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महात्मा बुद्ध: पुनर्जागरण के अग्रदूत | 07 May 2020 | भारतीय इतिहास

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में महात्मा बुद्ध के दर्शन की प्रासंगिकता व उससे संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ 

विश्व में कुछ ऐसे महापुरुष रहे हैं जिन्होंने अपने जीवन से समस्त मानव जाति को एक नई राह दिखाई है। उन्हीं में से एक महान विभूति गौतम बुद्ध थे, जिन्हें महात्मा बुद्ध के नाम से जाना जाता है। दुनिया को अपने विचारों से नया मार्ग (मध्यम मार्ग) दिखाने वाले महात्मा बुद्ध भारत के एक महान दार्शनिक, समाज सुधारक और बौद्ध धर्म के संस्थापक थे। भारतीय वैदिक परंपरा में धीरे-धीरे जो कुरीतियाँ पनप गईं थी, उन्हें पहली बार ठोस चुनौती महात्मा बुद्ध ने ही दी थी।

बुद्ध ने वैदिक परंपरा के कर्मकांडों पर कड़ी चोट की किंतु वेदों और उपनिषदों में विद्यमान दार्शनिक सूक्ष्मताओं को किसी-न-किसी मात्रा में अपने दर्शन में स्थान दिया और इस प्रकार भारतीय सांस्कृतिक विरासत को एक बने-बनाए ढर्रे से हटाकर उसमें नवाचार की गुंजाइश पैदा की। मध्यकाल में कबीरदास जैसे क्रांतिकारी विचारक पर महात्मा बुद्ध के विचारों का गहरा प्रभाव दिखता है। डॉ अंबेडकर ने भी वर्ष 1956 में अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले बौद्ध धर्म अपना लिया था और तर्कों के आधार पर स्पष्ट किया था कि क्यों उन्हें महात्मा बुद्ध शेष धर्म-प्रवर्तकों की तुलना में ज़्यादा लोकतांत्रिक नज़र आते हैं। आधुनिक काल में राहुल सांकृत्यायन जैसे वामपंथी साहित्यकार ने भी बुद्ध से प्रभावित होकर जीवन का लंबा समय बुद्ध को पढ़ने में व्यतीत किया।

इस आलेख में बुद्ध के जीवन वृत्तांत, उनके दर्शन के सकारात्मक व नकारात्मक पहलूओं तथा बुद्ध की शिक्षाओं की प्रासंगिकता पर विमर्श किया जाएगा।

महात्मा बुद्ध: जीवन वृत्तांत 

बुद्ध दर्शन के सकारात्मक पहलू 

बुद्ध दर्शन के नकारात्मक पहलू

महात्मा बुद्ध के विचारों की प्रासंगिकता

निष्कर्ष

प्रत्येक विचारक की तरह बुद्ध कुछ बिंदुओं पर आकर्षित करते है तो कुछ बिंदुओं पर नहीं कर पाते हैं। विवेकशीलता का लक्षण यही है कि हम अपने काम की बातें चुन लें और जो अनुपयोगी हैं, उन्हें त्याग दें। बुद्ध से जो सीखा जाना चाहिये, वह यह है कि जीवन का सार संतुलन में है, उसे किसी भी अतिवाद के रास्ते पर ले जाना गलत है। हर व्यक्ति के भीतर सृजनात्मक संभावनाएँ होती हैं, इसलिये व्यक्ति को अंधानुकरण करने के बजाय स्वयं अपना रास्ता बनाना चाहिये।

प्रश्न- महात्मा बुद्ध के नैतिक विचार वर्तमान में भी प्रासंगिक हैं। चर्चा कीजिये।