देश को बड़े मेगा-बैंकों की आवश्यकता | 23 Apr 2019

संदर्भ

हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की एक शोध रिपोर्ट में कहा गया है कि बैंकों के विलय और कंप्यूटरीकरण की वज़ह से बैंकों की दक्षता बढ़ी है। साथ ही बैंकों में नौकरियों में कटौती करने से जो खर्च बचा है उससे सरकारी बैंकों की हालत में कुछ सुधार देखने में आया है।

  • पिछले वर्ष वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसी फिच ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि भारत सरकार ने बैंक ऑफ बड़ौदा, विजया बैंक और देना बैंक के विलय का जो फैसला किया, उससे भारत बैंकिंग क्षेत्र में बड़े सुधार की राह पर आगे बढ़ेगा।
  • वैश्विक रेटिंग एजेंसी मूडीज़ ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा कि भारत में सरकार द्वारा छोटे-छोटे बैंकों के एकीकरण से बड़े और मज़बूत बैंक बनाया जाना देश के बैंकिंग परिदृश्य की बड़ी ज़रूरत है।

भारत सरकार भी पक्ष में

  • वित्त मंत्री अरुण जेटली भी कह चुके हैं कि बैंकिंग क्षेत्र में मितव्ययिता के साथ काम करने के लिये देश को गिने-चुने, लेकिन बड़े बैंकों की आवश्यकता है। भारत को ऐसे बड़े बैंकों की ज़रूरत है जो हर तरह से मज़बूत हों।
  • इससे कर्ज़ की दर से लेकर बड़े पैमाने की मितव्ययिता के अनुकूलतम उपयोग तक में इसका लाभ उठाने में मदद मिलेगी।
  • भारत को ऐसे मेगा-बैंकों की ज़रूरत है, जो कि  वित्तीय तौर पर मज़बूत हों, क्योंकि कर्ज़ लेने की दरों से लेकर अधिकतम उपयोग के पैमाने तक बैंकिंग क्षेत्र को इससे बड़े पैमाने पर मदद मिलती है।
  • वित्त मंत्री के नेतृत्व में एक पैनल बैंकों के विलयीकरण संबंधी मामलों पर विचार करता रहा है। यह पैनल सार्वजनिक क्षेत्र के 21 बैंकों का विलय करके उन्हें 12 इकाइयों में निगमित करना चाहता है, जिनमें से 3 या 4 बैंक SBI के आकार के हो सकते हैं।

23 अगस्त, 2017 को कैबिनेट ने सार्वजनिक बैंकों के एकीकरण में तेज़ी लाने के प्रस्ताव को मंज़ूरी दी थी। पिछले वर्ष 24 जुलाई को केंद्र सरकार ने भारतीय रिज़र्व बैंक से उन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बारे में राय मांगी थी जिनका विलय किया जा सकता है। बैंकिंग क्षेत्र में दो-तिहाई से अधिक हिस्सेदारी सरकारी बैंकों की है। सरकार की रणनीति अगले तीन वर्षों में सरकारी बैंकों की संख्या घटाकर 10 से 12 के बीच लाने की है। उल्लेखनीय है कि छोटे बैंकों को बड़े बैंक में मिलाने का फॉर्मूला केंद्र सरकार पहले भी अपना चुकी है। दो साल पहले 1 अप्रैल, 2017 को भारतीय स्टेट बैंक के पाँच सहायक बैंकों और भारतीय महिला बैंक का स्टेट बैंक में विलय किया गया था। भारत में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया जैसे बड़े बैंकों में सहायक बैंकों के विलय से उद्योग, कारोबार व विभिन्न वर्गों की कर्ज़ की बड़ी ज़रूरतें पूरी करने में आसानी हुई है।

बड़े बैंकों के लाभ

बड़े बैंकों को उच्च पूंजी बना कर रखनी होती है, क्योंकि इससे नियामक व सरकार द्वारा सहायता की संभावनाएँ बढ़ती हैं। सरकार इन बैंकों को डूबने से बचा सकती है, क्योंकि बड़े बैंक अल्प व दीर्घकालिक तरलता (Liquidity) का प्रबंधन कर सकते हैं।

  • स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में उसके 5 सहयोगी बैंकों का विलय करके सरकार ने एक मेगा-बैंक बना दिया। अब यह मेगा-बैंक अन्य वैश्विक संस्थाओं के समूह में शामिल हो गया है।
  • बैंकों का बड़ा आकार न केवल अर्थव्यवस्था के लिये फायदेमंद है, बल्कि इससे व्यावसायिक लागत में भी कमी आती है।
  • इसका एक और लाभ यह है कि इससे तकनीकी दक्षता बढ़ती है, जिससे बैंकों में होने वाले लेन-देन (Transactions) अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों के अनुसार होते हैं। दक्षता बढ़ने से बैंकिंग उत्पाद व सेवाओं की भी गुणवत्ता बढ़ती है।
  • व्यावसायिक मानकों में सुधार के अलावा बैंकों का बड़ा आकार होने से भारतीय बैंकिंग प्रणाली सुदृढ़ बनेगी, विशेषकर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में।
  • 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट से सबक लेते हुए सरकार ने बैंकों का आकार बढ़ाने का फैसला किया और RBI बैंकिंग क्षेत्र में विश्व की सर्वश्रेष्ठ प्रणाली का अनुसरण कर रहा है।

