शासन व्यवस्था
भारत में एक सुदृढ़ स्वास्थ्य क्षेत्र का निर्माण
- 22 Apr 2026
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यह लेख 21/04/2026 को द हिंदू में प्रकाशित "A major health challenge” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र के बहु-आयामी विकास का विश्लेषण करता है, जिसमें महत्त्वपूर्ण डिजिटल एवं अवसंरचनात्मक प्रगति पर प्रकाश डाला गया है, साथ ही स्थायी वित्तपोषण तथा बढ़ते गैर-संचारी रोगों (NCD) के बोझ को भी संबोधित किया गया है।
प्रिलिम्स के लिये: आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन, BioE3 नीति, पीएम-अभिम, पीएम-जेएवाई।
मेन्स के लिये: भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र में वर्तमान विकास, प्रमुख मुद्दे और आवश्यक उपाय।
भारत का स्वास्थ्य क्षेत्र एक महत्त्वपूर्ण संक्रमणकालीन मोड़ पर स्थित है, जो संक्रामक रोगों तथा तीव्र गति से बढ़ते गैर-संचारी रोगों (NCD) के दोहरे बोझ से प्रभावित है। वर्ष 2023 के लैंसेट अध्ययन के अनुसार, 10 करोड़ से अधिक भारतीय लोग मधुमेह से ग्रस्त हैं, जबकि लगभग 13 करोड़ लोग पूर्व-मधुमेह (Pre-diabetes) की स्थिति में हैं, जो एक व्यापक निवारक स्वास्थ्य चुनौती को इंगित करता है। सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय वर्तमान में लगभग सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 2% है, हालाँकि भारत आयुष्मान भारत जैसी प्रमुख योजनाओं का विस्तार भी कर रहा है। विश्व की सबसे युवा जनसंख्या वाले देशों में से एक होने के नाते, स्वास्थ्य सेवा प्रदायगी प्रणाली को सुदृढ़ करना ही यह निर्धारित करेगा कि वह अपने जनसांख्यिकीय लाभांश को एक स्वस्थ एवं उत्पादक मानव पूंजी लाभ में रूपांतरित कर एक सशक्त, समावेशी एवं अनुकूलित स्वास्थ्य प्रणाली की दिशा में प्रभावी रूप से अग्रसर हो पाता है अथवा नहीं।
भारत किस प्रकार एक सुदृढ़ स्वास्थ्य सेवा तंत्र का विकास कर रहा है?
- अंतरसंचालनीय डिजिटल स्वास्थ्य पारितंत्र: भारत का अंतरसंचालनीय डिजिटल स्वास्थ्य ग्रिड की ओर संक्रमण सूचना विषमता को न्यूनतम करता है तथा असमन्वित सार्वजनिक एवं निजी स्वास्थ्य प्रदाताओं के बीच देखभाल की निरंतरता को सुदृढ़ करता है।
- यह डिजिटल संरचना एक मूलभूत डेटा अवसंरचना स्थापित कर स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच के लोकतंत्रीकरण को सक्षम बनाती है, जिससे दीर्घकालिक एवं पूर्वानुमानित स्वास्थ्य निगरानी संभव होती है।
- आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (ABDM) के अंतर्गत रोगियों के रिकॉर्ड को ट्रैक करने के लिये अब तक 800 मिलियन से अधिक आयुष्मान भारत स्वास्थ्य खाते (ABHA) बनाए जा चुके हैं।
- इसके अतिरिक्त, हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स रजिस्ट्री में 4.85 लाख से अधिक स्वास्थ्य सुविधाओं का एकीकरण देशव्यापी स्तर पर एक सत्यापन योग्य एवं डेटा-आधारित नैदानिक पारिस्थितिकी तंत्र को सुनिश्चित करता है।
- साथ ही आयुष्मान आरोग्य मंदिरों (AAM) में उपलब्ध टेली-कंसल्टेशन सेवाएँ घर के निकट विशेषज्ञ चिकित्सा पहुँच को संभव बनाती हैं, जिससे भौतिक पहुँच की बाधाएँ, मानव संसाधन की कमी तथा देखभाल की निरंतरता संबंधी समस्याएँ दूर होती हैं।
- अक्तूबर 2025 तक 41 करोड़ से अधिक टेली-कंसल्टेशन आयोजित किये जा चुके हैं।
- व्यापक प्राथमिक देखभाल एवं निवारक स्वास्थ्य: चयनात्मक प्राथमिक देखभाल से व्यापक प्राथमिक देखभाल की ओर परिवर्तन ज़मीनी स्तर पर प्रारंभिक स्क्रीनिंग को सक्षम बनाकर बढ़ते गैर-संचारी रोगों (NCD) के बोझ को सीधे संबोधित करता है।
- यह स्वास्थ्य सेवा विकेंद्रीकरण जटिल तृतीयक जटिलताओं में रूपांतरण से पूर्व ही रोगों के सक्रिय प्रबंधन के माध्यम से आउट ऑफ पॉकेट एक्सपेंडीचर (OOPE) को कम करने में सहायक है।
- वर्तमान में 1.8 लाख से अधिक आयुष्मान आरोग्य मंदिर कार्यरत हैं, जो विशेष रूप से चयापचय संबंधी विकारों से प्रभावित लगभग एक-चौथाई भारतीय जनसंख्या की स्क्रीनिंग पर केंद्रित हैं।
- वर्ष 2017 से भारत ने व्यापक स्तर पर स्वास्थ्य स्क्रीनिंग एवं प्रारंभिक पहचान कार्यक्रमों का उल्लेखनीय विस्तार किया है।
