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भारत में कुपोषण : कारण और प्रयास | 22 Feb 2020 | सामाजिक न्याय

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख के अंतर्गत भारत के संबंध में कुपोषण की चुनौती से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ

बीते कुछ वर्षों में भारत में कुपोषण को लेकर नए सिरे से चर्चा शुरू हुई है। अक्तूबर 2019 में जारी वैश्विक भुखमरी सूचकांक में भारत 117 देशों में से 102वें स्थान पर रहा था, जबकि वर्ष 2018 में भारत 103वें स्थान पर था। देश में कुपोषण की समस्या को संबोधित करने की तात्कालिकता हाल ही में वित्त मंत्री के बजट भाषण में भी देखने को मिली थी। वर्ष 2017 में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 जारी की गई थी, जिसमें नागरिकों की उत्पादकता पर कुपोषण के नकारात्मक प्रभाव और देश में मृत्यु दर में इसके योगदान पर प्रकाश डाला गया था। हालाँकि सरकार द्वारा इस संदर्भ में काफी प्रयास किये गए हैं और विभिन्न प्रकार की योजनाएँ चलाई जा रही हैं, किंतु इन योजनाओं और प्रयासों के बावजूद हम देश में कुपोषण की चुनौती से पूर्णतः निपटने में असमर्थ रहे हैं। इससे न केवल भारत के आर्थिक विकास में बाधा उत्पन्न हो रही है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भारत की छवि भी नकारात्मक रूप से प्रभावित हो रही है।

भारत और कुपोषण

विभिन्न राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय अध्ययनों में कुपोषण के विभिन्न संकेतकों पर भारत का प्रदर्शन असंतोषजनक रहा है। यूनिसेफ (UNICEF) के अनुसार, वर्ष 2017 में सबसे कम वजन वाले बच्चों की संख्या वाले देशों में भारत 10वें स्थान पर था। इसके अलावा वर्ष 2019 में ‘द लैंसेट’ नामक पत्रिका द्वारा जारी रिपोर्ट में यह बात सामने आई थी कि भारत में पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की 1.04 मिलियन मौंतों में से तकरीबन दो-तिहाई की मृत्यु का कारण कुपोषण है। देश में फैले कुपोषण को लेकर उक्त आँकड़े काफी चिंताजनक हैं। अपनी एक हालिया रिपोर्ट में विश्व बैंक ने कहा था कि वर्ष 1990 से वर्ष 2018 के बीच भारत ने गरीबी से लड़ने के लिये अतुलनीय कार्य किया है और इससे देश में गरीबी दर में काफी गिरावट दर्ज की गई है। इस अवधि में भारत की गरीबी दर तकरीबन आधी रह गई है। यद्यपि देश में गरीबी दर में गिरावट आ रही है, किंतु कुपोषण और भूख की समस्या आज भी देश में बरकरार है। हाल ही में जारी 'द स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स चिल्ड्रन- 2019’ रिपोर्ट के अनुसार, विश्व में 5 वर्ष तक की उम्र के प्रत्येक 3 बच्चों में से एक बच्चा कुपोषण अथवा अल्पवज़न की समस्या से ग्रस्त है। पूरे विश्व में लगभग 200 मिलियन तथा भारत में प्रत्येक दूसरा बच्चा कुपोषण के किसी-न-किसी रूप से ग्रस्त है। रिपोर्ट से यह भी ज्ञात हुआ कि वर्ष 2018 में भारत में कुपोषण के कारण 5 वर्ष से कम उम्र के लगभग 8.8 लाख बच्चों की मृत्यु हुई जो कि नाइजीरिया (8.6 लाख), पाकिस्तान (4.09 लाख) और कांगो गणराज्य (2.96 लाख ) से भी अधिक है। आँकड़े बताते हैं कि भारत में 6 से 23 महीने के कुल बच्चों में से मात्र 9.6 प्रतिशत को ही न्यूनतम स्वीकार्य आहार प्राप्त हो पाता है। हालाँकि ऐसा नहीं है कि देश में कुपोषण की समस्या केवल बच्चों के मध्य ही है, वर्ष 2017 के आँकड़ों पर गौर करें तो वयस्कों में देश की 23 प्रतिशत महिलाएँ और 20 प्रतिशत पुरुष कुपोषण का सामना कर रहे हैं। कुपोषण से संबंधित ये तथ्य देश में कुपोषण की चुनौती से निपटने के लिये 1990 के दशक में शुरू हुई योजनाओं को लेकर चिंता को स्पष्ट करते हैं। अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन का कहना है कि देश में कुपोषण और भूख से पीड़ित बच्चों की स्थिति काफी खतरनाक है और इससे निपटने के लिये जल्द-से-जल्द नए विकल्पों को खोजा जाना चाहिये। जन्म के बाद बच्चों को जिन पोषक तत्त्वों की आवश्यकता होती है, उन्हें वह नहीं पाता है। भारत में तो स्थिति यह है कि बच्चों का न तो सही ढंग से टीकाकरण हो पाता है और न ही उन्हें इलाज की उचित व्यवस्था मिल पाती है, ऐसी स्थिति में कुपोषण जैसी समस्याएँ और अधिक गंभीर हो जाती हैं।

कुपोषण का अर्थ?

कुपोषण (Malnutrition) वह अवस्था है जिसमें पौष्टिक पदार्थ और भोजन, अव्यवस्थित रूप से ग्रहण करने के कारण शरीर को पूरा पोषण नहीं मिल पाता है। चूँकि हम स्वस्थ रहने के लिये भोजन के ज़रिये ऊर्जा और पोषक तत्त्व प्राप्त करते हैं, लेकिन यदि भोजन में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, विटामिन तथा खनिजों सहित पर्याप्त पोषक तत्त्व नहीं मिलते हैं तो हम कुपोषण के शिकार हो सकते हैं। कुपोषण तब भी होता है जब किसी व्यक्ति के आहार में पोषक तत्त्वों की सही मात्रा उपलब्ध नहीं होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ के अनुसार कुपोषण के तीन प्रमुख लक्षण हैं:

भारतीय संविधान और कुपोषण

कुपोषण का प्रभाव

कुपोषण के कारण

सरकार द्वारा किये गए प्रयास

कार्यक्रमों की असमर्थता का कारण

निष्कर्ष

इसमें कोई संदेह नहीं है कि भोजन में पोषक तत्त्वों की कमी कुपोषण का सबसे प्रमुख कारण है किंतु समाज के एक बड़े हिस्से में इस संबंध में जागरूकता की कमी स्पष्ट तौर पर दिखाई देती है। आवश्यक है कि कुपोषण संबंधी समस्याओं को संबोधित करने के लिये जल्द-से-जल्द आवश्यक कदम उठाए जाएँ, ताकि देश के आर्थिक विकास में कुपोषण के कारण उत्पन्न बाधा को समाप्त किया जा सके।

प्रश्न: “भारत में कुपोषण की समस्या के समाधान हेतु सरकार के विभिन्न प्रयासों के बावजूद यह देश में एक गंभीर समस्या के रूप में विद्यमान है।” कुपोषण के कारणों पर चर्चा करते हुए इस समस्या के समाधान की दिशा में किये जा रहे प्रयासों का उल्लेख कीजिये।