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जैव विविधता और पर्यावरण

भारत की जलवायु कार्रवाई का मार्ग निर्देशन

  • 20 Apr 2026
  • 226 min read

यह एडिटोरियल 17/04/2026 को द हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित ‘The climate game India cannot afford to lose’ शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख COP33 की मेज़बानी से भारत की रणनीतिक वापसी विश्लेषण करते हुए ‘ग्लोबल साउथ’ के नेतृत्व की आकांक्षाओं और ऊर्जा सुरक्षा की कठोर आर्थिक वास्तविकताओं के बीच विद्यमान तनाव को रेखांकित करता है। साथ ही, यह भारत की जलवायु शमन प्रगति का समग्र मूल्यांकन प्रस्तुत करता है तथा वित्त और प्रौद्योगिकी से जुड़ी उन संरचनात्मक कमियों को उजागर करता है, जो एक वास्तविक और सुदृढ़ जलवायु परिवर्तन की दिशा में बाधा उत्पन्न करती हैं।

प्रिलिम्स के लिये: वैश्विक स्टॉकटेक, सॉवरेन ग्रीन बॉण्ड, MISHTI पहल, नगरीय ऊष्मा द्वीप प्रभाव

मेन्स के लिये: भारत में जलवायु अनुकूलन और शमन प्रयासों की वर्तमान स्थिति, भारत में जलवायु अनुकूलन और शमन के लिये प्रमुख चुनौतियाँ, भारत ने COP 33 की मेज़बानी से क्यों नाम वापस लिया

भारत वर्तमान में जलवायु संकट की अग्रिम पंक्ति में है। पहले से ही संचित वैश्विक उत्सर्जन में इसका योगदान लगभग 3% रहा है, फिर भी विश्व के तीसरे सबसे बड़े उत्सर्जक के रूप में वर्तमान वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में इसका योगदान लगभग 8% है। इसकी 50% से अधिक आबादी जलवायु-संवेदनशील कृषि पर निर्भर है और 85% किसान लघु एवं सीमांत किसान हैं। ऐसे में बढ़ता हीटवेव, अनियमित मानसून और ग्लेशियरों का विगलन व्यापक स्तर पर आजीविका के लिये खतरा बन गए हैं। इस संदर्भ में COP33 की मेज़बानी से भारत का बाहर रहने का निर्णय बदलती वैश्विक जलवायु परिस्थितियों के बीच अपनी विकासात्मक प्राथमिकताओं और रणनीतिक नीतिगत स्थान की रक्षा के लिये एक सुविचारित दृष्टिकोण को दर्शाता है। 

भारत में जलवायु अनुकूलन और शमन प्रयासों की वर्तमान स्थिति क्या है?

