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भारतीय अर्थव्यवस्था

भारतीय रेल तीव्र रूपांतरण की दिशा में अग्रसर

  • 23 Apr 2026
  • 174 min read

यह एडिटोरियल 23/04/2026 को द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित “Tracks to transformation: Modernisation is powering a safer, faster Indian Railways” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख वृहद स्तर पर पटरियों के नवीनीकरण, सुदृढ़ सुरक्षा तंत्र तथा उन्नत अवसंरचना के माध्यम से भारतीय रेलवे के निरंतर आधुनिकीकरण को रेखांकित करता है। यह दर्शाता है कि किस प्रकार उन्नयन और वंदे भारत एक्सप्रेस जैसी सेवाएँ इसे एक सुरक्षित, तीव्र तथा अधिक कुशल परिवहन मार्ग में परिवर्तित कर रही हैं।

प्रिलिम्स  के लिये: वंदे भारत, अमृत भारतडेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, कवच 4.0 प्रणाली, केंद्रीय बजट 2026-27, गति शक्ति कार्गो टर्मिनल।

मेन्स के लिये: भारतीय रेलवे के विकास को गति देने वाले प्रमुख घटनाक्रम, भारतीय रेलवे से जुड़े प्रमुख मुद्दे। 

भारत की रेल व्यवस्था, जो प्रतिदिन 2 करोड़ से अधिक यात्रियों की जीवनरेखा है, ने विगत एक दशक में निरंतर और महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किये हैं। वर्ष 2014 से अब तक लगभग 55,000 किमी पटरियों का नवीनीकरण किया गया है, मशीनीकरण का स्तर दोगुने से अधिक हो गया है तथा अल्ट्रासोनिक परीक्षण के माध्यम से रेल दुर्घटनाओं में लगभग 90% की कमी दर्ज की गई है। 110 किमी प्रति घंटे या उससे अधिक गति से ट्रेनों का संचालन में सक्षम पटरियों का अनुपात 40% से बढ़कर 80% हो गया है, जिससे वंदे भारत एक्सप्रेस जैसी तीव्र एवं सुगम सेवाएँ संभव हो पाई हैं। वर्तमान में भारतीय रेलवे की ‘यह विकास यात्रा आधुनिकीकरण की एक सतत प्रक्रिया को प्रतिबिंबित करती है, जिसने एक पुरातन नेटवर्क को सुरक्षित, तीव्र तथा अधिक विश्वसनीय प्रणाली में रूपांतरित कर दिया है।

भारतीय रेलवे के विकास को गति देने वाले प्रमुख घटनाक्रम क्या हैं?

