कर दर की शुरुआत के बाद से निवेशकों की प्राथमिकता तेज़ी से घरेलू टैरिफ क्षेत्रों (DTA) की ओर स्थानांतरित हो गई है, जिससे SEZ का राजकोषीय लाभ कम हो गया है।
    • इससे विशेष आर्थिक क्षेत्रों (SEZ) का तुलनात्मक आकर्षण कमज़ोर हुआ है, यद्यपि वे वस्तु एवं सेवा कर शून्य-दर निर्धारण तथा निर्यात-उन्मुख अवसंरचना जैसे अप्रत्यक्ष कर लाभ अब भी प्रदान करते हैं। 
  • DTA बाज़ार पहुँच बाधाएँ और टैरिफ विषमता: घरेलू बिक्री हेतु SEZ इकाइयों पर सामान्य सीमा शुल्क लागू करना एक विरोधाभासी स्थिति उत्पन्न करता है, जिससे वे भारत के तीव्र गति से विस्तृत होते घरेलू उपभोक्ता बाज़ार से विधिक रूप से पृथक हो जाती हैं। 
    • इस शुल्क असमानता के कारण विशेष आर्थिक क्षेत्रों (SEZ) में निर्मित वस्तुएँ शून्य शुल्क मुक्त व्यापार समझौतों के तहत आयातित तैयार उत्पादों की तुलना में घरेलू स्तर पर काफी अधिक महंगी हो जाती हैं। 
    • उदाहरण के लिये, SEZ के भीतर निर्मित इलेक्ट्रॉनिक्स को ASEAN देशों से सीधे आयात की तुलना में घरेलू बाज़ार में प्रवेश करने में अधिक बाधाओं का सामना करना पड़ता है। 
    • इसके अलावा, वर्ष 2026 की शुरुआत में CBIC द्वारा जारी स्पष्टीकरण SEZ से DTA ड्यूटी ड्रॉबैक दावों से संबंधित चल रहे प्रशासनिक अंतर्विरोध और वाद-विवाद के जोखिमों को उजागर करते हैं।
  • PLI योजनाओं द्वारा पूंजी का विचलन: आलोचकों का तर्क है कि घरेलू टैरिफ क्षेत्र में उत्पादन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजनाओं के आक्रामक रणनीतिक कार्यान्वयन ने निर्यात-उन्मुख परिसरों हेतु निर्धारित निवेश प्रवाह को अनपेक्षित रूप से प्रभावित किया है। 
    • केवल कर-छूट के स्थान पर प्रत्यक्ष, परिणाम-आधारित राजकोषीय प्रोत्साहन प्रदान करके PLI योजनाएँ वैश्विक विनिर्माताओं के लिये अधिक लाभकारी और संरचनात्मक रूप से श्रेष्ठ विकल्प प्रस्तुत करती हैं। 
    • 1.97 लाख करोड़ रुपये के व्यापक PLI व्यय ने महत्त्वपूर्ण उच्च-प्रौद्योगिकी विनिर्माण पूँजी को पारंपरिक विशेष आर्थिक क्षेत्रों से सक्रिय रूप से दूर किया है। 
      • परिणामस्वरूप, विशेष आर्थिक क्षेत्र मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक घटक विनिर्माण में हालिया तीव्र वृद्धि को आकर्षित करने में बड़े पैमाने पर विफल रहे हैं, जो अभी भी घरेलू टैरिफ क्षेत्र में केंद्रित है। 
  • गंभीर क्षेत्रीय असंतुलन और भेद्यता: SEZ का अंतर्निहित संस्थागत ढाँचा गहरी संरचनात्मक विषमता से ग्रस्त है, जो अत्यधिक रूप से सॉफ्टवेयर सेवाओं को प्राथमिकता देता है, जबकि भारी विनिर्माण अथवा विविधीकृत वस्तु-निर्यात को उत्प्रेरित करने में विफल रहता है। 
    • क्षेत्रीय विविधीकरण के इस अभाव से संपूर्ण विशेष आर्थिक क्षेत्र पारिस्थितिकी तंत्र वैश्विक प्रौद्योगिकी मंदी और स्वचालित बाज़ार व्यवधानों के प्रति अत्यधिक व्यापक आर्थिक संवेदनशीलता का शिकार हो जाता है।  