  • नवीकरणीय ऊर्जा अवसंरचना का तीव्र विस्तार:  भारत का उपयोगिता-स्तरीय नवीकरणीय अवसंरचना की ओर अति सक्रिय रुख, मौलिक रूप से इसकी ऊर्जा संरचना के जोखिम को कम करता है, साथ ही आर्थिक संवृद्धि को कार्बन तीव्रता से अलग करता है। 
    • अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन की संस्थागत गति के कारण पिछले एक दशक में मात्र सौर ऊर्जा क्षमता में ही चालीस गुना वृद्धि हुई है।
    • यह संरचनात्मक संक्रमण ग्रिड के डीकार्बोनाइज़ेशन के लिये एक सुदृढ़ आधार तैयार करता है, आयातित जीवाश्म ईंधन पर दीर्घकालिक निर्भरता को कम करता है और राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ाता है। 
      • परिणामस्वरूप, भारत ने वर्ष 2030 की समय सीमा से पाँच वर्ष पहले ही पेरिस समझौते के अपने प्रारंभिक लक्ष्य को हासिल कर लिया, जिसके तहत उसे अपनी स्थापित विद्युत क्षमता का 50% गैर-जीवाश्म स्रोतों से उत्पन्न करना था।
  • आवागमन का रणनीतिक विद्युतीकरण: परिवहन क्षेत्र, विशेष रूप से सार्वजनिक परिवहन और दोपहिया वाहनों का रणनीतिक विद्युतीकरण, शहरी वायु प्रदूषण की गंभीर समस्या को कम करता है और अर्थव्यवस्था को अस्थिर वैश्विक तेल कीमतों से संरक्षित रखता है। 
    • घरेलू इलेक्ट्रिक वाहन बैटरी निर्माण को गति देने से आत्मनिर्भर ‘मेक इन इंडिया’ आर्थिक ढाँचे के भीतर यह परिवर्तन और भी सुदृढ़ होता है। 
    • पीएम-ईबस सेवा जैसे कार्यक्रम के अंतर्गत सार्वजनिक परिवहन नेटवर्क में सुधार लाने के लिये टियर-2 और टियर-3 शहरों में 10,000 से अधिक इलेक्ट्रिक बसों को सक्रिय रूप से परिनियोजित किया जा रहा है। 
      • इसके साथ ही, दोपहिया इलेक्ट्रिक वाहनों का प्रसार तीव्र गति से बढ़ते हुए लगभग 30% हिस्सेदारी की ओर अग्रसर है, जिससे कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटने तथा राजकोष को प्रतिवर्ष अरबों रुपये की संभावित बचत होने का अनुमान है।
  • ग्रीन हाइड्रोजन इकोसिस्टम का व्यावसायीकरण: इस्पात, सीमेंट और उर्वरक जैसे कठिन-उत्सर्जन वाले क्षेत्रों को लक्षित करते हुए, भारत की हाइड्रोजन रणनीति बड़े औद्योगिक केंद्रों को जीवाश्म ईंधन-आधारित संचालन से स्वच्छ ऊर्जा-संचालित पारिस्थितिकी तंत्र में रूपांतरित करने की दिशा प्रदान करती है।
  • जलवायु-अनुकूलनशील कृषि का मुख्यधारा में समावेशन: पारंपरिक अधिक जल की आवश्यकता वाली फसलों से जलवायु-अनुकूलनशील खेती की ओर रुख करने से अनियमित मानसून और बढ़ते ताप तनाव के खिलाफ सुभेद्य लघु किसानों की आजीविका संरक्षित हो जाती है। 
    • कृषि प्रौद्योगिकी और जल-अनुकूल बीजों के लिये संस्थागत समर्थन भविष्य में संभावित फसल उत्पादन में गिरावट से ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावी रूप से संरक्षित करता है।
    • उदाहरण के लिये, अगस्त 2024 में, भारतीय प्रधानमंत्री ने भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान में 61 फसलों में 109 उच्च उपज देने वाली, जलवायु-अनुकूलनशील और जैव-संवर्द्धित फसल किस्मों को जारी किया, साथ ही कृषि में मूल्यवर्द्धन, जलवायु-अनुकूलनशील खेती और ‘प्रयोगशाला से भूमि तक’ दृष्टिकोण पर बल दिया।
      • इसके अतिरिक्त, कदन्न की खेती को बढ़ावा देने के लिये वार्तमान में जारी राष्ट्रीय अभियान (श्री अन्न) से कृषि में जल की खपत में कमी हो रही है।
  • उन्नत आपदा पूर्वानुमान और प्रारंभिक चेतावनी: मौसम संबंधी बुनियादी ढाँचे को उन्नत करने और राज्य-स्तरीय ऊष्मा कार्रवाई योजनाओं को संस्थागत रूप देने से चरम मौसम संबंधी घटनाओं के दौरान मानवीय हताहतों और आर्थिक नुकसान में व्यापक कमी आती है।
    • कॉमन अलर्टिंग प्रोटोकॉल (CAP) और मौसमग्राम जैसे प्लेटफॉर्म (विकेंद्रीकृत, स्थानीयकृत अलर्ट सिस्टम) यह सुनिश्चित करते हैं कि अत्यधिक संवेदनशील तटीय और ग्रामीण आबादी आकस्मिक आने वाले जलवायवीय घटनाओं से पहले ही सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित हो सकें या उन घटनाओं के प्रति अनुकूलन क्षमता का विकास कर सकें। 
    • भारत की मल्टी हज़ार्ड प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली वर्तमान में लगभग पूरी तटीय रेखा को कवर करती है, जिसके परिणामस्वरूप पिछले दशक में चक्रवात से संबंधित मृत्यु दर में 90% से अधिक की कमी हुई है। 
