पराली दहन | 21 Sep 2022

प्रिलिम्स के लिये:

बायो-डीकंपोज़र, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR), स्टबल बर्निंग, टर्बो हैप्पी सीडर (THS) मशीन।

मेन्स के लिये:

पराली दहन के प्रभाव।

चर्चा में क्यों?

हाल ही में दिल्ली सरकार ने घोषणा की है कि वह शहर में 5,000 एकड़ से अधिक धान के खेतों में पूसा बायो-डीकंपोज़र का मुफ्त छिड़काव करेगी क्योंकि इससे सर्दियों के दौरान पराली दहन और वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।

पूसा बायो-डीकंपोज़र:

  • विषय:
    • यह अनिवार्य रूप से एक कवक-आधारित तरल घोल है जो कठोर ठूंठ को इस हद तक नरम कर सकता है कि इसे खाद के रूप में कार्य करने के लिये आसानी से खेत में मिट्टी के साथ मिलाया जा सकता है।
      • यह कवक 30-32 डिग्री सेल्सियस पर पनपता है, जो कि धान की कटाई और गेहूँ की बुवाई के लिये प्रचलित तापमान है।
    • यह धान के भूसे में सेल्यूलोज, लिग्निन और पेक्टिन को पचाने योग्य एंज़ाइम का उत्पादन करता है।
    • यह भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) द्वारा विकसित किया गया है और दिल्ली के पूसा स्थित ICAR परिसर के नाम पर रखा गया है।
    • यह फसल अवशेष, पशु अपशिष्ट, गोबर और अन्य कचरे को तेज़ी से जैविक खाद में परिवर्तित करता है।
    • यह कृषि अपशिष्ट और फसल अवशेष प्रबंधन के लिये एक सस्ती और प्रभावी तकनीक है।
  • फायदे:
    • यह डीकंपोज़र मिट्टी की उर्वरता और उत्पादकता में सुधार करता है क्योंकि ठूंठ फसलों के लिये खाद के रूप में काम करते हैं, इससे भविष्य में कम उर्वरक की आवश्यकता होती है।
      • पराली दहन से मिट्टी अपनी उपजाऊपन खो देती है और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के अलावा यह मिट्टी में मौजूद उपयोगी बैक्टीरिया तथा फंगस को भी नष्ट कर देती है।
    • यह पराली को दहन से रोकने के लिये एक कुशल और प्रभावी, सस्ती, साध्य एवं व्यावहारिक तकनीक है।
    • यह पर्यावरण के अनुकूल और पर्यावरण की दृष्टि से उपयोगी तकनीक है तथा स्वच्छ भारत मिशन को प्राप्त करने में सहायक सिद्ध होगी।

पराली दहन (Stubble Burning):

  • परिचय:
    • पराली दहन, अगली फसल बोने के लिये फसल के अवशेषों को खेत में आग लगाने की क्रिया है।
    • इसी क्रम में सर्दियों की फसल (रबी की फसल) की बुवाई हरियाणा और पंजाब के किसानों द्वारा कम अंतराल पर की जाती है तथा अगर सर्दी की छोटी अवधि के कारण फसल बुवाई में देरी होती है तो उन्हें काफी नुकसान हो सकता है, इसलिये पराली दहन पराली की समस्या का सबसे सस्ता और तीव्र तरीका है।
    • पराली दहन की यह प्रक्रिया अक्तूबर के आसपास शुरू होती है और नवंबर में अपने चरम पर होती है, जो दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी का समय भी है।
  • पराली दहन का प्रभाव:
    • प्रदूषण:
      • खुले में पराली दहन से वातावरण में बड़ी मात्रा में ज़हरीले प्रदूषक उत्सर्जित होते हैं जिनमें मीथेन (CH4), कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOC) और कार्सिनोजेनिक पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन जैसी हानिकारक गैसें होती हैं।
      • वातावरण में छोड़े जाने के बाद ये प्रदूषक वातावरण में फैल जाते हैं, भौतिक और रासायनिक परिवर्तन से गुज़र सकते हैं तथा अंततः स्मॉग (धूम्र कोहरा) की मोटी चादर बनाकर मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।
    • मिट्टी की उर्वरता:
      • भूसी को ज़मीन पर दहन से मिट्टी के पोषक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं, जिससे इसकी उर्वरकता कम हो जाती है।
    • गर्मी उत्पन्न होना:
      • पराली दहन से उत्पन्न गर्मी मिट्टी में प्रवेश करती है, जिससे नमी और उपयोगी रोगाणुओं को नुकसान होता है।
  • पराली दहन के विकल्प:
    • पराली का स्व-स्थाने (In-Situ) प्रबंधन: ज़ीरो-टिलर मशीनों और जैव-अपघटकों के उपयोग द्वारा फसल अवशेष प्रबंधन।
    • इसी प्रकार बाह्य-स्थाने (Ex-Situ) प्रबंधन: जैसे मवेशियों के चारे के रूप में चावल के भूसे का उपयोग करना।
    • प्रौद्योगिकी का उपयोग: उदाहरण के लिये टर्बो हैप्पी सीडर (Turbo Happy Seeder-THS) मशीन, जो पराली को जड़ समेत उखाड़ फेंकती है और साफ किये गए क्षेत्र में बीज भी बो सकती है। इसके बाद पराली को खेत के लिये गीली घास के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
    • फसल पैटर्न बदलना: यह गहरा और अधिक मौलिक समाधान है।
    • बायो एंज़ाइम-पूसा: भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (Indian Agriculture Research Institute) ने बायो एंज़ाइम-पूसा (bio enzyme-PUSA) के रूप में एक परिवर्तनकारी समाधान पेश किया है।
      • यह अगले फसल चक्र के लिये उर्वरक के खर्च को कम करते हुए जैविक कार्बन और मृदा स्वास्थ्य में वृद्धि करता है।
  • अन्य कार्ययोजना:
    • पंजाब, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) राज्यों और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (GNCTD) ने कृषि पराली दहन की समस्या से निपटने हेतु वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग द्वारा दी गई रूपरेखा के आधार पर निगरानी के लिये विस्तृत कार्ययोजना तैयार की है।