  • उच्च गति एवं प्रीमियम यात्री अनुभव: आधुनिकीकरण अब केवल ‘कनेक्टिविटी’ तक सीमित न रहकर ‘सुविधा और गति’ की दिशा में अग्रसर है, जिसका उद्देश्य प्रीमियम कोच डिज़ाइनों के माध्यम से मध्यम वर्ग को आकर्षित करना है।
    • इस रणनीति का प्रमुख लक्ष्य लागत में कमी हेतु स्वदेशी विनिर्माण पर ज़ोर देना है, साथ ही वैक्यूम टॉयलेट, GPS आधारित सिस्टम तथा उन्नत इंटीरियर जैसी विश्व स्तरीय सुविधाएँ प्रदान करना है।
    • वंदे भारत एक्सप्रेस तथा अमृत भारत एक्सप्रेस जैसी सेवाओं का विस्तार उच्च स्तरीय यात्रा सुविधाओं का व्यापक विस्तार कर रहा है तथा अल्प एवं मध्यम दूरी के लिये अर्द्ध-उच्च गति रेल को हवाई यात्रा का व्यवहार्य विकल्प बना रहा है। 
    • दिसंबर 2023 से 30 अमृत भारत एक्सप्रेस ट्रेनों का संचालन प्रारंभ हो चुका है, जबकि वर्ष 2025–26 में यात्री राजस्व 5.96% से बढ़कर 80,000 करोड़ रुपये तक पहुँच गया।
  • माल ढुलाई एवं यात्री यातायात का पृथक्करण: साझा लाइनों पर मिश्रित यातायात से उत्पन्न परिचालन संबंधी बाधाओं का समाधान वृहद समर्पित अवसंरचना के माध्यम से किया जा रहा है, जिससे परिवर्तन समय (Turnaround Time) में तेज़ी आएगी।
    • माल ढुलाई के पृथक्करण के माध्यम से रेलवे इस्पात और सीमेंट जैसे प्रमुख उद्योगों के लिये ‘व्यापार में सुगमता’ को उल्लेखनीय रूप से सुदृढ़ कर रहा है तथा लॉजिस्टिक्स लागत में कमी ला रहा है।
    • डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC) का पूर्ण होना माल ढुलाई क्षमता को दोगुना करने तथा यह सुनिश्चित करने में प्रमुख भूमिका निभाता है कि मालगाड़ियाँ बिना अवरोध उच्च औसत गति बनाए रखें।
      • 1,506 किमी लंबी पश्चिमी DFC का निर्माण मार्च 2026 में पूर्णतः संपन्न हो गया तथा वर्ष 2025-26 की अवधि के दौरान कुल माल ढुलाई रिकॉर्ड 1,670 मिलियन टन तक पहुँच गया।
  • स्वदेशी सुरक्षा और AI का एकीकरण: उच्च घनत्व वाले गलियारों में मानवीय त्रुटि के जोखिम को समाप्त करने के लिये सुरक्षा व्यवस्था अब मैनुअल निरीक्षण से आगे बढ़कर स्वचालित एवं वास्तविक-समय सुरक्षा प्रणालियों पर आधारित हो गई है, जिससे त्रुटियों की संभावना न्यूनतम हो जाती है। 
    • इसका प्रमुख उद्देश्य एक ‘फेल-सेफ’ पारिस्थितिकी तंत्र (Fail-safe ecosystem) का विकास करना है, जो वंदे भारत 4.0 जैसी आधुनिक ट्रेनों की उच्च गति आवश्यकताओं के अनुरूप हो।
    • कवच 4.0 प्रणाली को दिल्ली–मुंबई तथा दिल्ली–हावड़ा मार्गों के विभिन्न खंडों पर लागू किया गया है, जिससे सुरक्षा दृष्टिकोण प्रतिक्रियात्मक से पूर्वानुमान-आधारित हो गया है।
      • वित्त वर्ष 2025-26 के लिये आवंटित 1,17,000 करोड़ रुपये से अधिक के विशाल सुरक्षा बजट के समर्थन से गंभीर दुर्घटनाओं की संख्या घटकर मात्र 11 रह गई है।
  • 100% विद्युतीकरण एवं सौरकरण: भारतीय रेल स्वयं को विश्व का पहला ‘नेट ज़ीरो’ बड़े पैमाने का रेल नेटवर्क बनाने की दिशा में अग्रसर है, जहाँ जीवाश्म ईंधन निर्भरता को नवीकरणीय ऊर्जा से प्रतिस्थापित किया जा रहा है।
    • यह परिवर्तन केवल ऊर्जा सुरक्षा और लागत में कमी तक सीमित न होकर पर्यावरणीय स्थिरता तथा कार्बन फुटप्रिंट में कमी से भी संबंधित है।
    • स्टेशन स्तर पर सौर ऊर्जा के उपयोग के साथ लगभग पूर्ण विद्युतीकरण से परिचालन अनुपात में उल्लेखनीय कमी आ रही है तथा राष्ट्रीय परिवहन प्रणाली वैश्विक तेल कीमतों की अस्थिरता से सुरक्षित हो रही है।
      • वर्ष 2025 के अंत तक विद्युतीकरण 99.2% (69,427 RKM) तक पहुँच गया, जबकि सौर क्षमता बढ़कर 898 मेगावाट हो गई, जिससे ट्रैक्शन एवं स्टेशन आवश्यकताओं की पूर्ति सुनिश्चित हुई।
  • पूंजीगत व्यय-आधारित अवसंरचना एवं क्षेत्रीय एकीकरण: सरकार ने क्षेत्रीय कनेक्टिविटी की कमियों को दूर करने हेतु, विशेषकर उत्तर-पूर्व एवं पहाड़ी क्षेत्रों में निरंतर एवं अभूतपूर्व पूंजीगत व्यय को प्रोत्साहित किया है।
