रेलवे में निजीकरण | 23 Oct 2019

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में रेलवे में निजीकरण और उसके विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ

भारत की पहली प्राइवेट ट्रेन तेजस एक्सप्रेस के बाद अब नीति आयोग ने देश की कुछ अन्य ट्रेनों और रेलवे स्टेशनों के संचालन के निजीकरण का सुझाव दिया है। ध्यातव्य है कि नीति आयोग एक व्यापक योजना पर कार्य कर रहा है, जिसमें रेलवे स्टेशनों के आसपास के क्षेत्र के समग्र विकास की परिकल्पना की गई है और अनुमान के मुताबिक इसमें निजी निवेश आकर्षित करने की प्रबल संभावना है। विदित है कि भारत के पास अमेरिका, चीन और रूस के बाद दुनिया में चौथा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क है। एक अनुमान के मुताबिक, भारतीय रेलवे प्रतिदिन लगभग 2.5 करोड़ लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती है और इस कार्य के लिये उसके पास तकरीबन 1.3 मिलियन कर्मचारी हैं। उल्लेखनीय है कि भारतीय रेलवे का संपूर्ण बुनियादी ढाँचा रेलवे बोर्ड द्वारा प्रबंधित है और भारतीय रेल सेवाओं पर उसका एकाधिकार है, परंतु बीते 2 दशकों में भारतीय रेलवे में निजीकरण का विषय चर्चाओं का केंद्र बिंदु रहा है। यह सच है कि भारतीय रेलवे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में सेवाएँ देने हेतु प्रशंसा का हकदार है, परंतु कुछ पहलुओं जैसे- दुर्घटना, खानपान और समय की पाबंदी आदि के कारण भारतीय रेलवे को समय-समय पर आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है और इन्हीं आलोचनाओं ने भारतीय रेलवे में निजीकरण को भी हवा दी है।

निजीकरण से आशय

  • सामान्यतः निजीकरण का आशय निजी मालिकों को राज्य के स्वामित्त्व वाले उद्यमों के हस्तांतरण से है। ध्यातव्य है कि यह दुनिया भर में एक महत्त्वपूर्ण नीति उपकरण बन गया है।
  • बीते कुछ दशकों से निजी और सार्वजानिक क्षेत्र में श्रेष्ठता की बहस काफी प्रबल हो गई है और इसी कारण निजीकरण भी चर्चाओं के केंद्र में रहा है।
  • निजीकरण के उद्देश्य
    • सरकार के बोझ को कम करना
    • प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ावा देना
    • सार्वजानिक वित्त में सुधार करना
    • अनावश्यक हस्तक्षेप को कम करना
    • गुणवत्ता में सुधार करना

