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आवश्यक है ‘हिरासत में यातना’ का उन्मूलन | 01 Dec 2017 | अंतर्राष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

विधि आयोग के रिपोर्ट में क्या?

विधि आयोग की 273वीं रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार के एजेंट्स यानी सरकार के वैसे प्रतिनिधि जो लोगों को हिरासत में लेने संबंधी दायित्वों का निर्वहन करते हैं, उनके द्वारा नागरिकों पर किये गए किसी भी आत्याचार के लिये राज्य को उत्तरदायी बनाया जाए। विधि आयोग की कुछ महत्त्वपूर्ण सिफारिशें हैं:

 ►सरकार ‘यातना के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन’ की पुष्टि करे।
► विधायिका, यातना के विरुद्ध एक विशेष कानून बनाए।
► राज्य अपने प्रतिनिधियों या एजेंटों के कार्यों से प्रतिरक्षा का दावा न करे।
► विधि आयोग ने ‘द प्रिवेंशन ऑफ टार्चर बिल’ 2017" नामक एक नया कानून प्रस्तावित किया है।

द प्रिवेंशन ऑफ टार्चर बिल’ 2017 की महत्त्वपूर्ण बातें:

क्या है यातना के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र का कन्वेंशन?

यातना के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन की पुष्टि आवश्यक क्यों?

► न्यायिक या पुलिस हिरासत में किसी व्यक्ति की मृत्यु की घटना को ‘हिरासत में मौत’ (custodial death) के रूप में परिभाषित किया गया है।
► राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2001 से वर्ष 2010 के बीच ‘न्यायिक हिरासत’ में 12,727 लोगों की, जबकि ‘पुलिस हिरासत’ में 1275 लोगों की मौत हो चुकी है।

► अन्य देशों से अपराधियों के प्रत्यर्पण का भारत का अनुरोध कई बार सिर्फ इसलिये खारिज़ कर दिया जाता है, क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के भीतर यह डर व्याप्त है कि भारत में आरोपी व्यक्तियों को यातनाएँ दी जाती हैं।
► अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के इस डर का कारण है भारत का यातना के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन की पुष्टि न करना।

► भारत में बड़े पैमाने पर कैद में यातनाएँ दी जाती हैं और इसका हालिया उदाहरण है ‘रेयान इंटरनेशनल स्कूल मामला’।
► इस मामले में आरोपी को यातनाएँ देकर अपराध स्वीकार करने पर मजबूर किया गया था।

► भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) और आपराधिक प्रक्रिया संहिता (Code of Criminal Procedure Code) दोनों में ही ‘कैद में यातना’ (custodial torture) के संबंध में कोई विशेष और व्यापक प्रावधान नहीं हैं।
► यदि भारत कन्वेंशन पर हस्ताक्षर करता है तो पहले आईपीसी और सीपीसी में समुचित प्रावधान जोड़ने होंगे और यह एक आवश्यक सुधार होगा।

► राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा सरकार को ‘कैद में यातना’ को एक अलग और दंडनीय अपराध के रूप में पहचान करने की मांग की जाती रही है।
► मानवाधिकार आयोग का मानना है कि एक सभ्य समाज में ‘हिरासत में हिंसा’ जैसी घटनाओं की अनुमति नहीं होनी चाहिये।

आगे की राह

निष्कर्ष