    • इसके अतिरिक्त गर्मी से प्रभावित 20 से अधिक राज्यों ने दैनिक वेतन भोगी श्रमिकों को प्राण घातक और लंबे समय तक चलने वाली लू से बचाने के लिये लक्षित शीतलन उपायों को लागू किया है।
  • ऊर्जा दक्षता और स्मार्ट कूलिंग को लागू करना: आवासीय और वाणिज्यिक बुनियादी ढाँचे में सुदृढ़ ऊर्जा दक्षता प्रोटोकॉल को मुख्यधारा में लाने से बेस-लोड विद्युत प्रबंधन और बढ़ती शहरी कूलिंग मांगों की दोहरी चुनौती का समाधान होता है। 
    • पैसिव कूलिंग डिज़ाइन और कुशल उपकरणों के क्रियान्वन से भीषण, लंबे समय तक चलने वाले गर्मी के महीनों के दौरान बिजली की खपत में होने वाली असंधारणीय वृद्धि को रोका जा सकता है। 
    • व्यापक इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान (ICAP) का लक्ष्य वर्ष 2037-38 तक सभी क्षेत्रों में कुल शीतलन मांग में 20-25% की कमी लाना है। 
    • इसके साथ ही UJALA योजना के तहत वितरित किये गए 360 मिलियन से अधिक LED बल्बों से सालाना लगभग 48 बिलियन किलोवाट-घंटे ऊर्जा की बचत हो रही है, जिससे ग्रिड पर चरम भार का दबाव काफी कम हो रहा है।
  • पारिस्थितिक कार्बन सिंक और बायो-शील्ड का सुदृढ़ीकरण: खराब हो चुके वन परिदृश्यों और महत्त्वपूर्ण तटीय बायोमों को बहाल करने से देश की प्राकृतिक कार्बन पृथक्करण क्षमता में प्रत्यक्ष रूप से वृद्धि होती है, साथ ही साथ स्थानीय जैव विविधता की स्थिति में भी सुधार होता है। 
    • समुदाय के नेतृत्व में किये गए संरक्षण प्रयासों से संवेदनशील तटीय क्षेत्रों को तूफानी लहरों, भूमि क्षरण और बढ़ते समुद्री जल स्तर से जीवित जैव-शील्ड में प्रभावी रूप से परिवर्तित किया जा सकता है। 
    • MISHTI पहल के अंतर्गत वर्तमान में नौ तटीय राज्यों में विस्तारित 540 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में मैंग्रोव वृक्षारोपण का विस्तार किया जा रहा है जिससे कमज़ोर तटरेखाओं को संरचनात्मक रूप से संरक्षित किया जा सकेगा। 
    • इसके अतिरिक्त, भारत के हाल ही में अद्यतन किये गए NDC के अनुसार, भारत का लक्ष्य वर्ष 2035 तक वन और वृक्ष आवरण को बढ़ाकर 3.5 से 4.0 बिलियन टन CO2 समतुल्य का अतिरिक्त कार्बन सिंक तैयार करना है। 
      • वर्ष 2025 तक भारत ने वनों और वृक्षों के आवरण से 2.29 बिलियन टन CO2 के बराबर अतिरिक्त कार्बन सिंक का निर्माण किया।
  • सॉवरेन हरित वित्त जुटाना: संरचित हरित वित्त तंत्र स्थापित करने से पूंजी-गहन शमन और अनुकूलन मेगा-परियोजनाओं के वित्तपोषण के लिये आवश्यक महत्त्वपूर्ण घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय पूंजी उपलब्ध हो जाती है। 
    • इस वित्तीय संरचना में सुदृढ़ पर्यावरणीय, सामाजिक और शासन (ESG) मानकों को लागू किया जाता है और साथ ही यह निजी क्षेत्र के संस्थागत निवेशों को सफलतापूर्वक आकर्षित करती है। 
    • भारत ने वित्त वर्ष 2022-23 में अपना सॉवरेन ग्रीन बॉण्ड (SGrB) कार्यक्रम शुरू किया, जिसके तहत जनवरी और फरवरी 2023 के दौरान दो किस्तों में कुल ₹16,000 करोड़ के बॉण्ड जारी किये गए।
      • ये विशेष निधियाँ सक्रिय रूप से निम्न-कार्बन उत्सर्जन वाले मेट्रो परिवहन नेटवर्क, बड़े स्तर के सौर ऊर्जा पार्कों तथा जलवायु-अनुकूल जल अवसंरचना के वित्तपोषण को सक्षम बना रही हैं, जो वैश्विक बाज़ार में सुदृढ़ विश्वास का संकेत है।
  • समुत्थानशील अवसंरचना और आजीविका: आर्थिक समीक्षा 2025-26 स्पष्ट रूप से ‘विकास को अनुकूलन के सर्वोत्तम रूप’ के रूप में परिभाषित करता है, जिसमें भौतिक और सामाजिक सुरक्षा उपायों के माध्यम से सुभेद्य समुदायों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई है। 
    • इसमें कृषि संबंधी जोखिमों को कम करने के लिये पीएम-KUSUM और नेशनल अडैप्टेशन फंड फॉर क्लाइमेट चेंज (NAFCC) जैसी प्रमुख योजनाओं में जलवायु अनुकूलनशीलता को मुख्यधारा में लाना शामिल है।
    • उदाहरण के लिये, पीएम-KUSUM योजना के तहत 10 लाख से अधिक स्टैंडअलोन सौर कृषि पंप स्थापित किये गए हैं। 
      • कोएलिशन फॉर डिज़ास्टर रेज़िलियेंट इंफ्रास्ट्रक्चर (CDRI) के माध्यम से भारत ने अपने परिवहन और बिजली क्षेत्रों में मल्टी-हज़ार्ड जोखिम आकलन को एकीकृत किया है।