भारतीय रेलवे- विकास यात्रा और निजीकरण

  • भारत में रेलवे का इतिहास कई दशकों पुराना है। गौरतलब है कि भारत में व्यावसायिक ट्रेन यात्रा की शुरुआत वर्ष 1853 में हुई थी जिसके बाद वर्ष 1900 में भारतीय रेलवे तत्कालीन सरकार के अधीन आ गई।
  • वर्ष 1925 में बॉम्बे से कुर्ला के बीच देश की पहली इलेक्ट्रिक ट्रेन चलाई गई।
  • वर्ष 1947 में आज़ादी के पश्चात् भारत को एक पुराना रेल नेटवर्क विरासत में मिला और पूर्व का लगभग 40 प्रतिशत रेल नेटवर्क नवगठित पाकिस्तान के हिस्से में चला गया। ऐसी स्थिति में यह आवश्यकता महसूस की गई कि कुछ लाइनों की मरम्मत की जाए और कुछ नई लाइने बिछाई जाएँ ताकि जम्मू जैसे क्षेत्रों को देश के अन्य हिस्सों से जोड़ा जा सके।
  • वर्ष 1952 में तत्कालीन रेल नेटवर्क को ज़ोन (Zone) में बदलने का निर्णय लिया गया और इसी वर्ष कुल 6 ज़ोन अस्तित्व में आए।
  • इससे पूर्व रेलवे संबंधी उत्पादन देश में काफी कम होता था, परंतु देश ने जैसे-जैसे विकास किया रेलवे संबंधी उत्पादन भी देश के अंदर ही होने लगा।
  • सितंबर 2003 में प्रशासन को मज़बूत करने के उद्देश्य से ज़ोन की संख्या को बढ़ाकर 12 कर दिया गया जिसके बाद कई अन्य मौकों पर रेलवे ज़ोन्स की संख्या को बढ़ाया गया और वर्तमान में देश में कुल 17 ज़ोन मौजूद हैं।
  • देश में जैसे-जैसे रेलवे नेटवर्क का विकास हुआ, रेलवे के संचालन और प्रबंधन संबंधी चुनौतियाँ भी सामने आने लगीं और इन चुनौतियों से निपटने के लिये नए विकल्पों की खोज की जाने लगी। कई विशेषज्ञ रेलवे के निजीकरण को इसी प्रकार के एक विकल्प के रूप में देखने लगे।
  • वर्ष 2019 में लखनऊ से नई दिल्ली के बीच भारत की पहली प्राइवेट ट्रेन तेजस एक्सप्रेस की शुरुआत हुई, जिसे रेलवे में निजीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम माना गया।
  • उल्लेखनीय है कि वर्तमान में सरकार देश में कुछ स्टेशनों के समग्र विकास हेतु निजी निवेश को आकर्षित करने की योजना बना रही है और यदि ऐसा होता है तो यह रेलवे में निजीकरण की ओर दूसरा बड़ा कदम होगा।

रेलवे में निजीकरण के कारण

  • भारतीय रेलवे उन चुनिंदा सरकारी स्वामित्त्व वाले उपक्रमों की सूची में आती है जिसे साल-दर-साल नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।
  • भारतीय रेलवे अपने बुनियादी ढाँचे और सेवाओं के आधुनिकीकरण के साथ तालमेल रख पाने में असफल रहा है। हालाँकि वर्तमान में इस दिशा में कार्य जारी है।
  • रेलवे अपनी सेवाओं जैसे- टिकटिंग, खानपान, कोच रखरखाव और टिकट चेकिंग आदि के विषय में ग्राहकों को संतुष्ट करने में असफल रहा है और यह आम लोगों की रेलवे के प्रति नाराज़गी का प्रमुख कारण है।
  • तकनीकी स्तर पर भी रेलवे सेवाओं की गुणवत्ता के उच्च मानकों को प्राप्त करने में सफल नहीं हो पाया है और यही कारण है कि समय-समय पर रेल दुर्घटना की खबरें सामने आती रही हैं।
  • इसके अलावा रेलगाड़ियों का समय प्रबंधन भी भारतीय रेलवे के समक्ष एक बड़ी चुनौती के रूप में मौजूद है।
  • भारतीय रेलवे में सुधार हेतु नीति निर्माण के लिये वर्ष 2014 में गठित बिबेक देबरॉय समिति की सिफारिशें इस संदर्भ में सहायक साबित हो सकती हैं।

बिबेक देबरॉय समिति

  • वर्ष 2014 में रेलवे बोर्ड ने प्रमुख रेल परियोजनाओं के लिये संसाधन जुटाने और रेलवे बोर्ड के पुनर्गठन हेतु एक समिति का गठन किया था।
  • इस समिति ने वर्ष 2015 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की और रेल के डिब्बों तथा इंजन के निजीकरण का पक्ष लिया।
  • समिति की मुख्य सिफारिशें
    • रेलवे के बुनियादी ढाँचे के लिये एक अलग कंपनी का निर्माण।
    • ट्रेन संचालन को निजी लोगों के लिये खोलना।
    • भारतीय रेलवे को अपनी जटिल लेखांकन पद्धति को छोड़कर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मानकों को अपनाना चाहिये।
    • भारतीय रेलवे में भर्ती के विभिन्न माध्यमों को सुव्यवस्थित किया जाना चाहिये।
    • रेलवे में निचले स्तर पर विकेंद्रीकरण की आवश्यकता है।
    • माल और यात्री गाड़ियों को चलाने के लिये निजी क्षेत्र को अनुमति दी जानी चाहिये।
    • नई लाइनों के निर्माण में रेलवे को राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम करना चाहिये।

