भूल जाने का अधिकार | 27 Sep 2019

चर्चा में क्यों?

हाल ही में यूरोपियन कोर्ट ऑफ जस्टिस (European Court of Justice) ने गूगल को विश्व भर में संवेदनशील व्यक्तिगत डेटा से जुड़े लिंक को नहीं हटाने की अनुमति दे दी है।

पृष्ठभूमि

  • व्यक्तियों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति (Free Speech) और वैध सार्वजनिक हित के बिना इंटरनेट सर्च परिणामों से व्यक्तिगत जानकारी हटाने को लेकर फ्राँस तथा गूगल के बीच एक मामला यूरोपियन कोर्ट ऑफ जस्टिस में विचाराधीन था।
  • न्यायालय ने अपने फैसले में ऑनलाइन गोपनीयता कानून की पहुँच को 'भूल जाने का अधिकार' के रूप में सीमित कर दिया और इंटरनेट पर उपलब्ध लोगों के डेटा के नियंत्रण पर उनकी क्षमता को भी व्याख्यायित किया।

यूरोपीय कानून के अनुसार, गूगल किसी विशेष देश द्वारा अनुरोध किये जाने पर अपने खोज इंजन संस्करणों (Search Engine Version) से वैश्विक रूप से इस तरह की जानकारी को हटाने के लिये बाध्य नहीं है।

  • न्यायालय ने कहा कि इंटरनेट से डेटा को हटाते समय गोपनीयता और स्वतंत्र अभिव्यक्ति के बीच के संतुलन को ध्यान में रखा जाना चाहिये ।

यूरोपीय न्यायालय

(European Court)

  • यूरोपियन कोर्ट ऑफ जस्टिस (European Court of Justice- ECJ) कानूनी मामलों के लिये वर्ष 1952 में स्थापित यूरोपीय संघ का सर्वोच्च न्यायालय है।
  • यूरोपीय संघीय न्यायालय, कोर्ट ऑफ जस्टिस एंड जनरल कोर्ट (Court of Justice and General Court) का संयुक्त रूप है तथा इसका मुख्यालय लक्ज़मबर्ग में है।
  • रोम संधि के अनुच्छेद 164 के अनुसार, यूरोपीय संघ के न्यायालय को वहाँ के कानून की व्याख्या करने और सभी सदस्य देशों की समान भागीदारी सुनिश्चित करने का काम सौंपा गया है।

भारत के संदर्भ में भूल जाने का अधिकार

  • भूल जाने का अधिकार, के इंटरनेट पर उपलब्ध किसी व्यक्ति निजी डेटा के भ्रामक, अप्रासंगिकता को सीमित करने, हटाने या सही करने की क्षमता को संदर्भित करता है।
    • यह किसी व्यक्ति द्वारा अनुरोध किये जाने पर उसकी व्यक्तिगत जानकारी को वैध रूप से हटाने की अनुमति देता है।
  • भूल जाने का अधिकार निजता के अधिकार से अलग है, जहाँ निजता के अधिकार में ऐसी जानकारी शामिल होती है जो सार्वजनिक रूप से ज्ञात नहीं है। वहीं भूल जाने के अधिकार में एक निश्चित समय पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी को हटाना और तीसरे पक्ष को जानकारी तक पहुँचने से रोकना भी शामिल है।
  • विधायी दृष्टिकोण: भारत में भूल जाने के अधिकार से संबंधित कोई कानूनी प्रावधान नहीं है।
    • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (वर्ष 2008 में संशोधित) और सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2011 में भूल जाने के अधिकार से संबंधित कोई प्रावधान नहीं है।
    • भूल जाने के अधिकार से संबंधित केवल तीन परिदृश्यों को डेटा संरक्षण विधेयक के मसौदे की धारा 27 में सूचीबद्ध किया गया है जिसके तहत किसी व्यक्ति को व्यक्तिगत डेटा के निरंतर प्रकटीकरण को प्रतिबंधित करने या रोकने का अधिकार होगा।

किसी व्यक्ति से संबंधित डेटा के प्रकटीकरण की आवश्यकता न रह गई हो या डेटा के उपयोग करने की सहमति वापस ले ली गई हो तब ऐसी स्थितियों मे भूल जाने का अधिकार लागू होगा।

  • न्यायिक दृष्टिकोण : भारत में कई ऐसे उदाहरण हैं, जहाँ न्यायालयों ने किसी व्यक्ति के भूल जाने के अधिकार को बरकरार रखा है।
    • कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक महिला के अधिकार को यह कहते हुए भुला दिया कि यह अधिकार पश्चिमी देशों की प्रवृत्ति के अनुरूप है। महिलाओं से जुड़े सामान्य और अति संवेदनशील मामले जो संबंधित व्यक्ति की शालीनता तथा प्रतिष्ठा को प्रभावित करते है, में भूल जाने के अधिकार का पालन किया जाना चाहिये।
    • इसी प्रकार एक अन्य मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्र और गूगल से पूछा था कि क्या निजता के अधिकार में इंटरनेट से अप्रासंगिक सूचनाओं को हटाने का अधिकार शामिल है?

आगे की राह

  • व्यक्तिगत डेटा की गोपनीयता और सुरक्षा का अधिकार (भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत) तथा इंटरनेट उपयोगकर्त्ताओं की जानकारी की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19 के तहत) के बीच एक संतुलन होना चाहिये।
  • एक ऐसा व्यापक डेटा संरक्षण कानून होना चाहिये जो इन मुद्दों की व्याख्या कर सके और दो ऐसे मौलिक अधिकारों के बीच के विवाद को कम करे जो भारतीय संविधान के महत्त्वपूर्ण हिस्से स्वर्णिम त्रिमूर्ति कला (GoldenTrinity- Art14,19 और 21) से बने हैं।

स्रोत: द हिंदू