    • भारत में वर्तमान में कार्यरत SEZ में से 60% से अधिक हिस्सा सॉफ्टवेयर और IT/ITES क्षेत्रों का है।
    • इस बीच, प्रमुख विनिर्माण क्षेत्र का योगदान नगण्य है, जो व्यापक आधार वाले, बहु-क्षेत्रीय औद्योगिक रोज़गार सृजन के मूल वैधानिक दृष्टिकोण को गंभीर रूप से सीमित करता है।
  • DESH विधेयक के गतिरोध के कारण नीतिगत गतिरोध: लंबे समय से चल रहे अंतर-मंत्रालयी अंतर्विरोध के कारण उद्यम और सेवा केंद्र विकास (DESH) विधेयक में विलंब हो रहा है, जिससे एक गंभीर नीतिगत शून्य उत्पन्न हो गया है, जो दीर्घकालिक कॉर्पोरेट पूंजी प्रतिबद्धताओं को सक्रिय रूप से बाधित कर रहा है। 
    • यह विधायी गतिरोध पृथक निर्यात-केवल क्षेत्रों से समग्र, घरेलू रूप से एकीकृत आर्थिक केंद्रों की ओर आवश्यक संस्थागत संक्रमण को प्रत्यक्ष रूप से अवरुद्ध करता है। 
    • पहली बार वर्ष 2022 में तैयार किये गए DESH कानून के लगातार स्थगन के कारण अवसंरचना विकासकर्त्ता पुराने SEZ अधिनियम अनुपालन मानदंडों के साथ कानूनी रूप से फंसे हुए हैं। 
  • OECD के दूसरे स्तंभ के कर ढाँचे द्वारा निष्प्रभावीकरण: OECD के आधार क्षरण और लाभ स्थानांतरण (BEPS) संबंधी द्वितीय स्तंभ ढाँचे के चरणबद्ध वैश्विक क्रियान्वयन ने बहुराष्ट्रीय निगमों के लिये विशेष आर्थिक क्षेत्र कर-अवकाश के प्रतिस्पर्द्धात्मक लाभ को मूलतः निष्प्रभावी कर दिया है। 
    • सार्वभौमिक कर-न्यूनतम सीमा लागू करके यह अंतर्राष्ट्रीय अनुपालन तंत्र शीर्ष स्तर के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हेतु स्थानीय कर-छूटों को अप्रासंगिक बना देता है। 
    • यह संरचनात्मक परिवर्तन भारतीय विशेष आर्थिक क्षेत्रों में कार्यरत वैश्विक अग्रणी निगमों के लिये प्रमुख राजकोषीय आकर्षण को समाप्त करता है, जिससे भविष्य की प्रत्यक्ष विदेशी निवेश धाराओं पर खतरा उत्पन्न होता है। 
  • जटिल मुक्त व्यापार समझौता (FTA) मूल्य-वर्द्धन मानदंडों से उत्पन्न घर्षण: हाल के द्विपक्षीय व्यापार समझौतों में अंतर्निहित कड़े मूल नियम और जटिल मूल्य-वर्द्धन मानदंड उन SEZ इकाइयों को असमान रूप से दंडित करते हैं जो आयातित कच्चे माल पर अत्यधिक निर्भर हैं। 
    • इससे परिचालन अनुपालन में गंभीर बाधाएँ उत्पन्न होती हैं, जिससे SEZ निर्यातकों को उन तरजीही वैश्विक टैरिफ लाभों से वंचित होना पड़ता है जिनका घरेलू निर्माता आसानी से फायदा उठाते हैं। 
    • उदाहरण के लिये, भारत-UAE CEPA के तहत सख्त मूल्यवर्द्धन मानदंडों ने SEZ निर्यातकों के लिये अनुपालन संबंधी चुनौतियाँ उत्पन्न कर दी हैं। 
      • परिणामस्वरूप, विशेष आर्थिक क्षेत्रों पर आधारित वस्तु-निर्यातकों के लिये उन घरेलू शुल्क क्षेत्र कंपनियों के पक्ष में मूल्यवान वैश्विक बाज़ार हिस्सेदारी खोने का जोखिम है, जिन्हें अधिक सुदृढ़ घरेलू आपूर्ति नेटवर्क का लाभ प्राप्त है। 

