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अफगान नीति में परिवर्तन की आवश्यकता | 18 May 2020 | अंतर्राष्ट्रीय संबंध

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में अफगान नीति में परिवर्तन की आवश्यकता व उससे संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ

हाल ही में अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी और उनके प्रतिद्वंदी अब्दुल्ला अब्दुल्ला के बीच घोषित शक्ति-साझाकरण समझौते (Power-Sharing Deal) का भारत ने स्वागत किया है जो कि पिछले वर्ष हुए विवादित राष्ट्रपति पद के चुनाव से उत्पन्न राजनीतिक कलह का अंत माना जा रहा है। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि भारत को उम्मीद है कि सुलह के माध्यम से राजनीतिक समझौते और परिषद के गठन से स्थायी शांति और स्थिरता स्थापित करने के लिये नए सिरे से प्रयास किये जाएँगे और अफगानिस्तान में गैर राज्य अभिकर्त्ताओं द्वारा प्रायोजित आतंकवाद और हिंसा पर लगाम लगेगी। दो दशक से युद्ध और हिंसा से जूझ रहे अफगानिस्तान में शांति की उम्मीद जगी है। शक्ति-साझाकरण समझौते से लोग खुश हैं और उन्हें देश में अमन लौटने की आशा है।    

यदि बात भारत और अफगानिस्तान संबंधों की करें तो समय के साथ यह बेहद मज़बूत और मधुर होते जा रहे हैं। अफगानिस्तान जितना अपने तात्कालिक पड़ोसी पाकिस्तान के निकट नहीं है, उससे कहीं अधिक निकटता उसकी भारत के साथ है। भारत अफगानिस्तान में अरबों डॉलर लागत वाली कई बड़ी परियोजनाओं को पूरा कर चुका है और कुछ पर अभी भी काम चल रहा है। 

इस आलेख में शक्ति-साझाकरण समझौते, शक्ति-साझाकरण समझौते का अमेरिका-तालिबान समझौते पर प्रभाव, तालिबान को लेकर भारत की स्थिति, भारत की अफगान नीति में बदलाव की आवश्यकता पर विमर्श किया जाएगा। 

अफगानिस्तान में संघर्ष की पृष्ठभूमि

अफगानिस्तान में अमेरिका का प्रवेश 

 शक्ति-साझाकरण समझौते के प्रमुख बिंदु

अमेरिका के लिये क्यों जरूरी है यह समझौता?

भारत की अफगान नीति में बदलाव क्यों? 

भारत के लिये अफगानिस्तान का महत्त्व

आगे की राह

प्रश्न- ‘बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत को अफगानिस्तान के प्रति अपनी नीति में बदलाव करने की आवश्यकता है।’ इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं तर्क सहित विवेचना कीजिये?