भारत की जलवायु परिवर्तन प्रतिक्रिया की प्रभावशीलता को बाधित करने वाली प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?

  • कोयले पर निर्भरता और ग्रिड की जड़ता: आधारभूत बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने हेतु घरेलू कोयले पर निरंतर निर्भरता भारत के कार्बन उत्सर्जन में कमी के मार्ग में गंभीर बाधा उत्पन्न करती है, जिससे उच्च उत्सर्जन का दुष्चक्र निर्मित होता है। 
    • बड़े पैमाने पर बैटरी अवसंरचना में समानांतर निवेश के अभाव में परिवर्तनशील नवीकरणीय ऊर्जा का तीव्र एकीकरण ग्रिड स्थिरता को जोखिम में डालता है तथा बिजली कटौती की आशंका बढ़ाता है। 
    • वर्तमान में भारत में बिजली उत्पादन का 70% से अधिक भाग कोयले पर आधारित है, जो 240 गीगावाट से अधिक की रिकॉर्ड ग्रीष्मकालीन मांग के दबाव में है। 
    • इसके अलावा, 2032 तक ग्रिड स्थिरता सुनिश्चित करने के लिये भारत को अनुमानित 411 गीगावाट घंटे की ऊर्जा भंडारण क्षमता की आवश्यकता होगी, लेकिन वर्तमान बीईएस और पंप युक्त हाइड्रो परियोजनाएँ अपर्याप्त बनी हुई हैं।
  • जलवायु वित्त में भारी कमी: रियायती अंतर्राष्ट्रीय जलवायु वित्त में गंभीर कमी के कारण भारत को अनुकूलन की दिशा में घरेलू पूंजी का पुनर्निर्देशन करना पड़ रहा है, जिससे व्यापक आर्थिक स्थिरता पर दबाव उत्पन्न होता है। 
    • घरेलू सार्वजनिक वित्तपोषण पर अत्यधिक निर्भरता राजकोषीय घाटे को बढ़ाती है तथा संवेदनशील क्षेत्रों में उच्च जोखिम वाली परियोजनाओं को अपर्याप्त वित्त उपलब्ध कराती है।
    • भारत को अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित अंशदान (NDC) के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये वर्ष 2030 तक अनुमानित 2.5 ट्रिलियन डॉलर की आवश्यकता होगी, फिर भी वास्तविक हरित वित्त प्रवाह इस वार्षिक आवश्यकता के एक चौथाई से भी कम है। 
  • शहरी अवसंरचना का कुपरिनियोजन (Maladaptation): अव्यवस्थित शहरीकरण तथा प्राकृतिक जल-निकासी तंत्रों के व्यापक कंक्रीटीकरण ने महानगरों की जल-वैज्ञानिक सहनशीलता को गंभीर रूप से क्षीण कर दिया है, जिससे मौसमी वर्षा विनाशकारी शहरी बाढ़ में परिवर्तित हो रही है।
    • इसके अतिरिक्त, शहरी ग्रीन-ब्लू नेटवर्क के व्यवस्थित विनाश से शहरी ऊष्मा द्वीप (UHI) प्रभाव में तीव्र वृद्धि हो रही है, जो घातक तापीय तनाव तथा अस्थिर शीतलन मांग को बढ़ावा देता है।
      • उदाहरणस्वरूप, भारतीय विज्ञान संस्थान के अध्ययनों के अनुसार, बंगलूरू में पिछले पाँच दशकों में तीव्र कंक्रीटीकरण के कारण लगभग 93% झीलें तथा वन समाप्त हो चुके हैं; जल निकायों में 79% तथा वन आच्छादन में 88% की कमी आई है, जबकि निर्माण गतिविधियाँ दस गुना से अधिक बढ़ गई हैं।
    • परिणामस्वरूप, शहर को अब भीषण गर्मी, हल्की बारिश के बाद बार-बार आने वाली बाढ़ और लगातार जल संकट का सामना करना पड़ रहा है।
  • मानसूनी बदलावों के प्रति कृषि की संवेदनशीलता: अनियमित मानसूनी पैटर्न एवं स्थानीय वर्षा में कमी का तीव्र होना वर्षा-आधारित कृषि के लिये गंभीर खतरा उत्पन्न कर रहा है, जिससे गंभीर व्यापक आर्थिक मुद्रास्फीति और ग्रामीण आजीविका संकट उत्पन्न हो रहे हैं। 
    • फसल बीमा कवरेज की सीमाएँ तथा जलवायु-अनुकूल तकनीकों का धीमा प्रसार लघु किसानों को अचानक पारिस्थितिकी व्यवधानों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है। 
    • वर्ष 2015 से 2021 के बीच लगभग 69 मिलियन हेक्टेयर फसल क्षेत्र ( 33.9 मिलियन हेक्टेयर बाढ़/अत्यधिक वर्षा तथा 35 मिलियन हेक्टेयर सूखा) चरम मौसमीय घटनाओं से प्रभावित हुआ। 
    • वर्तमान आकलन संकेत देते हैं कि आक्रामक अनुकूलन उपायों के अभाव में वर्षा-आधारित धान उत्पादन में वर्ष 2050 तक 20% तक गिरावट संभव है, जिससे 86% सीमांत कृषि परिवारों की आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
  • न्यायसंगत परिवर्तन की जटिलताएँ: जीवाश्म ईंधन के चरणबद्ध परित्याग की प्रक्रिया पूर्वी भारत के कोयला उत्पादक राज्यों के लिये एक गंभीर सामाजिक-आर्थिक दुविधा उत्पन्न करती है, जहाँ स्थानीय अर्थव्यवस्थाएँ खनन गतिविधियों से अविभाज्य रूप से जुड़ी हुई हैं। 
    • इन संसाधन-निर्भर क्षेत्रों में वैकल्पिक औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र तथा लक्षित पुनर्कौशल विकास कार्यक्रमों की कमी के कारण ‘न्यायसंगत संक्रमण’ का ढाँचा विकसित करना अत्यंत जटिल हो जाता है। 
