अधिशेष का समय | 12 Jun 2018

संदर्भ

हाल के समय में भारतीय कृषि में आपूर्ति प्रक्रिया में बदलाव आ चुका है। अब किसान कीमतें बढ़ने के समय उत्पादन बढ़ाने की क्षमता प्राप्त कर चुके हैं। पहले फसल आपूर्ति वक्र लगभग लंबवत था, अर्थात् चाहे कीमतें कितनी भी हों, उत्पादन और बेची जाने वाली मात्रा समान रहती थी। उदाहरण के तौर पर दालों को लिया  जा सकता है। 1980 के दशक से लेकर 2000 के दशक तक देश का औसत उत्पादन 13 मिलियन टन (एमटी) से थोडा अधिक था। जो सूखे की स्थितियों में 11-12 मिलियन टन तक गिर गया, जबकि सबसे अच्छे उत्पादन वर्षों के दौरान भी यह 15 मिलियन टन से थोड़ा कम ही बना रहा।

प्रमुख बिंदु

  • पहली बार 2010-11 में दालों का उत्पादन न केवल 15 मिलियन टन को पार कर गया, बल्कि 18 मिलियन टन तक पहुँच गया।
  • यहाँ तक कि 2014-15 और 2015-16 में, जो दोनों सूखे के वर्ष थे, उत्पादन 16-17 मिलियन तक के स्तर पर बना रहा।
  • चूँकि, किसानों ने 2015 और 2016 की उच्च कीमतों के जवाब में रोपण को बढ़ाया, इसलिये 2016-17 में उत्पादन 23.13 मिलियन और 2017-18 में 24.51 मिलियन तक बढ़ गया।
  • जुलाई से शुरू होने वाले नए फसल वर्ष से पहले ही सरकार के पास घरेलू रूप से खरीदी गई दालों का 4 मिलियन टन का स्टॉक मौजूद है। ऐसा पहले कभी नहीं देखा गया था।
  • यह परिदृश्य केवल दालों के मामले में ही सत्य नहीं है, बल्कि चीनी उत्पादन के संदर्भ में भी देखा जा  सकता है।
  • पूर्व में चीनी उत्पादन को सूखे की स्थितियों से उभरने में आमतौर पर दो साल लगते थे। लेकिन, 2017-18 में उत्पादन पिछले साल के 20.26 मिलियन टन के निचले स्तर से उबर कर 32 मिलियन टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया। अतः पुराना चीनी चक्र, जिसमें तीन बंपर पैदावार वाले सीजनों के बाद दो वर्ष कम उत्पादन होता था, वह अब घटकर पाँच साल में एक साल रह गया है।
  • सब्जियों के मामले में भी कमोबेश यही स्थिति बनी हुई है। पिछले साल कर्नाटक में पैदा हुई सूखे की स्थिति के कारण प्याज की कीमतों में तेजी आ गई और इसकी कीमत बढ़कर ₹30 प्रति किलोग्राम तक पहुँच गईं। अतः किसानों ने पिछले रबी के सीजन में बड़े स्तर पर प्याज की बुआई की।  फलतः इस वर्ष  अप्रैल-मई में प्याज की कीमतें ₹6-7 प्रति किलोग्राम तक गिर गईं। कुछ इसी प्रकार की स्थति टमाटर के संदर्भ में देखी गई।
  • ऐसे में जानना जरूरी हो जाता है कि इस बदले हुए परिदृश्य के लिये कौनसे कारण प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं।

बढ़ते उत्पादन के लिये जिम्मेदार कारक

  • वास्तव में बेहतर बीज और प्रौद्योगिकी की उपलब्धता ने बड़ा फर्क पैदा किया है। उदाहरण के तौर पर 2011 में जारी की गई गेहूँ की एक किस्म एचडी-2967 पाँच साल के भीतर एक सीजन में 10 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र को कवर कर सकती है। 
  • इसी प्रकार, गन्ने की एक किस्म Co-0238 का भी उदाहरण लिया जा सकता है, जो न सिर्फ प्रति हेक्टेयर अधिक उत्पादन प्रदान करने में सक्षम है , बल्कि प्रति टन अधिक चीनी भी प्रदान करती है। पहली बार 2013-14 में रोपित किये जाने के बाद, वर्तमान में यह उत्तर भारत में गन्ने के अंतर्गत आने वाले आधे से अधिक प्रदेश में उगाई जाती है और उत्तर प्रदेश के इस सीजन के 12 मिलियन टन चीनी उत्पादन के लिये जिम्मेदार है।
  • इसी प्रकार हाइब्रिड किस्मों के चलन के बाद चावल, मक्का जैसी अन्य किस्मों के उत्पादन में भी जमकर बढ़ोतरी हुई है और देश के कुछ हिस्सों में इनका उत्पादन पश्चिमी देशों के कृषि समृद्ध प्रदेशों में होने वाले उत्पादन के बराबर है। 
  • इसी प्रकार ऑपरेशन फ्लड कार्यक्रम ने भारत के दुग्ध उत्पादन को 1970-71 के 22 मिलियन टन से 1995-96 में 66.2 मिलियन टन तक बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई। यह उत्पादन 2016-17 में 165.4 मिलियन टन पर पहुँच चुका है।
  • संक्षेप में कहें तो उन्नत बीज, तकनीक और बेहतर अवसंरचनात्मक सुधारों के कारण उत्पादन में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है। अब किसान कीमतों और नई किस्मों के बारे में और सजग रहते हैं और फसल संरक्षण और बीज उपचार को बेहतर तरीके से निष्पादित करने में सक्षम हैं।
  • हालाँकि, हमारे नीति निर्माता अभी भी उत्पादन अधिशेष की स्थिति का बेहतर लाभ उठाने में पूरी तरह सक्षम नहीं हुए हैं। समय-समय पर कालाबाजारी जैसे कारणों से कीमतों में बढ़ोतरी होती रहती  है। इसे रोकने हेतु नीति-निर्माताओं को कुछ प्रभावी कदम उठाने होंगे। यथा- जब भी कीमतों में बढ़ोतरी होती है तो तुरंत प्रभाव से भंडारण क्षमता पर सीमाएँ आरोपित कर देनी चाहिये, निर्यात में कुछ समय के लिये कमी की जाए, उत्पादों के अंतर-राज्यीय पारेषण में कमी कर देनी चाहिये, कालाबाजारी करने वालों के विरुद्ध त्वरित और सख्त कार्यवाही की जाए।