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भारत के लिये सूक्ष्म सिंचाई का महत्त्व | 16 Jan 2019 | कृषि

संदर्भ


16 से 18 जनवरी तक केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय महाराष्ट्र के औरंगाबाद में ‘आधुनिक कृषि पर नौवाँ अंतर्राष्ट्रीय सूक्ष्म सिंचाई सम्मेलन’ आयोजित कर रहा है। यह सम्मेलन एक बहु-विषयक संवाद है, जिसमें आधुनिक कृषि के लिये सूक्ष्म सिंचाई से जुड़े मुद्दों के साथ-साथ बेहतर फसल उत्पादकता के लिये नई तकनीकों और क्लस्टर स्तरीय खेती में सूक्ष्म सिंचाई जैसे विभिन्न मुद्दों पर भी विचार-विमर्श किया जाना है।

क्या है सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली?


सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली सामान्य रूप से बागवानी फसलों में उर्वरक व पानी देने की सर्वोत्तम एवं आधुनिक विधि मानी जाती है। सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली में कम पानी से अधिक क्षेत्र की सिंचाई की जाती है। इस प्रणाली में पानी को पाइपलाइन के माध्यम से स्रोत से खेत तक पूर्व-निर्धारित मात्रा में पहुँचाया जाता है। इससे पानी की बर्बादी को तो रोका ही जाता है, साथ ही यह जल उपयोग दक्षता बढ़ाने में भी सहायक है। देखने में आया है कि सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली अपनाकर 30-40 फीसदी पानी की बचत होती है। इस प्रणाली से सिंचाई करने पर फसलों की गुणवत्ता और उत्पादकता में भी सुधार होता है। सरकार भी ‘प्रति बूँद अधिक फसल’ के मिशन के अंतर्गत फव्वारा (Sprinkler) व टपक (Drop) सिंचाई पद्धति को बढ़ावा दे रही है। हमारे देश में अधिकांशतः खेतों में सिंचाई के लिये कच्ची नालियों द्वारा पानी लाया जाता है, जिससे तकरीबन 30-40 फीसदी पानी रिसाव की वज़ह से बेकार चला जाता है। ऐसे में सूक्ष्म सिंचाई पद्धति का इस्तेमाल करने में फायदा-ही-फायदा है।


सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली की दो प्रमुख विधियाँ


बदलते परिदृश्य में सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली को पानी की बचत करने वाली तकनीक के रूप में देखा जा रहा है। सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली एक उन्नत पद्धति है, जिसके प्रयोग से सिंचाई के दौरान पानी की काफी बचत की जा सकती है। सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली में प्रमुखतः दो विधियाँ- फव्वारा सिंचाई व टपक सिंचाई अधिक प्रचलित हैं।

फव्वारा विधि (Sprinkler Method)


फव्वारा सिंचाई विधि में पानी का हवा में छिड़काव किया जाता है जो कृत्रिम वर्षा का एक रूप है। पानी का छिड़काव प्रेशर वाले छोटे नोज़ल से होता है। इस विधि में पानी महीन बूँदों में बदलकर वर्षा की फुहार के समान पौधों के ऊपर गिरता है। स्प्रिंकलर को फसलों के अनुसार उचित दूरी पर लगाकर पम्प की सहायता से चलाते हैं जिससे पानी तेज़ बहाव के साथ निकलता है। स्प्रिंकलर में लगी नोज़ल पानी को फुहार के रूप में बाहर फेंकती है। पानी की कमी वाले क्षेत्रों में यह विधि बेहद लाभदायक साबित हुई है। सामान्यतः फव्वारा सिंचाई सूखाग्रस्त, बलुई मृदा, ऊँची-नीची ज़मीन तथा पानी की कमी वाले क्षेत्रों के लिये उपयोगी है। घास के मैदानों और पार्कों में भी फव्वारा विधि द्वारा सिंचाई की जा सकती है। स्प्रिंकलर को खेत में इधर-उधर भी ले जाया जा सकता है।

फव्वारा विधि के लाभ

  1. इस विधि में सतही सिंचाई विधियों की तुलना में जल प्रबंधन आसानी से किया जा सकता है।
  2. फसल उत्पादन के लिये अधिक क्षेत्र उपलब्ध होता है क्योंकि इस विधि में नालियाँ बनाने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
  3. पानी का लगभग 80-90 प्रतिशत भाग पौधों द्वारा ग्रहण कर लिया जाता है, जबकि पारंपरिक विधि में लगभग 30-40 फीसदी पानी ही इस्तेमाल हो पाता है।
  4. ज़मीन को समतल करने की ज़रूरत नहीं होती, ऊँची-नीची और ढलान वाले स्थानों में भी इससे आसानी से सिंचाई की जा सकती है।
  5. फसलों में कीटों व बीमारियों का खतरा कम होता है, क्योंकि स्प्रिंकलर्स द्वारा कीटनाशकों का छिड़काव बेहतर ढंग से किया जा सकता है।
  6. फसलों में डालने के लिये घुलनशील उर्वरकों का इस्तेमाल आसानी से किया जा सकता है।

