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क्रेडिट रेटिंग एजेंसीज़ की साख पर सवाल | 10 Mar 2017 | अंतर्राष्ट्रीय संबंध

सुबह उठकर अख़बार खोलते ही हम प्रायः “क्रेडिट रेटिंग एजेंसीज़” से संबंधित ख़बरों से दो-चार होते हैं। ‘स्टैण्डर्ड एंड पुअर ने भारत की क्रेडिट रेटिंग घटाई’, ‘फ़ीच ने भारत के विकास दर को भ्रामक बताया’ आदि, आदि। क्रेडिट रेटिंग एजेंसीज़ कौन हैं? क्या करती हैं? और क्यों इनको महत्त्व दिया जाए अथवा न दिया जाए? इन सभी बातों को अर्थव्यवस्था की तकनीकी भाषा के बजाय सहज़ और सरल शब्दों में समझना दिलचस्प होगा।

क्या है क्रेडिट रेटिंग ?

क्रेडिट रेटिंग किसी भी देश, संस्था या व्यक्ति की ऋण लेने या उसे चुकाने की क्षमता का मूल्यांकन होती है। गौरतलब है कि क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों द्वारा एएए, बीबीबी, सीए, सीसीसी, सी, डी के नाम से विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्था को रेटिंग दी जाती है। यह बहुत कुछ वैसा ही दीखता है, जैसे ग्रेडिंग पद्धति से किसी विद्यार्थी को अंक प्राप्त होते हैं। वस्तुतः यह भी मूल्यांकन ही है, लेकिन किसी विद्यार्थी का नहीं बल्कि देशों, बड़ी कंपनियों या बड़े पैमाने पर उधार लेने वालों का|

इसी मूल्यांकन पर निर्भर करता है कि उधार लेने वाले की माली हालत कैसी है, मसलन-  उनकी उधार लौटाने की क्षमता कितनी है; अच्छे मूल्यांकन का अर्थ है- कम ब्याज पर आसानी से ऋण और खराब मूल्यांकन का मतलब है- ऊँची दरों पर बमुश्किल ऋण।

रेटिंग की श्रेणियाँ:

क्रेडिट रेटिंग एजेंसियाँ क्या हैं ?

दुनिया के विभिन्न देशों या बड़ी संस्थाओं की रेटिंग दुनिया की तीन बड़ी क्रेडिट रेटिंग एजेंसियाँ—फिच, मूडीज और एस एंड पी तय करती हैं। इनमें सबसे पुरानी एजेंसी है- एस एंड पी जिसे स्टैण्डर्ड एंड पूअर भी कहा जाता है। इसकी स्थापना 1860 में हेनरी पूअर ने की थी। उन्होंने अमेरिका में नहरों और रेल नेटवर्क के विकास का इतिहास लिखा था। 1906 में गैर रेल कंपनियों के वित्त की जाँच शुरू होने पर स्टैण्डर्ड स्टैटस्टिक ब्यूरो की स्थापना हुई। 1940 के दशक में इन दोनों कंपनियों का विलय हो गया।

1909 में जॉन मूडी ने मूडीज़ की स्थापना की। मूडीज़ ने भी रेल वित्त की साख का विश्लेषण और उनका मूल्यांकन करना शुरू किया। आज दुनिया के रेटिंग व्यवसाय का लगभग आधा कारोबार इन्हीं दो कंपनियों के पास हैं। फिच इन्हीं दोनों कंपनियों का छोटा रूप है। इनके अलावा भी कई कंपनियाँ हैं, लेकिन उनकी रेटिंग को महत्त्व नहीं दिया जाता।

क्रेडिट रेटिंग के लिये ये एजेंसियाँ आँकड़ों और तथ्यों का इस्तेमाल करती हैं। इसमें सरकार द्वारा दी गई रिपोर्टें और सूचनाओं आदि का इस्तेमाल किया जाता है। क्रेडिट रेटिंग से आर्थिक स्थिति का पता चलता है। रेटिंग तैयार करते समय कंपनियाँ एजेंसियों के साथ गोपनीय बातों को भी साझा करती हैं। एजेंसियों को उन बातों का भी पता रहता है जो आमतौर पर सामान्य लोग नहीं जान पाते हैं। इसके साथ ही जब किसी कंपनी आदि के बारे में रेटिंग की रिपोर्ट तैयार हो जाती है तो उसे जारी करने से पहले तथ्यों की जाँच के लिये संबंधित कंपनी से आँकड़ों आदि के बारे में बात की जाती है।

क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों को महत्त्व देना आवश्यक क्यों ?

