शासन व्यवस्था
उच्च शिक्षा में विस्तार से उत्कृष्टता की ओर संक्रमण
- 27 Apr 2026
- 181 min read
यह एडिटोरियल 27/04/2026 को द हिंदू में प्रकाशित ‘Information asymmetry in higher education’ शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख इस तथ्य को रेखांकित करता है कि भारत में उच्च शिक्षा के तीव्र विस्तार ने पारदर्शिता को पीछे छोड़ दिया है, जिसके परिणामस्वरूप विद्यार्थी सीमित एवं प्रायः अविश्वसनीय सूचनाओं पर निर्भर हो गए हैं।
प्रिलिम्स के लिये: गिफ्ट सिटी (गुजरात), राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF), स्वयं, एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट्स
मेन्स के लिये: भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था को आकार देने वाले प्रमुख घटनाक्रम, भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था से जुड़े प्रमुख मुद्दे।
भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था में अभूतपूर्व विस्तार हुआ है, किंतु पारदर्शिता की तुलना में इसका विकास अपेक्षाकृत सीमित रहा है। विद्यार्थी, अपने जीवन के महत्त्वपूर्ण निर्णय प्रायः केवल ब्रोशर, रैंकिंग तथा सुनी-सुनाई सूचनाओं के आधार पर लेते हैं, जबकि संस्थानों के पास सूचना का केंद्रीकृत नियंत्रण बना रहता है। यह परंपरागत सूचना विषमता (information asymmetry) निम्न-स्तरीय संस्थानों को स्वयं को उच्च-गुणवत्ता वाले संस्थानों के रूप में प्रस्तुत करने की अनुमति देती है, जिससे संपूर्ण शैक्षणिक बाज़ार विकृत हो जाता है। यद्यपि NIRF जैसे उपकरण इस अंतर को कम करने का प्रयास करते हैं, फिर भी सत्यापित, तुलनीय एवं सुलभ डेटा अभी भी विकासशील अवस्था में है। अंततः मुख्य प्रश्न यह है कि क्या भारत ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित कर सकता है, जहाँ गुणवत्ता को केवल आकर्षक प्रस्तुति के माध्यम से नहीं, बल्कि वास्तविक रूप से प्रोत्साहित किया जाए।
भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था को आकार देने वाले प्रमुख घटनाक्रम क्या हैं?
- संस्थागत अंतर्राष्ट्रीयकरण का व्यापक स्तर: भारत शीर्ष-स्तरीय विदेशी विश्वविद्यालयों को स्थानीय परिसरों की स्थापना हेतु आमंत्रित कर, एक विद्यार्थी-निर्यातक देश से एक वैश्विक शिक्षा गंतव्य बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
- यह ‘घर पर अंतर्राष्ट्रीयकरण (Internationalization at Home)’ मॉडल पूंजी पलायन को कम करता है तथा भारतीय विद्यार्थियों को अपने ही देश में वैश्विक स्तर की शिक्षण गुणवत्ता तक सुलभ पहुँच प्रदान करता है।
- वर्ष 2025 में गिफ्ट सिटी (गुजरात) एक कार्यात्मक केंद्र बन गया, जहाँ ऑस्ट्रेलिया के डीकिन और वोलोंगोंग विश्वविद्यालयों ने अपना संचालन शुरू कर दिया।
- साथ ही IIT बॉम्बे जापान के तोहोकू (Tohoku) विश्वविद्यालय के साथ साझेदारी में अपना पहला द्वैध डिग्री कार्यक्रम प्रारंभ करने जा रहा है, जो भारतीय संस्थागत उत्कृष्टता के ‘रिवर्स फ्लो’ को दर्शाता है।
- मौलिक अंतःविषयक प्रवाह: अकादमिक विभाजनों (academic silos) के समाप्त होने से विद्यार्थियों को पारंपरिक रूप से पृथक क्षेत्रों, जैसे मानविकी एवं STEM को संयोजित करते हुए व्यक्तिगत अध्ययन पथ निर्मित करने की स्वतंत्रता मिलती है।