टपक विधि (Drop Method)


सिंचाई की टपक विधि का विकास 1960 के दशक के आरंभ में इज़राइल तथा 1960 के दशक के अंत में ऑस्ट्रेलिया व उत्तरी अमेरिका में हुआ। इस विधि में पाइप लाइन द्वारा पौधों की जड़ों के आस-पास सतह या उप-सतह पर ड्रिपर्स के माध्यम से आवश्यकतानुसार पानी दिया जाता है। इस प्रणाली में बूँद-बूँद द्वारा फसलों व बागवानी पौधों की सिंचाई की जाती है। इस विधि से सिंचाई करने पर लगभग 50 फीसदी पानी की बचत होती है। साथ ही फसल उत्पादन में वृद्धि, खरपतवारों में कमी और फसल उत्पाद की गुणवत्ता में भी सुधार होता है। इस विधि में सिंचाई के साथ उर्वरकों का इस्तेमाल भी किया जा सकता है।

टपक विधि के लाभ

फर्टिगेशन विधि (Fertigation Method)


फर्टिगेशन दो शब्दों फर्टिलाइजर (उर्वरक) और इरीगेशन (सिंचाई) से मिलकर बना है। अपेक्षाकृत इस नई विधि में टपक विधि से सिंचाई करते समय पानी के साथ-साथ उर्वरकों को भी पौधों तक पहुँचाया जाता है। फर्टिगेशन को खेतों में उर्वरक डालने की सर्वोत्तम तथा अत्याधुनिक विधि माना गया है। इस विधि में उर्वरकों को कम मात्रा में कम अंतराल पर पूर्व-नियोजित सिंचाई के साथ दिया जा सकता है। इससे पौधों को आवश्यकतानुसार पोषक तत्त्व मिल जाते हैं और उर्वरकों का अपव्यय भी नहीं होता। सामान्यतः फर्टिगेशन में तरल उर्वरकों का ही इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन दानेदार और शुष्क उर्वरकों को भी पानी में घोलकर इस विधि द्वारा दिया जा सकता है।

राष्ट्रीय सूक्ष्म सिंचाई मिशन


सूक्ष्म सिंचाई का राष्ट्रीय मिशन (National Mission on Micro Irrigation-NMMI) जून 2010 में शुरू किया गया था। NMMI पानी के इस्तेमाल में बेहतर दक्षता, फसल की उत्पादकता और किसानों की आय में वृद्धि करने के लिये राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (एनएफ़एसएम), तिलहनों, दालों एवं मक्का की एकीकृत योजना, कपास पर प्रौद्योगिकी मिशन आदि जैसे बड़े सरकारी कार्यक्रमों के अंतर्गत सूक्ष्म सिंचाई गतिविधियों के समावेश को बढावा देगा। इसके तहत दिये गए दिशा-निर्देश पानी के उपयोग की दक्षता में वृद्धि के साथ फसलों की उत्पादकता में वृद्धि करेंगे तथा पानी के खारेपन व जलभराव जैसे मुद्दों का हल भी प्रदान करते हैं।

सूक्ष्म सिंचाई कोष

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना


जुलाई 2015 में केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना को मंज़ूरी दी थी। इसमें पाँच सालों (2015-16 से 2019-20) के लिये 50 हज़ार करोड़ रुपए की राशि का प्रावधान किया गया है। इस योजना के प्रमुख उद्देश्यों में निवेश में एकरूपता लाना, 'हर खेत को पानी' के तहत कृषि क्षेत्र का विस्तार करना, खेतों में पानी इस्तेमाल करने की दक्षता को बढ़ाकर पानी की बर्बादी को रोकना, सही सिंचाई और पानी को बचाने की तकनीक को अपनाना तथा हर बूँद अधिक फसल आदि शामिल हैं।

देश में कुल 200.8 मिलियन हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि है, जिसमें से मात्र 95.8 मिलियन हेक्टेयर भूमि सिंचित है। यह कुल क्षेत्रफल का केवल 48 फीसदी है। ऐसे में 52 फीसदी असिंचित कृषि भूमि में उन्नत कृषि हेतु आवश्यक जल की आपूर्ति कराना भी चुनौतीपूर्ण है। समुचित जल प्रबंधन द्वारा ही इस चुनौती का सामना किया जा सकता है। इसके अलावा, भारत में विश्व की आबादी के लगभग 17 फीसदी लोग निवास करते हैं, जबकि देश में विश्व के केवल 4 फीसदी जल संसाधन उपलब्ध हैं। ऐसे में पानी का संरक्षण करने की चुनौती बहुत बड़ी है, जिसमें सूक्ष्म सिंचाई पद्धति काफी सहायक सिद्ध हो सकती है।