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अंबेडकर और पूना समझौता | 14 Apr 2020 | सामाजिक न्याय

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में अंबेडकर और पूना समझौते से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ 

प्रतिवर्ष 14 अप्रैल को पूरे देश में स्वतंत्रता संघर्ष के प्रमुख उन्नायक, शिल्पकार और स्वतंत्र भारत के प्रमुख संविधान निर्माता डा. भीमराव रामजी अंबेडकर की जयंती का हर्षोल्लास के साथ आयोजन किया जाता है। 

इस आयोजन का प्रमुख उद्देश्य भारत के युवाओं को उन विचारों से अवगत करना है जिन्होंने भारत के लोकतंत्र को संविधान रूपी नींव पर स्थापित किया। डा. अंबेडकर का योगदान केवल संविधान निर्माण तक ही नहीं सीमित था बल्कि सामाजिक व राजनैतिक स्तर पर भी उन्होंने अपना अमूल्य योगदान दिया। समाज में निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति को सामाजिक स्तर पर बराबरी का दर्जा दिलाया तो वहीँ राजनैतिक स्तर पर दलितों, शोषितों व महिलाओं को बराबरी का दर्जा प्रदान करने हेतु विधि का निर्माण कर उसे संहिताबद्ध किया।

कुछ विद्वानों का ऐसा मानना था कि महात्मा गांधी व अंबेडकर की विचारधारा सर्वथा एक-दूसरे से भिन्न थी, परंतु यह पूर्णतः सत्य नहीं है। भीमराव अंबेडकर, महात्मा गांधी के प्रशंसक ही नहीं बल्कि अनुगामी भी थे। निश्चित ही दोनों के बीच कुछ विषयों पर मतभेद थे परंतु उनका उद्देश्य मानव मात्र का कल्याण करना ही था। इसका एक ज्वलंत उदाहरण छुआछूत के विषय में देखा जा सकता है- छुआछूत के विषय पर दोनों का ही मानना था कि यह समाज में एक कोढ़ की भांति है, परंतु दोनों ही विद्वान छुआछूत को दूर करने के भिन्न-भिन्न मार्ग के समर्थक थे।

इस आलेख में डा. भीमराव रामजी अंबेडकर के सामाजिक, राजनीतिक व जातिगत विचारों पर अध्ययन करने के साथ ही आधुनिक भारत के निर्माण में उनकी भूमिका और महात्मा गाँधी के साथ उनके विचारों की भिन्नता व वैचारिक मतैक्यता पर भी विमर्श किया जाएगा।

पृष्ठभूमि   

छुआछूत के विरुद्ध संघर्ष  

असमानता दूर करने के लिये अंबेडकर के सुझाव 

पूना समझौता 

24 सितंबर 1932 को डॉ॰ अंबेडकर तथा अन्य हिंदू नेताओं के प्रयत्न से सवर्ण हिंदुओं तथा दलितों के मध्य एक समझौता किया गया। इसे पूना समझौते के नाम से जाना जाता है। इस समझौते के अनुसार-

पूना समझौते का दलितों पर प्रभाव 

वर्ण-व्यवस्था पर गांधी व अंबेडकर के मतभेद 

गांधी और अंबेडकर दोनों तात्कालिक सामाजिक स्थितियों व परिवेश से असंतुष्ट थे। दोनों समाज का नव निर्माण करना चाहते थे, परंतु इस संदर्भ में समस्या के कारण, स्वरुप व निदान के प्रति दोनों का दृष्टिकोण एवं कार्य-पद्धति अलग-अलग थी। 

 प्रश्न- पूना समझौते के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए वर्ण-व्यवस्था पर गांधी व अंबेडकर के मतभेदों का वर्णन कीजिये।