पर्यावरणीय मुद्दों को सुलझाने में नैनोमैटेरियल्स की भूमिका | 06 Oct 2022

प्रिलिम्स के लिये:

नैनोमैटेरियल्स, कार्बन डॉट्स, नैनो टेक्नोलॉजी

मेन्स के लिये:

वैज्ञानिक नवाचार और खोज, नैनो टेक्नोलॉजी

चर्चा में क्यों?

नैनोमैटेरियल्स या कार्बन डॉट्स (CD) जैसी आधुनिक तकनीक का उपयोग जल प्रदूषण जैसे पर्यावरणीय मुद्दों के समाधान में मदद कर सकता है।

  • शहरी विकास ने जल निकायों में हानिकारक और ज़हरीले प्रदूषकों की शुरुआत के परिणामस्वरूप जलीय पर्यावरण की आधुनिक समाज की अखंडता को नष्ट कर दिया है।
  • नैनो टेक्नोलॉजी जैसे आदर्श तकनीकी विकास टिकाऊ और कुशल पर्यावरणीय स्वच्छता के लिये अभिनव समाधान प्रदान करते हैं।

नैनो टेक्नोलॉजी/नैनो तकनीक:

  • परिचय:
    • नैनो टेक्नोलॉजी भौतिक घटनाओं का अध्ययन करने और 1 से 100 नैनोमीटर (NM) तक भौतिक आकार सीमा में नई सामग्री एवं उपकरणों की संरचना विकसित करने के लिये तकनीकों का उपयोग तथा विकास है।
    • नैनो टेक्नोलॉजी हमारे जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों को प्रभावित करती है, जिसमें विनिर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटर और सूचना प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, पर्यावरण एवं ऊर्जा भंडारण, रासायनिक तथा जैविक प्रौद्योगिकियाँ और कृषि शामिल है।
  • भारत में नैनो टेक्नोलॉजी:
    • भारत में नैनोटेक्नोलॉजी के उद्भव ने अभिकर्त्ताओं के विविध समूह की भागीदारी देखी है, जिनमें से प्रत्येक का अपना एजेंडा और भूमिका है।
    • वर्तमान में भारत में नैनो तकनीक ज़्यादातर सरकार के नेतृत्व वाली पहल है। उद्योग की भागीदारी हाल ही में शुरू हुई है।
    • कुछ अपवादों को छोड़कर नैनो प्रौद्योगिकी अनुसंधान एवं विकास बड़े पैमाने पर सार्वजनिक वित्तपोषित विश्वविद्यालयों के साथ-साथ अनुसंधान संस्थानों में किया जा रहा है।

कार्बन डॉट्स:

