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संसदीय समिति प्रणाली: महत्त्व और चुनौतियाँ | 14 Dec 2020 | भारतीय राजनीति

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में संसदीय समिति प्रणाली के महत्त्व और हाल के वर्षों में भारतीय संसदीय लोकतंत्र में इसकी अनदेखी व इससे संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ:

पिछले मानसून सत्र में संसद द्वारा पारित नए कृषि अधिनियमों ने सरकार और किसानों के बीच टकराव की एक गंभीर स्थिति पैदा कर दी है, हालाँकि सरकार कथित तौर पर इन अधिनियमों में सुधार के लिये तैयार हो गई है परंतु किसानों की मांग है कि इन अधिनियमों को निरस्त कर दिया जाए और यदि आवश्यक हो तो किसानों और अन्य हितधारकों के साथ चर्चा के बाद ही इसके लिये नए कानून बनाए जाएँ। 

संसद द्वारा पारित इन अधिनियमों को निरस्त किये जाने की मांग हाल के वर्षों में संसद में विधायी कार्यों के प्रबंधन में एक गंभीर चूक की तरफ संकेत करती है। विधायी कार्यों के प्रबंधन में हुई इन कमियों को अक्सर संसदीय समितियों को दरकिनार किये जाने और अध्यादेशों के प्रयोग में वृद्धि के रूप में देखा जा सकता है।

चूँकि संसद लोकतंत्र की प्रतीक है, ऐसे में संसदीय कार्यप्रणाली की गुणवत्ता में गिरावट की जाँच करना और इसके प्रति लोगों के विश्वास को मज़बूती प्रदान करना सरकार की ज़िम्मेदारी है। 

संसदीय समितियाँ: पृष्ठभूमि:

संसदीय समिति प्रणाली का महत्त्व:   

एक लघु संसद के रूप में कार्य:  

संसदीय समिति प्रणाली का सीमांकन: 

अध्यक्ष या स्पीकर की भूमिका:

आगे की राह:  

निष्कर्ष: 

Parliamentary-Committees

अभ्यास प्रश्न: ‘भारत में संसदीय समिति प्रणाली के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए हाल के वर्षों में उनके कामकाज के प्रति सरकार के रवैये में आए बदलाव और इससे जुड़े हालिया मुद्दों पर चर्चा कीजिये।