    • झारखंड, छत्तीसगढ़ एवं ओडिशा जैसे राज्यों में 13 मिलियन से अधिक लोग अपनी आजीविका के लिये प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोयला मूल्य शृंखला पर निर्भर हैं। 
    • इन क्षेत्रों को स्वच्छ ऊर्जा अर्थव्यवस्था में रूपांतरित करने हेतु आगामी तीन दशकों में लक्षित सामाजिक सुरक्षा एवं पुनर्प्रशिक्षण निवेश के रूप में लगभग 900 बिलियन डॉलर की आवश्यकता अनुमानित है।
  • बढ़ता जल तनाव तथा हिमनदों का पिघलना: हिमालयी ग्लेशियरों का तीव्र गति से पिघलना तथा भूजल भंडारों के अनियंत्रित दोहन के संयुक्त प्रभाव से उपमहाद्वीप में बहुस्तरीय ताजे जल का संकट उभर रहा है। 
    • यह द्विस्तरीय संकट उत्तरी भारत में कृषि के लिये आवश्यक नदी प्रवाह को बाधित करने के साथ-साथ नगरपालिका एवं औद्योगिक जल सुरक्षा हेतु अनिवार्य भूमिगत जलभंडारों को भी गंभीर जोखिम में डालता है।
    • हिंदू कुश हिमालयी ग्लेशियर तीव्र गति से सिकुड़ रहे हैं, जिससे मध्य शताब्दी तक गंगा एवं ब्रह्मपुत्र घाटियों के लिये आवश्यक ग्रीष्मकालीन जल प्रवाह में उल्लेखनीय कमी की आशंका है। 
      • साथ ही नीति आयोग के आँकड़ों के अनुसार लगभग 60 करोड़ भारतीय वर्तमान में उच्च से अत्यधिक जल संकट का सामना कर रहे हैं  और अनेक प्रमुख शहरी केंद्र ‘डे ज़ीरो’ की स्थिति के निकट पहुँच रहे हैं।
  • तकनीकी और बौद्धिक संपदा संबंधी बाधाएँ: आयातित स्वच्छ प्रौद्योगिकियों पर भारत की अत्यधिक निर्भरता और पेटेंट प्राप्त वैश्विक बौद्धिक संपदा की अत्यधिक लागत महत्त्वपूर्ण शमन अवसंरचना के तेज़ी से घरेलू विस्तार को गंभीर रूप से बाधित करती है। 
    • ग्रीन हाइड्रोजन इलेक्ट्रोलाइज़र और उन्नत बैटरी रसायन विज्ञान जैसे उभरते क्षेत्रों में स्वदेशी R&D (अनुसंधान एवं विकास) की कमी डीकार्बोनाइजेशन की समयसीमा को विलंबित करती है तथा लागत बढ़ाती है। 
    • वर्तमान में भारत अपने सौर फोटोवोल्टिक घटकों का 70–80% से अधिक आयात करता है तथा उन्नत लिथियम-आयन बैटरी सेल के लिये लगभग पूर्णतः वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं पर निर्भर है। 
    • परिणामस्वरूप, वैश्विक उत्तर से प्रभावी प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के अभाव में 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य वित्तीय एवं लॉजिस्टिक दृष्टि से अनिश्चित बना हुआ है।
  • खंडित संस्थागत शासन: भारत का नौकरशाही ढाँचा अत्यधिक विखंडित होने के कारण समन्वित जलवायु कार्रवाई में बाधा उत्पन्न करता है, क्योंकि केंद्रीय मंत्रालयों और राज्य स्तरीय विभागों के बीच अतिव्यापी अधिकार क्षेत्र प्रायः नीतिगत गतिरोध को जन्म देते हैं। 
    • यह संरचना एकीकृत पर्यावरणीय नियमों के प्रभावी प्रवर्तन को सीमित करती है तथा राष्ट्रीय अनुकूलन उपायों की ज़मीनी प्रभावशीलता को कमज़ोर करती है। 
    • केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार, NCAP (राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम) एवं 15वें वित्त आयोग के अंतर्गत शामिल 130 गैर-प्राप्ति शहरों में से आधे से अधिक ने अपने फंड का 50% से कम उपयोग किया है, जबकि 50–60 शहरों ने दो-तिहाई से भी कम व्यय किया। 
    • वित्त वर्ष 2021-22 से 2025-26 के बीच 15,000 करोड़ रुपये से अधिक आवंटन के बावजूद, 25–30 शहरों ने आधी से भी कम राशि का उपयोग किया, जबकि वायु प्रदूषण की स्थिति और अधिक खराब हो गई है।
  • ‘संयुक्त वक्तव्य’ एवं COP की प्रभावशीलता में कमी: हाल के COP (Conference of the Parties) शिखर सम्मेलनों, विशेषकर COP30 (बेलेम, 2025) में ‘अध्यक्षता रोडमैप’ की प्रवृत्ति उभरी है, जो गैर-बाध्यकारी होने के कारण अंतर्राष्ट्रीय विधिक शक्ति से वंचित है। 
    • भारत के लिये, ये शिखर सम्मेलन वास्तविक प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के बजाय ‘वाक्पटुतापूर्ण महत्त्वाकांक्षा’ के मंच बनते जा रहे हैं, जिसके चलते भारत ने हाल ही में ‘अवास्तविक’ शमन लक्ष्यों में फँसने से बचने के लिये COP33 (2028) की मेज़बानी के लिये अपनी बोली वापस ले ली।
    • यद्यपि COP30 ने 2035 तक प्रति वर्ष 1.3 ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य प्रस्तावित किया, फिर भी ‘नया सामूहिक मात्रात्मक लक्ष्य’ (NCQG) इस बारे में अस्पष्ट बना हुआ है कि इसमें से कितना ‘अनुदान-आधारित’ है और कितना ‘ऋण-सृजन करने वाला’।