- यह प्रक्रिया ‘संज्ञानात्मक अनुकूलनशीलता (cognitive flexibility)’ को प्रोत्साहित करती है, जिससे स्नातक विद्यार्थी जटिल वास्तविक जीवन की समस्याओं का समाधान तकनीकी दक्षता एवं सामाजिक संवेदनशीलता दोनों के साथ कर पाते हैं।
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अंतर्गत अब तक 1 करोड़ से अधिक विद्यार्थियों ने एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट्स में पंजीकरण कराया है, जो ‘मल्टीपल एंट्री एंड एग्जिट’ प्रणाली को सशक्त बनाता है।
- ‘स्किल-फर्स्ट’ क्रांति: व्यावसायिक प्रशिक्षण को मुख्यधारा की डिग्रियों के साथ एकीकृत कर दीर्घकालिक रोज़गार-योग्यता अंतर (employability gap) को समाप्त करने का प्रयास किया जा रहा है, जहाँ औद्योगिक अनुभव को वैकल्पिक नहीं बल्कि अनिवार्य शैक्षणिक घटक के रूप में मान्यता दी जा रही है।
- इस प्रक्रिया में डिजिटल अवसंरचना आधारभूत भूमिका निभाती है, जिससे उच्च गुणवत्ता वाले, उद्योग-संबद्ध प्रमाण-पत्र दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों तक भी पहुँच पा रहे हैं।
- उदाहरणार्थ, सिक्किम स्थित मेधावी स्किल्स यूनिवर्सिटी, जिसे सिक्किम अधिनियम 2021 के अंतर्गत स्थापित किया गया तथा वर्ष 2022 में UGC द्वारा मान्यता प्राप्त हुई, भारत का प्रथम कौशल-आधारित विश्वविद्यालय है, जो NEP 2020 को उद्योग-नेतृत्व वाले प्रारूप में एकीकृत करता है।
- सहयोगात्मक अनुसंधान पारितंत्र में तीव्र वृद्धि : सरकारी समर्थित ढाँचे अब ‘प्रकाशन’ से आगे बढ़कर ‘पेटेंट’ पर केंद्रित हो रहे हैं, जिसके अंतर्गत उद्योग–शैक्षणिक संस्थानों के गहन अनुसंधान क्लस्टर अनिवार्य किये जा रहे हैं।
- यह परिवर्तन विश्वविद्यालयों को नवाचार इनक्यूबेटर में परिवर्तित कर रहा है, जो भारत के उच्च-प्रौद्योगिकी विनिर्माण केंद्र एवं हरित ऊर्जा नेतृत्व के लक्ष्य में प्रत्यक्ष योगदान दे रहा है।
- उदाहरण के लिये, भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री के अनुसार, वित्त वर्ष 2025 में भारत में पेटेंट आवेदन 1.43 लाख से अधिक हो गए, जो नवाचार गतिविधियों में उल्लेखनीय वृद्धि को दर्शाता है, जिनमें से 69% से अधिक आवेदन घरेलू आवेदकों द्वारा किये गए।
- ANRF अब क्रियाशील है, जो इलेक्ट्रिक मोबिलिटी एवं मेडिकल टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में मिशन-उन्मुख वित्तीय सहायता प्रदान कर रहा है।
- ग्रामीण पहुँच के माध्यम से लोकतांत्रिक विस्तार: उच्च शिक्षा संस्थानों का विस्तार टियर-2 एवं टियर-3 शहरों में होने से सकल नामांकन अनुपात (GER) को वर्ष 2035 तक 50% के लक्ष्य की ओर अग्रसर किया जा रहा है।
- स्थानीय अवसंरचना एवं क्षेत्रीय भाषाओं में शिक्षण के माध्यम से यह प्रणाली अब भारत के ग्रामीण युवाओं की विशाल, अप्रयुक्त बौद्धिक पूंजी को समाहित कर रही है।
- फरवरी 2026 तक भारत में 495 राज्य सार्वजनिक विश्वविद्यालय तथा उनसे संबद्ध 46,000 से अधिक संस्थान कार्यरत हैं, जो उच्च शिक्षा के प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
- इन विश्वविद्यालयों में कुल विद्यार्थी नामांकन का 81% हिस्सा है, जिससे शिक्षा की व्यापक पहुँच सुनिश्चित होती है।
