पर्यावरण चुनौती से निपटने के लिये कुशल अंतर्राष्ट्रीय सहयोग आवश्यक | 17 Aug 2019

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण (UNEP) के आलेख “Facing our global environmental challenges requires efficient international cooperation” पर आधारित विश्लेष्णात्मक अध्ययन। 

संदर्भ

हमारी पृथ्वी मौजूदा समय में जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता के क्षरण तथा प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन जैसी प्रमुख समस्याओं से जूझ रही है। पिछले वर्षों में यूरोप, अमेरिका तथा जापान ने तीव्र हीटवेव का सामना किया है। इससे बड़ी मात्र में आर्थिक हानि को झेलना पड़ा है। वहीं अफ्रीका तथा एशिया में उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों से बड़ी संख्या में जन-धन की हानि हुई है। पूर्वी अफ्रीका में सूखे की बारंबारता बढती जा रही है तथा कुछ क्षेत्रों में अस्वाभाविक रूप से वर्षा में भी वृद्धि हुई है। उदाहरण के लिये सोमालिया सूखे के कारण अकाल से जूझ रहा है। इसके अतिरिक्त प्राकृतिक पर्यावरण में भी तेजी से ह्रास हुआ है जिससे कई वन्यजीव विलुप्ति की कगार पर पहुँच चुके हैं। वर्ष 2019 में 27000 से भी अधिक प्रजातियाँ विलुप्त होने के खतरे का सामना कर रहीं हैं। वर्तमान में सभी बड़े देशों का आर्थिक मॉडल प्राकृतिक संसाधनों के अति दोहन पर आधारित है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार प्राकृतिक संसाधनों का निष्कर्षण और प्रसंस्करण वैश्विक ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के आधे के लिये उत्तरदायी है, साथ ही 80-90 प्रतिशत जैव विविधता के क्षरण के लिये भी उपर्युक्त कारण ज़िम्मेदार है। जलवायु परिवर्तन एवं पर्यावरण से संबंधित अन्य चुनौतियों एवं इनकी तीव्रता को ध्यान में रखते हुए समय तेजी से निकल रहा है। इन चुनौतियों से निपटने के लिये वैश्विक स्तर पर सहयोग पर आधारित व्यापक रणनीति का निर्माण करना होगा। पारंपरिक आर्थिक मॉडल जो सिर्फ लाभ तक सीमित है, के द्वारा उपर्युक्त समस्याओं से निपटना संभव नहीं है।

क्या विश्व के लिये फ़िनलैंड बन सकता है प्रेरणा स्रोत ?

फ़िनलैंड की सरकार ने जलवायु परिवर्तन से निटपने के लिये महत्त्वपूर्ण एवं आकांक्षी एजेंडा तैयार किया है। वर्ष 2035 तक फ़िनलैंड की सरकार ने स्वयं को कार्बन न्यूट्रल करने का लक्ष्य तय किया है। यह ध्यान देने योग्य है कि ऐसा करने वाला फ़िनलैंड विश्व का प्रथम देश होगा। इसके अतिरिक्त फिनलैंड ने जैव विविधता की हानि को रोकने तथा स्वयं को चक्रीय अर्थव्यवस्था में परिवर्तित करने का लक्ष्य भी निर्धारित किया है। चक्रीय अर्थव्यवस्था में प्रमुख रूप से अपशिष्ट को कम करने एवं अपशिष्ट से संसाधन निर्माण पर बल दिया जाता है। फ़िनलैंड एजेंडा 2030 को वर्ष 2019 से लागू करने जा रहा है। इसके लिये सरकारी प्रयासों एवं बजट आवंटन के माध्यम से बल दिया जाएगा। इसके अतिरिक्त फिनलैंड सरकार के विभिन्न मंत्रालयों एवं पर्यावरण से संबंधित विभिन्न हित समूहों के मध्य मज़बूत तालमेल है। इससे विभिन्न योजनाओं को लागू करने तथा उनका सफल क्रियान्वयन करने में सहायता प्राप्त होती है।

