वर्ष 2022 तक किसानों की दोगुनी आय: एक महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य? | 29 Aug 2017

संदर्भ

  • इस बार स्वतंत्रता दिवस के भाषण में प्रधानमंत्री ने 12 बार किसानों का उल्लेख किया। उन्होंने कृषि क्षेत्र की अनेक उपलब्धियों के विषय में राष्ट्र को अवगत कराया, जैसे-9 करोड़ किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड उपलब्ध कराना और वर्धित फसल बीमा योजना।
  • उन्होंने इस बात का भी उल्लेख किया कि प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के अंतर्गत 99 प्रोजेक्टों को वर्ष 2019 तक पूरा कर लिया जाएगा, खाद्य प्रसंस्करण में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को प्रोत्साहित किया जाएगा, किसानों के उत्पादन की आपूर्ति को सुनिश्चित किया जाएगा तथा उन्हें उनके उत्पाद की बाज़ार बिक्री में भी सहयोग किया जाएगा।
  • साथ ही प्रधानमंत्री ने कहा था कि वर्ष 2022 तक देश के किसानों की आय दोगुनी हो जाएगी। इस लक्ष्य ने नीति-निर्माताओं, अर्थशास्त्रियों और सबसे महत्त्वपूर्ण किसानों का ध्यान आकर्षित किया। आरम्भ में यह स्पष्ट नहीं था कि सरकार किसानों की वास्तविक आय को दुगुना करना चाहती है अथवा सांकेतिक आय को?
  • परन्तु अब इसके प्रमाण उपलब्ध हैं कि सरकार का उद्देश्य किसानों की वास्तविक आय को दोगुनी करने का है। किसानों की दोगुनी आय पर बनाई गई समिति के नवीनतम रिपोर्टो ने इस लक्ष्य का उल्लेख किया है।

समिति की रिपोर्ट से संबंधित महत्त्वपूर्ण बिंदु

  • 13 अप्रैल 2016 को सरकार ने किसानों की आय पर एक रिपोर्ट तैयार करने के लिये केंद्र सरकार के कृषि मंत्रालय में तत्कालीन अतिरिक्त सचिव अशोक दलवाई के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया।
  • इस रिपोर्ट में तीन क्षेत्रों पर ध्यान केन्द्रित किया गया था- उत्पादकता लाभ, फसल के मूल्य में कमी और लाभकारी मूल्य। इस सामरिक ढाँचे में चार चिंताएँ भी थी जैसे- टिकाऊ कृषि उत्पादन, किसानों के उत्पाद का मौद्रीकरण, विस्तार सेवाओं का पुनः मज़बूतीकरण और कृषि को एक उद्यम के रूप में मान्यता प्रदान करना।
  • इस रिपोर्ट में कृषि, सिंचाई, ग्रामीण सड़कों, ग्रामीण ऊर्जा और ग्रामीण विकास में निवेश की आवश्यकता को पूरा करने के लिये एक आर्थिक मॉडल का उपयोग करने पर भी ज़ोर दिया गया था, जिससे 2015-16 के आधार वर्ष पर वर्ष 2022-23 तक किसानों की दोगुनी आय में 10.41% की वार्षिक वृद्धि का लक्ष्य प्राप्त किया जा सके।
  • ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि वर्ष 2002-03 से 2012-13 और इसके आगे के वर्षों में किसानों की वास्तविक आय में प्रति वर्ष मात्र 3.5% की दर से वृद्धि हुई।
  • अतः किसानों की दोगुनी आय से तात्पर्य तीन गुने प्रयास और संसाधनों से है। इसका तात्पर्य यह है कि वर्ष 2011-12 की कीमतों पर लगभग 6,40,000 करोड़ का अतिरिक्त निवेश किया जाए और इसमें कृषि रसद, कोल्ड चेन्स आदि में किये गए निवेश को शामिल नहीं किया जा सकता।
  • इस निवेश का 80% सरकार द्वारा प्राप्त होगा। यदि दोगुनी किसान आय के सपने को वास्तविक रूप प्रदान करना है तो कृषि के लिये निवेश में 22% तक की वृद्धि करने की आवश्यकता है।

रिपोर्ट में किन बातों पर ध्यान नहीं दिया गया?

  • इस रिपोर्ट में इस बात पर कोई भी चर्चा नहीं की गई कि इन संसाधनों को कहाँ से और कैसे उत्पन्न किया जाएगा।
  • दरअसल, ऋणों में छूट, सब्सिडी और कल्याण कार्यक्रम के कारण बजट पर हावी होने वाले दबावों के चलते इस निवेश-राशि में संकुचन आएगा। इस निवेश के परिणामस्वरूप कितना कृषि उत्पादन होगा और इस बढ़े हुए उत्पादन का उपयोग कहाँ पर किया जाएगा? रिपोर्ट में इसकी भी चर्चा नहीं की गई है।
  • हमने अक्सर यह देखा है कि जब भी उत्पादन में वृद्धि होती है तो मूल्यों में गिरावट आती है। इस वर्ष अनेक राज्यों में उत्पादन में वृद्धि के कारण प्याज, आलू, दलों और तिलहन की कीमतों में गिरावट आई है।
  • यदि घरेलू उपभोग से निर्गतों में वृद्धि नहीं हो सकती तो क्या हम वैश्विक बाज़ारों में निर्यात कर सकते हैं? यह रिपोर्ट इन बुनियादी प्रश्नों का उत्तर नहीं देती है।

तो क्या वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य हासिल नहीं हो पाएगा?