    • केंद्रीय बजट 2026-27 में भारतीय रेलवे के लिये 2,93,000 करोड़ रुपये से अधिक का रिकॉर्ड पूंजीगत व्यय निर्धारित किया गया है, जो अब तक का सर्वाधिक आवंटन है।
    • यह निवेश केवल पटरियों तक सीमित न रहकर ‘अमृत भारत’ स्टेशन पुनर्विकास हेतु भी है, जो रेल केंद्रों को शहरी केंद्रों में रूपांतरित करता है।
  • गति शक्ति कार्गो टर्मिनल (GCT) एवं मूल्यवर्द्धन हब: रेलवे टर्मिनल परिसरों के भीतर ही प्रसंस्करण इकाइयों को एकीकृत कर एक साधारण परिवहनकर्त्ता से समग्र लॉजिस्टिक्स भागीदार के रूप में विकसित हो रहा है।
    • इस परिवर्तन के माध्यम से खाद्यान्न प्रसंस्करण, डी-स्टफिंग तथा मूल्यवर्द्धन जैसी गतिविधियों को रेल स्टेशन पर ही संपादित करने की सुविधा मिलती है, जिससे प्रथम एवं अंतिम चरण की अक्षमताएँ समाप्त हो सकेंगी।
    • गति शक्ति कार्गो टर्मिनलों का विस्तार लॉजिस्टिक्स संबंधी बाधाओं को दूर कर रहा है तथा विस्तारित अनुबंध अवधि एवं मानकीकृत अनुमोदन मॉडल के माध्यम से निजी निवेश को आकर्षित कर रहा है।
  • ‘हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज’ एवं हरित ट्रैक्शन परीक्षण: भारतीय रेलवे पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील एवं विरासत मार्गों पर, जहाँ विद्युतीकरण कठिन है, कार्बन उत्सर्जन को समाप्त करने हेतु हाइड्रोजन-आधारित ट्रैक्शन का परीक्षण कर रहा है। 
    • मार्च 2026 में भारत की प्रथम हाइड्रोजन ट्रेन ने जींद–सोनीपत मार्ग पर सफल परीक्षण पूरा किया। 
    • इसके वाणिज्यिक संचालन में आने के साथ ही भारत, जर्मनी, स्वीडन, जापान तथा चीन जैसे देशों की श्रेणी में शामिल हो जाएगा, जो हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेनों का संचालन करते हैं।
  • AI-संचालित पूर्वानुमान-आधारित रखरखाव एवं डिजिटल ट्विन्स:आधुनिक रेलवे प्रबंधन अब आवधिक मैनुअल निरीक्षण से आगे बढ़कर सेंसर-आधारित वास्तविक-समय निगरानी पर आधारित हो गया है। 
    • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) एवं इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) का उपयोग करके, रेलवे अब उपकरण की खराबी होने से पहले ही उसका अनुमान लगा सकता है, जिससे अनियोजित डाउनटाइम में काफी कमी आती है और उच्च मूल्य वाली संपत्तियों के परिचालन जीवनकाल में वृद्धि होती है।
    • भारतीय रेलवे ने रोलिंग स्टॉक के पूर्वानुमानित रखरखाव के लिये ऑनलाइन मॉनिटरिंग ऑफ रोलिंग स्टॉक सिस्टम (OMRS), व्हील इम्पैक्ट लोड डिटेक्टर (WILD ) जैसी उन्नत/सुधारित तकनीकों को अपनाया है।
    • AI-सक्षम पूर्वानुमान उपकरणों का एकीकरण रखरखाव प्रणाली को प्रतिक्रियात्मक ‘ब्रेक-फिक्स’ (तत्काल मरम्मत मॉडल) चक्रों से हटाकर सक्रिय, डेटा-संचालित हस्तक्षेपों की ओर रूपांतरित कर रहा है, जिससे ऑपरेटिंग अनुपात में मौलिक परिवर्तन हो रहा है।
    • अब यह अनुमान व्यक्त किया जा रहा है कि AI के अनुप्रयोग, सुरक्षा तथा तकनीकी उन्नयन बजट के समर्थन से अनियोजित डाउनटाइम को 30-40% तक कम कर देंगे।
  • मेट्रो विस्तार तथा टियर-II शहरी परिवर्तन: भारतीय शहरों में ‘मेट्रो-करण’ अब केवल परिवहन परियोजना न रहकर शहरी पुनरुत्थान एवं आर्थिक सुदृढ़ीकरण का प्रमुख साधन बन गया है, जो निजी वाहनों पर निर्भरता को कम करता है। 
  • यह विस्तार ‘हब-एंड-स्पोक’ मॉडल पर आधारित है, जहाँ मेट्रो मुख्य धुरी के रूप में कार्य करती है और इसे इलेक्ट्रिक फीडर बसों एवं अंतिम मील परिवहन से जोड़ा जाता है। 
  • 26 शहरों में तीव्र विस्तार के साथ भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा मेट्रो नेटवर्क बन चुका है, जिसने भूमि मूल्य, श्रम गतिशीलता एवं शहरी अर्थव्यवस्था को मौलिक रूप से परिवर्तित किया है।

