पुलिस में महिलाओं हेतु एक आदर्श नीति | 20 Mar 2019

(यह एडिटोरियल 14 मार्च, 2019 को द हिंदू में प्रकाशित लेख ‘A model policy for women’ पर आधारित है। यह लेख पुलिस विभाग में महिलाओं की भागीदारी और उनके द्वारा सामना की जाने वाली चुनौतियों के संदर्भ में है।)

संदर्भ

  • स्वतंत्र भारत में महिलाएँ समय के प्रवाह के साथ विभिन्न क्षेत्रों में उभरकर सामने आई हैं परंतु ये परिवर्तन पिछले 35 वर्षों में तीव्रता से परिलक्षित हुए हैं। इस दौरान महिलाओं ने औद्योगिक क्रांति के पश्चात् उत्पन्न अनुकूल परिस्थितियों और वैश्वीकरण की सकारात्मकता का लाभ उठाया है।
  • इस उत्थान ने घरेलू, कार्यस्थल पर सहकर्मियों के साथ और संभवतः बड़े पैमाने पर समाज में लैंगिक संबंधों को मौलिक रूप से परिवर्तित किया है। यह वैसा ही है जैसा 1960 के दशक में अमेरिका में महिलाओं की सामाजिक स्थिति में परिवर्तनों का अनुभव किया गया।
  • अब तक भारतीय महिलाएँ सक्रिय कार्यबल का हिस्सा बनने में एक लंबा सफर तय कर चुकी हैं। भारतीय महिलाओं ने पुलिस और पैरा-मिलिट्री जैसे विभागों से लेकर संभवत: अधिकांश पेशेवर क्षेत्रों में सभी बाधाओं को पार किया है।
  • यद्यपि यह पर्याप्त नहीं है क्योंकि भारत में पुलिस को समावेशी, भेदभाव रहित और कुशल बनाकर महिलाओं को पुलिस की मुख्यधारा में लाने का प्रयास नीतिगत स्तर पर अभी भी अनुपस्थित है।

पुलिस विभाग में महिलाओं की भारी कमी

  • यद्यपि भारत में राष्ट्रीय स्तर पर पुलिस बलों में महिलाओं की संख्या बढ़ी है परंतु यह पुलिस विभाग की कुल संख्या बल का केवल 7 प्रतिशत तक सीमित है।
  • राज्यों के मध्य व्यापक रूप से भिन्नता है जिसमें तमिलनाडु पुलिस बल में 12 प्रतिशत महिलाएँ हैं, जबकि असम में यह 1 प्रतिशत से भी कम है। यह इस तथ्य के बावजूद है कि 12 राज्यों में पुलिस बल में महिलाओं के लिये 30 प्रतिशत या अधिक का आरक्षण निर्धारित करने वाले नियम वर्षों से हैं।
  • भारतीय पुलिस में महिलाओं की भागीदारी 70 के दशक की शुरुआत में आरंभ हुई जब महिलाएँ सुरक्षा बलो में शामिल होने लगीं। उस दशक के दौरान हजारों महिलाएँ कांस्टेबल से लेकर उच्चाधिकारी रैंक तक सभी स्तरों पर सुरक्षा बलों में नियुक्त हुईं।
  • पिछले बीस वर्षों में भारत में पुलिस बलों द्वारा महिलाओं की एक अच्छी संख्या में भर्ती की गई है लेकिन व्यावसायिक परिधि के भीतर महिलाओं को पुरुषों के ‘समान भागीदार’ के रूप में स्वीकार्यता और आत्मसात करने की दिशा में वांछित कार्य नहीं किये गए हैं।
  • महिलाओं का अल्प प्रतिनिधित्व इस तथ्य को उजागर करता है कि सुरक्षाबलों में महिलाओं को अभी भी सुरक्षा नियुक्तिओं के सभी रैंकों और स्तरों पर ‘वे’ बनाम ‘हम’ के रूप में माना जाता है।