- उदित ‘फिजिटल’ शिक्षण मॉडल (Booming 'Phygital' Learning): शिक्षा प्रणाली अब ‘फिजिटल (Phygital)’ आधारित संकर मॉडल की ओर अग्रसर है, जहाँ कुछ प्लेटफॉर्म जनरेटिव एआई एवं लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स (LLM) का उपयोग कर व्यक्तिगत स्तर पर शिक्षण को अनुकूलित करते हैं।
- यह परिवर्तन पाठ्यक्रम को स्थिर दस्तावेज़ के स्थान पर एक गतिशील एवं अनुकूलनशील अनुभव में परिवर्तित करता है, जो विद्यार्थियों की सीखने की गति एवं कमियों के अनुसार स्वयं को समायोजित करता है।
- भारत का ऑनलाइन शिक्षा बाज़ार वर्ष 2025-2030 के बीच 7.40 अरब डॉलर की वृद्धि के साथ 23% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) से बढ़ने का अनुमान है।
- जनवरी 2026 तक भारत के स्वदेशी MOOC प्लेटफॉर्म स्वयं (SWAYAM) पर 5.80 करोड़ से अधिक नामांकन दर्ज किये जा चुके हैं।
- साथ ही शिक्षा मंत्रालय एवं IIT कानपुर के सहयोग से प्रारंभ किया गया साथी (SATHEE) पोर्टल उच्च शिक्षा एवं प्रवेश परीक्षाओं हेतु एक समर्पित मंच के रूप में कार्य कर रहा है।
- लैंगिक समानता एवं STEM समावेशन में निर्णायक परिवर्तन: भारत में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक ‘नारीकरण (feminization)’ परिलक्षित हो रहा है, जहाँ लक्षित विद्यार्थीवृत्तियाँ एवं सामाजिक जागरूकता प्रयास उच्च-विकासशील तकनीकी क्षेत्रों में विद्यमान लैंगिक बाधाओं को समाप्त कर रहे हैं।
- यह परिवर्तन अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह कार्यबल में लैंगिक अंतर को कम करते हुए राष्ट्र के ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ को समावेशी बौद्धिक भागीदारी के माध्यम से पूर्ण रूप से साकार करने में सहायक है।
- AISHE रिपोर्ट के अनुसार, उच्च शिक्षा में कुल नामांकन में महिलाओं की भागीदारी लगभग 48% है। विशेष रूप से STEM क्षेत्रों में भारत में महिला भागीदारी दर 43% तक पहुँच चुकी है, जो वैश्विक स्तर पर सर्वाधिक में से एक है तथा अनेक विकसित देशों से भी अधिक है।
भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था से जुड़े प्रमुख मुद्दे क्या हैं?
- स्थायी ‘स्नातक बेरोज़गारी’ विरोधाभास: शैक्षणिक पाठ्यक्रम एवं बाज़ार-उन्मुख कौशल के बीच असंगति ने ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी है, जहाँ केवल डिग्री प्राप्त करना आर्थिक भागीदारी की गारंटी नहीं देता।
- इस असंतुलन के कारण उच्च शिक्षित युवा अल्प-रोज़गार या दीर्घकालिक बेरोज़गारी की स्थिति में आ जाते हैं, जिससे देश के संभावित जनसांख्यिकीय लाभांश का अनुत्पादक परिणामों पर दुरुपयोग होता है।
- स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026 रिपोर्ट के अनुसार, 25 वर्ष से कम आयु के स्नातकों के लिये बेरोज़गारी दर लगभग 40% है।
- संस्थानों में ‘परिमाण बनाम गुणवत्ता’ द्वंद्व : एशिया में सर्वाधिक रैंक प्राप्त विश्वविद्यालयों की संख्या होने के बावजूद भारत ‘परिमाण बनाम गुणवत्ता’ के द्वंद्व से ग्रस्त है, जहाँ कोई भी संस्थान वैश्विक शीर्ष श्रेणी में स्थान प्राप्त नहीं कर पा रहा है।
- यह स्थिति कठोर नियामक ढाँचों एवं उच्च प्रभाव वाले वैश्विक प्रतिस्पर्द्धी अनुसंधान पारितंत्र में ऐतिहासिक निवेश की कमी के कारण उत्पन्न हुई है।