भारतीय रेलवे से जुड़े प्रमुख मुद्दे क्या हैं? 

  • दीर्घकालिक वित्तीय अस्थिरता तथा परिचालन अनुपात: रेलवे एक अस्थिर वित्तीय संरचना से ग्रस्त है, जहाँ आंतरिक राजस्व लगभग पूर्णतः परिचालन लागतों में व्यय हो जाता है, जिससे महत्त्वपूर्ण बुनियादी ढाँचा एवं सुरक्षा उन्नयन के लिये न्यूनतम अधिशेष शेष रहता है।
    • यह ‘पेंशन एवं वेतन व्यय का दबाव’ केंद्र सरकार से प्राप्त सकल बजटीय सहायता (GBS) पर अत्यधिक निर्भरता को बाध्य करता है, जिससे वाणिज्यिक स्वायत्तता कमज़ोर हो जाती है।
    • वर्ष 2025-26 में रेलवे का परिचालन अनुपात 98.43% अनुमानित है, जो दर्शाता है कि रेलवे अपनी आय का लगभग प्रत्येक रुपया दैनिक रखरखाव पर व्यय कर देता है, परिणामस्वरूप स्व-वित्तपोषित पूंजी विस्तार के लिये सीमित अवसर बचता है।
  • प्रीमियमकरण बनाम समावेशिता का विरोधाभास: एक उभरती हुई सामाजिक-आर्थिक चिंता यह है कि वंदे भारत जैसी उच्च स्तरीय सेवाओं पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित करने से सस्ते परिवहन पर निर्भर सामान्य यात्री वर्ग वंचित होते जा रहे हैं।
    • अमृत भारत एक्सप्रेस में द्वितीय तथा स्लीपर श्रेणी के किराए सामान्य एक्सप्रेस ट्रेनों की तुलना में लगभग 15-17% अधिक हैं।
    • इस परिवर्तन के परिणामस्वरूप ‘जनरल’ एवं ‘स्लीपर’ श्रेणी के कोचों की कमी उत्पन्न हो गई है, जिससे नेटवर्क के गैर-प्रीमियम खंडों में अत्यधिक भीड़भाड़ तथा सुरक्षा जोखिम बढ़ गए हैं।
  • सुरक्षा चुनौतियाँ एवं 'कवच' कार्यान्वयन में विलंब: दुर्घटनाओं की संख्या में कमी के बावजूद, रेलवे प्रणाली अब भी उच्च प्रभाव वाले हादसों के प्रति संवेदनशील बनी हुई है, जिसका प्रमुख कारण स्वदेशी स्वचालित ट्रेन सुरक्षा प्रणाली (ATP) का धीमा विस्तार है।
    • मानवीय त्रुटि अब भी एक प्रमुख जोखिम बनी हुई है, क्योंकि सुरक्षा तकनीक अभी तक पूरे नेटवर्क पर पर्याप्त स्तर तक लागू नहीं हो सकी है।
    • वर्ष 2026 के प्रारंभ तक ‘कवच’ प्रणाली का कार्यान्वयन केवल 1,452 किमी तक ही हो पाया है, जो लगभग 68,000 किमी के विशाल नेटवर्क की तुलना में अत्यंत सीमित कवरेज को दर्शाता है।
  • माल ढुलाई में स्थिरता तथा क्रॉस-सब्सिडी: भारतीय रेलवे कम रखे गए यात्री किरायों की भरपाई हेतु माल ढुलाई ग्राहकों पर अधिक शुल्क आरोपित करता रहता है, जिसके परिणामस्वरूप उच्च मूल्य वाले माल के लिये रेल परिवहन सड़क परिवहन की तुलना में काफी अधिक महँगा हो जाता है।
    • इस व्यवस्था के कारण माल परिवहन में रेलवे की हिस्सेदारी में ठहराव बना हुआ है, जो राष्ट्रीय रेल योजना 2030 के निर्धारित महत्त्वाकांक्षी लक्ष्यों से काफी कम है।
