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जीवाश्म ईंधन और नीतिगत दुविधा | 03 Aug 2021 | भूगोल

यह एडिटोरियल 30/08/2021 को ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित ‘‘The agenda for Petroleum Minister Hardeep Singh Puri’’ लेख पर आधारित है। इसमें कच्चे तेल के आयात और उपयोगिता के संबंध में भारत के सामने मौजूद नीतिगत चुनौतियों की चर्चा की गई है।

जलवायु परिवर्तन के कारण हो रही तबाही का विस्तार और इसकी गति पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के लिये यदि नैतिक नहीं तो कम से कम एक नीतिगत दुविधा अवश्य उत्पन्न करती है।  

दुविधा यह है कि आत्मनिर्भरता (Self Sufficiency) की अनिवार्यता के सामने आपूर्ति-पक्ष की प्राथमिकताओं को फिर से कैसे परिभाषित किया जाए, जबकि देश में लगभग 85% जीवाश्म ईंधन अभी भी आयात किये जाते हैं।

इस प्रकार माँग-आपूर्ति के अंतराल को भरने के लिये पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा उठाए जा सकने वाले विभिन्न उपायों पर विचार करने की आवश्यकता है।

कच्चे तेल प्रबंधन से जुड़ी समस्याएँ

Structural-Challenges

आगे की राह:

निष्कर्ष

इस प्रकार सभी हितधारकों को तेल और प्राकृतिक गैस के संकुचित दृष्टिकोण के माध्यम से ही कार्यशील होने की आवश्यकता नहीं है। उन्हें अपने दायरे का विस्तार करना चाहिये और ऊर्जा संक्रमण/रूपांतरण का अगुवा बनने का प्रयास करना चाहिये।

यदि स्वच्छ ऊर्जा ढाँचे के अंदर प्राथमिकताएँ विकसित की जाती हैं तो पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की नीतिगत दुविधाएँ दूर हो सकती हैं।

India-Oil-gas

अभ्यास प्रश्न: कच्चे तेल की मांग तथा आपूर्ति के बीच अंतराल को भरने के लिये भारत द्वारा विभिन्न उपायों पर विचार किये जाने की आवश्यकता है टिप्पणी कीजिये