- लगभग 41.5 करोड़ व्यक्तियों की उच्च रक्तचाप हेतु स्क्रीनिंग की गई, जिनमें से 7.1 करोड़ मामलों का निदान हुआ तथा 5.7 करोड़ व्यक्ति उपचाराधीन हैं।
- मधुमेह के संदर्भ में 41.3 करोड़ व्यक्तियों की जाँच की गई, जिसके परिणामस्वरूप 4.7 करोड़ मामलों की पहचान हुई तथा 3.4 करोड़ लोग उपचाराधीन हैं।
- मांग-पक्षीय वित्तीय जोखिम संरक्षण: सार्वजनिक रूप से वित्तपोषित स्वास्थ्य बीमा के माध्यम से मांग-पक्षीय वित्तपोषण कमज़ोर जनसांख्यिकीय समूहों को विनाशकारी स्वास्थ्य जोखिमों से सुरक्षा प्रदान करता है तथा टियर-2 एवं टियर-3 शहरों में निजी चिकित्सा अवसंरचना के विकास को प्रोत्साहित करता है।
- स्वास्थ्य सेवा में यह राजकोषीय सुदृढ़ीकरण राष्ट्रीय प्रतिमान को आउट ऑफ पॉकेट एक्सपेंडीचर (OOPE) के प्रभुत्व से हटाकर एक सामूहिक एवं न्यायसंगत जोखिम-साझाकरण तंत्र की ओर सक्रिय रूप से स्थानांतरित करता है।
- प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PM-JAY) का उद्देश्य भारत की सबसे निचली 40% आबादी को लक्षित करना है, जिसमें लगभग 120 मिलियन लाभार्थी सम्मिलित हैं तथा प्रत्येक पात्र परिवार को प्रति वर्ष ₹5 लाख तक की वित्तीय सुरक्षा प्रदान करना है।
- फरवरी 2026 तक इस योजना के अंतर्गत कुल 11.69 करोड़ अस्पताल भर्तियाँ स्वीकृत की जा चुकी हैं, जिनमें से 6.74 करोड़ भर्तियाँ निजी अस्पतालों में हुई हैं।
- स्वदेशी चिकित्सा प्रौद्योगिकी में राज्य–पूंजी अभिसरण: घरेलू चिकित्सा विनिर्माण में रणनीतिक राज्य–पूंजी अभिसरण आपूर्ति शृंखला की कमज़ोरियों को कम करता है तथा भारत की स्थिति को एक अनुकूलित चिकित्सा प्रौद्योगिकी केंद्र के रूप में सुदृढ़ करता है।
- सक्रिय औषधीय घटकों (API) के स्थानीय उत्पादन को आक्रामक रूप से प्रोत्साहित कर राज्य अपनी महत्त्वपूर्ण स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी निर्भरता को अस्थिर वैश्विक आयात प्रणाली से रणनीतिक रूप से अलग कर रहा है।
- आंध्र प्रदेश, गुजरात एवं हिमाचल प्रदेश में संबंधित राज्य कार्यान्वयन एजेंसियों के माध्यम से 3 बल्क ड्रग पार्क स्वीकृत किये जा चुके हैं तथा वे विकास के विभिन्न चरणों में हैं।
- फार्मा एवं मेडटेक में अनुसंधान एवं नवाचार को प्रोत्साहन योजना (PRIP) का उद्देश्य भारत के फार्मा पारिस्थितिकी तंत्र को जेनेरिक उत्पादन से आगे बढ़ाकर नवाचार-आधारित विकास की दिशा में ले जाना है।
- चिकित्सा उपकरणों हेतु PLI योजना का लक्ष्य घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना एवं निवेश आकर्षित करना है। इसके अंतर्गत अब तक ₹12,000 करोड़ से अधिक का उत्पादन (जिसमें ₹5,800 करोड़ से अधिक निर्यात शामिल है) तथा ₹1,000 करोड़ से अधिक निवेश प्राप्त हुआ है।
- सक्रिय औषधीय घटकों (API) के स्थानीय उत्पादन को आक्रामक रूप से प्रोत्साहित कर राज्य अपनी महत्त्वपूर्ण स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी निर्भरता को अस्थिर वैश्विक आयात प्रणाली से रणनीतिक रूप से अलग कर रहा है।
- डीपटेक एवं बायोमैन्युफैक्चरिंग का एकीकरण: स्थानीय स्तर पर डीपटेक एवं बायोमैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को प्रोत्साहन देने से सटीक चिकित्सा क्षमताओं में तीव्र वृद्धि होती है तथा स्वदेशी नवाचार के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर महामारी जैसी स्थितियों के शमन हेतु सहायता मिलती है।
- इस नियामक एवं अवसंरचनात्मक प्रयास के परिणामस्वरूप औषधि क्षेत्र उच्च मात्रा वाले जेनेरिक उत्पादन से क्रमशः उच्च मूल्य आधारित पेटेंट-संरक्षित जैव-चिकित्सा अनुसंधान की दिशा में अग्रसर हो रहा है।
- हाल ही में लागू किया गया बायोई3 नीतिगत ढाँचा वर्ष 2030 तक भारत की जैव-अर्थव्यवस्था को लगभग 300 अरब डॉलर तक विस्तारित करने का लक्ष्य निर्धारित करता है।
- इसके अतिरिक्त, ICMR द्वारा आई-ड्रोन नेटवर्क तथा AI-संचालित नैदानिक रजिस्ट्रियों की तैनाती दूरस्थ एवं चुनौतीपूर्ण भौगोलिक क्षेत्रों में कोल्ड-चेन वैक्सीन वितरण एवं रक्त लॉजिस्टिक्स को प्रभावी रूप से अनुकूलित कर रही है।