भारत में विशेष आर्थिक क्षेत्रों के प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिये कौन-से उपाय आवश्यक हैं?

  • DESH ढाँचे की ओर विधायी परिवर्तन: प्रतिबंधात्मक SEZ अधिनियम, 2005 से प्रस्तावित उद्यम और सेवा केंद्रों के विकास (DESH) में संक्रमण शासन के विकेंद्रीकरण एवं परिचालन लचीलेपन को बढ़ाने के लिये महत्त्वपूर्ण है।
    • सरकार 'केवल निर्यात' पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय 'हबों के विकास' पर ध्यान केंद्रित करके, SEZ को घरेलू अर्थव्यवस्था के साथ सहज रूप से एकीकृत करने में सक्षम बना सकती है। 
    • इस विधायी विकास से अप्रयुक्त भूमि की अधिसूचना रद्द करना आसान हो जाता है और इकाइयों के लिये निवल विदेशी मुद्रा सकारात्मक होने की आवश्यकता समाप्त हो जाती है, जिससे अधिक समावेशी औद्योगिक वातावरण को बढ़ावा मिलता है।
  • सामंजस्यपूर्ण 'एक भारत' टैरिफ समतुल्यीकरण: विशेष आर्थिक क्षेत्रों के भीतर ‘द्वि-उपयोग’ विनियामक ढाँचे के क्रियान्वयन से निर्यातोन्मुख तथा घरेलू शुल्क क्षेत्र गतिविधियों का सह-अस्तित्व बिना भौतिक पृथक्करण अथवा अत्यधिक शुल्कों के संभव हो सकेगा। 
    • विशेष आर्थिक क्षेत्रों में निर्मित वस्तुओं के घरेलू विक्रय पर लागू शुल्क व्यवस्था को मुक्त व्यापार समझौतों के अंतर्गत आयातित वस्तुओं के समकक्ष बनाकर सरकार वर्तमान ‘प्रतिलोम शुल्क व्युत्क्रमण’ को समाप्त कर सकती है।
    • यह उपाय सुनिश्चित करता है कि घरेलू उपभोक्ताओं को उच्च-गुणवत्ता वाले विशेष आर्थिक क्षेत्र उत्पादों का लाभ प्राप्त हो, जबकि विनिर्माता बाज़ार विविधीकरण के माध्यम से अपनी क्षमता का सर्वोत्तम उपयोग कर सकें।
    • बाबा कल्याणी समिति ने भारत में विशेष आर्थिक क्षेत्रों का नाम बदलकर ‘3E’ अर्थात ‘रोज़गार एवं आर्थिक परिक्षेत्र’ रखने का प्रस्ताव दिया है, ताकि इन्हें ‘निर्यात द्वीप’ से आगे बढ़ाकर आर्थिक और रोज़गार वृद्धि के उत्प्रेरक के रूप में विकसित किया जा सके। 
  • रणनीतिक बहु-तरीका लॉजिस्टिक्स एकीकरण: PM गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान के साथ संरेखित करके SEZ को 'एकीकृत बंदरगाह-आधारित औद्योगिक क्लस्टर' में परिवर्तित करने से लॉजिस्टिक्स लागत में संरचनात्मक रूप से कमी आएगी।
    • 'अंतिम बिंदु' तक रेल-से-कारखाने की कनेक्टिविटी और समर्पित माल ढुलाई गलियारे की पहुँच सुनिश्चित करके, SEZ उन भौगोलिक बाधाओं को दूर कर सकते हैं जो वर्तमान में माल निर्यात में बाधा डालती हैं। 
    • मुक्त व्यापार भंडारण क्षेत्रों (FTWZ) को बहु-मोडल ट्रांसशिपमेंट हब के रूप में विकसित करने से कुशल इन्वेंट्री प्रबंधन और रणनीतिक भंडारण संभव हो पाता है, जिससे भारत वैश्विक मूल्य शृंखला में एक केंद्रीय नोड के रूप में स्थापित हो जाता है।
  • ESG-आधारित हरित अवसंरचना जनादेश: नवीकरणीय ऊर्जा के कैप्टिव संयंत्रों और शून्य-तरल निर्वहन प्रणालियों के लिये संप्रभु-समर्थित हरित ऋण प्रदान करके 'चक्रीय अर्थव्यवस्था एन्क्लेव' की ओर संक्रमण को प्रोत्साहित करना एक आधुनिक आवश्यकता है।