    • सरकारी अभिलेखों के अनुसार, माल परिवहन में रेल की हिस्सेदारी वर्ष 1951 में 85% से घटकर वर्ष 1991 में 60% तथा वर्ष 2022 में केवल 27% रह गई, जबकि राष्ट्रीय रेल योजना का लक्ष्य वर्ष 2030 तक इसे 45% तक पहुँचाना है।
  • बढ़ता ऋण बोझ एवं पुनर्भुगतान दबाव: आंतरिक संसाधनों से वित्तपोषण के स्थान पर अतिरिक्त-बजटीय संसाधनों (EBR) एवं बाज़ार ऋणों की ओर झुकाव ने दीर्घकालिक देयता जाल उत्पन्न कर दिया है, जो भविष्य में रेलवे की बैलेंस शीट पर दबाव डालेगा।
    • इंडियन रेलवे फाइनेंस कॉरपोरेशन (IRFC) द्वारा वित्तीय वर्ष 2026-27 हेतु लगभग ₹70,000 करोड़ की बाज़ार ऋण योजना को स्वीकृति दी गई है।
    • ऋणों पर बढ़ती निर्भरता ब्याज देनदारियों एवं पुनर्भुगतान दबाव को बढ़ाती है तथा सीमित आंतरिक आय के बीच रेलवे की वित्तीय सततता पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
  • क्रियान्वयन संबंधी जोखिम तथा परियोजना लागत में वृद्धि: योजना निर्माण से परियोजना संचालन तक की प्रक्रिया प्रायः प्रशासनिक अड़चनों, भूमि अधिग्रहण बाधाओं तथा ठेकेदार प्रबंधन की कमज़ोरियों के कारण प्रभावित होती है।
    • परिवहन एवं लॉजिस्टिक्स क्षेत्र भारत के अवसंरचना विकास का प्रमुख आधार बना हुआ है, जिसमें 1,421 परियोजनाएँ सम्मिलित हैं, जो कनेक्टिविटी-संचालित विकास पर ध्यान केंद्रित करने को उजागर करती हैं।
    • रेल मंत्रालय 245 परियोजनाओं (लगभग 12.6%) का प्रबंधन कर रहा है, किंतु निवेश में इसका सबसे बड़ा हिस्सा 8.39 लाख करोड़ रुपये (~20%) का है, जो इसकी पूंजी-गहन प्रकृति को परिलक्षित करता है।
    • यद्यपि पूंजीगत व्यय सर्वकालिक उच्च स्तर पर है फिर भी मेगा-परियोजनाओं को निर्धारित समय-सीमा में पूर्ण न कर पाने के कारण ‘पूंजी अवरोध’ की स्थिति उत्पन्न होती है, जहाँ ब्याज देनदारियाँ बढ़ने के साथ-साथ लाभ प्राप्ति में विलंब होता है।
  • मोडल अक्षमता एवं 'थोक वस्तु' निर्भरता: भारतीय रेलवे अब भी कोयला एवं लौह अयस्क जैसी सीमित थोक वस्तुओं पर अत्यधिक निर्भर है तथा उच्च मूल्य वाले कंटेनरीकृत एवं उपभोक्ता वस्तु (white goods) सेगमेंट को आकर्षित करने में असफल है।
    • माल ढुलाई से होने वाली आय कुल आंतरिक आय का लगभग 62% है, जिसमें अकेले कोयले का योगदान लगभग 48% है।
    • यह अत्यधिक निर्भरता रेलवे को क्षेत्र-विशिष्ट मांग व्यवधानों एवं ऊर्जा संक्रमण नीतियों के प्रति संवेदनशील बनाती है।
    • साथ ही यह उच्च मूल्य एवं समय-संवेदी माल सेगमेंट में रेलवे की सड़क परिवहन के साथ प्रतिस्पर्द्धात्मक क्षमता को सीमित करती है।