- केंद्रीय बजट 2026-27 में प्रस्तावित बायोफार्मा शक्ति पहल के अंतर्गत भारत को वैश्विक जैव-औषधीय विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने तथा बायोलॉजिक्स एवं बायोसिमिलर्स के घरेलू उत्पादन को सुदृढ़ करने हेतु पाँच वर्षों में ₹10,000 करोड़ का परिव्यय प्रस्तावित किया गया है।
- विकेंद्रीकृत रोग-प्रसार संबंधी निगरानी: एक विकेंद्रीकृत, तकनीक-सक्षम जीनोमिक एवं महामारी निगरानी ग्रिड का निर्माण उभरते पशुजन्य (Zoonotic) अथवा जलवायु-संवेदनशील खतरों के लिये पूर्वानुमानित मॉडलिंग तथा त्वरित रोग नियंत्रण सुनिश्चित करता है।
- यह सक्रिय अवसंरचना सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रशासन को प्रतिक्रियात्मक संकट प्रबंधन से हटाकर एक सतत डेटा-संचालित प्रणालीगत अनुकूलन (Systemic Resilience) प्रदान करती है।
- PM-ABHIM पहल के अंतर्गत सभी प्रशासनिक ज़िलों में एकीकृत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयोगशालाओं की स्थापना हेतु लगभग ₹64,000 करोड़ का आवंटन किया गया है।
- जीनोमइंडिया परियोजना ने अब तक 10,000 से अधिक भारतीयों के संपूर्ण जीनोम अनुक्रमण को पूर्ण कर एक विविध जीनोमिक डेटाबेस का निर्माण किया है, जो स्वास्थ्य सेवा, अनुसंधान एवं सतत विकास को सुदृढ़ करता है।
- जैव प्रौद्योगिकी विभाग की ‘उम्मीद पहल’ के अंतर्गत प्रसवपूर्व परीक्षण, नवजात शिशु स्क्रीनिंग तथा जोखिमग्रस्त माताओं के परामर्श हेतु निदान केंद्र स्थापित किये गए हैं, जिनका उद्देश्य आनुवंशिक विकारों का समय रहते नियंत्रण सुनिश्चित करना है।
- चिकित्सा मानव पूंजी का विस्तार: चिकित्सा शिक्षा अवसंरचना का व्यापक विस्तार डॉक्टर-जनसंख्या अनुपात में असंतुलन को दूर करने तथा नैदानिक प्रतिभा के गंभीर भौगोलिक असमान वितरण की समस्या के समाधान में सहायक है।
- व्यापक संघीय स्वास्थ्य मिशनों के अंतर्गत विकसित की जा रही विशाल भौतिक स्वास्थ्य अवसंरचना के संचालन एवं रखरखाव हेतु यह मानव पूंजी निवेश एक अपरिहार्य आवश्यकता है।
- मेडिकल कॉलेजों की संख्या वर्ष 2014 में 387 से बढ़कर दिसंबर 2025 तक 810 से अधिक हो गई है।
- इसके साथ ही मौजूदा मेडिकल कॉलेजों के समीप स्थापित 157 नए नर्सिंग कॉलेजों का रणनीतिक उद्देश्य संबद्ध स्वास्थ्य सेवा कार्यबल की कमी को प्रभावी रूप से पूरा करना है।
- रणनीतिक वैश्विक स्वास्थ्य कूटनीति: स्वास्थ्य कूटनीति को एक प्रमुख विदेश नीति उपकरण के रूप में उपयोग करने से भारत की रणनीतिक सॉफ्ट पावर में वृद्धि होती है तथा साथ ही वैश्विक चिकित्सा आपूर्ति शृंखलाओं तक पारस्परिक पहुँच सुनिश्चित होती है।
- भारत की यह बहिर्मुखी नीति उसे वैश्विक दक्षिण के विश्वसनीय फार्मेसी केंद्र के रूप में स्थापित करती है तथा स्वास्थ्य सेवा नियामक मानकों पर महत्त्वपूर्ण द्विपक्षीय सहमति का निर्माण करती है।
- गुजरात में WHO ग्लोबल सेंटर फॉर ट्रेडिशनल मेडिसिन की मेज़बानी भारत की उस रणनीतिक भूमिका को रेखांकित करती है, जिसका उद्देश्य साक्ष्य-आधारित आयुष प्रणालियों को वैश्विक नैदानिक मानकों के साथ एकीकृत करना है।
- इसके अतिरिक्त, भारत द्वारा वैश्विक टीका मांग के 50% से अधिक की आपूर्ति उसे अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा में एक प्रमुख केंद्रबिंदु के रूप में सुदृढ़ करती है।
- मेडिकल वैल्यू ट्रैवल एवं होलिस्टिक वेलनेस (HEAL in India): भारत पारंपरिक आयुष प्रणालियों एवं आधुनिक चिकित्सा के एकीकृत मॉडल के माध्यम से किफायती एवं उच्च गुणवत्ता स्वास्थ्य सेवा प्रदान कर स्वयं को एक वैश्विक स्वास्थ्य सेवा गंतव्य के रूप में स्थापित कर रहा है।
- यह ‘वन अर्थ वन हेल्थ’ दृष्टिकोण विश्व स्तरीय अवसंरचना एवं विशेष वीज़ा सुविधा के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय रोगियों को आकर्षित करता है, जिससे चिकित्सा अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ गति प्राप्त होती है।
- उदाहरण के लिये, अनंतिम आँकड़ों के अनुसार जनवरी से नवंबर 2025 के मध्य 4.5 लाख से अधिक विदेशी पर्यटक चिकित्सा उपचार हेतु भारत आए।
भारत की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली से जुड़े प्रमुख मुद्दे क्या हैं?
- सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय में स्थिरता: सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय में स्थिरता राज्य की उस क्षमता को मूलतः सीमित करती है, जिसके माध्यम से वह प्रतिक्रियात्मक संकट-प्रबंधन से आगे बढ़कर सक्रिय एवं सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज सुनिश्चित कर सकता है।
- समष्टि अर्थव्यवस्था में निवेश की यह दीर्घकालिक कमी ऐसी संरचनात्मक बाधाएँ उत्पन्न करती है, जो प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं एवं विशेषीकृत चिकित्सा अवसंरचना के विस्तार को स्पष्ट रूप से अवरुद्ध करती हैं।
- राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में वर्ष 2025 तक GDP का 2.5% व्यय का लक्ष्य निर्धारित होने के बावजूद, वर्ष 2026 के प्रारंभ में संयुक्त सार्वजनिक व्यय अब भी 2% से कम बना हुआ है।
- इसके अतिरिक्त, स्वास्थ्य क्षेत्र हेतु केंद्र सरकार का आवंटन 0.37% (2020-21 वास्तविक व्यय) से घटकर 0.29% (2025-26 अनुमानित व्यय) हो गया है, जिसके परिणामस्वरूप राजकोषीय दबाव प्रत्यक्ष रूप से राज्य सरकारों पर स्थानांतरित हो गया है।
- आउट ऑफ पॉकेट एक्सपेंडीचर (OOPE): नियमित स्वास्थ्य सेवाओं के लिये निजी पूंजी पर अत्यधिक निर्भरता घरेलू असमानताओं को गंभीर रूप से बढ़ाती है, जिससे चिकित्सा आपात स्थितियाँ तीव्र सामाजिक-आर्थिक संकट में परिवर्तित हो जाती हैं।
- यह प्रतिगामी वित्तपोषण संरचना कमज़ोर जनसांख्यिकीय वर्गों को संकट-आधारित वित्तपोषण हेतु विवश कर गरीबी उन्मूलन प्रयासों को निरंतर कमज़ोर करती है।
- वर्ष 2026 के हालिया आर्थिक आँकड़ों के अनुसार, स्वास्थ्य पर आउट ऑफ पॉकेट एक्सपेंडीचर (OOPE) अब भी भारत के कुल स्वास्थ्य व्यय का लगभग 39% बना हुआ है।
- परिणामस्वरूप, अत्यधिक चिकित्सा लागत प्रतिवर्ष लाखों लोगों को गरीबी रेखा के नीचे धकेल देती है तथा गंभीर चिकित्सा घटनाओं के दौरान घरेलू बचत का लगभग 80% तक व्यय हो जाता है।
- ग्रामीण-शहरी अवसंरचना विषमता: नैदानिक संसाधनों का गंभीर भौगोलिक असमान वितरण एक अत्यंत असमान स्वास्थ्य सेवा परिदृश्य का निर्माण करता है, जो भारत की विशाल ग्रामीण आबादी को गंभीर रूप से प्रभावित करता है।
- महानगरीय क्षेत्रों में उन्नत निदान तथा तृतीयक स्वास्थ्य सेवाओं के केंद्रीकरण के परिणामस्वरूप दूरस्थ क्षेत्रों के नागरिक समयोचित जीवन-रक्षक चिकित्सकीय हस्तक्षेपों से प्रायः वंचित रह जाते हैं।
- उल्लेखनीय है कि भारत में सरकारी अस्पतालों के 73% बिस्तर शहरी क्षेत्रों में स्थित हैं, जबकि लगभग 69% जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच गंभीर रूप से बाधित होती है।
- हालिया ग्रामीण स्वास्थ्य आँकड़े इस स्थानिक असंतुलन को स्पष्ट करते हैं, जिनके अनुसार स्वीकृत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में महत्त्वपूर्ण स्वास्थ्यकर्मी पदों पर लगभग 34% रिक्तियाँ विद्यमान हैं।
- गैर-संचारी रोगों का बढ़ता संकट: चयापचय एवं जीवनशैली-जनित रोगों की ओर बढ़ता रोग प्रसार संबंधी परिवर्तन भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश तथा कार्यबल उत्पादकता के लिये दीर्घकालिक खतरा प्रस्तुत करता है।
- वर्तमान स्वास्थ्य सेवा संरचना अभी भी संक्रामक रोग प्रबंधन की ओर अधिक झुकी हुई है, जबकि दीर्घकालिक रोगों के निवारण हेतु आवश्यक समग्र एवं निरंतर देखभाल ढाँचे का अभाव बना हुआ है।
- उदाहरणार्थ, लैंसेट अध्ययन के अनुसार भारत में लगभग 101 मिलियन लोग (अर्थात लगभग 11.4% जनसंख्या) मधुमेह से प्रभावित हैं।
- अनुमान है कि गैर-संचारी रोगों (NCD) से उत्पन्न रुग्णता एवं कार्यबल उत्पादकता में हानि के कारण वर्ष 2030 तक भारतीय अर्थव्यवस्था को सामूहिक रूप से खरबों डॉलर का नुकसान हो सकता है।
- वर्तमान स्वास्थ्य सेवा संरचना अभी भी संक्रामक रोग प्रबंधन की ओर अधिक झुकी हुई है, जबकि दीर्घकालिक रोगों के निवारण हेतु आवश्यक समग्र एवं निरंतर देखभाल ढाँचे का अभाव बना हुआ है।
- डिजिटल स्वास्थ्य अपनाने एवं साक्षरता में अंतर: यद्यपि भारत तीव्र गति से उन्नत डिजिटल स्वास्थ्य सार्वजनिक अवसंरचनाओं का विस्तार कर रहा है, तथापि हाशिये पर स्थित आबादी के बीच डिजिटल स्वास्थ्य साक्षरता की संरचनात्मक कमी समावेशी तकनीकी अपनाने को सीमित करती है।
- इसके परिणामस्वरूप एक स्पष्ट डिजिटल विभाजन उत्पन्न होता है, जहाँ स्वास्थ्य डेटा एकीकरण के लक्षित लाभार्थी ही इसके नैदानिक लाभों से वंचित रह जाते हैं।
- आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (ABDM) के अंतर्गत वर्ष 2026 के प्रारंभ तक 800 मिलियन से अधिक आयुष्मान भारत स्वास्थ्य खाते (ABHA) सफलतापूर्वक निर्मित किये जा चुके हैं।
- हालाँकि, कमज़ोर वर्गों के बीच इसका वास्तविक उपयोग अत्यंत सीमित बना हुआ है; वर्ष 2021 के एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार, जहाँ 60% लोगों को ABHA प्लेटफॉर्म की जानकारी थी, वहीं केवल 10% उपयोगकर्ता ही इसका वास्तविक उपयोग कर रहे थे।
- असमन्वित कैंसर एवं क्रिटिकल केयर नेटवर्क: स्थानीय प्रारंभिक स्क्रीनिंग से लेकर उपशामक देखभाल (palliative care) तक, व्यापक ऑन्कोलॉजी अवसंरचना की निरंतर उपेक्षा के कारण राष्ट्रीय मृत्यु दर कृत्रिम रूप से उच्च बनी रहती है।
- उन्नत प्रतिरक्षा चिकित्सा एवं विशेषीकृत गहन देखभाल इकाइयों (ICU) का अत्यधिक केंद्रीकरण आर्थिक रूप से वंचित एवं ग्रामीण रोगियों के लिये उपचार की प्रभावशीलता को गंभीर रूप से सीमित करता है।
- हालिया विस्तारों के बावजूद, ज़मीनी स्तर पर स्क्रीनिंग कवरेज अत्यंत अपर्याप्त बना हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप गंभीर रोग प्रायः उन्नत एवं लगभग असाध्य चरणों में ही पहचान में आते हैं।
- नीति आयोग द्वारा 20,000 से अधिक कैंसर प्रोफाइल का डेटाबेस विकसित करने की पहल इस नैदानिक बाधा को दूर करने हेतु AI-संचालित प्रारंभिक पहचान की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती है।
- उन्नत प्रतिरक्षा चिकित्सा एवं विशेषीकृत गहन देखभाल इकाइयों (ICU) का अत्यधिक केंद्रीकरण आर्थिक रूप से वंचित एवं ग्रामीण रोगियों के लिये उपचार की प्रभावशीलता को गंभीर रूप से सीमित करता है।
- संबद्ध स्वास्थ्य सेवा मानव पूंजी में कमी: भौतिक चिकित्सा अवसंरचना एवं अस्पताल बिस्तरों का आक्रामक विस्तार, विशेषीकृत संबद्ध स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों की दीर्घकालिक कमी के कारण व्यवस्थित रूप से बाधित हो रहा है।
- इस गंभीर प्रतिभा अभाव के परिणामस्वरूप परिचालन लागत में वृद्धि होती है, स्थानीय स्तर पर सेवा गुणवत्ता में गिरावट आती है तथा नव-स्थापित सुविधाएँ इष्टतम क्षमता पर कार्य नहीं कर पाती हैं।
- अनुमानों के अनुसार, भारत में निदान, इमेजिंग, पुनर्वास एवं नैदानिक सहायता सहित विभिन्न क्षेत्रों में 60 लाख से अधिक संबद्ध स्वास्थ्य पेशेवरों की कमी विद्यमान है।
- यद्यपि ये पद स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र के लगभग 60% कार्यबल का प्रतिनिधित्व करते हैं, तथापि इन क्षेत्रों में मानव संसाधन का गंभीर अभाव बना हुआ है।
- इसके अतिरिक्त, कुशल नर्सों एवं तकनीशियनों का निरंतर पलायन तथा उभरते क्षेत्रीय मेडिकल कॉलेजों में शिक्षकों की स्थायी कमी इस संकट को और अधिक गहन बना रही है।
- राजकोषीय हस्तांतरण एवं उपकर उपयोग: प्रशासनिक बाधाएँ तथा सुदृढ़ वित्तीय शासन की कमी, केंद्रीय स्तर पर एकत्रित स्वास्थ्य राजस्व के व्यापक आर्थिक प्रभाव को गंभीर रूप से सीमित करती हैं।
- नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) द्वारा फरवरी 2026 में प्रस्तुत रिपोर्ट में प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा निधि (PMSSN) को स्वास्थ्य उपकर हस्तांतरण में लगभग ₹43,426 करोड़ के अंतर को उजागर किया गया है।
- समर्पित स्वास्थ्य उपकरों के प्रभावी उपयोग में यह प्रणालीगत विफलता राज्यों में महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशनों एवं विशेषीकृत नैदानिक अवसंरचना के तीव्र विस्तार को बाधित करती है।
- असमन्वित खरीद प्रणाली एवं आपूर्ति शृंखला विफलताएँ: केंद्रीकृत खरीद प्रणाली में विलंब के कारण सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा तंत्र बार-बार बाधित होता है, जिससे आवश्यक दवाओं की उपलब्धता में कमी उत्पन्न होती है तथा अस्पतालों को महँगी एवं गैर-प्रतिस्पर्द्धी स्थानीय खरीद के लिये विवश होना पड़ता है।
- यह प्रशासनिक अड़चन न केवल स्वास्थ्य सेवाओं की लागत को बढ़ाती है, बल्कि गुणवत्ता मानकों से भी समझौता करती है, जहाँ कई बार सुरक्षा परीक्षणों के पूर्ण सत्यापन से पूर्व ही रोगियों की तत्काल आवश्यकता की पूर्ति हेतु दवाओं का उपयोग किया जाता है।
- उदाहरणार्थ, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) द्वारा किये गए एक ऑडिट में दिल्ली सरकार के अस्पतालों में दवाओं की उपलब्धता, खरीद प्रक्रिया एवं गुणवत्ता नियंत्रण में संरचनात्मक कमियों को उजागर किया गया, जिससे केंद्रीय खरीद एजेंसी की अक्षमताएँ स्पष्ट होती हैं।
- वर्ष 2016-17 से 2021-22 के मध्य, आपूर्ति में विलंब के कारण अस्पतालों को लगभग 33–47% आवश्यक दवाओं की खरीद स्वयं करनी पड़ी।