भारत द्वारा COP33 (2028) की मेज़बानी से पीछे हटने के संभावित कारण:

  • मेज़बान की भूमिका एवं राष्ट्रीय हितों के मध्य अंतर्विरोध: COP33 के मेज़बान के रूप में भारत से पेरिस समझौते के सुदृढ़ अनुपालन एवं उसे आगे बढ़ाने की अपेक्षा की जाती है, किंतु भारत का विकसित होता दृष्टिकोण कठोर प्रतिबद्धताओं के स्थान पर विकास एवं लचीलेपन को प्राथमिकता देता है। इससे वैश्विक अपेक्षाओं एवं राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के मध्य स्पष्ट अंतर्विरोध उत्पन्न होता है।
  • भारत की जलवायु रणनीति में परिवर्तन: भारत ने तापमान लक्ष्यों तथा वैश्विक जलवायु नीति के शमन-केंद्रित दृष्टिकोण पर निरंतर प्रश्न उठाते हुए अब उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिये अनुकूलन एवं विकासात्मक आवश्यकताओं को प्रमुखता दी है। ऐसी स्थिति में COP की मेज़बानी भारत के इस स्वायत्त एवं विकसित होते दृष्टिकोण को सीमित कर सकती थी।
  • जलवायु वित्त पर असहमति: भारत ने अनुच्छेद 9.1 के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु विकसित देशों से सुनिश्चित वित्तीय सहायता की मांग को दृढ़तापूर्वक रखा है, किंतु जलवायु वित्त वार्ताओं में लगातार गतिरोध के कारण विश्वास की कमी और गहरी हुई है। मेज़बान देश के रूप में भारत को विरोधी हितों का संतुलन करना पड़ता, जिससे उसकी वार्तात्मक स्थिति कमज़ोर पड़ सकती थी।
  • जलवायु प्रतिबद्धताओं में वृद्धि का दबाव: तीसरे सबसे बड़े उत्सर्जक के रूप में भारत पर अपने जलवायु लक्ष्यों को और अधिक महत्त्वाकांक्षी बनाने का दबाव बढ़ता जा रहा है। COP की मेज़बानी से घरेलू नीतियों पर वैश्विक निगरानी तीव्र हो जाती, जिससे विकास एवं ऊर्जा नीति से जुड़े विकल्प सीमित हो सकते थे।
  • ग्लोबल स्टॉकटेक (GST) संबंधी दायित्व: COP33 के अंतर्गत पेरिस समझौते की प्रगति का आकलन करने हेतु द्वितीय GST आयोजित किया जाना था। इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप वैश्विक उत्सर्जन कटौती की मांग और तीव्र हो सकती थी तथा मेज़बान देश के रूप में भारत पर ऐसे महत्त्वाकांक्षी लक्ष्यों के प्रति उत्तरदायित्व बढ़ता, भले ही वे उसके राष्ट्रीय हितों से पूर्णतः मेल न खाते हों।
  • भू-राजनीतिक बाधाएँ एवं कमज़ोर वैश्विक सहयोग: संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे प्रमुख उत्सर्जकों की कम भागीदारी वैश्विक जलवायु प्रयासों को कमज़ोर करती है। साथ ही विकसित और विकासशील देशों के बीच विभाजन और भी बढ़ गया है। इससे मेज़बान के रूप में आम सहमति बनाना और भी चुनौतीपूर्ण हो गया है।

भारत में जलवायु कार्रवाई को तीव्र एवं सुदृढ़ करने हेतु कौन-कौन से उपाय अपनाये जा सकते हैं?

