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केंद्र प्रायोजित योजनाएँ और राज्य | 23 Sep 2019 | शासन व्यवस्था

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में केंद्र प्रायोजित योजनाओं और केंद्रीय क्षेत्रक योजनाओं पर चर्चा की गई है, साथ ही केंद्र प्रायोजित योजनाओं के संबंध में चुनौतियों का भी उल्लेख किया गया है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ

भारतीय संविधान निर्माताओं ने भारत की विविधता और विशालता को देखते हुए भारत के लिये संघात्मक शासन व्यवस्था का चुनाव किया था एवं इस प्रकार की व्यवस्था का सार, संघ और राज्यों के मध्य कानूनी संप्रभुता (Legal Sovereignty) की साझेदारी में निहित होता है। संघ और राज्यों के मध्य संबंधों को सुगम बनाए रखने के लिये आवश्यक है कि उनके कानूनी क्षेत्राधिकार एवं कानून निर्माण की शक्तियों का निर्धारण किया जाए। भारतीय संविधान में भी संघ और राज्यों के मध्य संतुलन बनाए रखने हेतु इस प्रकार की व्यवस्था की गई है। संविधान की 7वीं अनुसूची इस बात का निर्धारण करती है कि संघ और राज्य के मध्य भिन्न-भिन्न विषयों पर कानून निर्माण हेतु शक्तियों का बँटवारा किस प्रकार किया जाएगा।

चूँकि किसी भी राष्ट्र को अपने लक्ष्यों और उद्देश्यों की प्राप्ति एवं अपने नागरिकों के विकास हेतु कुछ योजनाओं और नीतियों की आवश्यकता होती है, इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए नीति निर्माताओं ने भारत की संघीय व्यवस्था में संघ और राष्ट्र के मध्य भारत की विकास योजनाओं को कार्यान्वित करने के लिये इसे दो भागों- केंद्रीय क्षेत्रक योजना (Central Sector Schemes) और केंद्र प्रायोजित योजना (Centrally Sponsored Schemes) में विभाजित किया है।

केंद्रीय क्षेत्रक योजनाएँ

(Central Sector Schemes)

केंद्र प्रायोजित योजनाएँ

(Centrally Sponsored Schemes-CSS)

केंद्र प्रायोजित योजनाएँ और वर्तमान परिदृश्य

केंद्र प्रायोजित योजनाओं पर गठित मुख्य समितियाँ

बी.के. चतुर्वेदी रिपोर्ट

योजना आयोग ने अप्रैल 2011 में बी.के. चतुर्वेदी की अध्यक्षता में CSS के पुनर्गठन हेतु आवश्यक उपायों की पहचान करने के लिये एक समिति का गठन किया था। सितंबर 2011 में प्रस्तुत इस समिति की रिपोर्ट में सुझाव दिया गया था कि:

2015 में गठित मुख्यमंत्रियों के उप-समूह की रिपोर्ट

वर्ष 2015 में नीति आयोग ने केंद्र प्रायोजित योजनाओं के रेशनलाइज़ेशन (Rationalization) पर मुख्यमंत्रियों के एक उप-समूह का गठन किया था, जिसे वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने स्वीकृति प्रदान की। मुख्यमंत्रियों के उप-समूह द्वारा की गई मुख्य सिफारिशें:

इस प्रकार के वर्गीकरण के लाभ

केंद्र प्रायोजित योजनाओं को कोर ऑफ द कोर स्कीम, कोर स्कीम और ऑप्शनल स्कीम में वर्गीकृत करने से काफी हद तक केंद्र और राज्य के मध्य संसाधनों के इष्टतम प्रयोग को सुनिश्चित किया जा सका है। साथ ही इस प्रकार का वर्गीकरण यह भी सुनिश्चित करता है कि योजनाओं का लाभ अधिकतम लोगों तक पहुँचे।

प्रमुख योजनाओं के नाम

संबंधित मुद्दे

केंद्रीय बजट की जाँच करने से मालूम होता है कि इस वर्ष सरकार की कुल 28 CSS हैं। परंतु विश्लेषण से ज्ञात होता है कि एक ही योजना को ‘अम्ब्रेला योजना’ (Umbrella Scheme) मानते हुए इनके अंदर भी कई योजनाएँ निर्धारित की गई हैं। इस प्रकार यदि सभी योजनाओं को गिनें तो यह आँकड़ा 200 के भी पार पहुँच सकता है। तीसरी राष्ट्रीय विकास परिषद में कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने कहा था कि “कई बार केंद्र प्रायोजित योजनाओं में अपने अंशदान की पूर्ति के लिये संसाधनों की कमी राज्यों के समक्ष बड़ी चुनौती होती है।” साथ एक अन्य बैठक में यह भी मुद्दा उठा था कि अन्य मंत्रालयों द्वारा कई बार जो केंद्र प्रायोजित योजनाएँ चलाई जाती हैं उनमें भी अंशदान के लिये राज्यों के समक्ष चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं।

CSS की आलोचना

निष्कर्ष

भारतीय संघीय ढाँचे का झुकाव केंद्र की ओर है। इसके तहत केंद्र सरकार द्वारा आगे बढ़कर राज्यों के समग्र विकास के लिये केंद्रीय क्षेत्रक योजनाओं के साथ केंद्र प्रायोजित योजनाओं का संचालन किया जाता है। लेकिन कई बार ये योजनाएँ राज्यों को वांछनीय परिणाम नहीं दे पाती हैं, क्योंकि इन योजनाओं के निर्धारण में राज्यों के पक्ष को पर्याप्त महत्त्व नहीं दिया जाता है। अतः इन योजनाओं में राज्यों की चिंता शामिल करते हुए ‘सभी के लिये एक’ दृष्टिकोण के स्थान पर विभिन्न राज्यों के लिये अलग-अलग योजनाओं के क्रियान्वयन पर बल दिया जाना चाहिये जिससे देश का समावेशी विकास सुनिश्चित हो सके।

प्रश्न: केंद्र प्रायोजित योजनाएँ केंद्र व राज्यों के मध्य विवाद का विषय रही हैं। विवाद के कारणों को उचित उदाहरणों से स्पष्ट करते हुए समाधान हेतु उपाय सुझाएँ।