राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग: भूमिका व प्रभावकारिता | 21 Mar 2020

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की भूमिका व प्रभावकारिता पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ 

मानव के विकास के लिये कुछ अधिकार समान रूप से सभी को उपलब्ध होने चाहियेलेकिन दुनिया में कई ऐसे लोग हैं जो इन अधिकारों अर्थात मानवाधिकारों से वंचित हैं। हम अक्सर यह सुनते आए हैं कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में लोगों के मानवाधिकारों का हनन होता रहता है। इसका एक प्रत्यक्ष उदाहरण द्वितीय विश्वयुद्ध है। विश्वयुद्ध के दौरान जहाँ व्यापक जन-धन की हानि हुई वहीँ मानवाधिकारों का भी व्यापक उल्लंघन हुआ। लाखों लोग शरणार्थी जीवन जीने के लिये विवश हो गए। सभ्य समाज का हिस्सा होने के नाते प्रत्येक व्यक्ति के मानवाधिकारों का संरक्षण बेहद ज़रूरी है।

इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिये 10 दिसंबर, 1948 को संयुक्त राष्ट्र संघ ने मानवाधिकारों पर सार्वभौम घोषणापत्र जारी किया। 16 दिसंबर, 1966 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने ‘नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय समझौता’ तथा ‘आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय समझौते’ का प्रारूप प्रस्तुत किया जिस पर भारत भी एक हस्ताक्षरकर्त्ता देश हैइस आलेख में मानव अधिकार अधिनियम की विशेषताएँ, राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की संरचना, उद्देश्य, कार्य, शक्तियों और आवश्यक सुधारों पर चर्चा की जाएगी

मानव अधिकार क्या है?

  • संयुक्त राष्ट्र की परिभाषा के अनुसार, ये अधिकार जाति, लिंग, राष्ट्रीयता, भाषा, धर्म या किसी अन्य आधार पर भेदभाव किये बिना सभी को प्राप्त हैं।
  • मानवाधिकारों में मुख्यतः जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार, गुलामी और यातना से मुक्ति का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार और काम एवं शिक्षा का अधिकार, आदि शामिल हैं।
  • कोई भी व्यक्ति बिना किसी भेदभाव के इन अधिकारों को प्राप्त करने का हक़दार होता है।
  • मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के प्रावधानों के तहत 12 अक्टूबर, 1993 को राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (National Human Rights Commission-NHRC) की स्थापना की गई।

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की संरचना 

  • NHRC एक बहु-सदस्यीय संस्था है। इसके अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति, जिसमें प्रधानमंत्री सहित लोकसभा अध्यक्ष, राज्यसभा का उप-सभापति, संसद के दोनों सदनों के मुख्य विपक्षी नेता तथा केंद्रीय गृहमंत्री शामिल होते हैं, की सिफारिशों के आधार पर की जाती है।  
  • राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल 3 वर्ष या 70 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो) तक निर्धारित है। इसके अतिरिक्त ये पुनर्नियुक्ति के भी पात्र होंगे।
  • राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष पद पर उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के साथ-साथ उच्चतम न्यायालय के अन्य न्यायाधीश भी नियुक्त किये जा सकते हैं।
  • एक सदस्य उच्चतम न्यायालय में कार्यरत अथवा सेवानिवृत्त न्यायाधीश, एक सदस्य उच्च न्यायालय का कार्यरत या सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश होना चाहिये।

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ 

  • भारतीय लोकतंत्र तीन स्तंभों के मध्य शक्ति के पृथक्करण सिद्धांत पर आधारित है
  • ये तीन स्तंभ विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका हैं इनमें प्रत्येक स्तंभ एक-दूसरे के साथ ‘चेक एंड बैलेंस’ के सिद्धांत के रूप में कार्य करते हैं।
  • हालाँकि, वर्तमान में शासन और प्रशासन की जटिलताओं के कारण स्वतंत्र निकायों की आवश्यकता है, जो निरीक्षण जैसे महत्त्वपूर्ण कार्यों के लिये विशेषज्ञता प्राप्त हैं।
  • इन स्वतंत्र निकायों को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है।
  • प्रायः मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, परंतु राष्ट्र-राज्य की आधुनिक अवधारणा में संवैधानिक और वैधानिक (निर्वाचन आयोग, नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक, केंद्रीय व राज्य सूचना आयोग, केंद्रीय व राज्य मानव अधिकार आयोग) निकायों को भी लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाने लगा है। 
  • तीन अन्य व्यक्तियों को मानवाधिकारों से संबंधित जानकारी अथवा कार्यानुभव होना चाहिये। इसमें कम-से-कम एक महिला सदस्य का होना आवश्यक है।
  • इन पूर्णकालिक सदस्यों के अतिरिक्त आयोग में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC), राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST), राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग, राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW), राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC), राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अध्यक्ष तथा दिव्यांग व्यक्तियों के कार्यालय के मुख्य आयुक्त को भी NHRC का सदस्य नियुक्त किया गया है।

