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हिंदू महिलाओं के विरासत अधिकारों पर SC का निर्णय | 12 Aug 2020 | सामाजिक न्याय

प्रिलिम्स के लिये:

मिताक्षरा तथा दयाभाग कानून के बारे में, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, कॉपर्सनर/सहदायक, संपत्ति का अधिकार 

मेन्स के लिये

पैतृक संपत्ति में महिलाओं के अधिकार पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय तथा इसका महत्त्व

चर्चा में क्यों?

सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने अपने एक हालिया एक निर्णय में पुरुष उत्तराधिकारियों के समान शर्तों पर हिंदू महिलाओं के पैतृक संपत्ति में उत्तराधिकारी और सहदायक (संयुक्त कानूनी उत्तराधिकारी) के अधिकार का विस्तार किया है। यह निर्णय हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम (Hindu Succession (Amendment) Act), 2005 से संबंधित है।

प्रमुख बिंदु

हिंदू कानून से संबंधित विधियाँ/नियम

मिताक्षरा कानून

दयाभाग कानून 

मिताक्षरा पद की उत्पत्ति याज्ञवल्क्य स्मृति पर विज्ञानेश्वर द्वारा लिखित एक टीका के नाम से हुई है।

दयाभाग पद जिमुतवाहन द्वारा लिखी गई, समान नाम की पुस्तक से लिया गया है।

भारत के सभी भागों में इसका प्रभाव देखने को मिलता है और यह बनारस, मिथिला, महाराष्ट्र एवं द्रविड़ शैली में उप-विभाजित है।

बंगाल और असम में इसका प्रभाव देखने को मिलता है। 

जन्म से ही संयुक्त परिवार की पैतृक संपत्ति में पुत्र की हिस्सेदारी होती है।

पुत्र का संपत्ति पर जन्म से कोई स्वत: स्वामित्व/अधिकार नहीं होता है, परंतु वह अपने पिता की मृत्यु के बाद स्वतः ही इस अधिकार को प्राप्त कर लेता है।

एक पिता के संपूर्ण जीवनकाल के दौरान परिवार के सभी सदस्य को कॉपर्सनरी का अधिकार प्राप्त होता है।



पिता के जीवनकाल में पुत्र को कॉपर्सनर का अधिकार प्राप्त नहीं होता है।

इसमें कॉपर्सनर का भाग परिभाषित नहीं है और इसे समाप्त नहीं किया जा सकता है।

प्रत्येक कॉपर्सनर के हिस्से को परिभाषित किया गया है और इसे समाप्त किया जा सकता है।

पत्नी बँटवारे की मांग नहीं कर सकती है लेकिन उसे अपने पति और पुत्रों के बीच किसी भी बँटवारे में हिस्सेदारी का अधिकार प्राप्त है।

यहाँ महिलाओं के लिये समान अधिकार मौजूद नहीं है क्योंकि पुत्र बँटवारे की मांग नहीं कर सकता हैं और यहाँ पिता ही पूर्ण मालिक होता है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस