हॉन्गकॉन्ग संकट | 23 Aug 2019

इस Editorial में ‘The Hindu’, ‘The Indian Express’, ‘Business Line’ में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस आलेख में हॉन्गकॉन्ग संकट तथा इसके संदर्भ में चीन की नीति एवं भारत के पक्ष की चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ

चीन को फिर एक बार विरोध प्रदर्शन का सामना करना पड़ रहा है। हॉन्गकॉन्ग में पिछले दो माह से बड़ी संख्या में लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। इस विरोध का प्रमुख कारण हॉन्गकॉन्ग के प्रत्यर्पण कानून में लाए जा रहे बदलाव हैं। हॉन्गकॉन्ग एक स्वायत्त क्षेत्र है तथा इसकी शासन व्यवस्था चीन से भिन्न है। हॉन्गकॉन्ग के लोगों का मानना है कि इस प्रकार के बदलाव हॉन्गकॉन्ग की स्वायत्तता एवं ‘एक देश दो व्यवस्था’ के सिद्धांत को खतरे में डाल सकते हैं।

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हॉन्गकॉन्ग संकट का कारण

यह विवाद प्रत्यर्पण कानून में लाए गए बदलाव को लेकर उत्पन्न हुआ। प्रस्तावित विधेयक के माध्यम से हॉन्गकॉन्ग से लोगों का प्रत्यर्पण चीन को किया जा सकेगा। हॉन्गकॉन्ग विश्व में आर्थिक गतिविधियों का केंद्र है तथा विश्व के विभिन्न देशों के आर्थिक हित हॉन्गकॉन्ग से जुड़े हुए हैं। यदि कोई व्यक्ति अथवा संस्था व्यवसाय से संबंधित विवाद में दोषी पाए जाते हैं तो इनका प्रत्यर्पण चीन में किया जा सकता है। जबकि अभी तक हॉन्गकॉन्ग ब्रिटिशकालीन कॉमन लॉ सिस्टम से काम कर रहा है और उसकी 1997 से पहले अमेरिका, ब्रिटेन, सिंगापुर के साथ ही प्रत्यर्पण संधि थी। इस प्रत्यर्पण विधेयक से हॉन्गकॉन्ग के लोगों में यह भय पनपने लगा है कि चीन इस कानून के ज़रिये किसी भी ऐसे लोगों को, जो हॉन्गकॉन्ग के राजनीतिक आंदोलन से जुड़े हैं, नियंत्रित कर लेगा। इससे हॉन्गकॉन्ग वासियों के राजनीतिक अधिकार समाप्त हो जाएँगे।

हॉन्गकॉन्ग की पृष्ठभूमि

हॉन्गकॉन्ग लगभग एक शताब्दी तक ब्रिटेन का उपनिवेश रहा था जिसे एक लंबी वार्ता के द्वारा वर्ष 1997 में चीन को सौंप दिया गया। इसके साथ ही एक देश दो व्यवस्था (One Nation Two System) की अवधारणा भी सामने आई। इस व्यवस्था के अनुसार हॉन्गकॉन्ग को विशेष दर्जा दिया गया अर्थात् हॉन्गकॉन्ग की शासन व्यवस्था चीन के मुख्य क्षेत्र से अलग होनी थी। चीन को रक्षा एवं विदेश संबंधी मामलों में अधिकार दिया गया जबकि अन्य मामले हॉन्गकॉन्ग को दिये गए तथा यह तय किया गया कि वर्ष 2047 में अर्थात् चीन को हॉन्गकॉन्ग सौंपे जाने के 50 वर्ष पश्चात् इस व्यवस्था को पुनरीक्षित किया जाएगा।

चीन एकदलीय व्यवस्था वाला देश है जिसमें हाल ही में एक बदलाव किया गया है। इस बदलाव के अनुसार चीन का राष्ट्रपति जीवनपर्यंत इस पद पर रहेगा। जबकि हॉन्गकॉन्ग का पिछली एक शताब्दी का इतिहास चीन से पृथक रहा है। ब्रिटेन का उपनिवेश होने के कारण हॉन्गकॉन्ग में लोकतांत्रिक विचारों का आगमन हुआ तथा हॉन्गकॉन्ग की संस्कृति एवं पश्चिमी संस्कृति ने मिलकर कुछ नए विचारों को जन्म दिया, जो चीन से बहुत अलग हैं। हॉन्गकॉन्ग पर चीन के आधिपत्य के अभी 20 वर्ष ही पूर्ण हुए हैं और चीन एक देश दो व्यवस्था के विचार को मिटा देना चाहता है। यद्यपि चीन के मुकाबले अब हॉन्गकॉन्ग का आर्थिक महत्त्व सीमित हो गया है लेकिन 1997 में हॉन्गकॉन्ग जैसे छोटे से प्रांत की GDP चीन की GDP की 27 प्रतिशत थी जो अब घटकर 3 प्रतिशत के करीब ही रह गई है। चीन के मौजूदा राष्ट्रपति का विस्तारवादी रवैया ‘एक देश दो व्यवस्था’ को नकार रहा है तथा हॉन्गकॉन्ग के चीन में पूर्ण विलय के लिये किसी भी सीमा तक जाने के लिये तैयार है।