क्या लाभ होगा निजीकरण से

  • बेहतर बुनियादी ढाँचा
    निजीकरण के पक्ष में एक तर्क यह दिया जाता है कि इससे बेहतर बुनियादी ढाँचे को बढ़ावा मिलेगा और यात्रियों के लिये बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध होंगी। उम्मीद है कि रेलवे में निजी कंपनियों के आने से बेहतर प्रबंधन संभव हो पाएगा।
  • गुणवत्ता और किराए के मध्य संतुलन
    संभवतः रेलवे से लोगों को सबसे अधिक शिकायत यह रहती है कि प्रदान की गई सेवाओं की गुणवत्ता यात्रियों द्वारा किये गए भुगतान से मेल नहीं खाती है। रेलवे में निजीकरण के समर्थक मानते हैं कि इसके पश्चात् उपरोक्त समस्या को आसानी से संबोधित किया जा सकता है।
  • दुर्घटनाओं में कमी
    कई अध्ययनों में सामने आया है कि देश में ट्रेन दुर्घटनाओं का सबसे मुख्य कारण रखरखाव की कमी है और निजीकरण समर्थक मानते हैं कि यदि हमें इन दुर्घटनाओं पर रोक लगानी है तो निजी क्षेत्र को प्रवेश की अनुमति देनी होगी।
  • प्रतिस्पर्द्धा में वृद्धि
    अभी तक रेलवे में रेलवे बोर्ड का एकाधिकार है, परंतु निजीकरण के माध्यम से इस क्षेत्र में एकाधिकार को समाप्त कर प्रतिस्पर्द्धा लाई जा सकती है, ताकि ग्राहकों को बेहतर-से-बेहतर सुविधा प्रदान की जा सके।

रेलवे में निजीकरण के नुकसान

  • सीमित कवरेज
    यदि रेलवे का स्वामित्त्व भारत सरकार के पास ही रहता है तो इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि वह लाभ की परवाह किये बिना राष्ट्रव्यापी कनेक्टिविटी प्रदान करती है। परंतु रेलवे के निजीकरण से यह संभव नहीं हो पाएगा, क्योंकि निजी उद्यमों का मुख्य उद्देश्य लाभ कमाना होता है और उन्हें जिस क्षेत्र से लाभ नहीं होता वे वहाँ कार्य बंद कर देते हैं।
  • सामाजिक न्याय
    निजी उद्यमों का एकमात्र उद्देश्य लाभ कमाना होता है और रेलवे में लाभ कमाने का सबसे सरल तरीका किराए में वृद्धि है और यदि ऐसा होता है तो इसका सबसे ज़्यादा असर आम नागरिकों पर पड़ेगा।
  • जवाबदेही
    निजी कंपनियाँ अपने व्यवहार में अप्रत्याशित होती हैं और इनमें जवाबदेहिता की कमी पाई जाती है, जिसके कारण रेलवे जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्र में इनके प्रयोग का प्रश्न विचारणीय हो जाता है।

निष्कर्ष

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि देश में रेलवे के समक्ष चुनौतियाँ नहीं हैं, परंतु निजीकरण द्वारा एकपक्षीय चुनौतियों का हल नहीं हो सकता, इसलिये यह आवश्यक है कि एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया जाए और सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर आगे बढ़ा जाए।

प्रश्न: क्या सभी समस्याओं का समाधान निजीकरण है? रेलवे के संदर्भ में चर्चा कीजिये।