  • विकेंद्रीकृत माइक्रो-ग्रिड एवं वर्चुअल पावर प्लांट का एकीकरण: ब्लॉकचेन-सक्षम माइक्रो-ग्रिड के माध्यम से पीयर-टू-पीयर ऊर्जा व्यापार को प्रोत्साहित करने से नवीकरणीय ऊर्जा का व्यापक लोकतंत्रीकरण संभव होता है तथा केंद्रीय राष्ट्रीय ग्रिड पर पड़ने वाले अंतराल-जनित दबाव को कम किया जा सकता है। 
    • आवासीय एवं औद्योगिक क्षेत्रों को VPP (वर्चुअल पावर प्लांट) के रूप में संचालित करने हेतु प्रोत्साहन देकर, भारत वितरित रूफटॉप सौर ऊर्जा तथा स्थानीयकृत बैटरी भंडारण का उपयोग करते हुए चरम भार मांग का गतिशील प्रबंधन कर सकता है। 
    • यह व्यवस्था निष्क्रिय उपभोक्ताओं को सक्रिय स्व-उत्पादक उपभोक्ता (Prosumer) में रूपांतरित करती है, जिससे ग्रामीण ऊर्जा विश्वसनीयता सुदृढ़ होती है तथा उच्च-वोल्टेज पारेषण अवसंरचना के विस्तार हेतु आवश्यक भारी पूंजीगत व्यय को न्यूनतम किया जा सकता है।
  • स्पंज सिटी आर्किटेक्चर एवं ब्लू-ग्रीन कॉरिडोर का कार्यान्वयन: पारगम्य फुटपाथ, जैव-धारण संरचनाओं तथा परस्पर जुड़े आर्द्रभूमि तंत्र के साथ शहरी केंद्रों का पुनर्रचना करने से वर्षाजनित शहरी बाढ़ एवं UHI प्रभाव के बढ़ते जोखिम को प्रभावी रूप से कम किया जा सकता है। 
    • ये ‘स्पंज सिटी’ पहलें कठोर कंक्रीटीकरण-आधारित समाधान के स्थान पर प्रकृति-आधारित दृष्टिकोण को प्राथमिकता देती हैं, जिससे शहरों को वर्षा जल के अवशोषण, भंडारण एवं पुनः उपयोग की क्षमता प्राप्त होती है। 
    • साथ ही, निरंतर ब्लू-ग्रीन कॉरिडोर का विकास शहरी सूक्ष्म जलवायु को संतुलित करता है, जिससे तापीय दबाव में कमी आती है, श्रमिक वर्ग को राहत मिलती है तथा भूजल पुनर्भरण को भी प्रोत्साहन मिलता
  • पुनर्योजी कृषि एवं जैव-उत्तेजक पदार्थों का अंगीकरण: रासायनिक-गहन एक कृषि पद्धति से पुनर्योजी कृषि तकनीकों (जैसे शून्य जुताई, आवरण फसल तथा समुद्री शैवाल-आधारित जैव-उत्तेजक पदार्थों का उपयोग) की ओर संक्रमण से मृदा में जैविक कार्बन एवं नमी धारण क्षमता की पुनर्स्थापना संभव है। 
    • ये पद्धतियाँ मृदा की जैविक सहनशीलता को सुदृढ़ करती हैं, जिससे फसलें दीर्घकालिक लू एवं अनियमित वर्षा से उत्पन्न भौतिक तनावों के प्रति कम संवेदनशील होती हैं। 
    • ‘कार्बन फार्मिंग’ प्रोत्साहनों को संस्थागत रूप प्रदान कर भारत लघु किसानों को कार्बन क्रेडिट के माध्यम से आय के वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध करा सकता है, जिससे सतत भूमि प्रबंधन की आर्थिक व्यवहार्यता सुनिश्चित होगी।
  • औद्योगिक कार्बन उत्सर्जन में कमी हेतु अनिवार्य चक्रीय अर्थव्यवस्था विनियम: इस्पात एवं सीमेंट जैसे कठिन-उत्सर्जन क्षेत्रों में कठोर संसाधन दक्षता मानकों तथा द्वितीयक सामग्री उपयोग के अनिवार्य प्रावधानों को लागू करने से औद्योगिक कार्बन पदचिह्न में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।
    • ‘औद्योगिक सहजीवन’ केंद्रों (जहाँ एक इकाई का अपशिष्ट ऊष्मा अथवा उप-उत्पाद दूसरी इकाई के लिये कच्चे माल के रूप में प्रयुक्त होता है) के विकास से संसाधन उत्पादकता में वृद्धि होती है तथा स्थानीय पर्यावरणीय क्षरण कम होता है। 
    • यह चक्रीय संक्रमण न केवल कच्चे माल की मांग एवं ऊर्जा-गहन प्रसंस्करण लागत को घटाता है, बल्कि घरेलू आपूर्ति शृंखलाओं को वैश्विक वस्तु अस्थिरता से भी सुरक्षित करता है।
  • जलवायु-अनुकूल स्थानिक योजना एवं आपदा-क्षेत्र निर्धारण: स्थानीय मास्टर प्लान में उच्च-रिज़ॉल्यूशन जलवायु जोखिम मॉडलिंग के एकीकरण से बाढ़ मैदानों तथा तटीय ‘निषिद्ध निर्माण’ क्षेत्रों जैसे पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में उच्च-जोखिम अवसंरचना विकास को प्रभावी रूप से रोका जा सकता है। 
    • रियल एस्टेट एवं अवसंरचना परियोजनाओं के लिये अनिवार्य ‘जलवायु-जोखिम प्रकटीकरण’ लागू करने से यह सुनिश्चित होता है कि पूंजी प्रवाह ऐसे अनुकूलित डिज़ाइनों की ओर निर्देशित हो, जो समुद्र-स्तर वृद्धि एवं चरम मौसमीय घटनाओं को पूर्वानुमानित करते हों। 
    • यह सक्रिय स्थानिक शासन दीर्घकालिक ‘हानि एवं क्षति’ देनदारियों को न्यूनतम करता है तथा सार्वजनिक एवं निजी संपत्तियों को संभावित पर्यावरणीय आपदाओं से संरक्षित करता है।
  • अति-स्थानीय ताप कार्य योजनाओं (HAP) का संस्थागतकरण: राज्य-स्तरीय ताप कार्य योजनाओं को वार्ड-स्तरीय हस्तक्षेपों में रूपांतरित करने से ‘कूल रूफ’ कार्यक्रमों एवं अनिवार्य ‘ताप-राहत क्षेत्रों’ के माध्यम से अत्यंत संवेदनशील शहरी आबादी की प्रभावी सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है। 
    • किफायती आवास योजनाओं में पारंपरिक स्थानीय वास्तुकला (जैसे प्राकृतिक वेंटिलेशन एवं छायादार आंगन) के समावेशन से ऊर्जा-गहन यांत्रिक शीतलन पर निर्भरता घटती है। 
    • ये विकेंद्रीकृत HAP सामाजिक समानता को प्राथमिकता देते हुए यह सुनिश्चित करते हैं कि दैनिक वेतनभोगी एवं झुग्गीवासी भी जलवायु-लचीले अवसंरचना तक पहुँच प्राप्त करें, जिससे ताप-संबंधी मृत्यु दर एवं उत्पादकता हानि में कमी लाई जा सके।
  • लंबी दूरी की लॉजिस्टिक्स में ग्रीन हाइड्रोजन का उपयोग: भारी-भरकम ट्रकिंग एवं रेलवे माल ढुलाई को ग्रीन हाइड्रोजन ईंधन सेल आधारित प्रणालियों में रूपांतरित करने की प्रक्रिया को तीव्र करने से परिवहन क्षेत्र के उच्च-उत्सर्जन खंड का प्रभावी समाधान किया जा सकता है। 
    • प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे हाइड्रोजन रिफ्यूलिंग स्टेशनों से युक्त ‘ग्रीन फ्रेट कॉरिडोर’ की स्थापना से इलेक्ट्रोलाइज़र लागत एवं ईंधन मूल्य को कम करने हेतु आवश्यक पैमाना विकसित किया जा सकता है। 
    • यह संक्रमण न केवल अर्थव्यवस्था की आधारभूत लॉजिस्टिक संरचना को कार्बन-मुक्त करेगा, बल्कि आयातित LNG एवं कच्चे तेल पर निर्भरता को घटाकर रणनीतिक स्वायत्तता को भी सुदृढ़ करेगा।
  • मिश्रित वित्त साधनों के माध्यम से जलवायु वित्त का लोकतंत्रीकरण: ‘मिश्रित वित्त’ (जहाँ सार्वजनिक एवं परोपकारी पूंजी द्वारा निजी निवेश के जोखिम को न्यूनतम किया जाता है) के उपयोग से अपशिष्ट जल पुनर्चक्रण एवं मैंग्रोव बहाली जैसी उच्च-प्रभाव किंतु निम्न-लाभकारी अनुकूलन परियोजनाओं हेतु बड़े पैमाने पर ऋण प्रवाह को सक्षम किया जा सकता है। 
    • राज्य-स्तरीय ‘ग्रीन बैंक’ की स्थापना से ग्रामीण उद्यमियों को सौर सिंचाई पंप एवं ऊर्जा-कुशल शीत भंडारण इकाइयों को अपनाने के लिये सूक्ष्म वित्तपोषण सुलभ होगा। 
    • यह वित्तीय नवाचार ‘पायनियर गैप’ को पाटते हुए जलवायु-स्मार्ट प्रौद्योगिकियों को उन क्षेत्रों तक विस्तार करने में सहायक होगा, जिन्हें पारंपरिक वाणिज्यिक बैंकिंग तंत्र प्रायः उपेक्षित करता रहा है। 