अंब्रेला मूवमेंट

हॉन्गकॉन्ग पर चीन के नियंत्रण के बाद से अब तक कई बार चीन को विरोध प्रदर्शन का सामना करना पड़ा है। वर्ष 2009 में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून को लेकर विरोध हुआ परिणामस्वरूप यह कानून वापस ले लिया गया। वर्ष 2014 में भी हॉन्गकॉन्ग में बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन किया गया। इस विरोध को ‘अंब्रेला मूवमेंट’ की संज्ञा दी जाती है। हॉन्गकॉन्ग की जनता को यह भरोसा दिलाया गया था कि वर्ष 2017 से हॉन्गकॉन्ग के नागरिक अपने मुख्य कार्यकारी का निर्वाचन स्वयं कर सकेंगे किंतु चीन ने सिर्फ उन्हीं लोगों को इस पद के लिये चुनाव लड़ने की अनुमति दी जिन्हें चीन की साम्यवादी पार्टी का समर्थन हासिल हो। इससे हॉन्गकॉन्ग के लोगों को अत्यधिक निराशा हुई। इसके परिणामस्वरूप लाखों लोगों ने 2 महीने से भी अधिक समय तक विरोध प्रदर्शन किया। पुलिस कार्रवाई से बचने के लिये लोगों ने छाते (‘अंब्रेला) का उपयोग किया इसी कारण इसको ‘अंब्रेला मूवमेंट’ के नाम से पुकारा जाता है।

प्रदर्शनकारियों की मांग

प्रत्यर्पण विधेयक के विरोध के पश्चात् इस विधेयक को निलंबित कर दिया गया था लेकिन प्रदर्शनकारियों की मांग है कि इस विधेयक को पूर्णतः समाप्त घोषित किया जाए। इसके अतिरिक्त हॉन्गकॉन्ग की मौजूदा मुख्य कार्यकारी कैरी लैम की बर्खास्तगी तथा उन सभी प्रदर्शनकारियों की रिहाई की मांग की जा रही है जिन्हें विरोध प्रदर्शन के दौरान गिरफ्तार किया गया है।

उपर्युक्त मांगों के अतिरिक्त हॉन्गकॉन्ग के लोग चीन के प्रति सशंकित दृष्टिकोण रखते हैं तथा ऐसा मानते हैं कि चीन विभिन्न माध्यमों के ज़रिये हॉन्गकॉन्ग की विशेष स्थिति को समाप्त करना चाहता है। हॉन्गकॉन्ग के लोग लंबे समय तक ब्रिटेन के उपनिवेश होने के कारण लोकतांत्रिक विचारों तथा पश्चिमी सभ्यता के करीब रहे हैं, साथ ही ये स्वयं भी अपनी संस्कृति तथा विशिष्ट पहचान को संरक्षित रखना चाहते हैं। लोगों का मानना है कि चीन धीरे-धीरे अपने प्रभाव के ज़रिये हॉन्गकॉन्ग की विशिष्ट पहचान को समाप्त करना चाहता है इसलिये लोग विरोध प्रदर्शन द्वारा चीन की हठधर्मिता के विरोध में उतर आते हैं।

चीन की स्थिति

मौजूदा समय में चीन आर्थिक मोर्चे पर गंभीर समस्या का सामना कर रहा है। अमेरिका ने चीन के साथ व्यापार युद्ध छेड़ दिया है। इसके जवाब में चीन ने भी अमेरिकी सामानों पर शुल्क में वृद्धि कर दी है। ध्यान देने योग्य है कि चीन की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से निर्यात पर निर्भर करती है परिणामतः चीन की अर्थव्यवस्था पिछले 27 वर्षों के न्यूनतम वृद्धि दर पर पहुँच चुकी है। आर्थिक क्षेत्र के अतिरिक्त हॉन्गकॉन्ग में हो रहे विरोध प्रदर्शन ने भी चीन के समक्ष चुनौती प्रस्तुत की है। इस विरोध प्रदर्शन को विभिन्न पश्चिमी देशों, यथा- अमेरिका, ब्रिटेन आदि तथा जापान का भी समर्थन प्राप्त है। चीन ने भी प्रदर्शनकारियों को चेतावनी दी है कि यदि विरोध प्रदर्शन को नहीं रोका गया तो वह सैनिक कार्रवाई को भी अपने विकल्पों में शामिल कर सकता है। चीन के ऊपर वर्ष 1989 के थ्यानमन आंदोलन के नृशंस दमन का कलंक है जिसको लेकर विश्व में चीन की आलोचना होती रही है लेकिन 1989 की घटना चीन की सैनिक कार्रवाई की चेतावनी को मजबूत आधार प्रदान करती है, साथ ही हॉन्गकॉन्ग के लोगों के मन में भय भी उत्पन्न करती हैं। यह भय हॉन्गकॉन्ग में तेज़ी से बढ़ रही सैन्य बलों की संख्या से और भी तीव्र हुआ है। हालाँकि चीन पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का दबाव है तथा उसकी आर्थिक स्थिति भी कमज़ोर हुई है, ऐसे में सैनिक कार्रवाई चीन के लिये अन्य समस्याएँ उत्पन्न कर सकती हैं।

