भारतीय अर्थव्यवस्था
भारत के समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र का संवर्द्धन
- 21 Apr 2026
- 226 min read
यह लेख 17/04/2026 को द हिंदू बिजनेस लाइन में प्रकाशित ‘Pathway to maritime insurance sovereignty’ शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख भारत के समुद्री विकास का बहु-आयामी विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जिसमें अवसंरचना विस्तार से वित्तीय एवं तकनीकी संप्रभुता की ओर हो रहे रणनीतिक परिवर्तन पर प्रकाश डाला गया है। साथ ही यह मूल्यांकन करता है कि औपनिवेशिक काल के कानूनों का निरसन तथा हरित ऊर्जा का अंगीकरण किस प्रकार भारत के व्यापार को बढ़ते भू-राजनीतिक व्यवधानों से सुरक्षित करने में सहायक हो सकता है।
प्रिलिम्स के लिये: ग्रीन टग ट्रांजिशन प्रोग्राम, राष्ट्रीय जलमार्ग-1, गैलेथिया खाड़ी परियोजना।
मेन्स के लिये: भारत के समुद्री क्षेत्र में प्रगति, भारत के समुद्री क्षेत्र में प्रमुख बाधाएँ।
भारत का समुद्री क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था का अदृश्य आधार है, जो समुद्री मार्गों के माध्यम से भारत के व्यापार की लगभग 95% मात्रा और लगभग 70% मूल्य का परिवहन करता है। विश्व के तीसरे सबसे बड़े तेल आयातक के रूप में भारत की ऊर्जा सुरक्षा, स्थिर समुद्री लॉजिस्टिक्स और बीमा नेटवर्क से गहराई से जुड़ी हुई है। लगभग 7,500 किलोमीटर लंबी तटरेखा, 12 प्रमुख बंदरगाहों तथा 200 से अधिक गौण बंदरगाहों के साथ यह क्षेत्र व्यापार, रोज़गार और तटीय विकास का आधार प्रदान करता है। हाल ही में होर्मुज़ से जुड़े बीमा व्यवधान यह दर्शाते हैं कि 21वीं सदी में समुद्री शक्ति न केवल जहाज़ों और बंदरगाहों पर निर्भर करती है, बल्कि जहाज़रानी वित्त, बीमा और रणनीतिक समुद्री मार्गों पर नियंत्रण पर भी निर्भर करती है।
भारत के समुद्री क्षेत्र के विकास को गति देने वाले प्रमुख कारक क्या हैं?
- रणनीतिक जहाज़ निर्माण का पुनरुत्थान: भारत समुद्री आयातक की स्थिति से आगे बढ़ते हुए जहाज़ निर्माण क्षेत्र में एक प्रतिस्पर्द्धी वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में अपनी अग्रणी भूमिका को पुनर्स्थापित कर रहा है।
- यह बहुआयामी संरचनात्मक परिवर्तन राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करता है, आपूर्ति शृंखला व्यवधानों के प्रति अनुकूलन बढ़ाता है तथा वैश्विक व्यापार के भू-राजनीतिक पुनर्संयोजन से उत्पन्न अवसरों का लाभ उठाने में सहायक सिद्ध होता है।
- इस दिशा में ठोस प्रगति सुनिश्चित करने हेतु सितंबर 2025 में कैबिनेट द्वारा घरेलू शिपयार्डों के विस्तार एवं प्रोत्साहन के लिये 69,000 करोड़ रुपये से अधिक के व्यापक पुनरुत्थान पैकेज को स्वीकृति प्रदान की गई।
- इसी क्रम में कोचीन शिपयार्ड ने फ्राँस की CMA CGM के लिये 1,700 TEU क्षमता वाले छह दोहरे-ईंधन वाले जहाज़ों के निर्माण का एक महत्त्वपूर्ण अनुबंध प्राप्त किया, जो उन्नत वैश्विक विनिर्माण नेटवर्क में भारत के सुदृढ़ एकीकरण को प्रतिबिंबित करता है।
- इसके अतिरिक्त, भारतीय नौसेना ने संस्कृति मंत्रालय तथा होडी इनोवेशन के साथ साझेदारी में वर्ष 2025 में INSV कौंडिन्या का अनावरण किया।
- यह पोत 5वीं शताब्दी की शैली का एक सिलाई वाला जहाज़ (stitched ship) है, जिसे नारियल के रेशे की रस्सियों एवं लकड़ी के जोड़-तोड़ जैसी पारंपरिक तकनीकों के माध्यम से निर्मित किया गया है, जिसमें धातु की कीलों का उपयोग नहीं किया गया है।
- अजंता गुफाओं में चित्रित कलाकृतियों से प्रेरित यह जहाज़ भारत की प्राचीन समुद्री शिल्पकला के पुनर्जीवन तथा दीर्घ दूरी की समुद्री यात्राओं हेतु इसकी क्षमता के प्रभावी प्रदर्शन का उद्देश्य रखता है।
- माल ढुलाई एवं मेगा पोर्ट विस्तार: देश घरेलू माल ढुलाई यातायात पर रणनीतिक नियंत्रण स्थापित कर कोलंबो एवं सिंगापुर जैसे विदेशी ट्रांसशिपमेंट केंद्रों पर निर्भरता को क्रमशः समाप्त करने की दिशा में अग्रसर है।
- गहरे जल के बड़े बंदरगाहों को औद्योगिक एवं वितरण नेटवर्क के साथ एकीकृत कर भारत अपने समुद्री माल प्रवाह पर अधिक नियंत्रण स्थापित कर रहा है।
