परमाणु अराजकता की समाप्ति | 14 Apr 2017

संदर्भ
उल्लेखनीय है कि मार्च 2017 का अंतिम सप्ताह न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि साबित हुआ क्योंकि 130 देशों के राजनयिकों ने परमाणु हथियारों को प्रतिबंधित करने के लिये एक अंतर्राष्ट्रीय संधि पर औपचारिक वार्ता की| विदित हो कि इस वार्ता का उद्देश्य किसी भी देश के लिये परमाणु हथियारों का उत्पादन करना, इसकी प्रक्रिया, भंडारण, तैनाती, परमाणु हाथियारों को उपयोग करने की धमकी देना तथा इनके उपयोग को गैर-क़ानूनी घोषित करना था| ध्यातव्य है कि इस संधि के अंतिम रूप को वर्ष 2017 के अंत तक अनुमोदित किया जा सकता है|

महत्त्वपूर्ण बिंदु

  • उल्लेखनीय है कि उक्त देशों में से मात्र नौ देशों (जिनमें भारत और पाकिस्तान भी शामिल हैं) के राजनयिक इस सम्मेलन में उपस्थिति नहीं थे| 
  • परमाणु हथियार के संबंध में हुई यह वार्ता उस दीर्घावधिक मांग का परिणाम थी जिसमें यह पक्ष रखा गया था कि दुनिया के सभी देशों के लिये एकसमान सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिये|
  • दशकों से विश्व का झुकाव परमाणु खतरे के कारण परमाणु हथियारों युक्त देशों से मानवता युक्त देशों की ओर हुआ है| ध्यातव्य है कि वर्ष 1946 में इस संबंध में पहला संकल्प पारित हुआ था जिसमें परमाणु हथियारों को राष्ट्रीय हथियारों की श्रेणी से हटाने की योजना बनाने की मांग की गई थी| 

शीत युद्ध की दौड़

  • परमाणु हथियारों से रहित विश्व की मांग से तात्पर्य सामान्य मानवीय आवेग और अन्य मानवों के प्रति सहानुभूति है| परमाणु हथियार केवल सामूहिक विनाश का साधन हैं और ऐतिहासिक रूप से यह देखा जा चुका है कि उनके उपयोग से असहनीय क्षति ही पहुँचती है|
  • ध्यातव्य है कि इसी परिप्रेक्ष्य में नवम्बर,1961 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक संकल्प पारित किया गया था, जिसमें यह घोषणा की गई थी कि यदि कोई राष्ट्र परमाणु अथवा थर्मोनुक्लेअर हथियारों (thermonuclear weapons) का उपयोग करता है तो उसे संयुक्त राष्ट्र के चार्टर का उल्लंघनकर्ता माना जाएगा| इसका अर्थ यह है कि ऐसी कोई भी हरकत करने वाला देश मानवता के लिये निर्धारित नियमों के विपरीत कार्य करता हुआ माना जाएगा| ऐसे किसी भी कृत्य को मानवजाति और सभ्यता के विरुद्ध अपराध के रूप में दृष्टिगत किया जाएगा|
  • विदित हो कि शीत युद्ध के दौरान भी अमेरिका और सोविअत संघ के द्वारा यह तर्क प्रस्तुत किया गया था कि विश्व जीवन और मृत्यु के संघर्ष से जूझ रहा था और इसमें परमाणु हथियार का उपयोग एक दुखद आवश्यकता थी| हालाँकि दोनों पक्ष यह जानते थे कि परमाणु युद्ध में कोई भी विजयी नहीं होगा, तथापि इन्होंने युद्ध किया| 

परमाणु क्लब का विरोध 

  • जैसा की हम सभी जानते हैं कि शीतयुद्ध के अंत के पश्चात् ही विश्व की एक नई शुरुआत की अपेक्षा की गई थी| संयुक्त राष्ट्र महासभा ने परमाणु हथियार के खतरे या उपयोग की वैधता के संबंध में अंतर्राष्ट्रीय न्यायलय से भी पूछताछ की थी| 
  • जुलाई 1996 में, न्यायालय द्वारा इस संबंध में दो निष्कर्षों सहित एक सलाहकारी विकल्प जारी किया गया| पहला निष्कर्ष यह था कि परमाणु हथियारों का खतरा और प्रयोग सामान्यतः सेना संघर्ष में लागू होने वाले अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के नियमों तथा मानवता के नियमों व सिद्धांतों के विपरीत हैं|
  • और दूसरा, इसमें विश्वास के साथ आगे बढ़ने का दायित्व तथा सख्त एवं प्रभावी अंतर्राष्ट्रीय नियंत्रण के साथ-साथ परमाणु निरस्त्रीकरण भी शामिल है|
  • उल्लेखनीय है कि न्यायालय द्वारा दिये गए निर्णय के 20 वर्षों बाद परमाणु हथियारों से युक्त देशों ने अंतर्राष्ट्रीय नियमों का पालन करने से इंकार कर दिया| हालाँकि इस देशों के द्वारा परमाणु निरस्त्रीकरण के संबंध में अवश्य वार्ताएँ प्रारंभ की गई|
  • इसके पश्चात् इन देशों के द्वारा परमाणु हथियारों पर प्रतिबंध लगाने का विचार करने, इन्हें प्रतिबंधित करने के लिये दीर्घकालिक कार्यक्रमों की शुरुआत करने तथा इनका आधुनिकीकरण करने के साथ-साथ कुछ मामलों में विश्व की दिनोंदिन बढ़ती परमाणु शक्ति को नियंत्रित करने के लिये अपने स्वयं के परमाणु शस्त्रागारों में बढ़ोतरी करने के विकल्पों की प्राथमिकता दी गई|
  • इन सबके विपरीत गैर-परमाणु राष्ट्रों और शांति आंदोलनों के सक्रिय कार्यकर्ताओं के द्वारा बुनियादी चीजों पर अधिक ध्यान दिया गया| इन्होंने परमाणु हथियारों की क्षमता (जिससे विशाल तबाही हुई) का आकलन करने के लिये बहुत से अंतर्राष्ट्रीय प्रयास किये| इन कार्यों को वैश्च्विक स्तर बहुत अधिक समर्थन भी प्राप्त हुआ|
  • ध्यातव्य है कि वर्ष 2014 में ‘परमाणु हथियारों पर मानवता का प्रभाव’ (Conference on the Humanitarian Impact of Nuclear Weapons) के नाम से हुए वियना सम्मेलन में 158 देशों के अधिकारियों ने अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया| इसी संदर्भ में पिछले अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र में ऐतिहासिक संकल्प को स्वीकार किया गया था|
  • जैसा की इस संबंध में अभी तक हुई पहलों से स्पष्ट होता है, परमाणु हथियारों को प्रतिबंधित करने के लिये कानूनी संधि पर वार्ता करना से इनके प्रयोग एवं निर्माण पर पूर्णतः रोक लगायी जा सकती है|