इसके बावजूद विश्व में कोई भी देश अपने बल पर पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने में सक्षम नहीं है। इसके लिये विभिन्न देशों को मिलकर व्यापक एवं प्रभावी समाधान खोजने होंगे, साथ ही न सिर्फ राष्ट्रीय स्तर पर बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी सहयोग को बढ़ावा देना होगा। इसके लिये सिविल समाज, अकादमिक क्षेत्र से संबंधित लोगों, निजी क्षेत्रों तथा सरकारों को भी इसमें शामिल करना होगा।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण महासभा- 2019

  • UNEA-4 का विषय 'पर्यावरणीय चुनौतियों और सतत् उपभोग तथा उत्पादन हेतु अभिनव समाधान' (Innovative Solutions for Environmental Challenges and Sustainable Consumption and Production) था।
  • सभा के दौरान राष्ट्र इस बात पर सहमत हुए कि उन्हें 2030 तक सतत् विकास लक्ष्यों के तहत लक्ष्य प्राप्त करने हेतु विकास के नए मॉडल की ओर कदम बढ़ाने होंगे।
  • सभी राष्ट्रों ने सर्वसम्मति से 2030 तक एकल-उपयोग प्लास्टिक उत्पादों जैसे- कप, कटलरी और बैग आदि में कटौती करने पर भी सहमति व्यक्त की।
  • इस सम्मेलन के दौरान संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (United Nation Environment Programme-UNEP) ने वैश्विक पर्यावरण आउटलुक रिपोर्ट का छठा संस्करण भी जारी किया है।

UNEP तथा UNEA को अधिक प्रभावी बनाना

अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण के प्रशासन में सुधार के लिये फिनलैंड जैसे देश लगातार मुखर रहे हैं। वर्ष 2012 में संपन्न हुए रियो +20 सम्मेलन में सहयोग तथा प्रभावकारिता बढ़ाने के लिये प्रयास किये गए। इस सम्मेलन में मुख्य रूप से दो बातों पर बल दिया गया है- प्रथम, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण के शासन, वित्तीयन एवं कार्यिकी को सुधारना। दूसरा, बहुपक्षीय पर्यावरण समझौतों में विभिन्न देशों के मध्य तालमेल को बेहतर करना।

संयुक्त राष्ट्र में पर्यावरण से संबंधित विभिन्न सुधारों में सबसे महत्त्वपूर्ण सुधार संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा (UNEA) जो पहले 58 सदस्यों तक सीमित थी जिसको परिवर्तित करके सार्वभौमिक कर दिया गया है। इस परिषद के सार्वभौमिकरण से सभी देशों (चाहे उनका आकार छोटा हो या बड़ा) को अपनी समस्याओं को एक मंच पर साझा करने का अवसर मिलेगा, साथ ही ये देश अपने संयुक्त पर्यावरण एजेंडे पर भी चर्चा कर सकेंगे। इस सफलता के बावजूद अभी भी संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा (UNEA) एक नवीन इकाई है तथा इसको संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था में एक प्रमुख भूमिका निभाने में और अधिक प्रयास करने होंगे।

वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा UN पर्यावरण के कार्यों पर निर्णय लेती है। UNEA की मौजूदा भूमिका को बदलने की आवश्यकता है तथा पर्यावरण सभा को सदस्य राष्ट्रों तथा  पर्यावरण व्यवस्था को रणनीतिक निर्देश देना चाहिये। इससे पर्यावरण से संबंधित मुद्दों पर संयुक्त राष्ट्र तथा विभिन्न राष्ट्रों के स्तर पर राजनीतिक रुझान में वृद्धि करने में सहायता मिलेगी।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा (United Nations Environment Assembly-UNEA)

  • संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा (UNEA) संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) का प्रशासनिक निकाय है।
  • पर्यावरण के संदर्भ में निर्णय लेने वाली विश्व की सर्वोच्च संस्था संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा है।
  • यह दुनिया के सामने आने वाली महत्त्वपूर्ण पर्यावरणीय चुनौतियों को संबोधित करती है।
  • यह पर्यावरणीय सभा वैश्विक पर्यावरण नीतियों हेतु प्राथमिकताएँ निर्धारित करने और अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण कानून विकसित करने के लिये हर दो वर्ष में एक बार आयोजित की जाती है।
  • सतत् विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के दौरान संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा का गठन जून 2012 में किया गया। ध्यातव्य है कि सतत् विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन को RIO+20 या RIO 2012 भी कहा जाता है।

