सरोगेसी | 28 May 2022

प्रिलिम्स के लिये:

सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी, परोपकारी और वाणिज्यिक सरोगेसी। 

मेन्स के लिये:

सरोगेसी, कानूनी प्रावधान और कमियाँ, महिलाओं से संबंधित मुद्दे। 

चर्चा में क्यों? 

हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष एक याचिका दायर की गई थी, जिसमें एक एकल पुरुष और एक महिला को सरोगेसी द्वारा बच्चा पैदा करने के बहिष्कार को चुनौती दी गई और वाणिज्यिक सरोगेसी के गैर-अपराधीकरण की मांग की गई है। 

  • याचिकाकर्त्ताओं ने सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (विनियमन) अधिनियम, 2021 और सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 के अंतर्गत सरोगेसी का लाभ उठाने से प्रतिबंधित करने के विनियम को चुनौती दी है। 
  • याचिकाकर्त्ता ने तर्क दिया कि सरोगेसी के माध्यम से बच्चे के जन्म के बारे में एक व्यक्ति का व्यक्तिगत निर्णय, यानी प्रजनन स्वायत्तता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता के अधिकार का एक पहलू है। 
    • इस प्रकार सरोगेसी के माध्यम से बच्चे को जन्म देने या जन्म देने के निर्णय को मूल रूप से प्रभावित करने वाले मामलों में हर नागरिक या व्यक्ति के अनुचित सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त होने के निजता के अधिकार को छीना नहीं जा सकता है। 

सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021: 

  • प्रावधान: 
    • सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 के अनुसार, महिला जो 35 से 45 वर्ष की आयु के बीच विधवा या तलाकशुदा है या कानूनी रूप से विवाहित महिला और पुरुष के रूप में परिभाषित युगल सरोगेसी का लाभ उठा सकते है 
    • इसमें वाणिज्यिक सरोगेसी पर भी प्रतिबंध है, जो 10 साल की जेल और 10 लाख रुपये तक के जुर्माने से दंडनीय है। 
    • कानून केवल परोपकारी सरोगेसी की अनुमति देता है जहांँ कोई पैसे का आदान-प्रदान नहीं होता है, साथ ही सरोगेट मांँ आनुवंशिक रूप से बच्चे की तलाश करने वालों से संबंधित होनी चाहिये। 
  • चुनौतियांँ: 
    • सरोगेट और बच्चे का शोषण: 
      • कोई भी यह तर्क दे सकता है कि राज्य को सरोगेसी के तहत गरीब महिलाओं के शोषण को रोकने के साथ बच्चे के जन्म लेने के अधिकार की रक्षा करनी चाहिये। हालांँकि वर्तमान अधिनियम इन दोनो चुनौतियों का निवारण करने में विफल है। 
    • पितृसत्तात्मक मानदंडों को मज़बूत करता है: 
      • यह अधिनियम हमारे समाज के पारंपरिक पितृसत्तात्मक मानदंडों को मज़बूत करता है जो महिलाओं को उनके कार्य का कोई आर्थिक मूल्य नहीं देता है, साथ ही संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत महिलाओं के प्रजनन के मौलिक अधिकारों को सीधे प्रभावित करता है। 
    • सरोगेट को वैध आय से वंचित करता है: 
      • वाणिज्यिक सरोगेसी पर प्रतिबंध लगाने से सरोगेट की आय का वैध स्रोत भी प्रतिवंधित हो जाता है, अर्थात् ऐसा करना सरोगेट करने के लिये इच्छुक महिलाओं की संख्या को और सीमित करना है। 
      • कुल मिलाकर यह कदम परोक्ष रूप से उन युगलों को बच्चे से वंचित रखता है जो बच्चे पैदा करने के लिये इस विकल्प का चयन करना चाहते हैं। 
    • भावनात्मक जटिलताएँ: 
      • परोपकारी सरोगेसी में दोस्त या रिश्तेदार सरोगेट मांँ के रूप में न केवल इच्छुक माता-पिता के लिये बल्कि सरोगेट बच्चे के लिये भी भावनात्मक जटिलताओं का कारण बन सकता है क्योंकि यह सरोगेसी अवधि और जन्म के बाद रिश्ते को जोखिम में डाल सकता है। 
      • परोपकारी सरोगेसी भी सरोगेट मांँ चुनने में इच्छुक जोड़े के विकल्प को सीमित करती है क्योंकि बहुत सीमित रिश्तेदार इस प्रक्रिया में शामिल होने के लिये तैयार होंगे। 
    • तृतीय-पक्ष भागीदारी नहीं: 
      • एक परोपकारी सरोगेसी में कोई तीसरे पक्ष की भागीदारी नहीं है। 
      • तीसरे पक्ष की भागीदारी यह सुनिश्चित करती है कि सरोगेसी प्रक्रिया के दौरान इच्छित युगल चिकित्सा और अन्य विविध खर्चों को वहन करेगा, साथ ही उनका समर्थन करेगा। 
      • कुल मिलाकर तीसरा पक्ष इच्छित जोड़े एवं सरोगेट मांँ दोनों को जटिल प्रक्रिया के माध्यम से नेविगेट करने में मदद करता है, जो परोपकारी सरोगेसी के मामले में संभव नहीं हो सकता है। 

