अंबेडकर के मूल्य एवं विरासत | 16 Apr 2021

यह एडिटोरियल 14/04/2021 को द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित लेख "The Ambedkar we don’t know" पर आधारित है। इसमें राष्ट्र-निर्माण में बी.आर. अंबेडकर की भूमिका एवं उनके मूल्यों की प्रासंगिकता पर चर्चा की गई है।

हाल ही में भारत ने बी. आर. अंबेडकर की 130वीं जयंती मनाई। एक समाज सुधारक, भारतीय संविधान सभा के प्रारूप समिति के अध्यक्ष और देश के प्रथम कानून मंत्री के रूप में उनकी भूमिका सर्वविदित है।

हालाॅंकि, बी.आर. अंबेडकर की कई ऐसी विशेषताओं के बारे में सार्वजनिक रूप से कम जानकारी है जिन्होनें राष्ट्र निर्माण में मदद की तथा वर्तमान भारतीय सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक परिदृश्य में भी बेहद प्रासंगिक हैं।

भारत आज़ादी के 75 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में "आज़ादी का अमृत महोत्सव" मनाने वाला है। इस मौके पर भारत निर्माण में बी.आर. अंबेडकर द्वारा निभाई गई भूमिका को याद रखना अनिवार्य है।

राष्ट्र निर्माण में बी.आर. अंबेडकर की भूमिका

  • भारतीय संविधान के जनक: कानून के क्षेत्र में बी.आर. अंबेडकर की विशेषज्ञता और विभिन्न देशों के संविधान का ज्ञान भारतीय संविधान के निर्माण में बहुत मददगार साबित हुआ। वह संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष बने और भारतीय संविधान के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • न्यायपूर्ण समाज का निर्माण: संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के माध्यम से न्यायपूर्ण समाज के निर्माण के लिये उपाय किये।
    • उनके अनुसार, भारतीय समाज जोकि जाति, धर्म, भाषा और अन्य कारकों के आधार पर विभाजित है के लिये एक सामान्य नैतिक मानदंड आवश्यक है एवं संविधान उस मानदंड की भूमिका निभा सकता है।
    • इसके अलावा उन्होंने, पूना पैक्ट के अंतर्गत सार्वजनिक सेवाओं में सामाजिक रूप से वंचित वर्गों के उचित प्रतिनिधित्व का आश्वासन दिया एवं उनके उत्थान के लिये शैक्षिक अनुदान के एक हिस्से को इन वर्गों के लिये सुरक्षित किया।
    • सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का पक्षधर होने के साथ उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि स्वतंत्रता के तुरंत पश्चात महिलाओं को भी वोट देने का अधिकार प्राप्त हो।
  • प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री: भारतीय रिज़र्व बैंक की परिकल्पना हिल्टन यंग कमीशन की सिफारिश पर की गई थी, जो अंबेडकर के लेख "रुपए की समस्या: इसका मूल एवं समाधान" में दिये गए दिशा-निर्देशों से प्रेरित था।
  • एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन में भूमिका: उनकी दूरदर्शिता ने दामोदर नदी घाटी परियोजना, सोन नदी घाटी परियोजना, महानदी (हीराकुंड परियोजना) आदि, जैसी नदी घाटी परियोजनाओं की स्थापना के माध्यम से केंद्रीय जल आयोग और एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन की स्थापना में मदद की।
    • अंतर-राज्य जल विवाद अधिनियम, 1956 और नदी बोर्ड अधिनियम, 1956 भी उनकी सोच का परिणाम है।
  • मज़दूरों के नेता: अम्बेडकर हर मंच पर वंचित वर्गों की आवाज़ थे। गोलमेज सम्मेलन में वंचित वर्गों के प्रतिनिधि के रूप में उन्होंने श्रमिकों और किसानों की स्थिति में सुधार पर चर्चा की।
    • इसके अलावा बॉम्बे असेंबली के सदस्य के रूप में, अंबेडकर ने कर्मचारियों के हड़ताल के अधिकार को समाप्त करने के कारण औद्योगिक विवाद विधेयक, 1937 का विरोध किया। वो 'कार्य करने की बेहतर स्थिति' के स्थान पर 'श्रमिकों के जीवन की उचित स्थिति' की वकालत करते थे। इसके साथ उन्होंने सरकार की श्रम नीति की बुनियादी संरचना तैयार की।
  • भारत की कृषि समस्या के लिये विज़न: उनके निबंध का शीर्षक 'भारत में छोटी जोत और उनका समाधान' (1918) ने भारत की कृषि समस्या के समाधान के रूप में उन्होंने औद्योगिकीकरण का प्रस्ताव दिया। वर्तमान में भी इस पर बहस जारी है।
  • लैंगिक समानता सुनिश्चित करने में भूमिका: उन्होंने कार्य के घंटों में कमी कर प्रति सप्ताह 48 घंटे कार्य करने करने का प्रावधान किया। उन्होंने कोयले की भूमिगत खानों में महिलाओं के कार्य करने पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया, ओवरटाइम, सशुल्क अवकाश और न्यूनतम मज़दूरी  का प्रावधान पेश किया।
    • उन्होंने मातृत्व लाभ के साथ बिना लैंगिक पक्षपात के "समान काम के लिये समान वेतन" के सिद्धांत को स्थापित करने में मदद की।
    • हिंदू कोड बिल के संदर्भ में उनका समर्थन महिलाओं को एडॉप्ट करने और विरासत में हिस्सा प्राप्त करने का अधिकार प्रदान करने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम था।