आगे की राह

  • जैसा कि हम जानते हैं, पराली दहन से उपयोगी कच्चा माल नष्ट हो जाता है, हवा प्रदूषित हो जाती है, श्वसन संबंधी बीमारियाँ उत्पन्न हो जाती हैं और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ जाता है। इसलिये समय की मांग है कि पराली का पशु आहार के रूप में रचनात्मक उपयोग किया जाए तथा टर्बो-हैप्पी सीडर मशीन एवं बायो-डीकंपोज़र आदि जैसे विभिन्न विकल्पों को सक्षम करके प्रौद्योगिकी का उपयोग किया जाए।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न:  

प्रश्न. कृषि में शून्य जुताई का/के क्या लाभ है/हैं? (2020)

  1. पिछली फसलों के अवशेषों को जलाए बिना गेहूँ की बुवाई संभव है।
  2. धान के पौधों की नर्सरी की आवश्यकता के बिना गीली मिट्टी में धान के बीज की सीधी बुवाई संभव है।
  3. मिट्टी में कार्बन पृथक्करण संभव है।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: d

व्याख्या:

  • शून्य जुताई (ज़ीरो टिलेज) वह प्रक्रिया है जहाँ बीज को बिना पूर्व तैयारी और बिना तैयार किये तथा जहांँ पिछली फसल की पराली (स्टबल) मौजूद होते हैं, वहाँ ड्रिलर्स के माध्यम से बोया जाता है। एक अध्ययन के अनुसार, यदि किसान अपने फसल अवशेषों को जलाना बंद कर दें तथा इसके बजाय शून्य जुताई खेती की अवधारणा को अपनाएंँ तो उत्तर भारत में किसान न केवल वायु प्रदूषण को कम करने में मदद कर सकते हैं, बल्कि अपनी मृदा की उत्पादकता में भी सुधार कर सकते हैं और अधिक लाभ कमा सकते हैं। ज़ीरो टिलेज के तहत बिना जुताई वाली मिट्टी में गेहूंँ की सीधी बुवाई और चावल के अवशेषों को छोड़ देना बहुत फायदेमंद साबित हुआ है। इसने जल, श्रम व कृषि रसायनों के उपयोग में कमी, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी और मृदा के स्वास्थ्य एवं फसल की उपज में सुधार किया, इस तरह किसानों तथा समाज दोनों को बड़े पैमाने पर लाभ हुआ। अत: कथन 1 सही है।
  • चावल का प्रत्यक्ष बीजारोपण (DSR) जिसे 'बीज बिखेरना तकनीक (Broadcasting Seed Technique)' के रूप में भी जाना जाता है, धान की बुवाई की एक जल बचत विधि है। इस विधि में बीजों को सीधे खेतों में ड्रिल किया जाता है। नर्सरी से जलभराव वाले खेतों में धान की रोपाई की पारंपरिक जल-गहन विधि के विपरीत यह विधि भूजल की बचत करती है। इस पद्धति में कोई नर्सरी तैयारी या प्रत्यारोपण शामिल नहीं है।
  • किसानों को केवल अपनी ज़मीन को समतल करना होता है और बुवाई से पहले सिंचाई करनी होती है। यह पाया गया है कि 1 किलो धान के उत्पादन के लिये 5000 लीटर तक जल का उपयोग किया जाता है। हालांँकि पानी की बढ़ती कमी की स्थिति में न्यूनतम या शून्य जुताई के साथ DSR श्रम की बचत कर इस तकनीक के लाभों को बढ़ाया जा सकता है। अत: कथन 2 सही है।
  • बिना जुताई वाली मृदा, जुताई वाली मृदा से आंशिक रूप में ठंडी होती है क्योंकि पौधे के अवशेषों की एक परत सतह पर मौज़ूद होती है। मिट्टी में कार्बन जमा हो जाता है तथा इसकी गुणवत्ता में वृद्धि होती है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग का खतरा कम होता है। अत: कथन 3 सही है।

अतः विकल्प (d) सही उत्तर है।


प्रश्न. दिल्ली में बढ़ते वायु प्रदूषण के कारण और प्रभाव क्या हैं? इस दिशा में सरकार द्वारा किये गए उपायों तथा उनकी प्रभावशीलता का वर्णन कीजिये। (मुख्य परीक्षा, 2021)

स्रोत: द हिंदू