नरसिम्हन कमेटी की रिपोर्ट

  • सरकार काफी पहले से बैंकों का विलय करके बड़े बैंक बनाने पर विचार करती रही है। नरसिम्हन कमेटी (1991-1998) ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का विलय करने की सिफारिश की थी।
  • इसके बाद अल्‍टरनेटिव मैकेनिज्‍म के माध्‍यम से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के विलय को सैद्धांतिक रूप से मंज़ूरी दी गई।
  • इस निर्णय से राष्‍ट्रीयकृत बैंकों के विलय के फलस्‍वरूप सशक्‍त और प्रतिस्पर्द्धी बैंकों के निर्माण में मदद मिली।

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिये फ्रेमवर्क के अनुमोदन के मुख्‍य बिंदु निम्‍नानुसार हैं: 

  • बैंकों को मज़बूत और प्रतिस्पर्द्धी बनाने के संबंध में यह निर्णय मुख्‍य रूप से वाणिज्यिक दृष्टि को ध्‍यान में रखकर किया गया।
  • विलय प्रस्‍ताव बैंकों के बोर्डों की ओर से रखा जाना ज़रूरी होगा।
  • विलय की योजनाओं को तैयार करने के लिये बैंकों से प्राप्‍त प्रस्‍तावों के सैद्धांतिक अनुमोदन के लिये प्रस्‍तावों को अल्‍टरनेटिव मैकेनिज्‍म के समक्ष रखा जाएगा।
  • सैद्धांतिक मंज़ूरी मिलने के बाद बैंक कानून और सेबी की अपे‍क्षाओं के अनुसार कदम उठाएंगे।
  • केंद्र सरकार द्वारा भारतीय रिज़र्व बैंक के साथ परामर्श करके अंतिम योजना को अधिसूचित किया जाएगा।

बैंकों को दिये गए वृहद् अधिकार

यह बात महत्त्वपूर्ण है कि सरकार ने बैंकिंग सुधारों के लिये जो कदम उठाए हैं, उनसे भी सरकारी बैंकों की स्थिति सुधरने लगी है। पिछले वर्ष 22 नवंबर को केंद्र सरकार ने बैंकों के साथ धोखाधड़ी करके विदेश भागने जैसी घटनाओं को रोकने के लिये सार्वजनिक क्षेत्र के सभी बैंकों के अध्यक्षों, प्रबंध निदेशकों और मुख्य कार्याधिकारियों को अधिकार सम्पन्न बनाया है। इस अधिकार के बाद कर्ज़ चुकाने में जानबूझकर चूक करने वाले कर्ज़दारों के खिलाफ FIR दर्ज करने और उनके लिये लुकआउट नोटिस जारी करने का आग्रह अब बैंक के शीर्ष अधिकारी सीधे गृह मंत्रालय से कर सकेंगे। बैंक प्रमुखों के पास ऐसा अधिकार पहले नहीं था। अब इस संबंध में केंद्र सरकार के नए अहम कदम से बैंक के चूककर्त्ताओं के लिये देश से भागने की कोई गुंजाइश नहीं होगी।

  • हाल ही में वैश्विक रेटिंग एजेंसी मूडीज़ ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को वर्ष 2019 के बाद बहुत ज़्यादा बाहरी पूंजी की ज़रूरत नहीं होगी।
  • भारत सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में जो अतिरिक्त पूंजी डाल रही है, उससे बैंकों में फंसे कर्ज़ (NPA) की समस्या से निपटने में मदद मिलेगी।
  • आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि छोटे और कमज़ोर सरकारी बैंकों में पूंजी डालने का फैसला बैंकिंग सुधार की दिशा में बड़ा कदम है। इससे सरकारी बैंकों की वित्तीय हालत सुधरेगी और बैंक फिर से खड़े हो सकेंगे।
  • वर्तमान में सबसे बड़ी चुनौती बैंकिंग व्यवस्था को मज़बूत बनाने की ही है। इसके लिये सबसे बड़ी और पहली ज़रूरत NPA की समस्या का समाधान करना है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की कर्ज़ वसूली प्रणाली को बेहतर बनाए बिना यह काम कर पाना संभव नहीं है।