- महाराष्ट्र में लगभग 76,220 करोड़ रुपये की लागत से स्वीकृत वधावन बंदरगाह की प्रस्तावित क्षमता 23 मिलियन TEU होगी, जिससे यह विश्व के शीर्ष दस कंटेनर बंदरगाहों में सम्मिलित हो सकेगा।
- इसी क्रम में ग्रेट निकोबार द्वीप समूह में ₹48,000 करोड़ से अधिक लागत वाली गैलेथिया खाड़ी परियोजना अति-विशाल कंटेनर जहाज़ों (ultra-large container vessels) के लिये घरेलू पोत-स्थल (Anchor) क्षमता विकसित करने हेतु तीव्र गति से प्रगति कर रही है।
- सागरमाला कार्यक्रम अब एक समग्र समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में विकसित हो चुका है, जो बंदरगाह-आधारित औद्योगीकरण को बहुआयामी कनेक्टिविटी के साथ एकीकृत कर लॉजिस्टिक लागत में संरचनात्मक कमी लाने का लक्ष्य रखता है।
- हरित समुद्री परिवहन एवं कार्बन उत्सर्जन में कमी: भारत स्थायी वैकल्पिक समुद्री ईंधनों की ओर संक्रमण को तीव्र करते हुए आर्थिक विकास को जलवायु उत्तरदायित्वों के साथ संतुलित रूप से समन्वित कर रहा है, जिससे समुद्री क्षेत्र के डीकार्बोनाइजेशन की दिशा में ठोस प्रगति सुनिश्चित हो सके।
- भारत के हरित समुद्री परिवर्तन को इंडिया मैरीटाइम वीक 2025 के दौरान उल्लेखनीय गति प्राप्त हुई, जहाँ पारादीप बंदरगाह में ग्रीन हाइड्रोजन हब के लिये लगभग ₹45,000 करोड़ रुपये तथा वी.ओ. चिदंबरनार बंदरगाह में ग्रीन अमोनिया सुविधा के लिये लगभग ₹47,000 करोड़ रुपये आवंटित किये गए।
- साथ ही ग्रीन टग ट्रांजिशन प्रोग्राम के अंतर्गत वर्ष 2030 तक 50 स्वदेशी ग्रीन टग तैनात किये जा रहे हैं, जो निम्न-कार्बन पोर्ट लॉजिस्टिक्स एवं स्वच्छ तटीय शिपिंग की दिशा में भारत के सतत प्रयासों को स्पष्ट रूप से प्रतिबिंबित करते हैं।
- भारत के हरित समुद्री परिवर्तन को इंडिया मैरीटाइम वीक 2025 के दौरान उल्लेखनीय गति प्राप्त हुई, जहाँ पारादीप बंदरगाह में ग्रीन हाइड्रोजन हब के लिये लगभग ₹45,000 करोड़ रुपये तथा वी.ओ. चिदंबरनार बंदरगाह में ग्रीन अमोनिया सुविधा के लिये लगभग ₹47,000 करोड़ रुपये आवंटित किये गए।
- समुद्री बीमा संप्रभुता: वैश्विक भू-राजनीतिक अस्थिरता से महत्त्वपूर्ण ऊर्जा और व्यापार सुरक्षा को सुरक्षित रखने के लिये, भारत बाहरी संरक्षण और क्षतिपूर्ति (P&I) पुनर्बीमा क्लबों पर अपनी निर्भरता को सक्रिय रूप से समाप्त कर रहा है।
- एक सशक्त घरेलू समुद्री बीमा ढाँचे का निर्माण यह सुनिश्चित करता है कि लाल सागर जैसे संवेदनशील मार्गों पर अंतर्राष्ट्रीय बीमाकर्त्ताओं द्वारा युद्ध-जोखिम कवरेज वापस लेने की स्थिति में भी व्यापार प्रवाह निर्बाध बना रहे।
- इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये सरकार ने ऊर्जा शिपमेंट हेतु अंतिम उपाय के बीमाकर्त्ता के रूप में 1.5 बिलियन डॉलर की संप्रभु गारंटी सक्रिय की है, जिसे 300 मिलियन डॉलर के उद्योग-दावों के कोष तथा 1,000 करोड़ रुपये के समर्पित युद्ध-जोखिम कोष द्वारा और अधिक सुदृढ़ किया गया है।
- व्यापक विधायी सुधार: भारत व्यवसाय सुगमता में सुधार तथा अंतर्राष्ट्रीय नाविकों के कल्याण को सुदृढ़ करने हेतु औपनिवेशिक कालीन अप्रासंगिक विधिक ढाँचों को आक्रामक रूप से समाप्त कर रहा है।
- यह संरचनात्मक विधिक आधुनिकीकरण घरेलू संचालन को अंतर्राष्ट्रीय हेग-विस्बी नियमों के अनुरूप बनाता है, जिससे मुकदमेबाज़ी संबंधी बाधाएँ कम होती हैं तथा वैश्विक समुद्री निवेशकों के लिये अत्यधिक पारदर्शी वातावरण निर्मित होता है।
- वर्ष 2025 में प्रस्तुत पाँच प्रमुख समुद्री विधेयकों (जैसे तटीय नौवहन विधेयक और भारतीय पत्तन विधेयक) के माध्यम से 1908 के पत्तन अधिनियम जैसे पुराने ढाँचों को औपचारिक रूप से निरस्त किया गया है।
- अंतर्देशीय जलमार्ग तथा तटीय एकीकरण: नीति-निर्माता भीड़भाड़ वाले सड़क नेटवर्क से माल परिवहन को अधिक दक्ष अंतर्देशीय जलमार्गों तथा एकीकृत तटीय नौवहन मार्गों की ओर स्थानांतरित करने के लिये सक्रिय रूप से प्रयासरत हैं।
- मल्टी- मॉडल(multi-modal) विविधीकरण लॉजिस्टिक लागत को कम करता है, क्षेत्रीय आर्थिक विकास को संतुलित बनाता है तथा औद्योगिक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी लाता है।
- राष्ट्रीय जलमार्ग-1 जैसे स्थानीय गलियारों के परिणामस्वरूप अंतर्देशीय माल ढुलाई में तीव्र वृद्धि हुई है, जो वर्ष 2014 में 18 मिलियन मीट्रिक टन से बढ़कर वर्ष 2025 में रिकॉर्ड 146 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुँच गई है।