- THE एशिया यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2026 में भारत 128 विश्वविद्यालयों के साथ सबसे आगे है, फिर भी शीर्ष 40 में एक भी संस्थान शामिल नहीं है।
- इस अंतर को इस तथ्य से भी समझा जा सकता है कि कई प्रमुख IIT इन रैंकिंग्स का बहिष्कार करते रहे हैं, क्योंकि वे मूल्यांकन मानकों में पारदर्शिता के अभाव को रेखांकित करते हैं।
- संरचनात्मक ग्रामीण-शहरी असमानता : ‘श्रेणी-1’ के प्रमुख संस्थानों का महानगरीय क्षेत्रों में अत्यधिक केंद्रीकरण एक भौगोलिक अवरोध उत्पन्न करता है, जिससे ग्रामीण प्रतिभा हाशिये पर चली जाती है तथा उल्लेखनीय ‘ट्रांज़िशन लॉसेज़’ उत्पन्न होते हैं।
- टियर-3 शहरों के विद्यार्थी प्रायः निम्न-गुणवत्ता वाले स्थानीय महाविद्यालयों में प्रवेश लेने के लिये बाध्य होते हैं, जिससे सामाजिक-आर्थिक असमानता का चक्र सुदृढ़ होता है तथा ग्रामीण जनसमूह की ऊर्ध्व गतिशीलता सीमित हो जाती है।
- आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, जहाँ शहरी क्षेत्रों में 38.1% माध्यमिक विद्यालय उपलब्ध हैं, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में यह अनुपात काफी कम है, जिसके परिणामस्वरूप ड्रॉपआउट दर अधिक रहती है।
- टियर-3 शहरों के विद्यार्थी प्रायः निम्न-गुणवत्ता वाले स्थानीय महाविद्यालयों में प्रवेश लेने के लिये बाध्य होते हैं, जिससे सामाजिक-आर्थिक असमानता का चक्र सुदृढ़ होता है तथा ग्रामीण जनसमूह की ऊर्ध्व गतिशीलता सीमित हो जाती है।
- शिक्षकों की कमी और गुणवत्ता ह्रास: उच्च शिक्षा संस्थान एक व्यापक रिक्ति संकट (vacancy crisis) का सामना कर रहे हैं, जहाँ स्थायी शिक्षकों के पद रिक्त रहने के कारण अस्थायी अथवा अंशकालिक कर्मचारियों पर निर्भरता बढ़ गई है।
- यह स्थिति शिक्षण गुणवत्ता को कमज़ोर करती है, मार्गदर्शन-आधारित अधिगम को बाधित करती है तथा ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था के लिये आवश्यक अनुसंधान उत्पादन को स्थिर कर देती है।
- मार्च 2025 की एक संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षण पदों में से 28% और गैर-शिक्षण पदों में से 48% पद रिक्त हैं।
- यह समस्या ‘ब्रेन ड्रेन’ से और गंभीर हो जाती है, जहाँ उच्च-स्तरीय Ph.D धारक बेहतर वित्तपोषण एवं संस्थागत स्वायत्तता के कारण भारतीय संस्थानों की अपेक्षा अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान अवसरों को प्राथमिकता देते हैं।
- मानसिक स्वास्थ्य और प्रतिस्पर्द्धात्मक तनाव में वृद्धि: प्रवेश परीक्षाओं की अत्यधिक प्रतिस्पर्द्धी प्रकृति तथा 'प्लेसमेंट-आधारित' शिक्षा के दबाव ने विद्यार्थियों के बीच एक मूक मानसिक स्वास्थ्य महामारी को जन्म दिया है।
- पर्याप्त संस्थागत सहयोग तंत्र के अभाव में विद्यार्थी प्रायः गंभीर बर्नआउट, चिंता तथा असफलता की भावना से जूझते हैं, जिससे कोचिंग हब्स और परिसरों में आत्म-क्षति की घटनाओं में वृद्धि हो रही है।
- एक हालिया अध्ययन के अनुसार, लगभग 70% महाविद्यालयों के विद्यार्थियों ने मध्यम से उच्च स्तर की चिंता व्यक्त की, लगभग 60% में अवसाद के लक्षण पाए गए तथा 70% से अधिक विद्यार्थियों में उच्च तनाव स्तर दर्ज किया गया।