भारतीय रेलवे को और अधिक आधुनिक और सुदृढ़ करने के लिये क्या कदम उठाए जाने चाहिये?

  • स्थिति-आधारित तथा पूर्वानुमेय परिसंपत्ति प्रबंधन अपनाना: रेलवे को पारंपरिक समय-आधारित रखरखाव से हटकर IoT सेंसर तथा डिजिटल ट्विन (Digital Twin) के उपयोग से डेटा-संचालित भविष्यवाणी-आधारित रखरखाव प्रणाली को अपनाना होगा।
    • रोलिंग स्टॉक एवं पटरियों में स्मार्ट सेंसर स्थापित कर यह प्रणाली विफलताओं से पूर्व ही वास्तविक समय में संरचनात्मक थकान (Structural Fatigue) तथा घटकों के घिसाव (wear) की पहचान करने में सक्षम होती है।
    • यह ‘शून्य-विफलता’ रणनीति अनियोजित ठहराव (Downtime) को कम करती है, सुरक्षा मार्जिन को बढ़ाती है तथा वंदे भारत जैसी उच्च-मूल्य परिसंपत्तियों के परिचालन जीवनचक्र को उल्लेखनीय रूप से विस्तारित करती है।
  • ‘लॉजिस्टिक्स-एज़-ए-सर्विस (LaaS)’ राजस्व मॉडल का संस्थानीकरण: थोक वस्तुओं पर निर्भरता को कम करने हेतु रेलवे को एक मल्टी-मोडल लॉजिस्टिक्स ढाँचा लागू करना चाहिये, जो निजी भागीदारी के माध्यम से ‘फर्स्ट-माइल से लास्ट-माइल’ तक समग्र कनेक्टिविटी सुनिश्चित करता है।
    • विशेषीकृत ‘कॉमन यूजर टर्मिनल’ तथा रेफ्रिजरेटेड ‘कोल्ड-चेन कॉरिडोर’ के विकास से रेलवे को इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स तथा शीघ्र नष्ट होने वाली वस्तुओं जैसे उच्च-लाभ वाले सेगमेंट में प्रभावी हिस्सेदारी बढ़ाने में सहायता मिलेगी।
    • ग्राहक-केंद्रित सेवा मॉडल की ओर यह परिवर्तन भारत की समग्र लॉजिस्टिक्स लागत को प्रभावी रूप से कम करेगा तथा सड़क परिवहन से परिवहन हिस्सेदारी को पुनः प्राप्त करने में सहायक होगा।
  • ओपन आर्किटेक्चर के माध्यम से ‘कवच’ इकोसिस्टम का त्वरण: हार्डवेयर आपूर्ति में एकाधिकार संबंधी बाधाओं को रोकने हेतु ओपन-वेंडर इकोसिस्टम को अपनाकर स्वदेशी स्वचालित ट्रेन सुरक्षा (ATP) प्रणाली की तैनाती में तेज़ी लाई जानी चाहिये।
    • ‘संचार-आधारित ट्रेन नियंत्रण (CBTC)’ अवसंरचना को सुदृढ़ करने से सुरक्षा से समझौता किये बिना उच्च अनुभागीय क्षमता तथा ट्रेनों के बीच कम अंतराल सुनिश्चित किया जा सकेगा।
    • कवच 4.0 मानक के साथ उपग्रह-आधारित ट्रैकिंग का एकीकरण यह सुनिश्चित करता है कि घने कोहरे जैसी चरम मौसम स्थितियों में भी उच्च गति संचालन निर्बाध एवं त्रुटिरहित बना रहे।
  • ‘संपत्ति मुद्रीकरण’ तथा SPV के माध्यम से वित्तीय वियोग: ‘परिचालन अनुपात’ संकट के समाधान हेतु रेलवे को विशेष प्रयोजन वाहनों (SPV) के माध्यम से गैर-मुख्य भूमि पार्सल तथा स्टेशन हवाई क्षेत्र के संपत्ति मुद्रीकरण को तीव्रता से आगे बढ़ाना चाहिये।
    • ‘स्टेशन एस्टेट डेवलपमेंट’ से प्राप्त राजस्व को विशेष रूप से सुरक्षा उन्नयन एवं ऋण सेवा के लिये निर्धारित किया जा सकता है, जिससे सकल बजटीय सहायता पर निर्भरता में कमी आती है।
    • इससे एक आत्मनिर्भर वित्तीय चक्र का निर्माण होता है, जहाँ शहरी रेल केंद्र वाणिज्यिक ‘शहर केंद्र’ में रूपांतरित होकर खुदरा, कार्यालयों तथा आतिथ्य क्षेत्र के माध्यम से किराया-बॉक्स राजस्व के अतिरिक्त अन्य आय स्रोत उत्पन्न करते हैं।