    • जैसे-जैसे वैश्विक बाज़ार कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज़्म (CBAM) को लागू कर रहे हैं, SEZ को अंतर्राष्ट्रीय खरीद के लिये व्यवहार्य बने रहने के लिये सतत, कार्बन-तटस्थ विनिर्माण की ओर रुख करना होगा। 
    • इन क्षेत्रों के भीतर ESG (पर्यावरण, सामाजिक और शासन) अनुपालन ढाँचे को मानकीकृत करने से प्रभाव के प्रति जागरूक वैश्विक संस्थागत निवेशकों से उच्च गुणवत्ता वाला प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आकर्षित होगा।
  • क्षेत्र-विशिष्ट 'प्लग-एंड-प्ले' पारिस्थितिकी तंत्र: सेमीकंडक्टर, एयरोस्पेस और चिकित्सा उपकरणों जैसे उच्च-तकनीकी क्षेत्रों के लिये तैयार किये गए 'प्लग-एंड-प्ले' अवसंरचना के साथ विशेष 'संप्रभु औद्योगिक एन्क्लेव' विकसित करने से नए निवेशों के लिये विकास अवधि कम हो जाएगी। 
    • इन क्षेत्रों में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल के तहत साझा परीक्षण प्रयोगशालाएँ, सामान्य अपशिष्ट उपचार संयंत्र तथा विशेष कौशल विकास केंद्र उपलब्ध कराए जाने चाहिये। 
    • क्लस्टर स्तर पर पूर्व-अनुमोदित पर्यावरणीय मंजूरी और भवन निर्माण परमिट उपलब्ध कराने से वैश्विक कंपनियों को वर्षों के बजाय हफ्तों के भीतर परिचालन शुरू करने की सुविधा मिलेगी।
  • वित्तीय आकर्षण को बहाल करने के लिये SEZ इकाइयों के लिये न्यूनतम वैकल्पिक कर (MAT) और सनसेट क्लॉज़ का राजकोषीय पुनर्समायोजन: एक व्यावहारिक ज़मीनी स्तर का उपाय SEZ इकाइयों के लिये न्यूनतम वैकल्पिक कर (MAT) को अधिक प्रतिस्पर्द्धी दर पर पुनर्समायोजित करना आवश्यक है। 
    • समाप्त हो चुकी प्रत्यक्ष कर छूटों को अनुसंधान एवं विकास व्यय और उच्च-मूल्य वाले रोज़गार सृजन पर केंद्रित 'परिणाम-आधारित प्रोत्साहनों' (PLI मॉडल के समान) से प्रतिस्थापित करने से स्थायी राजवित्तीय सहायता प्राप्त होगी। 
    • इस परिवर्तन से यह सुनिश्चित होता है कि सरकार निम्न-स्तरीय असेंबली के लिये निष्क्रिय कर मध्यस्थता प्रदान करने के बजाय वास्तविक आर्थिक मूल्यवर्द्धन और नवाचार को प्रोत्साहित करे।
  • संस्थागत वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR): प्रमुख केंद्रों के भीतर समर्पित 'SEZ वाणिज्यिक मध्यस्थता न्यायाधिकरण' स्थापित करने से न्यायिक प्रणाली के अत्यधिक भार से बाहर संविदात्मक एवं कर संबंधी विवादों को हल करने के लिये एक विशेष, समयबद्ध तंत्र उपलब्ध होगा। 
    • अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता मानकों को अपनाकर और प्रौद्योगिकी आधारित मध्यस्थता का लाभ उठाकर, सरकार अनुबंधों की शुचिता में निवेशकों का अधिक विश्वास उत्पन्न कर सकती है। 
    • यह कानूनी 'सुरक्षित आश्रय' दृष्टिकोण नीतिगत उलट-फेर के कथित जोखिम को कम करता है तथा यह सुनिश्चित करता है कि प्रशासनिक घर्षण दीर्घकालिक पूंजी ठहराव में परिणत न हो।