- ज़ूनोटिक हॉटस्पॉट एवं असमन्वित ‘वन हेल्थ’ निगरानी: भारत में तीव्र शहरीकरण तथा उच्च पशुधन घनत्व ज़ूनोटिक रोगों के प्रसार हेतु अनुकूल परिस्थितियाँ निर्मित करते हैं, किंतु मानव, पशु एवं पर्यावरण स्वास्थ्य की एकीकृत निगरानी प्रणाली अभी भी कार्यात्मक रूप से विखंडित बनी हुई है।
- नेशनल वन हेल्थ मिशन (NOHM) के आरंभ के बावजूद, पशु चिकित्सा एवं मानव स्वास्थ्य विभागों के बीच रियल-टाइम डेटा साझाकरण में विलंब के कारण प्रकोपों का पता प्रायः तब चलता है, जब मानव समुदाय में संक्रमण व्यापक स्तर पर फैल चुका होता है।
- यह प्रतिक्रियात्मक दृष्टिकोण, सक्रिय एवं पूर्वानुमानित निगरानी के अभाव में स्वास्थ्य तंत्र को स्थानीय स्तर पर उत्पन्न संक्रमणीय जोखिमों के प्रति संवेदनशील बना देता है, जो आगे चलकर व्यापक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप धारण कर सकते हैं।
- रोगाणुरोधी प्रतिरोध (AMR) में वृद्धि एवं प्रबंधन की कमियाँ: मानव चिकित्सा तथा कुक्कुट क्षेत्र में उच्च श्रेणी की एंटीबायोटिक दवाओं के अनियंत्रित उपयोग से ‘अंतिम उपाय’ औषधियों की प्रभावकारिता तीव्र गति से घट रही है, जिससे भारत ‘एंटीबायोटिक-पश्चात युग’ (post-antibiotic era) की ओर अग्रसर हो रहा है।
- यद्यपि राष्ट्रीय कार्य योजना AMR 2.0 (2025-2029) के अंतर्गत ओवर-द-काउंटर बिक्री को नियंत्रित करने हेतु ‘रेड लाइन’ पैकेजिंग की पहल की गई है, तथापि सामुदायिक फार्मेसी स्तर पर इसका प्रवर्तन अत्यंत असंगत बना हुआ है।
- यह नियामकीय शिथिलता, साथ ही औषधि निर्माण केंद्रों से उत्पन्न पर्यावरणीय प्रदूषण, मिलकर ‘सुपरबग्स’ का एक खतरनाक भंडार निर्मित करते हैं, जो सामान्य शल्य चिकित्सा प्रक्रियाओं तथा नवजात शिशु देखभाल को भी जटिल बना देते हैं।
भारत के स्वास्थ्य सेवा तंत्र को सुदृढ़ करने हेतु किन उपायों की आवश्यकता है?
- ‘सभी नीतियों में स्वास्थ्य’ (HiAP) शासन मॉडल का क्रियान्वयन: स्वास्थ्य अनुकूलन सुनिश्चित करने हेतु एक मौलिक संरचनात्मक परिवर्तन आवश्यक है, जिसके अंतर्गत शहरी विकास से लेकर कृषि क्षेत्र तक प्रत्येक मंत्रालय एवं विभाग को अपनी नीतियों के नैदानिक प्रभावों के मूल्यांकन का दायित्व सौंपा जाए।
- यह अंतर-क्षेत्रीय समन्वय वायु गुणवत्ता, स्वच्छता एवं पोषण सुरक्षा जैसे सामाजिक निर्धारकों को संबोधित करता है, जो वर्तमान में भारत में बढ़ते चयापचय संबंधी रोगों के प्रमुख कारक हैं।
- इस प्रकार का शासन ढाँचा राष्ट्रीय स्वास्थ्य विमर्श को अस्पताल-केंद्रित उपचारात्मक मॉडल से आगे बढ़ाकर एक समग्र एवं प्रणालीगत कल्याण उन्मुख शासन दृष्टिकोण की ओर रूपांतरित करेगा।
- हाइब्रिड स्वास्थ्य वित्तपोषण ‘सार्वजनिक-निजी’ संयुक्त कोष की संरचना: निरंतर विद्यमान वित्तपोषण अंतराल को दूर करने हेतु भारत को एक संप्रभु स्वास्थ्य कोष की स्थापना करनी चाहिये, जो एकीकृत विकासात्मक जनादेश के अंतर्गत CSR योगदान, स्वास्थ्य उपकर तथा निजी परोपकारी पूंजी को समेकित करे।
- यह मिश्रित वित्त तंत्र टियर-2 एवं टियर-3 शहरों में अस्पताल अवसंरचना विस्तार हेतु रियायती दरों पर ऋण उपलब्ध करा सकता है तथा उन्नत चिकित्सा निदान उपकरणों के घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहित कर सकता है।
- कम-सुविधा युक्त क्षेत्रों में निजी निवेश जोखिम को कम करके राज्य यह सुनिश्चित कर सकता है कि उच्च गुणवत्ता वाली तृतीयक स्वास्थ्य अवसंरचना केवल महानगरों तक सीमित न रहकर व्यापक स्तर पर सुलभ हो।
- मूल्य-आधारित स्वास्थ्य सेवा एवं परिणाम-आधारित प्रतिपूर्ति की ओर संक्रमण: वर्तमान ‘शुल्क-आधारित सेवा’ (Fee-for-Service) अथवा ‘प्रति-प्रक्रिया’ भुगतान मॉडल को एक मूल्य-आधारित प्रतिपूर्ति प्रणाली से प्रतिस्थापित किया जाना आवश्यक है, जो दीर्घकालिक रोगी पुनर्प्राप्ति तथा दीर्घकालिक रोगों के स्थिरीकरण के आधार पर स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को प्रोत्साहित करे।
- प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PM-JAY) जैसी योजनाओं के अंतर्गत, अस्पतालों को प्रदत्त भुगतान को केवल अस्पताल प्रवेश के बजाय नैदानिक परिणामों से संबद्ध करने से आपूर्तिकर्ता-प्रेरित मांग एवं अनावश्यक शल्य-चिकित्साओं में कमी लाई जा सकेगी।
- यह परिवर्तन अस्पतालों को निवारक अनुवर्ती जॉंच एवं समग्र रोगी प्रबंधन को प्राथमिकता देने हेतु प्रेरित करेगा, जिससे पुनः भर्ती दर में प्रभावी कमी सुनिश्चित होगी।
