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जम्मू-कश्मीर की वर्षों से चली आ रही दुविधा | 22 Jun 2018 | भारतीय राजनीति

संदर्भ

हाल ही में भारतीय जनता पार्टी ने यह कहते हुए कि 'जम्मू-कश्मीर में बढ़ते कट्टरपंथ और चरमपंथ के कारण सरकार में बने रहना मुश्किल हो गया था', पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के साथ राज्य में क़रीब तीन साल तक गठबंधन में रहने के बाद समर्थन वापसी की घोषणा कर दी। सरकार की दुविधा जहाँ एक तरफ, घाटी में बढ़ते विद्रोह और अशांति के लिये राजनीतिक समाधान खोजने हेतु जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक स्थिरता और मित्रवत सरकार की ज़रूरत थी तो वहीँ दूसरी तरफ, भाजपा को श्रीनगर के खिलाफ खड़े होने के लिये जम्मू में अपने हिंदू निर्वाचन क्षेत्र को शांत करने की ज़रूरत थी। अंत में  पार्टी ने कश्मीर में शांति खोजने की दीर्घकालिक आवश्यकताओं से अलग अल्पकालिक चुनावी लाभ का चयन किया।

क्या है जम्मू कश्मीर की दुविधा?

कश्मीर की दुविधा का प्रारंभिक इतिहास

दिल्ली समझौता

(टीम दृष्टि इनपुट)

आंदोलन से हुए नुकसान

कश्मीर में राज्यपाल शासन

वर्ष 1977 से यह आठवीं बार है जब जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन लगा है।

Kahmir.

जम्मू कश्मीर में राज्यपाल शासन ही क्यों राष्ट्रपति शासन क्यों नहीं?

केंद्र कब दे सकता है दखल?

अलग है जम्मू-कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा

जम्मू-कश्मीर भारत के अन्य राज्यों की तरह नहीं है क्योंकि इसे सीमित संप्रभुता प्राप्त है और इसीलिये इसे 1969 में विशेष राज्य का दर्जा दिया गया। लेकिन जम्मू-कश्मीर ने भारत के अधिराज्य को स्वीकार करते हुए सीमित संप्रभुता हासिल की थी और अन्य देशी रियासतों की तरह भारत के अधिराज्य के साथ उसका विलय नहीं हुआ था, इसलिये इसका विशेष दर्जा अन्य ऐसे राज्यों से कुछ अलग है, जिन्हें विशेष श्रेणी के राज्यों का दर्जा मिला हुआ है।

क्यों दिया गया विशेष राज्य का दर्जा?

(टीम दृष्टि इनपुट)

निष्कर्ष

प्रश्न: जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में राज्यपाल शासन और राष्ट्रपति शासन को स्पष्ट करते हुए धारा 370 की संवैधानिकता की विवेचना कीजिये।