पुरंदर दास: कर्नाटक संगीत के पिता | 27 May 2020

प्रीलिम्स के लिये:

पुरंदर दास, कर्नाटक संगीत, हिंदुस्तानी संगीत 

मेन्स के लिये:

भारतीय शास्त्रीय संगीत का ऐतिहासिक संबंध 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में ‘पुरातत्व, विरासत एवं संग्रहालय विभाग’ (Department of Archeology,Heritage and Museum) ने कर्नाटक के तीर्थहल्ली (Thirthahalli) तालुका के अरगा ग्राम पंचायत के केशवपुरा में अनुसंधान कार्य शुरू करने का निर्णय लिया।

  • इस शोध का उद्देश्य पुरंदर दास के जन्मस्थान के बारे में स्पष्ट पुरातात्त्विक साक्ष्य का पता लगाना है। जिन्हें ‘कर्नाटक संगीत के पिता’ के रूप में सम्मानित किया गया था।

प्रमुख बिंदु:

  • पुरंदर दास के जन्मस्थान से संबंधित रहस्य को सुलझाने के लिये राज्य सरकार ने कन्नड़ विश्वविद्यालय, हम्पी को एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया था।
  • इस समिति में आर.के. पद्मनाभ (संगीत विशेषज्ञ), लीलादेवी आर. प्रसाद (कन्नड़ एवं संस्कृति के पूर्व मंत्री), कन्नड़ भक्ति साहित्य के विशेषज्ञ ए. वी. नवादा, वीरन्ना राजूरा, अरालूमाल्लिगे पार्थसारथी और शिवानंद विरक्थमत्त को नामित किया गया था। 
  • इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में इस मुद्दे (पुरंदर दास के जन्मस्थान से संबंधित) पर और शोध करने की सिफारिश की थी।

पुरंदर दास (Purandara Dasa):

  • पुरंदर दास को कर्नाटक संगीत के पिता के रूप में सम्मानित किया गया था। कर्नाटक संगीत में उनके महत्त्वपूर्ण योगदान के सम्मान में उन्हें व्यापक रूप से ‘संगीत पितामह’ के रूप में जाना जाता है।
  • वे भगवान कृष्ण के महान भक्त, वैष्णव कवि, संत एवं समाज सुधारक थे।
  • वह द्वैत दार्शनिक संत व्यासतीर्थ के शिष्य थे और कनकदास के समकालीन थे। उनके गुरु व्यासतीर्थ ने एक गीत: दसरेंदर पुरंदर दारासराय, में पुरंदर दास की महिमा का बखान किया है।
    • कनकदास (1509-1609) कर्नाटक संगीत के प्रसिद्ध संगीतकार, कवि, दार्शनिक और संत थे। उन्हें कर्नाटक संगीत के लिये कन्नड़ भाषा में रचित रचनाएँ ‘कीर्तनास’ (Keertanas) और ‘ऊगाभोग’ (Ugabhoga) के लिये जाना जाता है।
  • वह एक संगीतकार, गायक और दक्षिण भारतीय शास्त्रीय संगीत (कर्नाटक संगीत) के मुख्य संस्थापकों में से एक थे।
  • हरिदास परंपरा (भगवान हरि या भगवान कृष्ण का सेवक) की शुरुआत करने से पहले पुरंदर दास एक अमीर व्यापारी थे और उन्हें ‘श्रीनिवास नायक’ कहा जाता था।
  • इतिहासकार बताते हैं कि पुरंदर दास का जन्म मलनाड में हुआ था और उनको मिली 'नायक' की उपाधि का श्रेय विजयनगर साम्राज्य को जाता है क्योंकि विजयनगर शासन के दौरान ‘नायक’ की उपाधि मलनाड के धनी व्यापारियों सहित स्थानीय प्रभावशाली लोगों को दी गई थी।

जन्मस्थान से संबंधित मुद्दा:

  • जैसा कि 'पुरंदरा विट्ठला' उनकी रचनाओं का नाम था जिसके कारण यह व्यापक रूप से माना जाता था कि इस रहस्यवादी कवि का जन्म महाराष्ट्र के पुरंदरगढ़ में हुआ था।
  • हालाँकि मलनाड में कई लोगों ने दावा किया कि वह इस क्षेत्र (मलनाड) से हैं।
  • इतिहासकारों के अनुसार, विजयनगर शासन के दौरान मलनाड में अरगा एक मुख्य व्यावसायिक केंद्र था जिसका संबंध कवि पुरंदर दास से था।
    • केशवपुरा के आसपास के क्षेत्रों के नामों (वर्थेपुरा, विट्ठलनागुंडी, दसानागड्डे) का उल्लेख करते हुए यह तर्क दिया गया था कि ये स्थान वैष्णव परंपरा से प्रभावित व्यापारी समुदाय से संबंधित था।
    • पुरंदर दास की रचनाओं में प्रयोग किये गए कई शब्दों का उपयोग मलनाडवासी अपने उस समय के दैनिक जीवन में करते थे।
  • पुरंदर दास के जन्मस्थान के बारे में रहस्य को सुलझाने के लिये कर्नाटक सरकार ने कन्नड़ विश्वविद्यालय, हम्पी को एक विशेषज्ञ समिति बनाने का निर्देश दिया था।