कम हो रहा है बैंकों का NPA

रिज़र्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास का भी कहना है कि लंबे समय तक दबाव में रहने के बाद अब बैंकिंग क्षेत्र की स्थिति सुधार के रास्ते पर है। बैंकों पर NPA का बोझ कम होने लगा है। सितंबर 2018 तक की अवधि में सकल NPA अनुपात में कमी आई है। पिछले तीन साल के दौरान इसमें यह पहली गिरावट है। यह बढ़ते दबाव के समक्ष बैंकों के मज़बूती से खड़े होने की क्षमता के तौर पर सकारात्मक संकेत है।

वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट 2019 के अनुसार, बैंकों का सकल NPA अनुपात सितंबर 2018 में घटकर 10.8% रह गया, जो मार्च 2018 में 11.5% पर पहुँच गया था। रिपोर्ट में यह अनुमान भी लगाया गया था कि मौजूदा परिदृश्य को देखते हुए सभी बैंकों का सकल NPA मार्च 2019 तक कम होकर 10.3% रह जाएगा।

कल्याणकारी जनहित योजनाओं के लिये मज़बूत बैंकों का होना ज़रूरी

  • सरकार की जनहित की योजनाएँ सरकारी बैंकों पर ही आधारित हैं, ऐसे में मज़बूत सरकारी बैंकों की ज़रूरत स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है।
  • देशभर में चल रही विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के लिये धन की व्यवस्था करने और उसे बाँटने की ज़िम्मेदारी सरकारी बैंकों की है।
  • मुद्रा लोन, शिक्षा के लिये कर्ज़ और किसान क्रेडिट कार्ड के ज़रिये बड़े पैमाने पर सरकारी कर्ज़ बाँट रहे है। चूँकि बीमा या सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ लेने के लिये बैंक खाता होना ज़रूरी है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्र में बैंकिंग सुविधाओं की भारी कमी है।

विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार 31 मार्च, 2018 तक जन-धन योजना के तहत 31.44 करोड़ खाते खुले थे। 2014 से 2017 के बीच दुनिया में 51 करोड़ बैंक खाते खुले। इसमें से 26 करोड़ खाते केवल भारत में जन-धन योजना के अंतर्गत खुले। भारत में इस अवधि में 26 हज़ार नई बैंक शाखाएँ भी खुलीं। ऐसे में भारत की नई बैंकिंग ज़िम्मेदारी बैंकों के निजीकरण से संभव नहीं है। यह ज़िम्मेदारी मज़बूत सरकारी बैंक ही निभा सकते हैं।

नए बैंकिंग युग की ज़रूरत हैं मेगा-बैंक

  • इसमें कोई दो राय नहीं कि सार्वजनिक क्षेत्र के छोटे और कमज़ोर बैंकों का एकीकरण नए बैंकिंग युग की ज़रूरत है।
  • इस समय जहाँ देश के बैंकिंग क्षेत्र में मेगा-बैंकों की ज़रूरत है वहीं यह भी ज़रूरी है कि सरकार बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के कार्य पर निगरानी के साथ नियंत्रण भी रखे।
  • बैंकों को दी गई भारी-भरकम नई पूंजी के आवंटन की उपयोगिता और प्रासंगिकता इस बात पर निर्भर करेगी कि बैंक इसका इस्तेमाल कितने प्रभावी ढंग से करेंगे और NPA से कैसे निपटेंगे।
  • बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के साथ-साथ बड़े और मज़बूत सरकारी बैंकों को आकार देने की रणनीति भी लाभप्रद होगी। ऐसा होने पर ही बैंकों में नए निवेश से सभी प्रकार के छोटे-बड़े उद्योग लाभान्वित होंगे और बैंक अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्द्धा में टिक सकेंगे।
  • सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के कमज़ोर और मज़बूत बैंकों के एकीकरण की प्रक्रिया को जारी रखेगी। इससे देश के सरकारी बैंकों द्वारा नई तकनीकी क्षमताओं के साथ खर्च में कमी की जाएगी।

बड़े बैंक अल्प व दीर्घकालिक तरलता का प्रबंधन भी कुशलतापूर्वक कर सकते हैं और अस्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा पर लगाम लगा सकते हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि आर्थिक सुधारों की असली कुंजी मज़बूत बैंकिंग क्षेत्र ही है। देश की तेज़ी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था को देखते हुए अब समय आ गया है कि देश में बड़े और प्रभावी बैंक हों।

अभ्यास प्रश्न: “तेज़ी से विकास कर रही भारतीय अर्थव्यवस्था के लिये मज़बूत यानी बड़े मेगा-बैंकों का होना ज़रूरी है।” कथन का परीक्षण कीजिये। साथ ही यह भी बताइये कि क्या बैंकों के विलय से NPA को काबू में लाया जा सकता है?