निष्कर्ष:

भारत के विशेष आर्थिक क्षेत्रों (SEZ) का पृथक निर्यात केंद्रों से एकीकृत आर्थिक केंद्रों में विकास, 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये एक रणनीतिक अनिवार्यता है। DESH ढाँचे के माध्यम से विधायी कमियों को दूर करके और राजकोषीय प्रोत्साहनों को वैश्विक ESG मानकों के अनुरूप बनाकर, भारत इन क्षेत्रों को 'विकसित भारत' के स्तंभों के रूप में पुनर्जीवित कर सकता है। संरचनात्मक विषमताओं और प्रतिलोम शुल्क व्युत्क्रमण को दूर करने से यह सुनिश्चित होगा कि विशेष आर्थिक क्षेत्र घरेलू औद्योगिक एकीकरण को गहरा बनाने के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी बने रहें। 

दृष्टि मेन्स प्रश्न 

“भारत में विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) अपने प्रारंभिक वादों पर खरे नहीं उतरे हैं।” इसके कारणों का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिये और सुधारों के सुझाव दीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. ‘देश विधेयक’ का प्राथमिक उद्देश्य क्या है?
विशेष आर्थिक क्षेत्रों को केवल निर्यात-उन्मुख मॉडल से हटाकर घरेलू बाज़ार के साथ एकीकृत समग्र ‘उद्यम एवं सेवा केंद्रों’ में परिवर्तित करना।

2. शुल्क एवं करों की वापसी योजना विशेष आर्थिक क्षेत्र इकाइयों को किस प्रकार लाभ पहुँचाती है?
यह स्थानीय स्तर पर अंतर्निहित करों और अधिभारों को निष्प्रभावी बनाती है, जिससे भारतीय निर्यात अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में मूल्य की दृष्टि से प्रतिस्पर्द्धी बने रहते हैं।

3. विशेष आर्थिक क्षेत्रों के संदर्भ में ‘प्रतिलोम शुल्क व्युत्क्रमण’ क्या है?
यह ऐसी स्थिति है, जिसमें विशेष आर्थिक क्षेत्रों से आने वाली तैयार वस्तुओं पर घरेलू बाज़ार में समान मुक्त व्यापार समझौता-आधारित आयातों की तुलना में अधिक शुल्क लगाया जाता है।

4. मुक्त व्यापार भंडारण क्षेत्र क्या हैं?
ये विशेष आर्थिक क्षेत्रों की विशिष्ट श्रेणियाँ हैं, जिन्हें विशेष रूप से व्यापार, भंडारण और लॉजिस्टिक गतिविधियों के लिये विकसित किया जाता है, ताकि आयात-निर्यात व्यापार अधिक सुगम हो सके।

5. ‘अप्रसंस्करण क्षेत्र’ सीमांकन का क्या महत्त्व है?
यह सूचना प्रौद्योगिकी/सूचना प्रौद्योगिकी सक्षम सेवाओं से संबंधित विशेष आर्थिक क्षेत्रों को अनुपयोगी स्थान का उपयोग घरेलू उद्यमों हेतु करने की अनुमति देता है, जिससे अवसंरचना पर प्रतिफल तथा अचल संपत्ति मूल्य का अधिकतम उपयोग संभव होता है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रिलिम्स

प्रश्न 1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2009) 

  1. भारत में पहली टेलीग्राफ लाइन कोलकाता (पूर्व में कलकत्ता) और डायमंड हार्बर के बीच बिछाई गई थी। 
  2. भारत का पहला निर्यात प्रसंस्करण क्षेत्र कांडला में स्थापित किया गया था। 

ऊपर दिये गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (c)


मेन्स

प्रश्न 1. इसकी स्पष्ट स्वीकृति है कि विशेष आर्थिक ज़ोन (एस.इ.जैड.) औद्योगिक विकास, विनिर्माण और निर्यातों के एक साधन हैं। इस संभाव्यता को मान्यता देते हुए, एस.ई.ज़ैड के संपूर्ण करणत्व में वृद्धि करने की आवश्यकता है। कराधान, नियंत्रक कानूनों और प्रशासन के संबंध में एस.ई.ज़ैडों. की सफलता को परेशान करने वाले मुद्दों पर चर्चा कीजिये। (2015)

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