- इस दक्षता के पूरक के रूप में वित्त वर्ष 2024-25 में प्रमुख बंदरगाहों ने माल ढुलाई में 4.3% की प्रभावशाली वार्षिक वृद्धि दर दर्ज की, जो बंदरगाह-आधारित कनेक्टिविटी की प्रभावशीलता को प्रमाणित करती है।
- AI-संचालित बंदरगाह डिजिटलीकरण: भारत परिचालन संबंधी बाधाओं को समाप्त करने तथा आपूर्ति शृंखला की संपूर्ण दृश्यता को अधिकतम करने हेतु अपने लॉजिस्टिकल इकोसिस्टम में स्मार्ट प्रौद्योगिकियों एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का तीव्र गति से एकीकरण कर रहा है।
- पारंपरिक बंदरगाहों को डेटा-संचालित डिजिटल हब में रूपांतरित करने से विभिन्न हितधारकों के मध्य निर्बाध अंतरसंचालनीयता (interoperability) स्थापित होती है, जिससे टर्मिनल उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि होती है और यह विकसित देशों के समकक्ष पहुँचती है।
- हाल ही में प्रारंभ किया गया राष्ट्रीय 'डिजी बंदर' ढाँचा इस तकनीकी प्रगति का प्रमुख उदाहरण है, जो व्यापक कार्गो ट्रैकिंग तथा पूर्वानुमानित बंदरगाह प्रबंधन के स्वचालन हेतु AI का उपयोग करता है।
- रणनीतिक कार्यबल एवं कौशल-संतुलन: मानव पूंजी को समुद्री प्रभुत्व का आधार स्तंभ मानते हुए, भारत अपने जनसांख्यिकीय लाभांश का उपयोग कर वैश्विक समुद्री कार्यबल में अपनी उपस्थिति को सुदृढ़ कर रहा है।
- घरेलू प्रशिक्षण अवसंरचना को उन्नत प्रौद्योगिकी तथा पर्यावरण-अनुकूल नौवहन (eco-shipping) की आवश्यकताओं के अनुरूप ढालकर, देश अपने समुद्री कार्यबल की वैश्विक रोज़गार-योग्यता तथा विशिष्ट विशेषज्ञता को उन्नत कर रहा है।
- इसके परिणामस्वरूप भारतीय नाविक कार्यबल 1.25 लाख से बढ़कर 3 लाख से अधिक हो गया है, जो अब वैश्विक समुद्री कार्यबल में लगभग 12% हिस्सेदारी रखता है।
- इस मानव संसाधन प्रभुत्व को वर्ष 2026 में दक्षिण कोरिया के साथ संपन्न एक रणनीतिक द्विपक्षीय साझेदारी के माध्यम से और सुदृढ़ किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य उन्नत जहाज़ निर्माण कौशल का विकास करना है।
- घरेलू प्रशिक्षण अवसंरचना को उन्नत प्रौद्योगिकी तथा पर्यावरण-अनुकूल नौवहन (eco-shipping) की आवश्यकताओं के अनुरूप ढालकर, देश अपने समुद्री कार्यबल की वैश्विक रोज़गार-योग्यता तथा विशिष्ट विशेषज्ञता को उन्नत कर रहा है।
भारत के समुद्री क्षेत्र से जुड़े प्रमुख मुद्दे क्या हैं?
- भू-राजनीतिक अस्थिरता तथा समुद्री मार्गों की भेद्यता: भारत का समुद्री व्यापार क्षेत्रीय संघर्षों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बना हुआ है, जो प्रमुख समुद्री मार्गों को बाधित करते हैं, परिणामस्वरूप बीमा प्रीमियम एवं ईंधन लागत में वृद्धि होती है।
- होर्मुज़ जलडमरूमध्य तथा बाब-अल-मंडेब जैसे संकरे समुद्री मार्गों पर देश की अत्यधिक निर्भरता ऊर्जा सुरक्षा एवं निर्यात विश्वसनीयता के लिये प्रणालीगत जोखिम उत्पन्न करती है।
- यह भेद्यता विशेष रूप से ऊर्जा क्षेत्र में स्पष्ट है; भारत अपनी LPG आवश्यकताओं का लगभग 60% आयात करता है तथा इन शिपमेंट का लगभग 90% होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है।
- हाल के भू-राजनीतिक तनावों के दौरान इस कॉरिडोर में किसी भी प्रकार की बाधा आपूर्ति शृंखलाओं को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है, जिससे देरी, लागत वृद्धि तथा भारतीय उद्योग के लिये अनिश्चितता बढ़ जाती है।
- हाल के भू-राजनीतिक तनावों के दौरान इस मार्ग में भी व्यवधानों ने आपूर्ति शृंखलाओं को प्रभावित किया है, जिससे विलंब, लागत वृद्धि तथा औद्योगिक अनिश्चितता में वृद्धि हुई है।
- माल ढुलाई में लगातार होने वाली हानि: स्थानीय क्षमता विस्तार के बावजूद, गहन-ड्राफ्ट मेगा ट्रांसशिपमेंट हब्स के शीघ्र संचालन में भारत की संरचनात्मक विफलता के कारण राजस्व एवं समय की व्यापक हानि होती है।
- ऐतिहासिक रूप से भारत के लगभग 75% ट्रांसशिपमेंट कार्गो को कोलंबो बंदरगाह, सिंगापुर बंदरगाह तथा पोर्ट क्लांग जैसे विदेशी केंद्रों के माध्यम से प्रेषित किया जाता रहा है, जो घरेलू हब क्षमता की अपर्याप्तता को स्पष्ट रूप से परिलक्षित करता है।
