पाम ऑयल: आत्मनिर्भरता के लिये सतत् दृष्टिकोण | 24 Mar 2020

प्रीलिम्स के लिये:

भारत में तेल का उत्पादन एवं आयात

मेन्स के लिये:

तेल उत्पादन में आत्मनिर्भरता, सतत् कृषि

चर्चा में क्यों?

भारत में बढ़ती तेल की मांग तथा पाम ऑयल की भारत में पारिस्थितिक अनुकूलता के कारण पाम ऑयल के उत्पादन बढ़ाने पर बल दिया गया है, ताकि भारत में बढ़ती तेल मांग समस्या का स्थायी समाधान निकाल सके। 

मुख्य बिंदु:

  • भारत पाम ऑयल का सबसे बड़ा उपभोक्ता एवं आयातक है।
  • भारत में पाम ऑयल की खपत वर्ष 2001 के 3 मिलियन टन से बढ़कर (300 प्रतिशत से अधिक) वर्तमान में लगभग 10 मिलियन टन हो गई है।

पाम ऑयल उत्पादन की आवश्यकता:

  • वर्तमान समय में भारत को अपनी आयात पर निर्भरता में कमी लाने तथा घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने की ज़रूरत है क्योंकि इससे: 
    • स्थानीय पाम ऑयल की पैदावार को बढ़ाने से आयात में कमी आएगी तथा विदेशी मुद्रा की बचत होगी। 
    • किसानों की आय को वर्ष 2022 तक दोगुना करने में मदद मिलेगी। 
    • देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा।
    • सस्ता खाद्य तेल जो देश की बढ़ती जनसंख्या की मांग की आवश्यकता पूर्ति के अनुकूल है। 

भारत में पाम ऑयल उत्पादन:

  • जब प्रमुख पाम उत्पादक देशों को कठोर पर्यावरणीय तथा जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, ऐसे में भारत पाम ऑयल की कृषि के अंतर्गत अधिक-से-अधिक भूमि लाने की दिशा में स्थायी प्रगति कर रहा है। 
  • वर्तमान में पाम ऑयल को 12 राज्यों के 4 लाख वर्ग हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में  उगाया जा रहा है। 
  • आंध्र प्रदेश देश के कुल पाम ऑयल के 80 प्रतिशत से अधिक उत्पादन के साथ प्रथम स्थान पर है। 

Oil-Palm

पाम ऑयल सतत् कृषि पद्धति:

  • कार्बन प्रच्छादन:
    • आंध्र प्रदेश में पाम ऑयल की कृषि का अधिकतर क्षेत्र लाल मृदा (जो बालू तथा लोमीय कणों से युक्त है) तथा काली मृतिका युक्त (Black Clayish) मृदा से संबंधित है। इन मृदाओं में कार्बन की मात्रा कम होने के कारण पाम ऑयल की कृषि कार्बन भंडारण में एक महत्त्वपूर्ण उत्प्रेरक की भूमिका निभाती है।
  • प्रति बूँद, अधिक फसल:
    • पाम ऑयल कृषि की सतत विधाओं में 'सूक्ष्म सिंचाई' भी महत्त्वपूर्ण पद्धति है। यह कृषि 'प्रति बूँद, अधिक फसल' के सिद्धांत को आगे बढ़ाती है।
  • प्रति इकाई अधिक उत्पादन:
    • पाम ऑयल का, अन्य खाद्य तेलों की तुलना में प्रति इकाई क्षेत्र उत्पादन अधिक होता है, इससे भारत में तेल उत्पादन में वृद्धि करने में मदद मिलेगी। 
  • दीर्घकालिक फसल की तरफ विस्थापन:
    • पिछले 25 वर्षों में, देश में पाम ऑयल क्षेत्र का विस्तार कृषि और बागवानी भूमि से फसल प्रतिरूप में बदलाव के कारण हुआ है, जिसमें किसानों ने अल्प-मध्यम अवधि की फसलों जैसे मक्का, तंबाकू, गन्ना आदि के स्थान पर दीर्घकालिक पाम ऑयल का उत्पादन करना शुरू किया है।
  • अधिक पारिस्थितिकी अनुकूल:
    • इसके अलावा बंजर तथा अवनयित भूमि को भी पाम ऑयल के बागानों के कृषि क्षेत्र में लाया गया है, नतीजतन किसानों द्वारा अपनाई गई बायोमास पुनर्चक्रण पद्धतियों के कारण इन्हें कार्बन प्रच्छादन की विधि के रूप में मान्यता मिली है।
    • भारत की पाम ऑयल की कृषि में विस्तार करते समय 'प्रकृति को कोई नुकसान नहीं' दर्शन के अनुसरण करते हुये वनों के अंतर्गत भूमि को पाम ऑयल कृषि क्षेत्र के अंतर्गत नहीं लाया गया है। भारत में पाम ऑयल के अंतर्गत औसत कृषि जोत का आकार 2 हेक्टेयर से कम है।
  • मिश्रित फसल:
    • पाम ऑयल की कृषि में किसानों द्वारा अतिरिक्त आय उत्पन्न करने के लिये मिश्रित कृषि तकनीकों को अपनाया जाता है तथा कम आय (Off Season) के दौरान अनेक फसलों को पौधों के मध्यवर्ती क्षेत्रों में बोया जाता है। 
  • सार्वजनिक निजी भागीदारी: 
    • पाम ऑयल के ताजे फलों के गुच्छों को शीघ्र उपयोग में लेने के किये संपूर्ण मूल्य श्रृंखला सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल के तहत संचालित की जाती है, जिसे निगम तथा किसानों के मध्य होने वाले अनुबंध के तहत उचित मूल्य पर किसानों से फलों को खरीदने का आश्वासन दिया जाता है।

सतत् उत्पादन की संभावना:

  • भारत दुनिया तिलहन उत्पादन में विश्व के 21 प्रतिशत क्षेत्र तथा उत्पादन के 5 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ विश्व में अमेरिका, चीन एवं ब्राज़ील के बाद चौथा बड़ा तिलहन उत्पादक देश है।
  • देश के पास तिलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता के पर्याप्त संसाधन हैं।  सरकार की नीतियों, सब्सिडी, आधुनिक कृषि प्रणालियों, नवीन उत्पादन तकनीकों तथा टिकाऊ कृषि प्रथाओं के माध्यम से भारत सभी हितधारकों आपस मे जोड़ सकता है तथा खाद्य तेलों के आयात को कम करते हुए आत्मनिर्भरता प्राप्त कर सकता है।

स्रोत: द हिंदू