  • ‘ग्रीन-हाइड्रोजन’ तथा ‘सॉलिड-स्टेट’ ऊर्जा भंडारण को अपनाना: साधारण विद्युतीकरण से आगे बढ़ते हुए रेलवे को वास्तविक नेट-जीरो स्थिति प्राप्त करने हेतु गैर-विद्युतीकृत एवं पहाड़ी मार्गों के लिये हाइड्रोजन-फ्यूल-सेल लोकोमोटिव का प्रायोगिक परीक्षण करना चाहिये।
    • स्टेशनों पर वृहद स्तर पर ‘सौर-प्लस-भंडारण’ समाधान लागू करने से रेल नेटवर्क को एक विकेंद्रीकृत हरित ऊर्जा ग्रिड में रूपांतरित किया जा सकता है, जो अतिरिक्त बिजली को राष्ट्रीय ग्रिड लाइनों में पुनः प्रेषित करने में सक्षम होगा।
    • यह ऊर्जा संक्रमण रणनीति दीर्घकालिक ईंधन व्यय को कम करने के साथ-साथ वैश्विक ऊर्जा मूल्य अस्थिरता एवं कार्बन करों से भी रेलवे को सुरक्षित करती है।
  • ‘एकीकृत कमान एवं नियंत्रण (UCC)’ केंद्रों का कार्यान्वयन: रेलवे को अपने खंडित विभागीय ढाँचों को एक एकीकृत डिजिटल कमांड संरचना में समाहित करना चाहिये, जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का उपयोग करते हुए रियल टाइम यातायात प्रबंधन एवं मार्ग अनुकूलन सुनिश्चित करे।
    • गतिशील ‘मांग-अनुकूल’ शेड्यूलिंग वास्तविक समय बाज़ार डेटा के आधार पर ट्रेन आवृत्ति को समायोजित कर बर्थ उपयोग तथा माल ढुलाई क्षमता को अधिकतम कर सकती है।
    • यह डिजिटल रूपांतरण परिचालन निर्णय-निर्माण में मानवीय हस्तक्षेप को कम करता है, जिससे ‘परिचालन अनुपात’ में उल्लेखनीय कमी आती है तथा संपूर्ण नेटवर्क की समयबद्धता में सुधार होता है।
  • कार्यबल का ‘कौशल उन्नयन’ तथा सामरिक मानव संसाधन पुनर्गठन: जैसे-जैसे सिस्टम अधिक तकनीकी रूप से उन्नत होता जा रहा है, पुराने कर्मचारियों को AI-निगरानी, इलेक्ट्रॉनिक्स रखरखाव तथा डिजिटल सिग्नलिंग आधारित भूमिकाओं में रूपांतरित करने हेतु एक समग्र तकनीकी पुनर्कौशल कार्यक्रम की आवश्यकता है।
  • महत्त्वपूर्ण रिक्तियों को भरकर तथा लोको-पायलटों के लिये ‘थकान-प्रबंधन’ AI को लागू कर ‘सुरक्षा-श्रेणी’ कार्यबल को सुदृढ़ करना मानवीय त्रुटि से उत्पन्न आपदाओं की रोकथाम के लिये आवश्यक है।
  • एक कुशल एवं प्रौद्योगिकी-उन्मुख कार्यबल यह सुनिश्चित करेगा कि उच्च गति वाले वाहनों में किये गए वृहद निवेश के साथ-साथ परिचालन एवं रखरखाव विशेषज्ञता भी सुदृढ़ हो।
  • रणनीतिक सीमावर्ती तथा आंतरिक क्षेत्रों की कनेक्टिविटी का विकास: संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों एवं उत्तर-पूर्व में रणनीतिक रेल संपर्कों के माध्यम से नेटवर्क को सुदृढ़ करना राष्ट्रीय सुरक्षा तथा क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
  • दुर्गम भूभागों में ‘सुरंग निर्माण प्रौद्योगिकी’ तथा ‘पुल अभियांत्रिकी’ को प्राथमिकता देकर रेलवे पूर्व में अलग-थलग रहे क्षेत्रों को सर्व-कालिक (all-weather) कनेक्टिविटी प्रदान कर सकता है।
  • यह ‘भू-राजनीतिक-रेल’ रणनीति न केवल सैन्य लॉजिस्टिक्स को सुदृढ़ करती है, बल्कि भारतीय पटरियों को पड़ोसी अंतर्राष्ट्रीय गलियारों से जोड़कर ‘एक्ट ईस्ट’ व्यापार नीतियों के लिये एक उत्प्रेरक के रूप में भी कार्य करती है।