- माल ढुलाई केंद्रों पर लगने वाले अतिरिक्त बंदरगाह संचालन शुल्क को देखते हुए, माल की ट्रांसशिपमेंट से भारतीय उद्योग के लिये लॉजिस्टिक्स लागत में अक्षमताएँ उत्पन्न होती हैं।
- अतिरिक्त पोर्ट हैंडलिंग लागत लगभग 80-100 डॉलर प्रति TEU है, जिसे बचाया जा सकता है यदि कंटेनर को ट्रांसशिपमेंट के स्थान पर सीधे गेटवे कार्गो के रूप में आयात/निर्यात किया जाए।
- हालाँकि विझिंजम अंतर्राष्ट्रीय बंदरगाह ने इस प्रवृत्ति को उलटना शुरू कर दिया है , लेकिन गहरे पानी और माल ढुलाई क्षमता में अंतर एक संरचनात्मक चुनौती बनी हुई है।
- हिंटरलैंड निकासी तथा बहु-आयामी असंतुलन: भीतरी इलाकों की खंडित कनेक्टिविटी गंभीर लॉजिस्टिक संबंधी बाधाएँ उत्पन्न करती है, जो बंदरगाह टर्मिनल स्तर पर प्राप्त किसी भी दक्षता वृद्धि को प्रभावी रूप से निष्प्रभावी कर देती हैं।
- भारतीय बंदरगाहों से माल निकासी अब भी सड़क परिवहन पर अत्यधिक निर्भर है, क्योंकि लगभग 60-65% माल ढुलाई सड़क माध्यम से होती है, जिससे भीड़भाड़, विलंब तथा उच्च उत्सर्जन की स्थिति उत्पन्न होती है।
- सड़क परिवहन की तुलना में रेल द्वारा माल ढुलाई की हिस्सेदारी 27-28% पर बनी हुई है, जो अपेक्षाकृत अपर्याप्त है, यद्यपि यह सड़क परिवहन की तुलना में अधिक किफायती है।
- इस बीच अंतर्देशीय जलमार्ग, वित्त वर्ष 2024-25 में बढ़कर 145.84 मिलियन मीट्रिक टन हो गए, फिर भी परिवहन हिस्सेदारी में 2% से कम योगदान देते हैं, जिससे बहु-आयामी लॉजिस्टिक दक्षता सीमित रहती है।
- वैश्विक जहाज़ निर्माण में नगण्य हिस्सेदारी: अपनी विस्तृत तटरेखा एवं बढ़ते व्यापारिक परिमाण के बावजूद, भारत की घरेलू जहाज़ निर्माण क्षमता सीमित बनी हुई है, जिसके कारण देश विदेशी निर्मित जहाज़ों पर निर्भर है तथा माल ढुलाई दरों की अस्थिरता के प्रति संवेदनशील बना रहता है।
- वैश्विक जहाज़ निर्माण उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी 1% से भी कम (लगभग 18वें स्थान) है, जो इसकी समुद्री महत्त्वाकांक्षाओं एवं औद्योगिक क्षमताओं के मध्य स्पष्ट अंतर को रेखांकित करती है।
- वर्तमान में भारतीय ध्वज वाले जहाज़ देश के कुल विदेशी आयात-निर्यात माल का मात्र 5% ही वहन करते हैं, जो स्थापित वैश्विक समुद्री शक्तियों की तुलना में अत्यंत कम है।
- विदेशी बेड़ों पर इस अत्यधिक निर्भरता के परिणामस्वरूप माल ढुलाई का वार्षिक बहिर्वाह बढ़कर 75 अरब डॉलर से अधिक हो जाता है।
- वैश्विक जहाज़ निर्माण में नगण्य हिस्सेदारी: अपनी विस्तृत तटरेखा एवं बढ़ते व्यापारिक परिमाण के बावजूद, भारत की घरेलू जहाज़ निर्माण क्षमता सीमित बनी हुई है, जिसके कारण यह विदेशी निर्मित जहाज़ों पर निर्भर है तथा माल ढुलाई दरों की अस्थिरता के प्रति संवेदनशील बना रहता है।
- वैश्विक जहाज़ निर्माण उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी 1% से भी कम (लगभग 18वें स्थान) है, जो इसकी समुद्री महत्त्वाकांक्षाओं एवं औद्योगिक क्षमताओं के मध्य स्पष्ट अंतर को रेखांकित करती है।
- वर्तमान में भारतीय ध्वज वाले जहाज़ देश के कुल विदेशी आयात-निर्यात माल का मात्र 5% ही वहन करते हैं, जो स्थापित वैश्विक समुद्री शक्तियों की तुलना में अत्यंत कम है।
- विदेशी बेड़ों पर यह अत्यधिक निर्भरता प्रतिवर्ष 75 अरब डॉलर से अधिक के भाड़ा बहिर्गमन का कारण बनती है।
- नियामक बाधाएँ तथा कर असमानताएँ: पुरातन कर संरचनाएँ तथा जटिल नियामक अनुपालन भारतीय शिपिंग रजिस्ट्रेशन की व्यावसायिक प्रतिस्पर्द्धात्मकता को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं।
- भारतीय शिपिंग कंपनियों को अनुपालन भार, नाविकों के वेतन पर कराधान तथा सीमित इनपुट टैक्स क्रेडिट लाभों के कारण उच्च परिचालन लागत का सामना करना पड़ता है, जिससे वे विदेशी-ध्वजांकित जहाज़ों की तुलना में कम प्रतिस्पर्द्धी हो जाती हैं।
- सीमा-शुल्क तथा प्रक्रियात्मक विलंब, जहाँ कार्गो क्लीयरेंस में प्रायः 3–4 दिन लग जाते हैं, लेन-देन लागत को और बढ़ाते हैं तथा टर्नअराउंड दक्षता को कम करते हैं।
- परिणामस्वरूप, अनेक संचालक विदेशी ‘सुविधा के ध्वज’ (flags of convenience) को प्राथमिकता देते हैं, जिससे भारत का समुद्री व्यापार बाह्य निर्भरता के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाता है तथा घरेलू बेड़े की क्षमता कमज़ोर होती है।