- एकीकृत प्राथमिक केंद्रों का विस्तार: प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को सामुदायिक समेकित केंद्रों के रूप में पुनर्परिभाषित किया जाना चाहिये, जहाँ नैदानिक सेवाओं के साथ-साथ स्वास्थ्य अधिकारों हेतु विधिक सहायता एवं सरकारी योजनाओं में नामांकन के लिये सामाजिक समर्थन तंत्र भी उपलब्ध हो।
- यह बहुआयामी दृष्टिकोण ‘न्याय तक पहुँच’ (Access to Justice) की उस खाई को पाटने में सहायक होगा, जहाँ प्रशासनिक बाधाओं या दस्तावेज़ीकरण की कमी के कारण वंचित वर्ग अपने वैधानिक लाभों से वंचित रह जाते हैं।
- आयुष्मान आरोग्य मंदिरों (AAM) को ऐसे एकीकृत केंद्रों में रूपांतरित करने से यह सुनिश्चित होगा कि रोगी की सामाजिक कमज़ोरियों का समाधान उनके जैविक लक्षणों के साथ समन्वित रूप से किया जाए।
- क्षेत्रीय समूहों के माध्यम से ‘मेडटेक आपूर्ति शृंखला’ का विकेंद्रीकरण: भारत को केवल बल्क ड्रग पार्कों तक सीमित न रहकर MRI मैग्नेट, वेंटिलेटर हेतु सेमीकंडक्टर तथा रोबोटिक सर्जिकल उपकरणों जैसे उच्च-मूल्य घटकों के स्वदेशी निर्माण पर केंद्रित विशेष मेडटेक ‘सिलिकॉन वैली’ विकसित करने की आवश्यकता है।
- अनुसंधान विश्वविद्यालयों एवं विनिर्माण इकाइयों को एकीकृत करने वाले क्षेत्रीय औद्योगिक समूहों के निर्माण से भारत अपने महत्त्वपूर्ण स्वास्थ्य अवसंरचना को अस्थिर वैश्विक आपूर्ति शृंखला एवं मुद्रा उतार-चढ़ाव से संरचनात्मक रूप से पृथक कर सकता है।
- इससे एक आत्मनिर्भर पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा मिलता है जहाँ ‘भारत में डिज़ाइन किये गए’ चिकित्सा उपकरण विशेष रूप से उष्णकटिबंधीय जलवायु और वैश्विक दक्षिण की लागत-संवेदनशील वास्तविकताओं को पूरा करते हैं।
- ‘सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रबंधन कैडर’ (PHMC) का व्यवसायीकरण: प्रशासनिक दक्षता को अनुकूलित करने हेतु भारत को एक समर्पित, गैर-नैदानिक सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रबंधन कैडर विकसित करना चाहिये, जो नैदानिक दायित्वों को विशेषीकृत स्वास्थ्य प्रशासन एवं लॉजिस्टिक्स प्रबंधन से पृथक करता हो।
- इससे यह सुनिश्चित होगा कि प्रशिक्षित चिकित्सक पूर्णतः रोगी उपचार पर केंद्रित रहें, जबकि महामारी विज्ञान, स्वास्थ्य अर्थशास्त्र एवं आपूर्ति शृंखला प्रबंधन में विशेषज्ञ पेशेवर प्रणालीगत संचालन का दायित्व सॅंभालें।
- ज़िला एवं राज्य स्तर पर स्वास्थ्य प्रशासन का पेशेवरकरण ‘प्रशासक–चिकित्सक’ द्वंद्व को समाप्त करेगा तथा आवंटित स्वास्थ्य बजट की अवशोषण क्षमता में उल्लेखनीय सुधार सुनिश्चित करेगा।
- जीनोमिक लोकतंत्रीकरण के माध्यम से सटीक चिकित्सा का विस्तार: सार्वजनिक अस्पतालों के नियमित नैदानिक कार्यप्रवाह में किफायती जीनोमिक अनुक्रमण के एकीकरण से कैंसर एवं दुर्लभ आनुवंशिक विकारों हेतु लक्षित एवं सटीक उपचार संभव हो सकेंगे।
- ‘जीनोम इंडिया’ परियोजना से प्राप्त डेटा का उपयोग कर स्वास्थ्य प्रणाली ‘व्यक्तिगत रोकथाम’ (Personalised Prevention) की दिशा में अग्रसर हो सकती है, जिससे आनुवंशिक संकेतकों के आधार पर उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों की समयपूर्व पहचान सुनिश्चित होगी।
- यदि इस उन्नत तकनीकी हस्तक्षेप को व्यापक रूप से सुलभ बनाया जाए तो यह पारंपरिक नैदानिक विलंब को समाप्त कर दीर्घकालिक एवं अंतिम चरण की बीमारियों के प्रबंधन की लागत में उल्लेखनीय कमी ला सकता है।
- एकीकृत ‘वन हेल्थ’ निगरानी ढाँचे को संस्थागत रूप देना: भारत को ज़ूनोटिक संक्रमणों एवं एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध (AMR) के पूर्व-नियंत्रण हेतु मानव, पशु एवं पर्यावरण स्वास्थ्य निगरानी प्रणालियों को एकीकृत कर एक एकल, वास्तविक-समय डेटा ग्रिड विकसित करना होगा।
- राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) के प्रोटोकॉल को पशु चिकित्सा एवं पारिस्थितिकी निगरानी तंत्र के साथ समेकित कर राज्य प्रतिक्रियात्मक प्रकोप प्रबंधन से आगे बढ़कर पूर्वानुमानित महामारी रोकथाम की दिशा में अग्रसर हो सकता है।
- यह दृष्टिकोण उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों, जैसे पशुधन बाज़ार एवं संवेदनशील हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र में AI-संचालित जैव-निगरानी की तैनाती को अनिवार्य बनाता है, जिससे रोगजनकों का प्रजातीय संक्रमण होने से पूर्व ही उनका प्रभावी रूप से पता लगाया जा सके।
- चक्रीय जैव-सुरक्षा के माध्यम से एंटीमाइक्रोबियल प्रबंधन: दवा-प्रतिरोधी रोगजनकों की बढ़ती ‘मूक महामारी’ से प्रभावी रूप से निपटने हेतु भारत को स्वैच्छिक दिशानिर्देशों से आगे बढ़कर एक अनिवार्य प्रबंधन मॉडल अपनाना होगा, जो एंटीमाइक्रोबियल औषधियों के संपूर्ण जीवनचक्र को नियंत्रित करे।