 निष्कर्ष: 

भारतीय रेलवे एक ऐसे महत्त्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है, जहाँ यह पारंपरिक परिवहन व्यवस्था से आगे बढ़कर आधुनिक, प्रौद्योगिकी-आधारित परिवहन तंत्र में परिवर्तित हो रहा है। गति, सुरक्षा तथा बुनियादी ढाँचे में हुए उल्लेखनीय सुधार एक परिवर्तनकारी बदलाव का संकेत देते हैं, फिर भी वित्त, माल ढुलाई में विविधता एवं समावेशिता से संबंधित संरचनात्मक चुनौतियाँ अभी भी विद्यमान हैं। इस गति को बनाए रखने हेतु नवाचार, वित्तीय विवेक तथा सामाजिक उत्तरदायित्व के समन्वय से संतुलित सुधारों की आवश्यकता है। अंततः एक सुदृढ़ एवं भविष्य-उन्मुख रेलवे प्रणाली भारत की आर्थिक प्रगति, क्षेत्रीय एकीकरण तथा सतत विकास में केंद्रीय भूमिका निभाएगी।

दृष्टि मेन्स का प्रश्न: 

‘भारतीय रेलवे एक पारंपरिक परिवहन प्रणाली से एक आधुनिक एवं कुशल राष्ट्रीय संपदा के रूप में संरचनात्मक परिवर्तन के दौर से गुजर रही है।’ इस कथन के संदर्भ में भारतीय रेलवे में आधुनिकीकरण की सीमा का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिये तथा सुरक्षा, गति और आर्थिक विकास पर इसके प्रभावों को स्पष्ट कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. भारतीय रेलवे के आधुनिकीकरण को गति देने वाले प्रमुख कारक क्या हैं? 
आधुनिकीकरण उच्च पूंजीगत व्यय निवेश, लगभग पूर्ण विद्युतीकरण, अर्द्ध-उच्च गति ट्रेनों के विस्तार, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC) तथा AI-आधारित पूर्वानुमानित रखरखाव के अंगीकरण से प्रेरित है। कवच जैसे स्वदेशी नवाचार एवं स्टेशन पुनर्विकास भी इसके प्रमुख सहायक कारक हैं।

2. वंदे भारत एक्सप्रेस और डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर जैसी पहलें परिचालन में किस प्रकार परिवर्तन ला रही हैं? 
वंदे भारत एक्सप्रेस यात्रियों की सुविधा में वृद्धि करते हुए यात्रा समय को कम कर रही है, जबकि डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC) मालगाड़ियों को यात्री यातायात से पृथक कर पटरियों पर भीड़ को कम कर रहे हैं। इससे संपूर्ण नेटवर्क में गति, समयबद्धता तथा लॉजिस्टिक्स दक्षता में सुधार हो रहा है।

3. बढ़ते निवेश के बावजूद भारतीय रेलवे को लगातार वित्तीय संकट का सामना क्यों करना पड़ रहा है? 
उच्च परिचालन अनुपात (~98%), पेंशन एवं वेतन व्यय का दबाव तथा माल ढुलाई राजस्व के माध्यम से यात्री किरायों पर सब्सिडी वित्तीय स्थिति पर दबाव डालते हैं। इसके अतिरिक्त ऋण पर बढ़ती निर्भरता दीर्घकालिक देनदारियों को और बढ़ा देती है।

4. कवच की तैनाती सहित प्रमुख सुरक्षा और परिचालन संबंधी चुनौतियाँ क्या हैं? 
यद्यपि दुर्घटनाओं में कमी आई है, तथापि कवच के धीमे कार्यान्वयन तथा मानवीय हस्तक्षेप पर निरंतर निर्भरता के कारण सुरक्षा जोखिम बने हुए हैं। विस्तृत नेटवर्क में सीमित कवरेज के कारण पूर्णतः त्रुटि-मुक्त प्रणाली की स्थापना में विलंब हो रहा है।

5. भारतीय रेलवे को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी एवं सतत बनाने हेतु किन सुधारों की आवश्यकता है?
प्रमुख सुधारों में माल ढुलाई में विविधता, परिसंपत्तियों का मुद्रीकरण, कवच का तीव्र विस्तार, AI-संचालित रखरखाव को अपनाना, बहु-आयामी लॉजिस्टिक्स ढाँचे का विकास तथा हाइड्रोजन एवं सौर ऊर्जा जैसे हरित ऊर्जा समाधान की ओर संक्रमण शामिल हैं।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ) 

प्रिलिम्स:

प्रश्न. भारतीय रेलवे द्वारा उपयोग किये जाने वाले जैव-शौचालय के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2015)

  1. जैव-शौचालय में मानव अपशिष्ट का अपघटन एक कवक इनोकुलम द्वारा शुरू किया जाता है।
  2.  इस अपघटन में अमोनिया और जलवाष्प एकमात्र अंतिम उत्पाद हैं जो वायुमंडल में निर्मुक्त होते हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: D

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