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मिड-डे मील कार्यक्रम की चुनौतियाँ | 07 Dec 2019 | सामाजिक न्याय

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में मिड-डे मील कार्यक्रम और उसकी चुनौतियों से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ

देश भर के सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील को दिनचर्या का हिस्सा बनाए हुए लगभग 2 दशक बीत चुके हैं। देशव्यापी स्तर पर दो दशकीय इस लंबी यात्रा ने मिड-डे मील कार्यक्रम की सुधार प्रक्रिया को काफी धीमा बना दिया है, परंतु इससे जुड़ी घटनाएँ अनवरत सामने आती रही हैं। हाल में मिड-डे मील से जुड़ी एक ऐसी ही घटना देखी गई जिसमें पानी से भरी एक बाल्टी में एक लीटर दूध मिला दिया गया ताकि उसे स्कूल में मौजूद 80 बच्चों के बीच बाँटा जा सके। इस प्रकार की घटनाएँ ज़ाहिर तौर पर शर्मनाक हैं और यह स्पष्ट करती हैं कि इस कार्यक्रम के कार्यान्वयन पर जल्द-से-जल्द गंभीरता से ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है।

मिड-डे मील कार्यक्रम

कार्यक्रम की आवश्यकता

मध्याह्न भोजन उपलब्ध कराने का है लंबा इतिहास

कार्यक्रम का महत्त्व

चुनौतियाँ

आगे की राह

निष्कर्ष

तमाम समस्याओं के बावजूद भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि मिड-डे मील कार्यक्रम ने आर्थिक और सामाजिक रूप से कमज़ोर बच्चों के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है। हालाँकि इस कार्यक्रम में अभी भी सुधार की आवश्यकता है। आवश्यक है कि सरकार योजना के कार्यान्वयन को लेकर अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन करे और मात्रा के साथ-साथ गुणवत्ता पर भी ध्यान दिया जाए।

प्रश्न: मिड-डे मील कार्यक्रम के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए इसके समक्ष मौजूद चुनौतियों पर चर्चा कीजिये।