सम्मेलन में भारत एवं पकिस्तान की अनुपस्थिति 

  • गौरतलब है कि भारत और पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र के मतदान में अनुपस्थित रहे| इस संदर्भ में भारत का पक्ष यह था कि परमाणु निरस्त्रीकरण की वार्ता केवल जेनेवा के निरस्त्रीकरण सम्मेलन में होनी चाहिये| इसके पीछे भारत का तर्क बिल्कुल सामान्य था: निरस्त्रीकरण के सम्मेलन के लिये आम सहमति आवश्यक है जिसका तात्पर्य यह है कि कोई भी राष्ट्र इसकी प्रगति में बाधा बन सकता है|
  • भारत ने इसी विशेषता का उपयोग वर्ष 1996 में व्यापक परमाणु परीक्षण-प्रतिबंध संधि (Comprehensive Nuclear-Test-Ban Treaty) को प्रतिबंधित करने के लिये किया था और पाकिस्तान भी अब इसी शक्ति का उपयोग नाभिकीय हथियारों के लिये आवश्यक छद्म सामग्री (fissile materials) के उत्पादन को प्रतिबंधित करने के लिये कर रहा है| पाकिस्तान के इस रवैये का कारण नाभिकीय निरस्त्रीकरण पर अपनी गैर-सक्रियता की निरंतरता को बनाए रखना है|

मुद्दे पर बल देने का समय

  • उल्लेखनीय है कि 70 वर्षों के बाद भी विश्व के अधिकांश परमाणु धारक देशों को यह संदेह है कि वह दिन कभी नहीं आएगा, जब परमाणु निशस्त्रीकरण की दिशा में कदम बढ़ाते हुए अमेरिका परमाणु हथियारों का त्याग करेगा| यही कारण है कि इतने लम्बे अरसे के बाद भी आज भी यह मुद्दा जस का तस बना हुआ है|
  • हालाँकि इस संदर्भ में प्रतीक्षारत रहने के बजाय परमाणु हथियारों से मुक्त देशों को सभी मामलों को अपने तरीके से सुलझाने का निर्णय करना चाहिये| उनका पहला कदम संधि पर प्रतिबंध लगाना होना चाहिये| इसका तात्पर्य यह है कि कोई भी देश युद्ध के समय भी परमाणु हथियारों के उपयोग पर विचार न कर सकें ऐसी व्यवस्था होनी चाहिये|
  • इसी प्रकार अन्य हथियारों पर भी प्रतिबंध लगाया जाना चाहिये, चाहे वे रासायनिक हथियार हो, जैविक हथियार हो, भूमिगत खदाने हों अथवा हथियारों का पूरा समूह ही क्यों न हो|

निष्कर्ष
जैसा की हम सभी जानते हैं कि सीरिया में हुए रासायनिक हमले के पश्चात् अंतर्राष्ट्रीय नियमों के उल्लंघन की बात सामने आ रही है| ध्यातव्य है कि इन अंतर्राष्ट्रीय नियमों के तहत रासायनिक हथियारों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया गया है, परन्तु विश्व में अभी भी ऐसे कार्य किये जा रहे हैं| सीरिया में अमेरिकी कार्यवाही एक ऐसे विचार का प्रत्यक्ष उदाहरण है जिसके अंतर्गत, कुछ सभ्य लोगों के द्वारा हर जगह अपराधियों को तलाश करने का प्रयास किया जाता हैं ताकि वे तथाकथित आम लोगों को न्याय दिला सकें| अन्ततः इस समस्त समस्या के समाधान के रूप में जो एक चित्र स्पष्ट होता है वह यह कि यदि पूरे विश्व को एक ओर नागाशाकी एवं हिरोशिमा बनने से बचाना है तो इसके लिये आवश्यक है कि भारत, पकिस्तान एवं अमेरिका सहित विश्व के सभी परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र को निशस्त्रीकरण की दिशा में उल्लेखनीय कदम उठाने की आवश्यकता है|