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के कार्य और शक्तियाँ

  • मानवाधिकारों के उल्लंघन से संबंधित कोई मामला यदि NHRC के संज्ञान में आता है या शिकायत के माध्यम से लाया जाता है तो NHRC को उसकी जाँच करने का अधिकार है।
  • इसके पास मानवाधिकारों के उल्लंघन से संबंधित सभी न्यायिक मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार है।
  • आयोग किसी भी जेल का दौरा कर सकता है और जेल के बंदियों की स्थिति का निरीक्षण एवं उसमें सुधार के लिये सुझाव दे सकता है।
  • NHRC संविधान या किसी अन्य कानून द्वारा मानवाधिकारों के संरक्षण हेतु प्रदान किये गए रक्षोपायों की समीक्षा कर सकता है और उनमें बदलावों की सिफारिश भी कर सकता है।
  • NHRC मानव अधिकार के क्षेत्र में अनुसंधान का कार्य भी करता है।
  • आयोग प्रकाशनों, मीडिया, सेमिनारों और अन्य माध्यमों से समाज के विभिन्न वर्गों के बीच  मानवाधिकारों से जुड़ी जानकारी का प्रचार करता है और लोगों को इन अधिकारों की सुरक्षा के लिये प्राप्त उपायों के प्रति भी जागरूक करता है।
  • आयोग के पास दीवानी अदालत की शक्तियाँ हैं और यह अंतरिम राहत भी प्रदान कर सकता है।
  • इसके पास मुआवज़े या हर्जाने के भुगतान की सिफ़ारिश करने का भी अधिकार है।
  • NHRC की विश्वसनीयता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसके पास हर साल बहुत बड़ी संख्या में शिकायतें दर्ज़ होती हैं।
  • यह राज्य तथा केंद्र सरकारों को मानवाधिकारों के उल्लंघन को रोकने के लिये महत्त्वपूर्ण कदम उठाने की सिफ़ारिश भी कर सकता है। 
  • आयोग अपनी रिपोर्ट भारत के राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत करता है जिसे संसद के दोनों सदनों में रखा जाता है।

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की सीमाएँ

  • NHRC के पास जाँच करने के लिये कोई भी विशेष तंत्र नहीं है। अधिकतर मामलों में यह संबंधित सरकार को मामले की जाँच करने का आदेश देता है
  • NHRC के पास किसी भी मामले के संबंध में मात्र सिफारिश करने का ही अधिकार है, वह किसी को निर्णय लागू करने के लिये बाध्य नहीं कर सकता।
  • NHRC उन शिकायतों की जाँच नहीं कर सकता जो घटना होने के एक साल बाद दर्ज कराई जाती हैं और इसलिये कई शिकायतें बिना जाँच के ही रह जाती हैं।
  • अक्सर सरकार या तो NHRC की सिफारिशों को पूरी तरह से खारिज कर देती है या उन्हें आंशिक रूप से ही लागू किया जाता है।
  • राज्य मानव अधिकार आयोग केंद्र सरकार से किसी भी प्रकार की सूचना नहीं मांग सकते, जिसका सीधा सा अर्थ यह है कि उन्हें  केंद्र के तहत आने वाले सशस्त्र बलों की जाँच करने से रोका जाता है।
  • आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति वाली चयन समिति में राजनीतिक पृष्ठभूमि के लोगों का प्रतिनिधित्व होता है, जिससे हितों का टकराव होने की आशंका होती है। इसके अतिरिक्त नियुक्ति के मापदंडों का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है।

प्रमुख सुझाव

  • NHRC को सही मायनों में मानवाधिकारों के उल्लंघन का एक कुशल प्रहरी बनाने के लिये उसमें कई सुधार किये जाने की आवश्यकता है। सरकार द्वारा आयोग के निर्णयों को पूरी तरह से लागू करके उसकी प्रभावशीलता में वृद्धि की जा सकती है।
  • NHRC की संरचना में भी परिवर्तन करने की आवश्यकता है तथा इसमें आम नागरिकों और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाना चाहिये।
  • आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति वाली चयन समिति में राजनीतिक पृष्ठभूमि के लोगों के अतिरिक्त सिविल सोसायटी के सदस्य भी शामिल किये जाने चाहिये, ताकि आयोग पर किसी भी प्रकार का राजनीतिक दबाव न डाला जा सके। 
  • NHRC को जाँच के लिये उचित अनुभव वाले कर्मचारियों का एक नया काडर तैयार कर प्रदान किया जाना चाहिये ताकि सभी मामलों की स्वतंत्र जाँच की जा सके।
  • मानव अधिकार आयोग किसी भी मानवाधिकारों के उल्लंघन की जांच नहीं कर सकता है, अगर शिकायत घटना के एक वर्ष बाद की गई हो। इस तरह का प्रावधानों को निरसित कर देना चाहिये
  • सरकार द्वारा मानव अधिकार आयोग को सशस्त्र बलों के खिलाफ मानव अधिकार के उल्लंघन की स्थिति में जाँच करने की शक्ति प्रदान करनी चाहिये
  • सरकार द्वारा आयोग के निर्णयों को पूरी तरह से लागू करके उसकी प्रभावकारिता में वृद्धि की जा सकती है।   
  • भारत में मानव अधिकार की स्थिति को सुधारने और मज़बूत करने के लिये राज्य अभिकर्त्ताओं और गैर-राज्य अभिकर्त्ताओं (State & Non-state Actors) को एक साथ मिलकर काम करना होगा।  

निष्कर्ष: 21वीं सदी मानवाधिकारों की सदी है। किसी भी व्यक्ति, सरकार या प्राधिकरण को इन अधिकारों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने या इन्हें सीमित करने का कोई अधिकार नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति जाति, पंथ, नस्ल, लिंग, संस्कृति, सामाजिक और आर्थिक स्थिति की भिन्नता के बावजूद इन अधिकारों को समान रूप से प्राप्त करता है। मानवाधिकारों और इनके उल्लंघन से जुड़े मुद्दों के प्रति पूरी गंभीरता प्रदर्शित करते हुए भारत में भी इसके संरक्षण के लिए प्रभावशाली कदम सतत रूप से उठाए जाते रहने चाहिये और राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग को अधिक सशक्त बनाना ऐसे उपायों की श्रृंखला में एक महत्त्वपूर्ण चरण होगा

प्रश्न- मानव अधिकार से आप क्या समझते हैं? भारत में मानवाधिकारों के संरक्षण में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की भूमिका का मूल्यांकन कीजिये।