वर्तमान में अंबेडकर की प्रासंगिकता

  • स्थायी जातिगत असमानताएँ: भारत में जातिगत असमानता अभी भी कायम है। यद्यपि दलितों ने आरक्षण जैसी सकारात्मक कार्रवाई के माध्यम से तथा अपने स्वयं के राजनीतिक दलों के गठन के माध्यम से एक राजनीतिक पहचान हासिल की है तथापि उनके पास सामाजिक (स्वास्थ्य और शिक्षा) और आर्थिक मोर्चे पर कमियाँ हैं।
  • वर्तमान सांप्रदायिकता की समस्या: राजनीति में अब सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और सांप्रदायिकता का उदय हुआ है अतः यह आवश्यक है कि भारतीय संविधान में स्थायी क्षति से बचने के लिये अंबेडकर की संवैधानिक नैतिकता को धार्मिक नैतिकता के ऊपर रखा जाए।
    • बाबासाहेब अंबेडकर के अनुसार, संवैधानिक नैतिकता का अर्थ विभिन्न वर्गों एवं प्रशासनिक समूहों के परस्पर विरोधी हितों के बीच प्रभावी समन्वय का होना है।
  • जनता के हित में नीतियों का निर्माण: अंबेडकर की सोच एवं उनकी विरासत भारत सरकार द्वारा जनता एवं गरीबों हेतु चलाए जा रहे कल्याणकारी योजनाओं और कार्यक्रमों में परिलक्षित होती हैं।
    • उदाहरण के लिये, ऋण प्राप्त करने के लिये मुद्रा योजना, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदाय में उद्यमशीलता को बढ़ावा देने के लिये स्टैंड-अप इंडिया, आयुष्मान भारत योजना, दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना, सरकार के कई उपायों में श्रम कानूनों का सरलीकरण शामिल हैं, जो सरकार द्वारा बी.आर. अंबेडकर के सपनों को पूरा करने की अटूट प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करते हैं।

निष्कर्ष

पंचतीर्थ - जन्मभूमि (महू), शिक्षा भूमि (लंदन), चैत्य भूमि (मुंबई), दीक्षाभूमि (नागपुर), महापरिनिर्वाण भूमि (दिल्ली) का विकास - राष्ट्रवादी सुधारक अंबेडकर के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने के लिये एक उचित कदम है। 

हालाँकि, आज भारत कई सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है जैसे कि जातिवाद, सांप्रदायिकता, अलगाववाद, लैंगिक असमानता आदि। हमें अपने भीतर अंबेडकर की शिक्षा को खोजने की आवश्यकता है ताकि हम इन चुनौतियों से निपट सकें।

अभ्यास प्रश्न: राष्ट्र निर्माण में बी.आर. अंबेडकर की भूमिका बेहद महत्त्वपूर्ण है। वर्तमान भारतीय सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक परिदृश्य पर इनका प्रभाव आज भी है। चर्चा कीजिये।