डेली अपडेट्स

सार्वजनिक क्षेत्र का निजीकरण | 01 Jan 2020 | भारतीय अर्थव्यवस्था

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में सार्वजनिक क्षेत्र के निजीकरण और उससे संबंधित विभिन्न महत्त्वपूर्ण पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ

अर्थव्यवस्था उत्पादन, वितरण एवं खपत की एक सामाजिक व्यवस्था है। यह किसी देश या क्षेत्र विशेष में अर्थशास्त्र का गतिशील प्रतिबिंब है। इस शब्द का सबसे प्राचीन उल्लेख कौटिल्य द्वारा लिखित ग्रंथ अर्थशास्त्र में मिलता है। अर्थव्यवस्था दो शब्दों से मिलकर बना है यहाँ अर्थ का तात्पर्य है- मुद्रा अर्थात् धन और व्यवस्था का तात्पर्य है- एक स्थापित कार्यप्रणाली। अर्थव्यवस्था में कार्यप्रणाली के कई स्वरुप हैं और इन्हीं स्वरूपों के आधार पर अर्थव्यवस्था का आयोजन एवं नियोजन प्रतिस्थापित होता है। मुख्यतः अर्थव्यवस्था तीन प्रकार की होती है- समाजवादी, पूंजीवादी और मिश्रित। समाजवादी अर्थव्यवस्था में राज्य का अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप होता है, इसके अतिरिक्त मिश्रित अर्थव्यवस्था में राज्य का हस्तक्षेप सीमित तथा पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में राज्य का अर्थव्यवस्था में अत्यल्प हस्तक्षेप होता है। अर्थव्यवस्था के स्वरुप के आधार पर ही नियोजन का स्वरुप निर्धारित होता है। भारतीय अर्थव्यवस्था मुख्यतः मिश्रित प्रकृति की है लेकिन हिंदू वृद्धि दर की सीमित सफलता और भूमंडलीकरण के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था का वर्ष 1991 के बाद से निजीकरण किया जा रहा है। वर्तमान में सार्वजनिक उपक्रमों के घाटे की प्रवृत्ति के कारण इनका निजीकरण किया जाना एक विमर्श का विषय बना हुआ है।

सार्वजनिक क्षेत्र की वर्तमान स्थिति:

वर्तमान में कुछ बड़े सार्वजनिक उपक्रमों जैसे- भारत संचार निगम लिमिटेड, महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड और एयर इंडिया में घाटे की प्रवृत्ति देखी जा रही है, इन उपक्रमों का घाटा इनके राजस्व प्राप्ति से अधिक है। अर्थशास्त्रियों के पास ऐसे उपक्रमों के लिये एक शब्द है - मूल्य आहरण वाले उपक्रम (Value Subtracting Enterprises)। इनका पुनर्गठन और यहाँ तक ​​कि धन और अन्य संसाधनों के प्रयोग के बावजूद सकारात्मक परिणाम नहीं उत्पन्न नहीं हो रहे हैं। सरकार को दिल्ली डिस्कॉम निजीकरण के मामले की भाँँति खरीदार को भुगतान करना पड़ सकता है। विश्व बैंक के सलाहकारों ने दिल्ली डिस्कॉम के निजीकरण पर कहा था: "निजीकरण का सहारा घाटे से निपटने के बजाय इनका भौतिक प्रदर्शन सुधारने के लिये किया जाना चाहिये।"

निजीकरण के उद्देश्य:

सामान्यतः यह माना जाता है कि "व्यापार राज्य का व्यवसाय नहीं है"। इसलिये व्यापार/अर्थव्यवस्था में सरकार का अत्यंत सीमित हस्तक्षेप होना चाहिये। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का संचालन बाज़ार कारकों के माध्यम से होता है। भूमंडलीकरण के पश्चात् इस प्रकार की अवधारण का और तेज़ी से विकास हो रहा है।