व्यवस्था के समक्ष चुनौतियाँ

  • महिलाओं की तैनाती के निर्णय लैंगिक रूढ़िवाद से मुक्त नहीं हैं जो महिलाओं को अग्रणी भूमिका निभाने से रोकते हैं। यह पूर्वाग्रह केवल पुरुष सहसहकर्मियों तक ही सीमित नहीं है अपितु कभी-कभी वरिष्ठ महिला अधिकारी भी उन्हें कमज़ोर, काम करने के कम इच्छुक और कम कठोर मानती हैं।
  • महिलाओं को शारीरिक रूप से कम दुष्कर या डेस्क ड्यूटी के कार्य स्थानांतरित कर अथवा केवल महिलाओं के विरुद्ध अपराधों पर कार्यवाही के लिये पुलिस कार्य देकर उन्हें दरकिनार करने की प्रवृत्ति परिलक्षित होती है।
  • महिला पुलिसकर्मियों को मुख्य रूप से महिलाओं के विरुद्ध अपराधों से निपटने के लिये नियुक्त किया जाता है। इसके साथ ही इन्हें महिला कैदियों से संलग्न दायित्वों के लिये नियुक्त करने की अवधारणा भी इनके हितों के विरुद्ध काम करती है क्योंकि यह उन्हें मुख्य पुलिस कार्यों से अलग करती है।
  • वर्तमान आँकड़ों से पता चलता है कि पुलिस में ज्यादातर महिलाएँ निचले पायदान पर कार्यरत हैं जो प्रमुख कार्यकारी पदों पर महिलाओं की कमी को दर्शाता है।
  • महिला पुलिसकर्मियों के लिये अलग शौचालयों की व्यवस्था न होना, महिलाओं के लिये पृथक आरामगृह की कमी, महिलाओं के लिये अलग आवास और अन्य सुविधाओं एवं बच्चे की देखभाल की उचित व्यवस्था का अभाव आदि के कारण पुलिस विभाग निरंतर और व्यापक रूप से लैंगिक पूर्वाग्रह के साथ-साथ लैंगिक उदासीनता से भी ग्रस्त है।

पुलिस विभाग में लैंगिक समानता की आवश्यकता

  • पुलिस तंत्र में अधिक महिलाओं की उपस्थिति पुलिस स्टेशनों में महिलाओं के लिये एक अच्छा वातावरण बना सकती है।
  • अंतर्राष्ट्रीय शोध से पता चलता है कि महिला पुलिस और प्रवर्तन अधिकारी एक अलग स्त्री सुलभ पुलिसिंग शैली का उपयोग करते हैं जैसे- शारीरिक बल प्रयोग पर कम निर्भरता और संचार कौशल पर अधिक जोर। इस शैली को अपनाने से संभावित हिंसक या संघर्ष की स्थितियों को नियंत्रित करने की संभावना बढ़ जाती है।
  • किसी भी प्रगतिशील और आधुनिक पुलिस एजेंसी में सभी स्तरों पर महिलाओं का निम्न प्रतिनिधित्व कानून प्रवर्तन एजेंसियों की संस्कृति और परिचालन दक्षता को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है विशेष रूप से उस समुदाय या देश में जहाँ यह व्यापक स्तर पर है।
  • वर्तमान भारत में महिलाओं के विरुद्ध अपराध अपने उच्च स्तर पर है और सामाजिक रूप से विनाशकारी और शोषणकारी गतिविधियाँ जैसे- दहेज, छेड़छाड़, यौन उत्पीड़न और बलात्कार आदि सामान्य घटनाएँ हो चुकी हैं। कई बार आपराधिक मामलों पर उचित तरीके से कार्रवाई नहीं हो पाती है क्योंकि पीड़ित/पीड़िता उन पुरुष अधिकारियों की असंवेदनशीलता से पीड़ित हो जाता है जिनमें संवेदनशीलता की कमी होती है। पुलिस तंत्र में अधिक महिला कर्मियों की नियुक्ति इस समस्या का समाधान करने में सहायता कर सकती है।