  • परिचय:
    • CDs कार्बन नैनोमटेरियल समूह के सबसे नया सदस्यों में से एक हैं।
    • इसे वर्ष 2004 में खोजा गया था और इसका औसत व्यास 10 नैनोमीटर से कम है।
    • CD में उल्लेखनीय ऑप्टिकल गुण होते हैं, जो संश्लेषण के लिये उपयोग किये जाने वाले अग्रदूत के आधार पर विशिष्ट रूप से भिन्न होते हैं।
    • यह अपने अच्छे इलेक्ट्रॉनदाताओं और ग्राह्यता के कारण सेंसिंग एवं बायोइमेजिंग जैसे अनुप्रयोगों में अधिक लोकप्रिय हो रहे हैं।
      • बायोइमेजिंग उन तरीकों से संबंधित है जो वास्तविक समय में जैविक प्रक्रियाओं की कल्पना करते हैं।
    • इसके अलावा CDs सस्ती, अत्यधिक जैव-संगत और पर्यावरण के अनुकूल हैं।
  • पर्यावरणीय मुद्दों के प्रबंधन में CDs की भूमिका:
    • प्रदूषक संवेदन:
      • CDs प्रतिदीप्ति (fluorescence) और वर्णमिति (colourimetric) पर्यावरण प्रदूषकों का पता लगाने के लिये एक उत्कृष्ट संभावना प्रदान करते हैं।
      • ये अपने उच्च प्रतिदीप्ति उत्सर्जन के कारण प्रदूषक का पता लगाने के लिये एक फ्लोरोसेंट नैनोप्रोब के रूप में व्यापक रूप से उपयोग किये जाते हैं।
      • ये वर्णमिति (colourimetric) विधि द्वारा रंग परिवर्तन के साथ प्रदूषकों का पता लगाने में भी सक्षम बनाते हैं।  
    • प्रदूषक ग्राही (Contaminant Adsorption):
      • यह प्रौद्योगिकी इनके छोटे आकार और बड़े विशिष्ट सतह क्षेत्र के कारण सतह पर प्रदूषक ग्राही की सुविधा दे सकती है।
    • जल उपचार:
      • CDs, जल उपचार के लिये भी उपयोगी हो सकते हैं क्योंकि इनसे पतली-फिल्म नैनोकम्पोज़िट झिल्ली के निर्माण द्वारा यह अन्य यौगिकों के साथ रासायनिक बंधन बना सकते हैं।
      • जलकुंभी अपशिष्ट से CDs का उत्पादन किया गया है, जो UV प्रकाश के तहत हरी प्रतिदीप्ति प्रदर्शित करते हैं। जलीय निकायों के लिये नुकसानदायक वनस्पतियों का पता लगाने के लिये ये फ्लोरोसेंट सेंसर भी साबित हुए हैं ।
    • प्रदूषक पदार्थों में गिरावट:
      • यह प्रौद्योगिकी अगली पीढ़ी के फोटोकैटलिसिस के लिये अत्याधुनिक दृष्टिकोण प्रदान करके प्रदूषक निराकरण के लिये भी उपयोगी हो सकती है।
        • फोटोकैटलिसिस में प्रकाश और अर्धचालक का उपयोग करके होने वाली प्रतिक्रियाएँ शामिल हैं।
      • प्रदूषित पानी में कार्बनिक प्रदूषक इलेक्ट्रॉन और होल (hole) स्थानांतरित करने वाले एजेंटों के रूप में कार्य कर सकते हैं, जबकि कार्बन डॉट्स फोटोसेंसिटाइज़र के रूप में कार्य करते हैं।
    • रोगाणुरोधी:
      • CDs के रोगाणुरोधी तंत्र में मुख्य रूप से-  भौतिक / यांत्रिक विनाश, ऑक्सीडेटिव तनाव, फोटोकैटालिटिक प्रभाव और जीवाणु चयापचय का निषेध आदि शामिल हैं।
      • दृश्य या प्राकृतिक प्रकाश के तहत बैक्टीरिया सेल के संपर्क में CDs कुशलतापूर्वक प्रतिक्रियाशील ऑक्सीजन प्रजातियाँ उत्पन्न कर सकते हैं।
      • यह डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड (डीएनए) या राइबोन्यूक्लिक एसिड (आरएनए) को नुकसान पहुँचा सकता है, जिससे बैक्टीरिया की मृत्यु हो सकती है।

कार्बन डॉट्स के ग्रीन संश्लेषण का वर्गीकरण:

  • आम तौर पर कार्बन डॉट्स के संश्लेषण को "टॉप-डाउन" और "बॉटम-अप" विधियों में वर्गीकृत किया जा सकता है।
    • टॉप-डाउन विधि लेज़र पृथक्करण, चाप निर्वहन और रासायनिक या विद्युत रासायनिक ऑक्सीकरण द्वारा बड़े कार्बन संरचनाओं को क्वांटम आकार के कार्बन डॉट्स में परिवर्तित करती है।
    • बॉटम-अप विधि में सीडी पायरोलिसिस, कार्बोनाइज़ेशन, हाइड्रोथर्मल प्रक्रियाओं या माइक्रोवेव-असिस्टेड संश्लेषण द्वारा छोटे अणु अग्रदूतों को कार्बोनाइज़ करने से उत्पन्न होती है।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)  

्रश्न. स्वास्थ्य क्षेत्र में नैनो तकनीक के प्रयोग के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (2015)

  1. नैनो तकनीक द्वारा लक्षित दवा वितरण को संभव बनाया गया है।
  2. नैनो तकनीक काफी हद तक जीन थेरेपी में योगदान कर सकती है।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: c

व्याख्या:

  • नैनो तकनीक में 1 NM (यानी, नैनोमीटर) और 100 NM आकार के बीच की संरचनाओं का अध्ययन और उपयोग किया जाता है।
  • स्वास्थ्य क्षेत्र में नैनो तकनीक का उपयोग लक्षित दवा वितरण हेतु किया जा सकता है और साथ ही यह जीन थेरेपी में भी मदद कर सकती है। अतः कथन 1 सही है।
  • जीन थेरेपी में किसी बीमारी के इलाज या रोकथाम हेतु जीन का उपयोग किया जाता है। यह डॉक्टरों को दवाओं या सर्जरी का उपयोग करने के बजाय रोगी की कोशिकाओं में जीन को प्रविष्ट कर विकार का इलाज करने की अनुमति देती है। अतः कथन 2 सही है।

प्रश्न: नैनो तकनीक से आप क्या समझते हैं और यह स्वास्थ्य क्षेत्र में कैसे मदद कर रही है? (मुख्य परीक्षा, 2020)

स्रोत: डाउन टू अर्थ