निष्कर्ष: 

भारत की जलवायु यात्रा विकास की अनिवार्य आवश्यकताओं एवं वैश्विक तापमान वृद्धि की अपरिहार्यता के मध्य एक जटिल संतुलन स्थापित करने का प्रयास है। COP33 की मेज़बानी से पीछे हटना ऊर्जा सुरक्षा एवं घरेलू नीति सुदृढ़ीकरण की दिशा में एक व्यावहारिक पुनर्संरेखण को इंगित करता है, लेकिन दीर्घकालिक सफलता अंततः वित्तीय संसाधनों एवं प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के मध्य विद्यमान अंतर को पाटने पर निर्भर करेगी। प्रतीकात्मक कूटनीति से आगे बढ़कर ठोस एवं बहुआयामी कार्रवाइयों (जैसे ग्रीन हाइड्रोजन से लेकर पुनर्योजी कृषि) की ओर बढ़ते हुए भारत अपनी 1.4 अरब आबादी के लिये एक अनुकूलित एवं कम-कार्बन वाला भविष्य सुनिश्चित करने की दिशा में अग्रसर हो सकता है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न 

‘COP33’ की मेज़बानी से भारत का पीछे हटना जलवायु प्रतीकात्मकता से रणनीतिक यथार्थवाद की ओर संक्रमण को दर्शाता है।’ वर्तमान वैश्विक ऊर्जा अस्थिरता तथा भारत की घरेलू ऊर्जा सुरक्षा आवश्यकताओं के परिप्रेक्ष्य में इस कथन का विश्लेषण कीजिये।

UNFCCC COP 30 का विस्तृत विवरण | UPSC | दृष्टि IAS (हिंदी)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. भारत की वर्तमान गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता की स्थिति क्या है?
भारत ने पेरिस समझौते के निर्धारित समय-सीमा से लगभग पाँच वर्ष पूर्व, अर्थात 2025 तक, गैर-जीवाश्म स्रोतों से अपनी स्थापित विद्युत क्षमता का 50% लक्ष्य प्राप्त कर लिया है।

2. पेरिस समझौते के लिये वर्ष 2028 क्यों महत्त्वपूर्ण है?
यह दूसरे ग्लोबल स्टॉकटेक (GST ) का प्रतीक है, जिसमें देशों को अपनी जलवायु प्रतिबद्धताओं की समीक्षा कर उन्हें और अधिक महत्त्वाकांक्षी बनाने की अपेक्षा की जाएगी।

3. मिष्टी’ (MISHTI) पहल क्या है?
यह एक सरकारी कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य भारत के तटीय क्षेत्रों में मैंग्रोव वनीकरण को बढ़ावा देकर तूफानी ज्वार (storm surge) के विरुद्ध जैव-ढाल (bio-shield) का निर्माण करना है।

4. भारत को वर्ष 2030 तक अपने राष्ट्रीय विकास लक्ष्यों (NDC) के लिये कितने वित्त की आवश्यकता होगी?
भारत को अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित अंशदान (NDC ) को पूरा करने के लिये अनुमानित 2.5 ट्रिलियन डॉलर की आवश्यकता है।

5. 'वर्चुअल पावर प्लांट' (VPP) क्या हैं?
ऐसी प्रणालियाँ जो रूफटॉप सोलर जैसे वितरित ऊर्जा संसाधनों को समेकित कर ग्रिड की मांग का गतिशील प्रबंधन सुनिश्चित करती हैं।

 

UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ) 

प्रिलिम्स:

प्रश्न. वर्ष 2015 में पेरिस में UNFCCC की बैठक में हुए समझौते के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (2016)

  1. इस समझौते पर UN के सभी सदस्य देशों ने हस्ताक्षर किये और यह वर्ष 2017 से लागू होगा।
  2.  यह समझौता ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन को सीमित करने का लक्ष्य रखता है जिससे इस सदी के अंत तक औसत वैश्विकं तापमान की वृद्धि उद्योग-पूर्व स्तर (pre-industrial levels) से 2 °C या कोशिश करें कि 1.5 °C से भी अधिक न होने पाए।
  3.  विकसित देशों ने वैश्विक तापन में अपनी ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी को स्वीकारा और जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिये विकासशील देशों की सहायता के लिये 2020 से प्रतिवर्ष 1000 अरब डॉलर देने की प्रतिबद्धता जताई।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1 और 3

(b)  केवल 2

(c)  केवल 2 और 3

(d)  1, 2 और 3

उत्तर: (b)

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