- इसमें मानव चिकित्सा में बिना डॉक्टर के पर्चे के मिलने वाली दवाओं के दुरुपयोग को खत्म करने के लिये उच्च श्रेणी की एंटीबायोटिक दवाओं (WHO की 'वॉच' और 'रिज़र्व' श्रेणियाँ) की डिजिटल ट्रैकिंग के माध्यम से ‘केवल डॉक्टर के पर्चे पर’ मिलने वाली दवाओं के अनुपालन को लागू करना शामिल है।
- साथ ही इस ढाँचे के अंतर्गत औषधि निर्माण इकाइयों हेतु कठोर ‘अपशिष्ट निर्वहन मानकों’ को अनिवार्य किया जाना आवश्यक है, ताकि सक्रिय औषधीय घटक (API) का जल स्रोतों में उत्सर्जन/प्रवेश रोका जा सके तथा पर्यावरणीय प्रतिरोध हॉटस्पॉट्स के निर्माण को प्रभावी रूप से नियंत्रित किया जा सके।
- इसमें मानव चिकित्सा में बिना डॉक्टर के पर्चे के मिलने वाली दवाओं के दुरुपयोग को खत्म करने के लिये उच्च श्रेणी की एंटीबायोटिक दवाओं (WHO की 'वॉच' और 'रिज़र्व' श्रेणियाँ) की डिजिटल ट्रैकिंग के माध्यम से ‘केवल डॉक्टर के पर्चे पर’ मिलने वाली दवाओं के अनुपालन को लागू करना शामिल है।
निष्कर्ष:
भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र को सुदृढ़ बनाने के लिये असमन्वित उपचारात्मक उपायों से हटकर एक एकीकृत, डेटा-आधारित एवं निवारक प्रणाली की ओर अग्रसर होना आवश्यक है। ग्रामीण-शहरी बुनियादी ढाँचे के अंतर को कम करके तथा ‘वन हेल्थ’ शासन मॉडल को संस्थागत रूप देकर भारत चयापचय संबंधी एवं गैर-संचारी रोगों के बढ़ते बोझ को प्रभावी रूप से कम कर सकता है। सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 2.5% व्यय का लक्ष्य केवल एक वित्तीय लक्ष्य नहीं है, बल्कि देश के जनसांख्यिकीय लाभांश की सुरक्षा हेतु एक अनिवार्य पूर्वशर्त है। अंततः एक सुदृढ़ स्वास्थ्य सेवा ढाँचा वर्ष 2047 तक भारत को एक उच्च आय वाली विकसित अर्थव्यवस्था में रूपांतरित करने का आधार स्तंभ सिद्ध होगा।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न ‘गैर-संचारी रोगों (NCD) की ओर बढ़ते रोग-प्रसार संबंधी परिवर्तन से भारत की मानव पूंजी को गंभीर खतरा उत्पन्न हो रहा है।’ इस कथन के आलोक में ‘शुल्क-आधारित सेवा’ मॉडल से ‘मूल्य-आधारित देखभाल’ मॉडल की ओर परिवर्तन की आवश्यकता का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. भारत में आउट ऑफ पॉकेट एक्सपेंडीचर (OOPE) का मुख्य कारण क्या है?
निजी स्वास्थ्य सेवा पूंजी पर अत्यधिक निर्भरता तथा नियमित बाह्य रोगी देखभाल (Outpatient Care) के लिये अपर्याप्त सार्वजनिक स्वास्थ्य बीमा कवरेज।
2. ‘बायोई3 नीति (BioE3)’ स्वास्थ्य क्षेत्र को किस प्रकार प्रभावित करती है?
यह उच्च मूल्य वाले जैव-विनिर्माण एवं सटीक चिकित्सा (Precision Medicine) को प्रोत्साहित करती है, जिसका उद्देश्य वर्ष 2030 तक भारत की जैव-अर्थव्यवस्था को 300 अरब डॉलर तक पहुँचाना है।
3. ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण क्या है?
एक एकीकृत रणनीतिक ढाँचा, जो मानव, पशु तथा पर्यावरण स्वास्थ्य को परस्पर संबद्ध करता है, जिससे पशुजन्य रोगों (Zoonotic Diseases) एवं रोगाणुरोधी प्रतिरोध (Antimicrobial Resistance) की प्रभावी निगरानी संभव हो सके।
4. आयुष्मान आरोग्य मंदिर क्या हैं?
स्वास्थ्य और कल्याण केंद्रों (HWC) का नया ब्रांड नाम दिया गया है, जो व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएँ तथा विकेंद्रीकृत गैर-संचारी रोग (NCD) स्क्रीनिंग प्रदान करने पर केंद्रित हैं।
5. सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रबंधन कैडर (PHMC) का प्रस्ताव क्यों किया जा रहा है?
स्वास्थ्य प्रशासन की दक्षता में वृद्धि हेतु चिकित्सकीय दायित्वों को पेशेवर प्रशासनिक एवं लॉजिस्टिक प्रबंधन कार्यों से पृथक करने के उद्देश्य से इसका प्रस्ताव किया जा रहा है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स:
प्रश्न: निम्नलिखित में से कौन-से 'राष्ट्रीय पोषण मिशन' के उद्देश्य हैं? (2017)
- गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं में कुपोषण के बारे में ज़ागरूकता पैदा करना।
- छोटे बच्चों, किशोरियों और महिलाओं में एनीमिया के मामलों को कम करना।
- बाजरा, मोटे अनाज और बिना पॉलिश किये चावल की खपत को बढ़ावा देना।
- पोल्ट्री अंडे की खपत को बढ़ावा देना।
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 1, 2 और 3
(c) केवल 1, 2 और 4
(d) केवल 3 और 4
उत्तर: a
मेन्स:
प्रश्न. "एक कल्याणकारी राज्य की नैतिक अनिवार्यता के अलावा, प्राथमिक स्वास्थ्य संरचना धारणीय विकास की एक आवश्यक पूर्व शर्त है।" विश्लेषण कीजिये। (2021)