- अपर्याप्त गहन-ड्राफ्ट अवसंरचना: परंपरागत भारतीय बंदरगाहों की ऐतिहासिक अक्षमता, अत्यधिक गहरे ड्राफ्ट को बनाए रखने में, उनकी अगली पीढ़ी के मेगा-शिप्स को समायोजित करने की क्षमता को सीमित करती है।
- यह अवसंरचनात्मक कमी वैश्विक शिपिंग गठबंधनों को भारतीय तटों को दरकिनार करने के लिये बाध्य करती है, जिससे भारत एक प्रमुख समुद्री केंद्र के बजाय फीडर गंतव्य के रूप में स्थापित हो जाता है।
- भारत के 12 प्रमुख बंदरगाहों में से केवल कुछ ही ऐसे हैं जिनमें बड़े जहाज़ों के लिये आवश्यक गहराई उपलब्ध है, जबकि अन्य को आधुनिक गहरे -ड्राफ्ट वाले पोतों के संचालन हेतु व्यापक ड्रेजिंग (Dredging) की आवश्यकता है।
- यह कठोर ड्राफ्ट प्रतिबंध सीधे मेनलाइन कॉल्स को सीमित करती है, जिसके परिणामस्वरूप मानक पोत टर्नअराउंड अभी भी उन्नत एशियाई बंदरगाहों की तुलना में पीछे है।
- ग्रीन बंकरिंग को अपनाने की धीमी गति: वैकल्पिक समुद्री ईंधनों हेतु भारत का मूलभूत पारिस्थितिकी तंत्र अत्यधिक अविकसित है, जिससे इस क्षेत्र के अनिवार्य डीकार्बोनाइजेशन पथ में गंभीर बाधा उत्पन्न होती है।
- विशेषीकृत हरित बंकरिंग अवसंरचना की तीव्र तैनाती के अभाव में, घरेलू बंदरगाहों के समक्ष अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) के क्रमशः सख्त होते उत्सर्जन मानकों के अंतर्गत वैश्विक स्तर पर अप्रासंगिक होने का जोखिम विद्यमान है।
- पारादीप जैसे बंदरगाहों पर हरित हाइड्रोजन एवं अमोनिया हेतु हाल ही में 92,000 करोड़ रुपये से अधिक के MoU हस्ताक्षरित होने के बावजूद, वास्तविक परिचालन हरित बंकरिंग सुविधाएँ अत्यंत सीमित हैं।
- बुनियादी ढाँचे की इस कमी के कारण शून्य-उत्सर्जन दोहरे ईंधन चालित जहाज़ों के लिये भारतीय तटों पर विश्वसनीय रूप से ईंधन आपूर्ति करना लगभग असंभव हो जाता है, जिससे IMO के वर्ष 2030 के उत्सर्जन कटौती लक्ष्यों के अनुपालन में विफलता का जोखिम उत्पन्न होता है।
- प्रौद्योगिकी अंतराल तथा यंत्रीकरण की कमी: समग्र कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) एवं बंदरगाह स्वचालन के धीमे अंगीकरण से श्रम उत्पादकता में उल्लेखनीय कमी आती है तथा आपूर्ति शृंखला की पूर्वानुमान क्षमता सीमित हो जाती है।
- यद्यपि कुछ आंशिक डिजिटल ढाँचे उपलब्ध हैं, तथापि व्यापक एंड-टू-एंड स्मार्ट टर्मिनल एकीकरण के अभाव में स्थानीय स्तर पर विखंडित डेटा भंडारण (Data Silo) निर्मित होते हैं, जो वास्तविक समय कार्गो दृश्यता में बाधा उत्पन्न करते हैं।
- कई राज्य-नियंत्रित प्रमुख बंदरगाह अब भी अर्द्ध-यंत्रीकृत कार्गो प्रबंधन पर निर्भर हैं, जहाँ क्रेन उत्पादकता केवल 25–30 मूव प्रति घंटा है, जबकि पूर्णतः स्वचालित वैश्विक हब्स में यह 40+ मूव तक पहुँचती है।
- यद्यपि ‘डिजी बंदर’ जैसी पहलें इस स्थिति को सुधारने का प्रयास कर रही हैं, फिर भी वर्तमान डिजिटल विखंडन के कारण लगभग 15% टर्मिनल क्षमता अनावश्यक प्रतीक्षा समय में फँसी रहती है।
- घरेलू संरक्षण एवं क्षतिपूर्ति (P&I) तथा बीमा घाटा: एक सुदृढ़ घरेलू संरक्षण एवं क्षतिपूर्ति (P&I) तथा पुनर्बीमा प्रणाली के अभाव में भारतीय समुद्री व्यापार भू-राजनीतिक व्यवधानों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बना रहता है।
- परिणामस्वरूप, भारतीय माल ढुलाई कंपनियाँ संरचनात्मक रूप से पश्चिमी सिंडिकेट पर निर्भर हैं, जिससे ऊर्जा आयात युद्ध-जोखिम बीमा की आकस्मिक वापसी के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाता है।
- वैश्विक समुद्री बीमा बाज़ार अत्यधिक केंद्रित है, जहाँ समुद्र में संचालित जहाज़ों के लगभग 90% टन भार का बीमा मात्र 12 P&I क्लबों के सीमित समूह द्वारा किया जाता है, जिसके कारण भारत जैसे देश जोखिम एवं मूल्य निर्धारण पर सीमित नियंत्रण के साथ मुख्यतः मूल्य-स्वीकारक बन जाते हैं।
- लाल सागर एवं होर्मुज़ क्षेत्र में तनाव बढ़ने के दौरान, बाह्य युद्ध-जोखिम में तीव्र वृद्धि हुई, जिसके परिणामस्वरूप भारतीय सरकार को आपूर्ति शृंखलाओं की निरंतरता सुनिश्चित करने हेतु तत्काल लगभग 1.5 बिलियन डॉलर की अंतरिम संप्रभु गारंटी प्रदान करनी पड़ी।
भारत के लिये समुद्री बीमा संप्रभुता क्यों आवश्यक है?