आवश्यक प्रोत्साहन उपाय

  • मुख्य कार्यकारी पोस्टिंग में कांस्टेबलों से लेकर इंस्पेक्टर और उच्च रैंक तक के क्षेत्र में अधिक महिलाओं को नियुक्त किये जाने की आवश्यकता है।
  • भौगोलिक व क्षेत्रीय विविधता को सुनिश्चित करने के लिये पुलिस/ सुरक्षा विभाग को प्रत्येक ज़िले में विशेष भर्ती अभियान चलाना चाहिये जिसमें महिलाओं के न्यूनतम 33 प्रतिशत स्थान का आरक्षित होना आवश्यक है।
  • पुलिस को मीडिया और शैक्षणिक संस्थानों में महिलाओं के लिये पुलिस में अवसरों के बारे में जागरूकता फैलानी चाहिये।
  • पुलिस में महिलाओं को अपने पुरुष समकक्षों के साथ प्रत्येक प्रकार से समानता बनाए रखने के लिये आवश्यक प्रशिक्षण, समर्थन और विश्वास प्राप्त करना चाहिये।
  • एक सामान्य लैंगिक-तटस्थ कैडर को सभी रैंकों के लिये बनाने की आवश्यकता है जिससे उन्नति के अवसर समान रूप से उपलब्ध हों।
  • परामर्श के लिये संसाधन केंद्र, अवसरों और संभावनाओं के बारे में जागरूकता पैदा करना और कॅरियर योजना और प्रशिक्षण तथा कार्यस्थल पर चुनौतियों का सामना करने में मदद करना आवश्यक है।
  • जबकि महिलाओं के खिलाफ अपराधों से निपटने के लिये प्रशिक्षण की कमी और सामान्य रूप से पुलिस बल के संवेदीकरण हेतु महिलाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका है इसलिये उन्हें केवल महिला अपराधों से निपटने तक ही सीमित नहीं होना चाहिये।
  • महिलाओं की कुछ विशेष आवश्यकताएँ होती हैं जैसे गर्भावस्था के दौरान और उसके बाद की स्थिति, जिस पर ध्यान देने की आवश्यकता होती है। उन्हें गैर-कार्यकारी पोस्टिंग के लिये नहीं हटाया जाना चाहिये। पुलिस बल को अधिक महिलाओं को क्षेत्र में नियुक्त करने के लिये प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है।
  • अधिकांश राज्य पुलिस विभागों ने महिलाओं के लिये अलग शौचालय और चेंजिंग रूम उपलब्ध कराने, सभी पुलिस स्टेशनों और इकाइयों में महिलाओं के लिये संलग्न शौचालयों युक्त अलग आवास बनाने हेतु राज्य पुलिस बल आधुनिकीकरण योजना के अंतर्गत धन प्राप्त किया है। पुलिस विभागों को इस कोष का सर्वोत्तम उपयोग सुनिश्चित करना चाहिये।
  • पुलिस विभाग को भी महिलाओं के लिये सुरक्षित कार्य स्थान सुनिश्चित करना चाहिये और महिलाओं हेतु एक व्यवहार्य व उपयुक्त कॅरियर विकल्प बनाने के लिये भेदभाव और उत्पीड़न के प्रति शून्य-सहिष्णुता की नीति अपनानी चाहिये।
  • विभागों को कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम 2013 को उचित प्रकार से लागू करना चाहिये।

आगे की राह

  • चूँकि पुलिस बलों में अधिक महिलाओं की तत्काल आवश्यकता है ऐसे में समानता सुनिश्चित किये बिना केवल संख्या में बढ़ोतरी पर्याप्त नहीं होगी।
  • नौकरशाही और पुलिस बल के भीतर लैंगिकवादी दृष्टिकोणों के प्रसार का मुकाबला करने और महिलाओं को उनकी पूरी क्षमता का एहसास कराने के लिये सुरक्षा बलों द्वारा एक संगठनात्मक प्रतिक्रिया की आवश्यकता है।
  • पुलिस बल में महिलाओं का एकीकरण करना भारत में पुलिस सुधार की प्रक्रिया का एक अनिवार्य घटक होना चाहिये जिससे वे परिवर्तन के अग्रदूत बन सकें।