- साथ ही राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आँकड़े दर्शाते हैं कि विद्यार्थी आत्महत्याएँ अब भी एक गंभीर चिंता का विषय बनी हुई हैं, विशेषकर NEET और JEE जैसी उच्च-दबाव वाली परीक्षाओं से जुड़ी हुई, जो परीक्षा-केंद्रित दृष्टिकोण से हटकर विद्यार्थी-केंद्रित कल्याण मॉडल अपनाने की तात्कालिक आवश्यकता को रेखांकित करता है।
- अनुसंधान-नवाचार वित्तीय अंतराल: भारत की वैश्विक अनुसंधान एवं विकास (R&D) केंद्र बनने की आकांक्षा सार्वजनिक तथा निजी निवेश के निम्न स्तर के कारण बाधित हो रही है, जो वैश्विक मानकों की तुलना में अत्यंत सीमित है।
- इस वित्तीय गतिरोध के कारण विश्वविद्यालयों को प्रयोगशालाओं के उन्नयन तथा शीर्ष स्तरीय शोधकर्त्ताओं को बनाए रखने से रोकता है, जिससे ‘ब्रेन ड्रेन’ की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है।
- भारत का सकल घरेलू व्यय अनुसंधान एवं विकास (GERD) जीडीपी के लगभग 0.6%–0.7% के बीच बना हुआ है, जो वैश्विक औसत तथा चीन, दक्षिण कोरिया और अमेरिका जैसे देशों की तुलना में काफी कम है।
- इसके अतिरिक्त, संसदीय स्थायी समिति की एक रिपोर्ट ने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग में निधियों के अपर्याप्त उपयोग पर चिंता व्यक्त की, जिसमें वर्ष 2025–26 में मात्र 60% आवंटित बजट के उपयोग की बात सामने आई।
- समिति ने चेतावनी दी कि ऐसी अक्षमताएँ उन्नत अंतरिक्ष मिशनों की प्रगति को धीमा कर सकती हैं।
- अनियंत्रित निजीकरण से गुणवत्ता में कमी: निजी स्व-वित्तपोषित महाविद्यालयों की तीव्र वृद्धि ने शिक्षा के वाणिज्यीकरण को बढ़ावा दिया है, जहाँ लाभ-उन्मुख दृष्टिकोण प्रायः शैक्षणिक गुणवत्ता और विद्यार्थी कल्याण पर हावी हो जाता है।
- ये संस्थान अक्सर निम्न-स्तरीय अवसंरचना एवं ‘गेस्ट फैकल्टी’ पर निर्भर रहते हैं, जिससे ऐसे स्नातक तैयार होते हैं जिनकी डिग्री का वास्तविक प्रतिस्पर्द्धात्मक श्रम बाज़ार में सीमित मूल्य होता है।
- हाल ही में हुए वर्ष 2026 के ऑडिट से पता चलता है कि जहाँ निजी विश्वविद्यालय अब सभी उच्च शिक्षा संस्थानों के 35% से अधिक (2024 तक) हैं, वहीं उनमें से केवल एक छोटा सा हिस्सा ही NAAC द्वारा 'A' ग्रेड से मान्यता प्राप्त है।
- नवंबर 2025 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने गुणवत्ता और प्रशासन को लेकर चिंताओं के बीच, सभी निजी और डीम्ड विश्वविद्यालयों के राष्ट्रव्यापी ऑडिट का आदेश दिया।
- ‘अंतिम चरण’ डिजिटल विभाजन: डिजिटल शिक्षा को प्रोत्साहन मिलने के बावजूद, विद्यार्थी समुदाय का एक बहुत बड़ा हिस्सा अभी भी उच्च-गति इंटरनेट कनेक्टिविटी तथा क्षेत्रीय भाषा-आधारित संसाधनों से वंचित है, जो प्रभावी हाइब्रिड शिक्षा के लिये अत्यावश्यक हैं।
- यह स्थिति एक नए प्रकार के ‘शैक्षणिक रंगभेद’ को जन्म देती है, जहाँ अंग्रेज़ी में प्रवीण तथा तकनीकी केंद्रों में निवास करने वाले विद्यार्थी अनुचित लाभ प्राप्त करते हैं, जबकि ग्रामीण एवं स्थानीय भाषा माध्यम के विद्यार्थी प्रतिस्पर्द्धा में पिछड़ जाते हैं।
- एक हालिया अध्ययन के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों के लगभग 32.5% विद्यार्थियों के पास अब भी पर्याप्त एवं तीव्र ब्रॉडबैंड इंटरनेट सुविधा उपलब्ध नहीं है।
भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली को सुदृढ़ बनाने हेतु कौन-कौन से उपाय किये जाने चाहिये?