निवेश प्रोत्साहन में क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों की अहम भूमिका होती है, इन एजेंसियों द्वारा भारत की रेटिंग को कम करके बताने से देश में विदेशी निवेश का वातावरण प्रतिकूल रूप से प्रभावित होता है। क्रेडिट रेटिंग में सुधार होने से भारत अपेक्षाकृत कम दरों पर दुनिया के बाकी हिस्सों से अधिक से अधिक पूंजी आकर्षित करने में सफल हो सकता है, जिससे विकास की संभावनाओं को बल मिलेगा। गौरतलब है कि कई संस्थागत निवेशक केवल उन्हीं प्रतिभूति बाज़ारों में निवेश करते हैं जिन्हें रेटिंग एजेंसियों द्वारा अच्छी रेटिंग प्राप्त हो। क्रेडिट रेटिंग में सुधार से राजनैतिक स्थिरता भी बहाल होती है क्योंकि लोगों को लगता है कि सरकार आर्थिक मोर्चे पर बेहतर कर रही है।

क्रेडिट रेटिंग में सुधार हेतु भारत सरकार तमाम प्रयास कर रही है। हालाँकि, इन प्रयासों के बावजूद भारत की क्रेडिट रेटिंग में उतना सुधार देखने को नहीं मिला है। भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविन्द सुब्रह्मण्यम ने हाल ही में सुझाव दिया था कि भारत को इन एजेंसियों को भूलकर बुनियादी बातों पर गौर करना चाहिये।

क्रेडिट रेटिंग को अधिक महत्त्व देना आवश्यक क्यों नहीं ?

वस्तुतः निवेश निर्धारण में केवल क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों की ही भूमिका नहीं होती है, बल्कि नीति निर्माताओं को भी बाज़ार को यह भरोसा दिलाना पड़ता है कि भारत व्यवसाय के लिये एक बेहतर जगह है। इसके लिये सरकार को सुधारों को गति देनी होगी, गौरतलब है एक दशक के विचार-विमर्श के बाद भी भारत अभी तक वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को प्रभाव में नहीं ला पाया है। हालाँकि अब जल्द ही जीएसटी के लागू होने की सम्भावना है।

एक तथ्य यह भी है कि अब रेटिंग एजेंसियाँ निवेशकों के बीच उतनी लोकप्रिय नहीं हैं। हाल ही में ‘एस एंड पी’ को एक अमेरिकी कंपनी ने भ्रामक रेटिंग दिये जाने के बाद अदालत में घसीट लिया था जिसके बाद ‘एस एंड पी’ को 1.375 बिलियन डॉलर जुर्माने के तौर पर देना पड़ा है। ध्यातव्य है कि 2008 की वैश्विक मंदी में रेटिंग एजेंसियों का भी हाथ बताया जाता है। कहा जाता है कि खराब आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद भी रेटिंग एजेंसियों ने अमेरिकी बाज़ारों को निवेश के लायक बताया और निवेशकों के पैसे डूब गए।

निष्कर्ष

भारत ने उल्लेखनीय आर्थिक प्रगति की है, लेकिन अभी भी बुनियादी आर्थिक बातों में व्यापक सुधार की गुंजाइश है। उदाहरण के लिये, भारत में उच्च राजकोषीय घाटा एक गंभीर आर्थिक समस्या है, अतः भारत को रेटिंग एजेंसियों के पीछे भागने की बजाय इस मूल समस्या पर ध्यान केन्द्रित करना होगा। अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतों में उल्लेखनीय कमी आने से भारत राहत महसूस कर रहा है, लेकिन तब क्या होगा जब अरब में परिस्थितियाँ शांत होंगी और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आएगा? इसके लिये भारत को पहले से कमर कसनी होगी।

निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि रेटिंग एजेंसियों की कार्यप्रणाली में त्रुटियाँ खोजने की बजाय भारत को क्षमता निर्माण पर ज़ोर देना होगा, एक संतुलित आर्थिक बजट पेश करने बाद अब सरकार को मुद्रास्फीति को नियंत्रण में रखना होगा। यदि भारत इन मूलभूत बातों पर ध्यान देता है तो इसकी क्रेडिट रेटिंग में सुधार हो या न हो भारतीय अर्थव्यवस्था प्रगति के मार्ग पर अग्रसर रहेगी।