कर्नाटक संगीत:

  • कर्नाटक संगीत शास्त्रीय संगीत की दक्षिण भारतीय शैली है। यह संगीत अधिकांशतः भक्ति संगीत के रूप में होता है और इसके अंतर्गत अधिकतर रचनाएँ हिन्दू देवी-देवताओं को संबोधित होती हैं। तमिल भाषा में कर्नाटक का आशय प्राचीन, पारंपरिक और शुद्ध से है। कर्नाटक संगीत की मुख्य विधाएँ निम्नलिखित हैं- 
  • अलंकारम- सप्तक के स्वरों की स्वरावलियों को अलंकारम कहते हैं। इनका प्रयोग संगीत अभ्यास के लिये किया जाता है। 
  • लक्षणगीतम्- यह गीत का एक प्रकार है जिसमें राग का शास्त्रीय वर्णन किया जाता है। पुरंदरदास के लक्षणगीत कर्नाटक में गाए जाते हैं। 
  • स्वराजाति- यह प्रारंभिक संगीत शिक्षण का अंग है। इसमें केवल स्वरों को ताल तथा राग में बाँटा जाता है। इसमें गीत अथवा कविता नहीं होते हैं।
  • आलापनम्- आकार में स्वरों का उच्चारण आलापनम् कहलाता है। इसमें कृति का स्वरूप व्यक्त होता है। इसके साथ ताल-वाद्य का प्रयोग नहीं किया जाता है।
  • कलाकृति, पल्लवी- कलाकृति में गायक को अपनी प्रतिभा दिखाने का पूर्ण अवसर मिलता है। द्रुत कलाकृति और मध्यम कलाकृति इसके दो प्रकार हैं। पल्लवी में गायक को राग और ताल चुनने की छूट होती है। 
  • तिल्लाना- तिल्लाना में निरर्थक शब्दों का प्रयोग होता है। इसमें लय की प्रधानता होती है। इसमें प्रयुक्त निरर्थक शब्दों को ‘चोल्लुक्केट्टू’ कहते हैं।
  • पद्म, जवाली- ये गायन शैलियाँ उत्तर भारतीय संगीत की विधाएँ- ठुमरी, टप्पा, गीत आदि से मिलती-जुलती हैं। ये शैलियाँ सुगम संगीत के अंतर्गत आती हैं। इन्हें मध्य लय में गाया जाता है। पद्म श्रृंगार प्रधान तथा जवाली अलंकार व चमत्कार प्रधान होती है। 
  • भजनम्- यह गायन शैली भक्ति भावना से परिपूर्ण होती है। इसमें जयदेव और त्यागराज आदि संत कवियों की पदावलियाँ गाई जाती हैं। 
  • रागमालिका- इसमें रागों के नामों की कवितावली होती है। जहाँ-जहाँ जिस राग का नाम आता है, वहाँ उसी राग के स्वरों का प्रयोग होता है, जिससे रागों की एक माला सी बन जाती है।

हिंदुस्तानी और कर्नाटक संगीत:

  • भारतीय संगीत के विकास के दौरान हिंदुस्तानी और कर्नाटक संगीत के रूप में दो अलग-अलग उप-प्रणालियों का उदय हुआ।
  • ये दोनों शब्द पहली बार हरिपाल की ‘संगीता सुधाकर’ (Sangeeta Sudhakara) में उभरे जो 14वीं शताब्दी में लिखी गई थी।

समानताएँ:

  • दोनों ही शैलियों में शुद्ध तथा विकृत कुल 12 स्वर लगते हैं। दोनों शैलियों में शुद्ध तथा विकृत स्वरों से थाट या मेल की उत्पत्ति होती है। 
  • जन्य-जनक का सिद्धांत दोनों ही स्वीकार करते हैं। दोनों ने संगीत में सुर-ताल के महत्त्व को स्वीकार किया है। 
  • दोनों के गायन में अलाप तथा तान का प्रयोग होता है। 

विषमताएँ:

  • कर्नाटक संगीत समरूप भारतीय परंपरा का जबकि हिंदुस्तानी संगीत एक विषम भारतीय परंपरा का प्रतिनिधित्त्व करता है।
  • हिंदुस्तानी संगीत में लखनऊ, जयपुर, किराना, आगरा आदि जैसे विभिन्न घराने हैं वहीं कर्नाटक संगीत में इस तरह के घराने नहीं मिलते हैं।

स्रोत: द हिंदू