- नए व्यापार अवरोधक के रूप में बीमा, न कि नाकेबंदी: हाल के हॉर्मुज़ तनावों ने यह स्पष्ट किया कि समुद्री मार्ग पुनः खुलने के बावजूद, यदि बीमाकर्त्ता युद्ध-जोखिम कवरेज देने से इनकार कर दें तो व्यापार ठप हो सकता है। अतः बीमा बाज़ार अब नौसैनिक नियंत्रण जितना ही रणनीतिक महत्त्व प्राप्त कर चुके हैं।
- युद्ध-जोखिम प्रीमियम का व्यवधान: सामान्य समुद्री बीमा में युद्ध-जोखिम शामिल नहीं होता, जिसके कारण व्यापारियों को अतिरिक्त कवरेज लेना पड़ता है।
- भू-राजनीतिक तनाव की स्थिति में ये युद्ध-जोखिम प्रीमियम तीव्रता से बढ़ते हैं, जिससे भाड़ा लागत एवं समग्र आयात व्यय में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।
- यह अस्थिरता न केवल व्यापारिक प्रतिस्पर्द्धात्मकता को प्रभावित करती है, बल्कि स्थिर समुद्री मार्गों पर निर्भर निर्यातकों एवं आयातकों के लिये अनिश्चितता भी उत्पन्न करती है।
- ऊर्जा सुरक्षा संबंधी भेद्यता: विश्व के तीसरे सबसे बड़े तेल आयातक के रूप में भारत निर्बाध समुद्री व्यापार पर बहुत अधिक निर्भर है।
- बीमा संबंधी व्यवधान कच्चे तेल की आपूर्ति, माल ढुलाई और मुद्रास्फीति की स्थिरता को सीधे तौर पर खतरे में डाल सकता है।
- विदेशी P&I क्लबों पर निर्भरता: भारत अभी भी विदेशी प्रोटेक्शन एंड इंडेम्निटी (P&I) क्लबों तथा पुनर्बीमा बाज़ारों पर निर्भर बना हुआ है।
- यह स्थिति राष्ट्रीय व्यापार को बाह्य भू-राजनीतिक निर्णयों एवं प्रतिबंध-आधारित जोखिमों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाती है।
- बंदरगाहों से परे रणनीतिक स्वायत्तता: आधुनिक समुद्री शक्ति अब केवल बंदरगाहों, बेड़ों और समुद्री मार्गों तक ही सीमित नहीं है, इसमें शिपिंग वित्त, बीमा और जोखिम संरचना पर नियंत्रण भी शामिल है।
भारत के समुद्री क्षेत्र को सुदृढ़ करने हेतु किन उपायों की आवश्यकता है?
- समुद्री बीमा का संस्थानीकरण: रणनीतिक रणनीतिक स्वायत्तता प्राप्त करने तथा घरेलू आपूर्ति शृंखलाओं को भू-राजनीतिक अस्थिरता से सुरक्षित रखने हेतु भारत को त्वरित रूप से एक स्वदेशी संरक्षण और क्षतिपूर्ति (P&I) पुनर्बीमा पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना आवश्यक है।
- इसके लिये नियामक निकायों को घरेलू बीमाकर्त्ताओं के मध्य जोखिम-साझाकरण ढाँचा अनिवार्य करना होगा, जिससे पश्चिमी सिंडिकेट्स को प्रीमियम के बाहरी प्रेषण में संरचनात्मक कमी सुनिश्चित हो सके।
- इसके अतिरिक्त, एक स्थायी संप्रभु युद्ध-जोखिम बैकस्टॉप का संस्थागतकरण वैश्विक ऊर्जा संकट के दौरान निर्बाध ऊर्जा सुरक्षा की गारंटी प्रदान करेगा।
- अंततः यह वित्तीय संप्रभुता भारतीय बेड़ा संचालकों को अस्थिर समुद्री गलियारों में बिना तदर्थ प्रतिक्रियात्मक हस्तक्षेपों पर निर्भर हुए प्रभावी संचालन हेतु सशक्त बनाएगी।
- डीपटेक तथा AI-संचालित पोर्ट गवर्नेंस का कार्यान्वयन: समुद्री लॉजिस्टिक्स में रूपांतरण हेतु एक पूर्वानुमानित एवं पूर्णतः स्वचालित पोर्ट गवर्नेंस ढाँचा स्थापित करने के लिये डीपटेक तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का तीव्र एकीकरण आवश्यक है।
- ब्लॉकचेन-सक्षम सिंगल-विंडो क्लीयरेंस के कार्यान्वयन से नौकरशाही बाधाएँ समाप्त होंगी, जिससे संपूर्ण आपूर्ति शृंखला में छेड़छाड़-रहित एवं रियल टाइम कार्गो ट्रैकिंग सुनिश्चित होगी।
- इसके अतिरिक्त, AI-संचालित पूर्वानुमानित रखरखाव तथा स्वायत्त टर्मिनल रोबोटिक्स की तैनाती से जहाज़ों के टर्नअराउंड समय में उल्लेखनीय कमी आएगी तथा टर्मिनल यार्ड उपयोग का अनुकूलन होगा।
- यह तकनीकी-शासन दृष्टिकोण भारतीय बंदरगाहों को पारंपरिक प्रतिक्रियाशील संचालन से हटाकर अत्यधिक चुस्त एवं डिजिटल रूप से अनुकूलित समुद्री केंद्रों में रूपांतरित करेगा।
- गहन-ड्राफ्ट मेगा ट्रांसशिपमेंट स्वायत्तता को तीव्र करना: घरेलू कार्गो के विदेशी हब्स की ओर निरंतर अपसरण को स्थायी रूप से रोकने हेतु नीति-निर्माताओं को गहन-ड्राफ्ट मेगा ट्रांसशिपमेंट बंदरगाहों के शीघ्र संचालन को आक्रामक रूप से प्राथमिकता देनी होगी।