  • क्या वर्ष 2022 तक दुगुनी किसान आय प्राप्त करने का लक्ष्य एक स्वप्न बनकर ही रह जाएगा? संभवतः यही होगा, यद्यपि यह आवश्यक नहीं है।
  • इस स्वप्न को वास्तविकता में बदलने के लिये वर्ष 1978-84 के दौरान किये गए चीन के कार्यों पर ध्यान देना आवश्यक है।
  • इस देश ने छह वर्षों में किसानों की वास्तविक आय को दुगना कर दिया था तथा गरीबी में लगभग 50% की कमी कर दी थी। भारत चीन के कृषि सुधार नीति से बहुत कुछ सिख सकता है।
  • दरअसल, खाद्य मूल्य श्रृंखला को यदि किसानों के लिये हितकर बनाना है तो उसे उत्पादन-चालित प्रणाली के आधार पर चलाने के बजाय मांग आधारित एक ऐसी प्रणाली के तहत चलाना होगा, जिसमें उपभोक्ता शीघ्रता से उत्पादकों से जुड़ जाते हैं।
  • इसके लिये नए तरीकों और नवाचारों की आवश्यकता होगी, इसके साथ-साथ खाद्य प्रणाली में निजी क्षेत्र और अन्य हितधारकों के बीच सहयोग को बढ़ावा देना होगा।
  • आज जलवायु परिवर्तन एवं भूमि और जल संसाधनों पर बढ़ते दबाव  के कारण कोई भी हितधारक चाहे वह सरकार हो, कॉर्पोरेट क्षेत्र हो या फिर सिविल सोसायटी हो अकेले ऐसा नहीं कर सकती है। अतः विभिन्न संगठनों और हितधारकों की दक्षताओं के संयोजन और साझेदारी प्लेटफार्मों के माध्यम से वास्तविक बदलाव लाया जा सकता है।

निष्कर्ष

  • दरअसल, समिति की सिफारिशों में कृषि उत्पाद और पशुधन विपणन (संवर्धन और सुविधा) अधिनियम लाने, ई-नाम और परक्राम्य गोदाम प्रणाली बनाने, किसान विकास कल्याण का पुनर्संगठन करने, किसान की आय दोगुनी करने के लिये एक अलग सचिवालय की स्थापना करने की बात की गई है।
  • यह कुछ ऐसा ही है कि ‘न नौ मन तेल होगा और न राधा नाचेगी’। व्यावहारिक सुझावों पर ज़ोर देने के बजाय हवा-हवाई बातें करना सुधारों के हक में नहीं है। किसानों की आय में तेज़ी से वृद्धि के मानक और प्रमाणित उपाय हैं:

1. कृषिगत गतिविधियों का विविधिकरण: प्रायः यह देखा गया है और कई अध्ययनों द्वारा प्रमाणित है कि उच्च मूल्य वाले फसलों और कृषि उद्यमों की ओर ध्यान देने वाले किसानों आय में तेज़ी से वृद्धि होती है। अतः कृषिगत गतिविधियों के विविधिकरण को गति देनी होगी।
2. बेहतर सिंचाई के साधन: देश में अभी भी निम्न उत्पादकता का एक बड़ा कारण सिचाई के साधनों की अपर्याप्त उपलब्धता है। अतः इस संबंध में भी ध्यान देने की ज़रूरत है।
3. प्रतिस्पर्द्धी बाज़ार मूल्य: बेहतर उत्पादन के बावजूद यदि किसान बेहतर मूल्य प्राप्त नहीं कर पाता तो उसका एक मुख्य कारण प्रतिस्पर्द्धी कीमत का न मिल पाना है और इसके कई कारण हैं। एकीकृत मूल्य श्रृंखला, भण्डारण की समुचित व्यवस्था आदि सुनिश्चित किया जाना चाहिये।

  • कृषि क्षेत्र में सुधार की समूची कयावाद इन्हीं मूल बातों पर केन्द्रित होनी चाहिये। राज्य स्तर के आँकडों से पता चलता है कि गुजरात, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान और तेलंगाना में 2006-07 और 2013-14 के बीच वास्तविक कृषि आय (इसमें व्यापार में सुधार के कारण बढ़ी आय भी शामिल है) दोगुनी हो गई है।
  • इन राज्यों द्वारा उपरोक्त मूल बातों पर ही ध्यान दिया गया है और यदि भारत के सभी राज्यों में ऐसा किया जाता है तो निश्चित ही हम वर्ष 2022  तक किसानों को दोगुनी आय की सौगात दे सकते हैं।