- संप्रभु अनुसंधान वित्त पोषण और उद्यम-संबंधित अनुदान: भारत को 'अनुदान-आधारित' अनुसंधान वित्त पोषण मॉडल से 'उद्यम-आधारित' अनुसंधान वित्त पोषण मॉडल में परिवर्तन करना चाहिये, जहाँ राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (NRF) विश्वविद्यालय के नेतृत्व वाले डीप-टेक स्टार्टअप के लिये एक रणनीतिक इक्विटी भागीदार के रूप में कार्य करता है।
- अकादमिक पेटेंटों के व्यावसायीकरण हेतु प्रत्यक्ष प्रारंभिक पूंजी प्रदान करने वाले विश्वविद्यालय नवाचार क्लस्टर (UIC) की स्थापना करके, यह प्रणाली राष्ट्रीय समस्याओं को हल करते हुए भविष्य के अनुसंधान को स्वयं वित्तपोषित कर सकती है।
- यह 'संप्रभु उद्यम' दृष्टिकोण बौद्धिक संपदा द्वारा संचालित धन सृजन के माध्यम से अकादमिक जगत को राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के एक सक्रिय इंजन में बदल देता है।
- ‘परफॉर्मेंस-लिंक्ड रेगुलेशन’ के माध्यम से संस्थागत स्वायत्तता: वर्तमान ‘एकरूप’ नियामक ढाँचे को एक स्तरीय स्वायत्तता मॉडल से प्रतिस्थापित किया जाना चाहिये, जिसमें मान्यता स्कोर (जैसे NAAC) को सीधे प्रशासनिक एवं वित्तीय स्वतंत्रता से संबद्ध किया जाए।
- उच्च प्रदर्शन करने वाले संस्थानों को ‘हाइपर-लोकलाइज़्ड’ पाठ्यक्रम निर्माण तथा अंतर्राष्ट्रीय संकाय की स्वतंत्र भर्ती जैसे अधिकार प्रदान किये जाने चाहिये, जिससे उन्हें प्रत्येक निर्णय हेतु केंद्रीय स्वीकृति पर निर्भर न रहना पड़े।
- इस प्रकार एक प्रतिस्पर्द्धात्मक ‘रेस-टू-द-टॉप’ की स्थिति उत्पन्न होती है, जो संस्थागत चपलता को प्रोत्साहित करते हुए कॉलेजों को मात्र अनुपालन के बजाय नवाचार हेतु प्रेरित करती है।
- उच्च प्रदर्शन करने वाले संस्थानों को ‘हाइपर-लोकलाइज़्ड’ पाठ्यक्रम निर्माण तथा अंतर्राष्ट्रीय संकाय की स्वतंत्र भर्ती जैसे अधिकार प्रदान किये जाने चाहिये, जिससे उन्हें प्रत्येक निर्णय हेतु केंद्रीय स्वीकृति पर निर्भर न रहना पड़े।
- ‘उद्योग-अकादमिक सह-शासन’ मॉडल: रोज़गार अंतराल को कम करने हेतु, शिक्षा व्यवस्था में यह अनिवार्य किया जाना चाहिये कि विश्वविद्यालयों के शासी निकायों में एक निश्चित प्रतिशत सक्रिय उद्योग विशेषज्ञों एवं वैश्विक उद्यमियों का प्रतिनिधित्व हो।
- यह व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि अकादमिक परिषदें बाज़ार की परिवर्तित मांगों के प्रति निरंतर उत्तरदायी रहें, जिससे कॉर्पोरेट सहयोग से विकसित ‘माइक्रो-क्रेडेंशियल’ एवं ‘स्टैकेबल डिग्री’ कार्यक्रमों का तीव्र क्रियान्वयन संभव हो सके।
- इस प्रकार का शासन-स्तरीय समन्वय पाठ्यक्रम को एक ‘सजीव दस्तावेज़’ में परिवर्तित करता है, जो वैश्विक प्रौद्योगिकीय परिवर्तनों के साथ वास्तविक समय में विकसित होता रहता है।
- ‘राष्ट्रीय संकाय गतिशीलता’ एवं प्रतिभा विनिमय कार्यक्रम: संकाय संकट के समाधान हेतु ‘राष्ट्रीय संकाय विनिमय (NFE)’ की स्थापना आवश्यक है, जिसके माध्यम से निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों तथा वैश्विक NRI प्रतिभाओं को भारतीय उच्च शिक्षण संस्थानों (HEI) में ‘सैबैटिकल’ अवकाश के दौरान गेस्ट फैकल्टी प्राध्यापक के रूप में कार्य करने की अनुमति दी जाए।
- लचीले टेन्योर-ट्रैक पदों तथा उद्योग-मानक अनुसंधान फेलोशिप्स के माध्यम से भारत ‘ब्रेन ड्रेन’ की प्रवृत्ति को उलट सकता है तथा कक्षा-कक्ष में व्यावहारिक अनुभव-आधारित अंतर्दृष्टियों का समावेश कर सकता है।
- यह बहुआयामी गतिशीलता शैक्षणिक संकीर्णता (insularity) को समाप्त करते हुए विविध शिक्षण पद्धतियों—जैसे उद्योग-उन्मुख प्रशिक्षण से लेकर उच्च-स्तरीय अनुसंधान-आधारित शिक्षण—का समावेश सुनिश्चित करती है।