पर्यावरणीय मुद्दों की संयुक्त राष्ट्र में पैरवी

संयुक्त राष्ट्र के मंच पर भी संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण की भूमिका में वृद्धि करने की आवश्यकता है ताकि पर्यावरण के मुद्दों को अधिक तरज़ीह दी जा सके। संयुक्त राष्ट्र में पर्यावरण के मामलों के लिये UN पर्यावरण की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। UN पर्यावरण संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न एजेंसियों के साथ समन्वय स्थापित करने तथा अन्य बहुपक्षीय निकायों को साथ लाने में इस संगठन की भूमिका बेहद उपयोगी है। संयुक्त राष्ट्र में चल रहे व्यापक सुधार राष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र के साथ सहयोग बढ़ाने और संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों के बीच प्रतिस्पर्धा को कम करने के लिये अच्छे अवसर प्रदान करते हैं। यह सुधार विशेष रूप से UN पर्यावरण के लिये अधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इस संगठन की पहुँच विभिन्न देशों में सीमित है।

विखंडन बनाम तालमेल 

विखंडित स्वरुप अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण से संबंधित अभिशासन की सबसे बड़ी चुनौती है। वर्तमान में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई बहुपक्षीय पर्यावरण समझौते है इन समझौतों में देशों की संख्या, ढांचे, वित्तीयन तंत्र तथा शासन व्यवस्था जैसे विषयों पर अत्यधिक विविधता विद्यमान है। फ़िनलैंड पर्यावरण से संबंधित विभिन्न समझौतों पर बेहतर तालमेल को प्रोत्साहित करने के लिये प्रयास कर रहा है। अन्य देशों को भी UNEA तथा विभिन्न पर्यावरण समझौतों के बीच समन्वय स्थापित करने के लिये प्रयास करने चाहिये, इसके साथ ही प्रत्येक बहुपक्षीय पर्यावरण समझौते के निर्णयों का पूरी तरह से सम्मान करते हुए, भविष्य के संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभाओं को पर्यावरणीय एजेंडे को बेहतर तालमेल के साथ समग्र रूप से लागू करना चाहिये।

निष्कर्ष

मौजूदा वक्त में हमारा ग्रह विभिन्न पर्यावरणीय चुनौतियों से जूझ रहा है। इन चुनौतियों से निपटने के लिये अंतर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न प्रयास किये जा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र की संस्था UN पर्यावरण तथा UNEA अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न समझौतों पर चर्चा के लिये तथा जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिये एक प्रभावी मंच प्रदान कर रहे हैं। किंतु मौजूदा प्रयास इन चुनौतियों को दूर करने में कारगर साबित नहीं हो रहे हैं। फ़िनलैंड ने विभिन्न देशों और समझौतों से आगे बड़कर वर्ष 2035 तक स्वयं को कार्बन न्यूट्रल करने का निर्णय लिया है। अन्य देशों को भी फ़िनलैंड से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है। देशों को आर्थिक विकास को ही एक मात्र उद्देश्य बनाने के स्थान पर विकास की धारणीयता पर भी विचार करना आवश्यक है। यह भी सही है कि कोई देश अपने बल पर वैश्विक चुनौती से पार नहीं पा सकता इसलिये सभी देशों को मिलकर प्रयास करने होंगे। इन देशों के मध्य बेहतर तालमेल तथा समन्वय को बनाने के लिये पर्यावरण से संबंधित निकायों को एक मंच पर लाना होगा, साथ ही संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था को भी पर्यावरण उन्मुख बनाना होगा। प्रायः ऐसा माना जाता है कि एक विचार अथवा कार्य के असफल हो जाने पर दूसरी नीति को अपना लेना चाहिये जिसे प्लान बी भी कहा जाता है। किंतु हमे यह समझना होगा कि हमारे पास सिर्फ एक ही ग्रह है यहाँ कोई प्लेनेट बी उपलब्ध नहीं है।

प्रश्न: अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के बिना जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटना संभव नहीं है। चर्चा कीजिये।