भारत-रूस संबंधों की नई शुरुआत | 17 Feb 2021

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य में भारत और रूस संबंधों का महत्त्व व इससे संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ: 

वर्ष 2020 में ऐसी कई भू-राजनीतिक घटनाएँ देखने को मिली हैं जिन्होंने भारत और रूस दोनों के संबंधों को प्रभावित किया। इनमें अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिद्वंद्विता, भारत-चीन सीमा तनाव, पश्चिमी देशों और रूस के संबंधों में लगातार गिरावट तथा जो बाईडन की जीत के साथ अमेरिकी नेतृत्व में परिवर्तन आदि कुछ महत्त्वपूर्ण घटनाओं के उदाहरण हैं। 

चूँकि रूस और भारत दोनों ही एक बहु-ध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था का समर्थन करते हैं, अतः वे एक-दूसरे के राष्ट्रीय हितों को पूरा करने के लिये एक-दूसरे के लिये समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। हालाँकि बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य के कारण दोनों देशों के बीच संबंध उतने अच्छे नहीं हैं, जितना कि शीत युद्ध के समय में हुआ करते थे।

इस संदर्भ में भारत के विदेश सचिव की आगामी रूस यात्रा बदलते वैश्विक भू-राजनीतिक समीकरण के बीच भारत-रूस संबंधों की प्रासंगिकता की समीक्षा करने का एक उपयुक्त अवसर प्रदान करती है।

भारत के लिये रूस का महत्त्व: 

  • चीनी आक्रामकता के खिलाफ संतुलन: पूर्वी लद्दाख के सीमावर्ती क्षेत्रों में चीनी आक्रामकता ने भारत-चीन संबंधों की प्रगति को प्रभावित किया है, हालाँकि यह भारत-चीन के बीच तनाव को कम करने में रूस की क्षमता को भी दर्शाता है।
    • रूस ने लद्दाख के विवादित गलवान घाटी क्षेत्र में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हुए हिंसक संघर्ष के बाद रूस, भारत तथा चीन के विदेश मंत्रियों के बीच एक त्रिपक्षीय बैठक का आयोजन किया था।
  • आर्थिक जुड़ाव के उभरते नए क्षेत्र: हथियार, हाइड्रोकार्बन, परमाणु ऊर्जा तथा हीरे जैसे सहयोग के पारंपरिक क्षेत्रों के अलावा भारत और रूस के बीच आर्थिक जुड़ाव के नए क्षेत्रों (जैसे-  रोबोटिक्स, नैनोटेक, बायोटेक,  खनन, कृषि-औद्योगिक एवं उच्च प्रौद्योगिकी) में अवसरों के उभरने की संभावना है।
    • भारत  द्वारा रूस के सुदूर पूर्व और आर्कटिक क्षेत्र में अपनी पहुँच के विस्तार  के लिये कार्य किया जा रहा है। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच कनेक्टिविटी परियोजनाओं को भी बढ़ावा मिल सकता है। 
  • आतंकवाद का मुकाबला:  भारत और रूस साथ मिलकर अफगानिस्तान में अपनी पहुँच को बढ़ाने के लिये कार्य कर रहे हैं, साथ ही दोनों देशों ने ‘अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक अभिसमय’ (Comprehensive Convention on International Terrorism- CCIT) को शीघ्र ही अंतिम रूप दिये जाने की मांग की है।
  • बहुपक्षीय मंचों पर समर्थन: इसके अतिरिक्त रूस संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) और परमाणु आपूर्तिकर्त्ता समूह (NSG) की स्थायी सदस्यता के लिये भारत की उम्मीदवारी का समर्थन करता है।

रूस के लिये भारत का महत्त्व: 

  • चीन के प्रभुत्त्व के खिलाफ संतुलन: रूस और चीन की साझेदारी वर्तमान में एक अर्द्ध-गठबंधन के रूप में है। हालाँकि रूस बार-बार यह दोहराता रहा है कि वह स्वयं को किसी के जूनियर पार्टनर के रूप में नहीं देखता है। यही कारण है कि रूस चाहता है कि भारत इस क्षेत्र में चीन के प्रभुत्त्व के बावजूद शक्ति संतुलन बनाए रखने में अपनी भूमिका निभाए।
    • उदाहरण के लिये रूस के सुदूर पूर्व का विशाल भू-भाग संसाधनों से समृद्ध है, परंतु यहाँ की आबादी बहुत कम है और यह क्षेत्र शेष रूस की तुलना में अविकसित है।
    • अब तक इस क्षेत्र के विकास में मुख्य रूप से चीन की ही भूमिका रही है और इसलिये चीन पर बढ़ती अपनी निर्भरता को कम करने के लिये रूस,  भारत की सहायता के माध्यम से इसमें विविधता लाना चाहता है।  
  • यूरेशियन आर्थिक संघ को पुनर्जीवित करना: रूस यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन की सफलता में वैधता हासिल करने के लिये भारत की नरम शक्ति का लाभ उठाने के साथ शीत युद्ध के समय की तरह ही इस क्षेत्र पर अपने आधिपत्य को फिर से स्थापित करने का प्रयास करा रहा है।