- ‘एआई-फर्स्ट’ वैयक्तिकृत शिक्षण अवसंरचना: भारत को राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी AI-कॉग्निटिव ट्यूटर अवसंरचना में निवेश करना चाहिये, जो SWAYAM एवं DIKSHA जैसे प्लेटफार्मों के ऊपर एक इंटीग्रेटेड लेयर के रूप में कार्य करते हुए प्रत्येक विद्यार्थी के लिये अति-वैयक्तिकृत तथा स्थानीय भाषा-आधारित शिक्षण मार्ग प्रदान करे।
- लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स (LLM) के माध्यम से वैश्विक शोध को 22 भारतीय भाषाओं में अनुवादित एवं अनुकूलित कर, यह प्रणाली ग्रामीण शिक्षार्थियों के लिये विशिष्ट ज्ञान तक पहुँच का लोकतंत्रीकरण सुनिश्चित कर सकती है।
- यह प्रौद्योगिकी-आधारित लोकतंत्रीकरण सुनिश्चित करता है कि ‘अंतिम छोर’ (last-mile) के विद्यार्थी भी शहरी संस्थानों के विद्यार्थियों के समान गुणवत्तापूर्ण शिक्षण अनुभव एवं तत्काल प्रतिक्रिया प्राप्त कर सकें।
- सतत ‘एंडोमेंट-आधारित’ वित्तीय संरचनाएँ: राज्य वित्तपोषण एवं विद्यार्थी शुल्क पर निर्भरता कम करने हेतु, सरकार को कॉर्पोरेट CSR एवं पूर्व विद्यार्थी योगदान के लिये कर प्रोत्साहन प्रदान कर संस्थागत एंडोमेंट फंड के निर्माण को बढ़ावा देना चाहिये।
- विश्वविद्यालय प्रशासकों को निधि प्रबंधन में प्रशिक्षित कर, संस्थान ऐसे दीर्घकालिक कोष विकसित कर सकते हैं जो विद्यार्थीवृत्ति, बुनियादी ढाँचे तथा उच्च-जोखिम अनुसंधान परियोजनाओं का स्वतंत्र वित्तपोषण सुनिश्चित करें।
- यह वित्तीय आत्मनिर्भरता संस्थानों को दीर्घकालिक रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाने में सक्षम बनाती है, जो वार्षिक बजटीय उतार-चढ़ाव एवं राजनीतिक चक्रों से अपेक्षाकृत मुक्त होता है।
- ‘ट्रांस-डिसिप्लिनरी’ डिज़ाइन थिंकिंग पर ज़ोर: भविष्य-उन्मुख शिक्षा के लिये ‘डिज़ाइन थिंकिंग’ एवं ‘कम्प्यूटेशनल लॉजिक’ को संस्कृत से लेकर अंतरिक्ष इंजीनियरिंग तक सभी विषयों में अनिवार्य आधारभूत पाठ्यक्रम के रूप में सम्मिलित करना आवश्यक है।
- यह दृष्टिकोण संज्ञानात्मक समन्वय (cognitive synthesis) को प्रोत्साहित करता है, जिससे मानविकी का विद्यार्थी डेटा एथिक्स को समझ सके तथा इंजीनियर शहरी नियोजन के सामाजिक आयामों को आत्मसात कर सके।
- क्रॉस-सेक्टोरल कैपस्टोन प्रोजेक्ट्स को अनिवार्य बनाकर, जहाँ विभिन्न विषयों के विद्यार्थी एक ही सामाजिक समस्या पर सहयोग करें, यह प्रणाली गहन विशेषज्ञता एवं व्यापक सहानुभूति से युक्त ‘टी-आकार’ के पेशेवरों का निर्माण करती है।
निष्कर्ष:
भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली एक महत्त्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है, जहाँ विस्तार के साथ-साथ गुणवत्ता, पारदर्शिता तथा उत्तरदायित्व का संतुलन स्थापित करना अनिवार्य हो गया है। यद्यपि नई शिक्षा नीति (NEP) के अंतर्गत अनुकूलन एवं अनुसंधान-उन्मुख सुधार सकारात्मक संकेत देते हैं, फिर भी रोज़गार, समानता एवं शासन-संबंधी संरचनात्मक कमियाँ निरंतर बनी हुई हैं। एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण, जो ‘मार्केटिंग’ के स्थान पर वास्तविक योग्यता (merit) को प्रोत्साहित करे, व्यापक संरचनात्मक, वित्तीय तथा तकनीकी परिवर्तन की मांग करता है। अंततः शिक्षा प्रणाली को नवाचार, समावेशन एवं समग्र कल्याण के साथ समन्वित करना ही यह निर्धारित करेगा कि भारत अपने जनसांख्यिकीय लाभांश का पूर्ण लाभ उठा सकता है या नहीं।
|
दृष्टि मेन्स का प्रश्न: भारत में उच्च शिक्षा का विस्तार गुणवत्ता और पारदर्शिता की तुलना में कहीं अधिक हुआ है। इस असंतुलन से उत्पन्न चुनौतियों का आलोचनात्मक विश्लेषण करते हुए आवश्यक सुधारात्मक उपाय सुझाइये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
1. भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था में सूचना विषमता एक प्रमुख चिंता का विषय क्यों है?