हॉन्गकॉन्ग में पहले भी कई विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं। ये विरोध प्रदर्शन वर्ष 2003, 2009, 2014 में हुए हैं। कुछ भू-सामरिक विश्लेषक इन प्रदर्शनों को विरोधों की पंच वर्षीय योजना की संज्ञा भी देते हैं। अतः चीन के लिये ये विरोध प्रदर्शन नए नहीं हैं, साथ ही विरोध की अवधि जितनी अधिक होगी, हॉन्गकॉन्ग का आर्थिक नुकसान भी उतना ही अधिक होगा। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि हॉन्गकॉन्ग के शेयर बाज़ार को पिछले दो माह में 500 बिलियन डॉलर की हानि हुई है। ऐसे में हॉन्गकॉन्ग के विरोध प्रदर्शन लंबी अवधि तक नहीं चल सकते क्योंकि इनका आर्थिक मूल्य अत्यधिक है।

थ्यानमन आंदोलन एवं दमन

अप्रैल 1989 में 10 लाख से अधिक प्रदर्शनकारी राजनीतिक आज़ादी की मांग को लेकर थ्यानमन चौक पर इकट्ठा हुए थे। चीन के वामपंथी शासन के इतिहास में इसे सबसे बड़ा राजनीतिक प्रदर्शन कहा जाता है जो डेढ़ महीने तक चला। यह प्रदर्शन कई शहरों और विश्वविद्यालयों तक फैल गया था। प्रदर्शनकारी तानाशाही समाप्त करने और स्वतंत्रता तथा लोकतंत्र की मांग कर रहे थे। इसके अलावा बढ़ती महँगाई, कम वेतन आदि को लेकर भी लोगों में रोष व्याप्त था। 30 वर्ष पहले चीन में आर्थिक बदलाव के बाद राजनीतिक बदलाव की मांग को लेकर वर्ष 1989 में छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किया था। चीन में लोकतंत्र समर्थक छात्रों के नेतृत्व में किये गए विरोध प्रदर्शनों का मुख्य केंद्र थ्यानमन चौक ही था। छात्रों के नेतृत्व में हुए इस प्रदर्शन में चीन के लगभग 400 शहरों-कस्बों के लोग शामिल हुए थे, जो कम्युनिस्ट नेताओं से इस्तीफा चाहते थे। साथ ही देश में लोकतंत्र की स्थापना, सामाजिक समानता, प्रेस और बोलने की आज़ादी दिलाना भी इस प्रदर्शन के उद्देश्यों में शामिल था। इस दौरान अनगिनत प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई थी तथा 10 हज़ार को गिरफ्तार भी किया गया था।

भारत तथा चीन

भारत का रुख चीन की हॉन्गकॉन्ग नीति के लिये उदासीन रहा है। भारत ने कभी भी प्रदर्शनकारियों का समर्थन नहीं किया है जबकि अन्य देश खुलकर हॉन्गकॉन्ग के लोगों का समर्थन करते रहे हैं। चीन के साथ भारत पहले से उपस्थित मतभेदों को बढ़ाना नहीं चाहता है किंतु चीन का रुख कश्मीर जैसे विभिन्न मुद्दों पर भारत विरोधी ही रहा है तथा वह हमेशा पाकिस्तान के समर्थन में खड़ा रहा है। एक ओर चीन कश्मीर मुद्दे का अंतर्राष्ट्रीयकरण करना चाहता है वहीं स्वयं उईगर तथा हॉन्गकॉन्ग के मामले में अमानवीय रुख अख्तियार करता है। भारत को भी चीन के रुख के अनुसार ही अपनी नीति का निर्माण करना चाहिये। यदि चीन कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के साथ खड़ा होता है तो भारत को भी हॉन्गकॉन्ग का खुलकर समर्थन करना चाहिये।

निष्कर्ष

हॉन्गकॉन्ग संकट सिर्फ चीन तक ही सीमित नहीं है। भारत के हित भी हॉन्गकॉन्ग में निहित हैं। भारत का डायस्पोरा हॉन्गकॉन्ग में आर्थिक रूप से महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। यदि हॉन्गकॉन्ग संकट में वृद्धि होती है अथवा चीन प्रदर्शनकारियों का बलपूर्वक दमन करता है तो भारत के हितों को भी क्षति पहुँच सकती है। इसके अतिरिक्त हॉन्गकॉन्ग मुद्दा भारत के लिये चीन से कश्मीर मुद्दे को संतुलित करने का भी एक ज़रिया बन सकता है।

प्रश्न: हॉन्गकॉन्ग के चीन को सौंपे जाने से अब तक कई बार हॉन्गकॉन्ग को कई विरोध प्रदर्शनों का सामना करना पड़ा है। हॉन्गकॉन्ग में होने वाले विरोध प्रदर्शनों का क्या कारण है, साथ ही हॉन्गकॉन्ग संकट के संदर्भ में चीन की नीति का विश्लेषण कीजिये?