- इसके लिये उन्नत ड्रेजिंग प्रौद्योगिकियों तथा रणनीतिक तटीय अभियांत्रिकी का उपयोग करते हुए अगली पीढ़ी के अत्यधिक विशाल कंटेनर पोतों के लिये निर्बाध पोत-स्थल क्षमता सुनिश्चित करनी होगी।
- इन गहरे जल केंद्रों के समीप विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) स्थापित करने से कैप्टिव कार्गो पारिस्थितिकी तंत्र विकसित होगा, जिससे व्यापक स्तर की अर्थव्यवस्थाएँ सृजित होंगी।
- ट्रांसशिपमेंट परिचालनों के आंतरिकीकरण के माध्यम से भारत समग्र लॉजिस्टिक लागत को उल्लेखनीय रूप से कम कर सकता है तथा अपने समुद्री माल मार्गों पर पूर्ण सार्वभौमिक नियंत्रण स्थापित कर सकता है।
- राजकोषीय युक्तिकरण तथा विधायी सामंजस्य: घरेलू जहाज़-मालिक पारिस्थितिकी तंत्र के पुनरुद्धार हेतु पुरातन कराधान संरचनाओं का व्यापक सुधार एवं समुद्री कानूनों का आक्रामक सामंजस्य आवश्यक है।
- बंकर ईंधन तथा जहाज़ मरम्मत जैसे महत्त्वपूर्ण इनपुट पर अप्रत्यक्ष करों का युक्तिकरण घरेलू एवं विदेशी ध्वज वाले जहाज़ों के मध्य वाणिज्यिक समानता स्थापित करने के लिये अनिवार्य है।
- साथ ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी टन भार कर व्यवस्था (Tonnage Tax) की ओर संक्रमण से भारतीय समुद्री संपत्तियों को अपतटीय कर आश्रयों में स्थानांतरित करने की प्रवृत्ति को प्रभावी रूप से हतोत्साहित किया जा सकेगा।
- सुव्यवस्थित कानूनी एवं वित्तीय ढाँचा स्वाभाविक रूप से एक अत्यधिक पूर्वानुमानित निवेश वातावरण को प्रोत्साहित करेगा, जिससे भारतीय शिपयार्डों में पर्याप्त विदेशी पूंजी आकर्षित होगी।
- हरित बंकरिंग एवं डीकार्बोनाइजेशन कॉरिडोर का नेतृत्व: कठोर वैश्विक जलवायु मानकों के अनुरूप भारत को अपनी विस्तृत तटरेखा पर शून्य-उत्सर्जन हरित बंकरिंग कॉरिडोर का व्यवस्थित विकास करना होगा।
- ग्रीन हाइड्रोजन एवं अमोनिया जैसे वैकल्पिक समुद्री ईंधनों के स्थानीय उत्पादन एवं भंडारण को प्रोत्साहित कर भारतीय बंदरगाहों को वैश्विक ईंधन आपूर्ति केंद्र के रूप में स्थापित किया जा सकता है।
- सभी प्रमुख टर्मिनलों पर शोर-टू-शिप पावर अवसंरचना को अनिवार्य बनाने से तटीय ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी आएगी तथा स्थानीय पारिस्थितिक दबाव घटेगा।
- यह आक्रामक डीकार्बोनाइजेशन पहल घरेलू बेड़े को भविष्य के लिये सुरक्षित करेगी तथा सतत वैश्विक समुद्री व्यापार में भारत की नेतृत्वकारी भूमिका को सुदृढ़ करेगी।
- नवाचारी वित्तपोषण के माध्यम से बेड़ा विस्तार: विदेशी बेड़ों पर संरचनात्मक निर्भरता को समाप्त करने हेतु घरेलू जहाज़ अधिग्रहण के लिये विशेष समुद्री वित्तपोषण तंत्र विकसित करना आवश्यक है।
- एक समर्पित समुद्री विकास वित्तीय संस्था की स्थापना घरेलू संचालकों को कम लागत एवं दीर्घावधि पूंजी उपलब्ध कराएगी, जिससे जहाज़ निर्माण से संबंधित उच्च पूंजीगत जोखिमों में कमी आएगी।
- साथ ही इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स तथा निजी इक्विटी निवेश को प्रोत्साहित कर इस क्षेत्र में तरलता बढ़ाई जा सकती है।
- वित्तीय लोकतंत्रीकरण भारतीय-ध्वजांकित बेड़े के तीव्र विस्तार को संभव बनाएगा तथा संप्रभु EXIM कार्गो परिवहन में आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करेगा।
- बहु-आयामी आंतरिक क्षेत्रों की कनेक्टिविटी का अनुकूलन: बंदरगाह स्तर पर दक्षता को अधिकतम करने हेतु सरकार को तटीय शिपिंग को विस्तृत अंतर्देशीय जलमार्ग एवं रेल नेटवर्क के साथ निर्बाध रूप से एकीकृत करने के लिये तीव्र प्रयास करने चाहिये।
- भीड़भाड़ वाले सड़क मार्गों से भारी माल ढुलाई को समर्पित रेल माल ढुलाई गलियारों तथा अनुकूलित नदी मार्गों की ओर स्थानांतरित करने से राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स लागत में उल्लेखनीय कमी आएगी।
- एक एकीकृत अंतर-मोडल डिजिटल फ्रेट एक्सचेंज के कार्यान्वयन से गतिशील कार्गो रूटिंग को बढ़ावा मिलेगा, जिससे सभी परिवहन माध्यमों में अधिकतम क्षमता उपयोग सुनिश्चित किया जा सकेगा।
- भीतरी क्षेत्रों का यह समग्र एकीकरण औद्योगिक विकास का लोकतंत्रीकरण करेगा, जिससे दूरस्थ विनिर्माण समूहों को प्रत्यक्ष रूप से अंतर्राष्ट्रीय समुद्री प्रवेश द्वारों से जोड़ा जा सकेगा।