इसके अतिरिक्त निजीकरण के कुछ अन्य प्रमुख उद्देश्य हैं-

निजीकरण से तात्पर्य:

वर्तमान लोकतंत्र में निजीकरण अत्यंत बहुचर्चित विषय है। निजीकरण का अर्थ अनेक प्रकार से व्यक्त किया जाता है। संकुचित दृष्टि से निजीकरण का अभिप्राय सार्वजनिक स्वामित्व के अंतर्गत कार्यरत उद्योगों में निजी स्वामित्व के प्रवेश से लगाया जाता है। विस्तृत दृष्टि से निजी स्वामित्व के अतिरिक्त (अर्थात् स्वामित्व के परिवर्तन किये बिना भी) सार्वजनिक उद्योगों में निजी प्रबंध एवं नियंत्रण के प्रवेश से लगाया जाता है, निजीकरण की उपुर्यक्त दोनों विचारधाराओं का अध्ययन करने के पश्चात् यही अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है कि निजीकरण को विस्तृत रूप से ही देखा जाना चाहिये।

यह भी संभव है कि सार्वजनिक क्षेत्र से निजी क्षेत्र को संपत्ति के अधिकारों का हस्तांतरण बिना विक्रय के ही हो जाए। तकनीकी दृष्टि से इसे अधिनियम (Deregulation) कहा जा सकता है। जिसका आशय यह है कि जो क्षेत्र अब तक सार्वजनिक क्षेत्र के रूप में आरक्षित थे उनमें अब निजी क्षेत्र के प्रवेश की अनुमति दे दी जाएगी। अन्य स्पष्ट शब्दों में निजीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत एक नवीन औद्योगिक संस्कृति का विकास होता है यानि सार्वजनिक क्षेत्र से निजी क्षेत्र की तरफ कदम बढ़ाया जाना।

आर्थिक सुधारों के संदर्भ में निजीकरण का अर्थ है सार्वजनिक क्षेत्र के लिये सुरक्षित उद्योगों में से अधिक-से-अधिक उद्योगों को निजी क्षेत्र के लिए खोलना। इसके अंतर्गत वर्तमान सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों को पूरी तरह या उनके एक हिस्से को निजी क्षेत्र को बेच दिया जाता है।

निजीकरण के लाभ:

"व्यापार राज्य का व्यवसाय नहीं है" इस अवधारणा के परिप्रेक्ष्य में निजीकरण से कार्य निष्पादन में बेहतरीन संभावना होती है।

निजीकरण से संबंधित समस्याएँ:

सार्वजनिक उपक्रमों के अनेक लाभ हैं इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि निजी क्षेत्र की अपेक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के अधिक आर्थिक, सामाजिक लाभ हैं और भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में निजीकरण की कई कठिनाइयाँ हैं। भारतीय संविधान की प्रस्तावना में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की संकल्पना की गई है, सैद्धांतिक तौर इन विचारों का निजीकरण की प्रक्रिया से मतभेद होता है।

निष्कर्ष:

वर्तमान में भूमंडलीकरण के प्रभावों के कारण गतिशील अर्थव्यवस्था का स्वरूप और अर्थव्यवस्था में कार्य निष्पादन, कॉर्पोरेट शासन के साथ-साथ NPA जैसी समस्याओं के कारण सरकार द्वारा निजीकरण को प्रोत्साहित किया जाना अपरिहार्य हो गया है। इसलिये सरकार को इस कदम के साथ-साथ सामाजिक और सार्वजनिक हितों पर भी ध्यान देना अतिआवश्यक है जिससे भारतीय संविधान की प्रस्तावना के उद्देश्यों को प्राप्त करने हेतु एक सकारात्मक कदम उठाया जा सके।

प्रश्न: “निजीकरण का प्रयोग राजस्व घाटे से निपटने की बजाय संरचनात्मक सुधार हेतु किया जाना चाहिये।” इस कथन के आलोक में निजीकरण से जुड़े मुद्दों का समग्र विश्लेषण कीजिये?