सूचना विषमता इसलिये उत्पन्न होती है क्योंकि संस्थानों के पास अपनी गुणवत्ता संबंधी अधिक विश्वसनीय एवं विस्तृत डेटा होता है, जबकि विद्यार्थी प्रायः रैंकिंग, ब्रोशर एवं अप्रमाणित सूचनाओं पर निर्भर रहते हैं। परिणामस्वरूप, निम्न-गुणवत्ता वाले संस्थान भी स्वयं को विश्वसनीय प्रदर्शित कर पाते हैं, जिससे विद्यार्थियों के चयन में विकृति आती है और योग्यता-आधारित प्रतिस्पर्द्धा कमज़ोर होती है।
2. अंतर्राष्ट्रीयकरण भारत के उच्च शिक्षा परिदृश्य को किस प्रकार नया आकार दे रहा है?
भारत, विदेशी विश्वविद्यालयों को देश में परिसर स्थापित करने की अनुमति देकर तथा वैश्विक सहयोग को प्रोत्साहित करते हुए, विद्यार्थी निर्यातक देश से एक वैश्विक शिक्षा केंद्र के रूप में उभर रहा है। इससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर की शिक्षा तक पहुँच सुलभ होती है तथा विदेशी मुद्रा के बहिर्वाह में भी कमी आती है।
3. भारत में ‘स्नातक बेरोज़गारी विरोधाभास’ क्या है?
यह उस स्थिति को दर्शाता है जहाँ उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद रोज़गार के अवसर सीमित रहते हैं। इसका मुख्य कारण अकादमिक पाठ्यक्रम एवं उद्योग की आवश्यकताओं के मध्य असंगति है, जिसके परिणामस्वरूप अल्प-रोज़गार तथा मानव संसाधन की अपार क्षमता का अपूर्ण उपयोग होता है।
4. भारत में उच्च शिक्षा पर डिजिटल परिवर्तन का क्या प्रभाव पड़ रहा है?
हाइब्रिड शिक्षण मॉडल, SWAYAM जैसे प्लेटफॉर्म एवं AI-आधारित वैयक्तिकृत शिक्षण के उदय से सुलभता एवं अनुकूलन में वृद्धि हुई है। हालाँकि डिजिटल विभाजन अब भी समान पहुँच को सीमित करता है, विशेषकर ग्रामीण विद्यार्थियों के संदर्भ में।
5. उच्च शिक्षा में गुणवत्ता और जवाबदेही में सुधार के लिये किन सुधारों की आवश्यकता है?
आवश्यक सुधारों में प्रदर्शन-आधारित संस्थागत स्वायत्तता, उद्योग-अकादमिक सहयोग को सुदृढ़ करना, अनुसंधान वित्तपोषण में वृद्धि, पारदर्शी एवं सत्यापन-योग्य डेटा प्रणालियाँ विकसित करना तथा कौशल-आधारित एवं विद्यार्थी-केंद्रित शिक्षा की ओर संक्रमण शामिल हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ)
प्रिलिम्स:
प्रश्न 1. भारतीय संविधान के निम्नलिखित में से कौन-से प्रावधान शिक्षा पर प्रभाव डालते हैं? (2012)
- राज्य की नीति के निदेशक तत्त्व
- ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकाय
- पंचम अनुसूची
- षष्ठ अनुसूची
- सप्तम अनुसूची
निम्नलिखित कूटों के आधार पर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 3, 4 और 5
(c) केवल 1, 2 और 5
(d) 1, 2, 3, 4 और 5
उत्तर- (d)
मेन्स
प्रश्न 1. भारत में डिजिटल पहल ने किस प्रकार से देश की शिक्षा व्यवस्था के संचालन में योगदान किया है? विस्तृत उत्तर दीजिये। (2020)
प्रश्न 2. जनसंख्या शिक्षा के प्रमुख उद्देश्यों की विवेचना करते हुए भारत में इन्हें प्राप्त करने के उपायों पर विस्तृत प्रकाश डालिये। (2021)