सरोगेसी:  

  • परिचय: 
    • सरोगेसी एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें एक महिला (सरोगेट) किसी अन्य व्यक्ति या जोड़े (इच्छित माता-पिता) की ओर से बच्चे को जन्म देने के लिये सहमत होती है। 
    • एक सरोगेट, जिसे कभी-कभी गर्भकालीन वाहक (Gestational Carrier,) भी कहा जाता है, एक महिला है जो किसी अन्य व्यक्ति या जोड़े (इच्छित माता-पिता) के लिये गर्भधारण करती है, बच्चे को कोख में रखती है और फिर उस बच्चे को जन्म देती है। 
  • परोपकारी सरोगेसी: 
    • इसमें गर्भावस्था के दौरान चिकित्सा व्यय और बीमा कवरेज के अलावा सरोगेट माँ को अन्य किसी प्रकार का मौद्रिक मुआवाज़ा प्राप्त नहींं होता है। 
  • वाणिज्यिक सरोगेसी: 
    • इसमें सरोगेसी या उससे संबंधित प्रक्रियाएँ शामिल हैं जो बुनियादी चिकित्सा व्यय और बीमा कवरेज के अलावा सेरोगेट माँ को मौद्रिक मुआवज़ा या इनाम (नकद या वस्तु) प्रदान किया जाता है। 

सहायक प्रजनन तकनीक: 

  • परिचय: 
    • सहायक प्रजनन तकनीक का प्रयोग बाँझपन की समस्या के समाधान के लिये किया जाता है। इसमें बाँझपन के ऐसे उपचार शामिल हैं जिसमें महिलाओं के अंडे और पुरुषों के शुक्राणु दोनों का प्रयोग किया । 
    • इसमें महिलाओं के शरीर से अंडे प्राप्त कर भ्रूण बनाने के लिये उन्हें शुक्राणु के साथ मिलाया जाता है। इसके बाद भ्रूण को दोबारा महिला के शरीर में डाल दिया जाता है। 
    • इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन (In Vitro fertilization- IVF), ART का सबसे सामान्य और प्रभावशाली प्रकार है। 
  • कानूनी प्रावधान: 
    • सहायक प्रजनन तकनीक अधिनियम (ART),  2021 राष्ट्रीय सहायक प्रजनन तकनीक और सरोगेसी बोर्ड की स्थापना करके सरोगेसी पर कानून के कार्यान्वयन के लिये एक प्रणाली प्रदान करता है। 
    • सहायक प्रजनन तकनीक (विनियम) विधेयक, 2021: यह सहायक प्रजनन तकनीक क्लीनिकों और सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी बैंकों के विनियमन एवं पर्यवेक्षण, दुरुपयोग की रोकथाम, सहायक प्रजनन तकनीक सेवाओं के सुरक्षित व नैतिक अभ्यास का प्रावधान करता है। 
  • कमियांँ: 
    • अविवाहित और विषम लैंगिक जोड़ों का बहिष्करण: 
      • यह अधिनियम अविवाहित पुरुषों, तलाकशुदा पुरुषों, विधुर, लिव-इन (Live-in) में रहने वाले, विषम लैंगिक युगल, ट्रांसजेंडर और समलैंगिक जोड़ों (चाहे विवाहित या लिव-इन में रहने वाले) को सहायक प्रजनन तकनीक सेवाओं का लाभ उठाने से प्रतिबंधित करता है। 
      • यह बहिष्करण प्रासंगिक है क्योंकि सरोगेसी अधिनियम भी उपरोक्त व्यक्तियों को प्रजनन की एक विधि के रूप में सरोगेसी का सहारा लेने से बाहर करता है। 
    • प्रजनन विकल्पों को कम करता है: 
      • अधिनियम उन वैधानिक युगल तक सीमित है जो बांँझ हैं- वे जो एक वर्ष के असुरक्षित सहवास के बाद भी गर्भधारण करने में असमर्थ हैं। इस प्रकार यह सीमितता के साथ-साथ बहिष्कृत लोगों के प्रजनन विकल्पों को काफी कम कर देता है। 
    • अनियंत्रित कीमतें: 
      • सेवाओं की कीमतें विनियमित नहीं हैं; यह निश्चित रूप से सरल निर्देशों के साथ इसे ठीक किया जा सकता है। 

आगे की राह 

  • चूंकि भारत इन प्रथाओं के प्रमुख केंद्रों में से एक है, यह अधिनियम निश्चित रूप से सही दिशा में एक कदम है। हालाँकि, यह सुनिश्चित करने के लिये गतिशील निरीक्षण की आवश्यकता है कि कानून तेज़ी से विकसित हो रही तकनीक, नैतिकता और सामाजिक परिवर्तनों में संतुलन स्थापित कर सके। 

स्रोत: द हिंदू