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NRC से बहिष्करण | 17 Sep 2019 | शासन व्यवस्था

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इसमें हाल ही में जारी की गई राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर की अंतिम सूची तथा संबद्ध मुद्दों पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ

कुछ समय पूर्व असम के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (National Register of Citizens-NRC) की अंतिम सूची जारी की गई जिसमें 19 लाख से अधिक आवेदकों के नाम शामिल नहीं किये गए हैं। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर का अंतिम मसौदा वर्ष 2018 में जारी किया गया था। जिसमें 40 लाख लोगों NRC की सूची से बाहर कर दिया गया था।

पृष्ठभूमि

असम में शरणार्थियों का मुद्दा राज्य की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक रहा है। वर्ष 1947 में जब भारत-पाकिस्तान का बँटवारा हुआ तो कुछ लोग असम से पूर्वी पाकिस्तान चले गए, लेकिन उनकी ज़मीन असम में थी और लोगों का दोनों ओर से आना-जाना बँटवारे के बाद भी जारी रहा। इसके चलते वर्ष 1951 में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर तैयार किया गया था। वर्ष 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद भी असम में भारी संख्या में शरणार्थियों का आना जारी रहा जिसके चलते राज्य की आबादी का स्वरूप बदलने लगा। 80 के दशक में अखिल असम छात्र संघ (All Assam Students Union-AASU) ने अवैध तरीके से असम में रहने वाले लोगों की पहचान करने तथा उन्हें वापस भेजने के लिये एक आंदोलन शुरू किया। AASU के छह साल के संघर्ष के बाद वर्ष 1985 में असम समझौते पर हस्ताक्षर किये गए थे।

असम समझौता

15 अगस्त, 1985 को AASU और दूसरे संगठनों तथा भारत सरकार के बीच एक समझौता हुआ जिसे असम समझौते के नाम से जाना जाता है। इस समझौते के अनुसार, 25 मार्च, 1971 के बाद असम में प्रवेश करने वाले हिंदू- मुसलमानों की पहचान कर उन्हें राज्य से बाहर किया जाना था। इस समझौते के तहत वर्ष 1961 से वर्ष 1971 के बीच असम आने वाले लोगों को नागरिकता तथा अन्य अधिकार दिये गए, लेकिन उन्हें मतदान का अधिकार नहीं दिया गया। इसके अंतर्गत असम के आर्थिक विकास के लिये विशेष पैकेज भी दिया गया। साथ ही यह फैसला भी किया गया कि असमिया भाषी लोगों के सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषायी पहचान की सुरक्षा के लिये विशेष कानून और प्रशासनिक उपाय किये जाएंगे। असम समझौते के आधार पर मतदाता सूची में संशोधन किया गया।

NRC को अपडेट करने का फैसला

वर्ष 2005 में सरकार ने 1951 के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर को अपडेट करने का फैसला किया और तय किया कि असम समझौते के तहत 25 मार्च, 1971 से पहले असम में अवैध तरीके से प्रवेश करने वाले लोगों का नाम भी नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीज़नशिप में जोड़ा जाएगा। लेकिन यह विवाद सुलझने की बजाय और अधिक बढ़ता गया तथा मामला कोर्ट पहुँच गया। इसके बाद वर्ष 2015 में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर असम में नागरिकों के सत्यापन का कार्य शुरू किया गया। इसके लिये पूरे राज्य में कई NRC केंद्र खोले गए। नागरिकों के सत्यापन के लिये यह अनिवार्य किया गया कि केवल उन्हीं लोगों को भारतीय नागरिक माना जाएगा जिनके पूर्वजों के नाम 1951 के NRC में या 24 मार्च 1971 तक के किसी वोटर लिस्ट में मौजूद हों।

"अपडेटेड" NRC क्या है?

क्या पिछले साल जारी की गई NRC अपडेटेड नहीं थी?

क्या NRC से बाहर किये गए लोग अवैध प्रवासी हैं?

किस आधार पर दावा कर सकते हैं सूची से बाहर किये गए लोग?

यदि सूची से बाहर किये गए लोगों के लिये कानूनी सहारा भी विफल हो जाता है तो क्या उन्हें निर्वासित किया जाएगा?

निर्वासित न किये जाने अथवा शरणार्थी शिविर में न भेजे जाने की स्थिति में

क्या शरणार्थियों के लिये कोई नीति नहीं है?

नागरिकताहीन होना शरणार्थी होने जैसा नहीं है। भारत में तिब्बत, श्रीलंका (तमिल) और पश्चिम पाकिस्तान के शरणार्थी निवास करते हैं। इनमें से केवल अंतिम समूह को लोकसभा चुनावों में मतदान का अधिकार है, हालाँकि विधानसभा चुनावों में इन्हें भी मतदान का अधिकार प्राप्त नहीं है। तिब्बतियों को सरकार एक विशेष संशोधन के साथ भारतीय नागरिकता की अनुमति देती है कि वे तिब्बती बस्तियों को छोड़ दें और शरणार्थी लाभों का परित्याग कर दें। कुछ राज्यों द्वारा अंगीकृत तिब्बती पुनर्वास नीति (Tibetan Rehabilitation Policy) 2014 के तहत शरणार्थी श्रम, राशन, आवास और ऋण के लिये सरकारी योजनाओं के तहत प्रदत्त कुछ लाभों के लिये पात्र हैं।

निष्कर्ष

NRC की सूची जारी होने के बाद लोग स्टेटलेस हो गए हैं, अर्थात् वे किसी भी देश के नागरिक नहीं रहे। ऐसी स्थिति में राज्य में हिंसा का खतरा बना हुआ है। जो लोग दशकों से असम में रह रहे थे, भारतीय नागरिकता समाप्त होने के बाद वे न तो पहले की तरह वोट दे सकेंगे, न इन्हें किसी कल्याणकारी योजना का लाभ मिलेगा और अपनी ही संपत्ति पर भी इनका कोई अधिकार नहीं रहेगा।

असमिया समाज का गौरव सहनशीलता और बहुलवाद की परंपरा से भरा हुआ है, जो शंकरदेव जैसे महान पुरुष से होते हुए अजन फकीर जैसे प्रभावशाली व्यक्तियों के रूप में इसे सँजोए हुए है। अब देखना यह है कि इस फैसले के बाद असम का भविष्य कितना उन्नतिशील होगा।

प्रश्न: क्या एनआरसी की अंतिम सूची जारी होने के बाद अवैध घुसपैठियों का मुद्दा समाप्त हो गया है? विश्लेषण कीजिये।