प्रमुख चुनौतियाँ: 

  • पश्चिमी देशों के साथ भारत की बढ़ती निकटता:  चीन की विस्तारवादी विदेश नीति ने भारत को पूर्व के संकोचों को दूर करने और पश्चिमी देशों, विशेष रूप से अमेरिका के साथ अपने घनिष्ठ संबंधों को सक्रिय करने के लिये विवश किया है।  
    • यह क्वाड प्रक्रिया को पुनः सुनियोजित रूप से शुरू किये जाने और एक स्वतंत्र तथा समावेशी हिंद-प्रशांत की घोषणा में भारत की भूमिका से प्रतिबिंबित होता है। 
  •  पूर्व की तरफ रूस का झुकाव: वर्ष 2014 में क्रीमिया पर रूस के कब्ज़े के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर कठोर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिये। 
    • उसे अलग करने के इन प्रयासों के जवाब में रूस ने अपनी ‘पिविट टू द ईस्ट’ (Pivot to the East) नीति को और अधिक मज़बूती के साथ सामने रखा।
    • रूस के रूख में इस बदलाव का सबसे स्पष्ट परिणाम चीन के साथ इसके संबंधों में सुधार  और तुर्की, ईरान तथा पाकिस्तान के साथ इसके बेहतर होते संबंधों के रूप में देखा जा सकता है।   
    • रूस की ‘पिविट टू द ईस्ट’ (Pivot to the East) नीति अमेरिका के साथ तालमेल नहीं रखती और यह स्थिति भारत तथा रूस के संबंधों को भी प्रभावित करती है।

आगे की राह:

  • हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रूस की भागीदारी: भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रूस की भागीदारी को बढ़ावा देने के सक्रिय प्रयासों के साथ इसके लिये उपयुक्त सहायता भी उपलब्ध करानी चाहिये। हालाँकि हिंद-प्रशांत में रूस की भूमिका इस बात पर निर्भर करेगी कि वह अपने आर्थिक विकास में बाधा बन रही मूलभूत समस्याओं से निपटने में कितना सफल रहता है।
    • इस क्षेत्र में रूस की सक्रिय भागीदारी हिंद-प्रशांत क्षेत्र को वास्तव में "स्वतंत्र और समावेशी" बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान देगी।
  • भारतीय विदेश नीति में आरआईसी (RIC) को प्राथमिकता देना: भारत को रूस, भारत और चीन (RIC) के बीच पारस्परिक रूप से लाभप्रद त्रिपक्षीय सहयोग को बढ़ावा देना चाहिये जो भारत तथा चीन के बीच अविश्वास एवं संदेह को कम करने में सहायक हो सकता है।
  • बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग: भारत और रूस अभी भी अपने संबंधों के लिये एक सामान्य रणनीतिक उद्देश्य साझा करते हैं। 

निष्कर्ष:  

  • यह स्पष्ट है कि भारत और रूस अभी भी एक-दूसरे को महत्त्वपूर्ण साझेदार मानते हैं। दोनों देशों की यह मैत्री  गहरे आपसी विश्वास पर बनी है, परंतु वर्तमान में उनकी विदेश नीति के लक्ष्य उन्हें अलग-अलग दिशाओं में ले जा रहे हैं।
  • हालाँकि न तो भारत और न ही रूस चीन या संयुक्त राज्य अमेरिका का एक कनिष्ठ/जूनियर साझेदार बनना चाहता है। अतः दोनों ही देश पुनः शीत युद्ध काल के समान ही द्विपक्षीय संबंधों को मज़बूत करने के लिये कार्य कर सकते हैं।

अभ्यास प्रश्न:  भारत और रूस की  विदेश नीति के लक्ष्य उन्हें अलग-अलग दिशाओं में ले जा रहे हैं, परंतु दोनों देशों के लिये बदलती वैश्विक व्यवस्था में अपनी स्थिति को मज़बूत करने हेतु द्विपक्षीय संबंधों को मज़बूत करना आवश्यक है। चर्चा कीजिये।