- समुद्री कूटनीति तथा रणनीतिक कौशल विकास का संवर्द्धन: दीर्घकालिक समुद्री प्रभुत्व प्राप्त करने हेतु घरेलू जहाज़ निर्माण प्रौद्योगिकियों तथा समुद्री कार्यबल दक्षता के उन्नयन के लिये रणनीतिक विदेशी साझेदारियों का उपयोग आवश्यक है।
- उन्नत समुद्री राष्ट्रों के साथ लक्षित द्विपक्षीय समझौते लागू करने से दोहरे ईंधन वाले जहाज़ों के निर्माण एवं स्वायत्त नौवहन जैसे विशिष्ट क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण ज्ञान हस्तांतरण को बढ़ावा मिलेगा।
- साथ ही घरेलू समुद्री अकादमियों का आधुनिकीकरण कर उन्हें भविष्य-उन्मुख डिजिटल एवं पारिस्थितिकी दक्षताओं के अनुरूप बनाने से भारतीय नाविकों की वैश्विक रोज़गार क्षमता में तीव्र वृद्धि होगी।
- यह सक्रिय समुद्री कूटनीति तथा उन्नत मानव संसाधन विकास का समन्वय भारत को वैश्विक समुद्री अर्थव्यवस्था का एक अनिवार्य स्तंभ स्थापित करेगा।
निष्कर्ष:
समुद्री संप्रभुता की दिशा में भारत की यात्रा के लिये प्रतिक्रियात्मक नीति-निर्माण से आगे बढ़कर बीमा, अवसंरचना और हरित प्रौद्योगिकी में सक्रिय एवं संस्थागत सुधारों की आवश्यकता है। AI-संचालित शासन और आत्मनिर्भर जहाज़ निर्माण पारिस्थितिकी तंत्र के साथ गहरे तल वाले विशाल बंदरगाहों को एकीकृत करके देश वैश्विक भू-राजनीतिक व्यवधानों से अपने व्यापार को प्रभावी ढंग से सुरक्षित कर सकता है। अंततः ‘समुद्री भारत विज़न 2030’ की सफलता उन्नत राजकोषीय युक्तिकरण और सतत कार्बन उत्सर्जन न्यूनीकरण के बीच संतुलन स्थापित करने पर निर्भर करेगी, जिससे भारत वैश्विक नीली अर्थव्यवस्था में एक अग्रणी भूमिका सुनिश्चित कर सके।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न भारत की समुद्री अर्थव्यवस्था को रूपांतरित करने में बंदरगाह-आधारित विकास (Port-led development) की भूमिका पर चर्चा कीजिये। इससे संबंधित चुनौतियों को भी स्पष्ट कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. 'समुद्री बीमा संप्रभुता' से क्या अभिप्राय है?
भारत का यह प्रयास घरेलू युद्ध-जोखिम कोष तथा संप्रभु बीमा गारंटी की स्थापना के माध्यम से विदेशी P&I क्लबों पर निर्भरता को कम करना है।
2. 'डिजी बंदर' फ्रेमवर्क क्या है?
यह एक राष्ट्रीय डिजिटल पहल है जो कार्गो ट्रैकिंग को स्वचालित करने और बंदरगाहों पर जहाज़ों के टर्नअराउंड समय को कम करने के लिये AI और स्मार्ट तकनीक का उपयोग करती है।
3. 'डीप-ड्राफ्ट' अवसंरचना क्यों महत्त्वपूर्ण है?
यह बंदरगाहों को अति-विशाल कंटेनर जहाज़ों (लगभग 18-20 मीटर गहराई) को समायोजित करने में सक्षम बनाती है, जिससे माल को विदेशी केंद्रों की ओर मोड़े जाने से रोका जा सकता है।
4. ग्रीन टग ट्रांजिशन प्रोग्राम क्या है?
यह समुद्री कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने हेतु पारंपरिक बंदरगाह टगबोटों को स्वदेशी हरित-ईंधन संचालित संस्करणों से प्रतिस्थापित करने की एक सरकारी पहल है।
5. P&I क्लब क्या है?
संरक्षण और क्षतिपूर्ति (P&I) क्लब एक पारस्परिक बीमा संघ है, जो मानक समुद्री बीमा के अंतर्गत कवर न किये गए वाणिज्यिक जहाज़ों के लिये जोखिम कवरेज प्रदान करता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ)
प्रश्न. 'क्षेत्रीय सहयोग के लिये इंडियन ओशन रिम एसोसिएशन फॉर रीजनल को-ऑपरेशन (IOR_ARC)' के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2015)
- इसकी स्थापना हाल ही में घटित समुद्री डकैती की घटनाओं और तेल अधिप्लाव (आयल स्पिल्स) की दुर्घटनाओं के प्रतिक्रियास्वरूप की गई है।
- यह एक ऐसी मैत्री है जो केवल समुद्री सुरक्षा हेतु है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (d)
प्रश्न. ब्लू कार्बन क्या है? (2021)
(a) महासागरों और तटीय पारिस्थितिकी प्रणालियों द्वारा प्रगृहीत कार्बन
(b) वन जैव मात्रा (बायोमास) और कृषि मृदा में प्रच्छादित कार्बन
(c) पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस में अंतर्विष्ट कार्बन
(d) वायुमंडल में विद्यमान कार्बन
उत्तर:(a)
मेन्स
प्रश्न. ‘नीली क्रांति’ को परिभाषित करते हुए, भारत में मत्स्यपालन की समस्याओं और रणनीतियों को समझाइये। (2018)