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भारत में बेरोज़गारी के सटीक सर्वेक्षण का अभाव | 14 Feb 2019 | शासन व्यवस्था

संदर्भ

हाल में आई एक सर्वेक्षण रिपोर्ट से पता चलता है कि भारत की श्रम भागीदारी दर वैश्विक मानकों से बहुत कम है और विमुद्रीकरण के बाद इसमें और गिरावट दर्ज की गई है तथा इसका महिलाओं की भागीदारी पर अधिक असर पड़ा है।

किसने किया यह सर्वेक्षण?

Centre for Monitoring India Economy-CMIE

इसके लिये किये जाने वाले अपने घरेलू सर्वेक्षण को CMIE ने उपभोक्ता पिरामिड घरेलू सर्वेक्षण (Consumer Pyramids Household Survey-CPHS) नाम दिया। सरकार के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (National Sample Survey Office-NSSO) के 101,724 लोगों के सैंपल सर्वे की तुलना में CMIE ने 172,365 लोगों को सैंपल सर्वे में शामिल किया। दोनों ही सर्वेक्षणों की कार्य पद्धति लगभग समान थी।

इसके अलावा, CPHS में आमने-सामने बातचीत की जाती है, जिसमें GPS युक्त स्मार्टफोन या टैबलेट का उपयोग अनिवार्य रूप से किया जाता है। इस तीव्र प्रमाणीकरण पद्धति से एकत्रित आँकड़ों की उच्च गुणवत्ता बनी रहती है। सभी प्रमाणीकरण कार्य वास्तविक समय (Real Time) में किये जाते हैं। आँकड़े एकत्रित करने वाली मशीनरी वास्तविक समय में उच्च गुणवत्ता वाले डेटा के वितरण को सुनिश्चित करती है ताकि किसी भी प्रकार की अशुद्धियों को समय रहते ठीक किया जा सके। एक बार आँकड़े एकत्र करने और वास्तविक समय में मान्य होने के बाद अनुमानों के लिये यह बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के स्वचालित रूप से लागू हो जाते हैं।

CPHS और NSSO सर्वेक्षण के बीच कुछ बुनियादी अंतर हैं। जहाँ NSSO एक वर्ष के लिये एक सप्ताह पहले तक की स्थिति को शामिल करने का प्रयास करता है, वहीं CPHS सर्वेक्षण के दिन की स्थिति को भी शामिल कर लेता है। यह इन चार कारकों में से कोई एक हो सकता है:

  1. नियोजित रोज़गार
  2. बेरोज़गार काम करने को तैयार हैं और सक्रिय रूप से नौकरी तलाश रहे हैं
  3. बेरोज़गार काम करने के लिये तैयार हैं लेकिन सक्रिय रूप से नौकरी की तलाश में नहीं हैं
  4. बेरोज़गार हैं, लेकिन न तो काम करने के लिये तैयार हैं और न ही नौकरी तलाश रहे हैं

चूँकि CPHS में सर्वेक्षण के दिन तक का डेटा लिया जाता है, जैसे कि दिहाड़ी मज़दूरों के मामले में तत्काल पूर्ववर्ती दिन के साथ प्राथमिक वर्गीकरण होता है, इसलिये यह परिस्थितियों को सही ढंग से परिलक्षित करता है। इसके विपरीत, NSSO की सर्वेक्षण प्रणाली काफी जटिल है।

बड़े CPHS नमूने को 16 सप्ताह के निष्पादन चक्र के तहत प्रत्येक सप्ताह ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में समान रूप से वितरित किया जाता है। यह ऐसी मशीनरी है जो हमें भारतीय श्रम बाज़ार को जल्द समझने में सक्षम बनाती है।

सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडिया इकोनॉमी (Centre for Monitoring India Economy-CMIE) एक निजी उद्यम है। इसने जो डेटा जुटाया है उससे पता चलता है कि पिछले तीन वर्षों में बेरोज़गारी में तेज़ी से वृद्धि हुई है और ऐसे में SDDS के अनुपालन के तहत बेरोज़गारी पर आँकड़े न जुटाने का कोई औचित्य नहीं रह जाता।

विमुद्रीकरण से बेरोज़गारी में हुआ इज़ाफा

श्रम भागीदारी में महिलाओं की स्थिति

CHPS दर्शाता है कि श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी की स्थिति आधिकारिक एजेंसियों के दिये गए आँकड़ों से कहीं अधिक खराब है। विमुद्रीकरण का बड़ा खामियाजा महिलाओं को उठाना पड़ा। उनकी श्रम भागीदारी में तेज़ी से कमी आई, जबकि पुरुषों के मामले में कोई बड़ा अंतर नही आया। विमुद्रीकरण के तुरंत बाद जुलाई 2017 में GST लागू हुआ और इसकी वज़ह से ऐसे छोटे उद्यम बाहर हो गए जो GST के माहौल में प्रतिस्पर्द्धा कर पाने में अक्षम थे । इससे रोज़गार के अवसरों की संख्या भी कम हुई।

बड़े पैमाने पर कम हुए रोज़गार

प्रारंभिक अनुमानों के अनुसार 2018 में कुल रोज़गार संख्या में 11 मिलियन की कमी आई है। इसका खामियाजा भी बड़े पैमाने पर महिलाओं को ही भुगतना पड़ा, जबकि पुरुष वर्ग पर भी इसका अच्छा-खासा प्रभाव पड़ा।

CMIE का डेटा यह भी दर्शाता है कि बेरोज़गारी में वृद्धि के साथ-साथ श्रम भागीदारी दर में भी गिरावट आई है। लेकिन एक अच्छी डेटा मॉनीटरिंग मशीनरी का उपयोग न करके से भारत सरकार स्वयं को और देश के नागरिकों को अँधेरे में रख रही है।

स्रोत: 9 फरवरी को The Hindu में प्रकाशित लेख Surveying India’s Unemployment Numbers पर आधारित