डेली अपडेट्स

न्यायपालिका की स्वतंत्रता का सिद्धांत | 27 Feb 2020 | भारतीय राजनीति

प्रीलिम्स के लिये:

अंतर्राष्ट्रीय न्यायिक सम्मेलन 2020, एस.पी. गुप्ता बनाम भारत संघ 1981, वर्ष 1993 का द्वितीय न्यायाधीश केस, न्यायिक चार्टर

मेन्स के लिये:

न्यायपालिका की स्वतंत्रता

चर्चा में क्यों?

हाल ही में उच्चतम न्यायालय के एक न्यायाधीश ने अंतर्राष्ट्रीय न्यायिक सम्मेलन 2020 (International Judicial Conference 2020) में भारत के प्रधानमंत्री की प्रशंसा की वहीं हाल ही में प्रधानमंत्री ने भी उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गए कुछ ‘महत्वपूर्ण निर्णयों’ का हवाला देते हुए उच्चतम न्यायालय की सराहना की थी। इससे न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच बढ़ती घनिष्ठता से संवैधानिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

मुख्य बिंदु:

न्यायपालिका की स्वतंत्रता

(Independence of The Judiciary):

एस.पी. गुप्ता बनाम भारत संघ 1981

(S.P. Gupta vs Union Of India 1981)

विधि का शासन (Rule of law):

सामाजिक न्याय (Social Justice):

वर्ष 1993 का द्वितीय न्यायाधीश केस

(The Second Judges Case of 1993):

आचरण का मानक

(Standard of conduct):

फ्रांसिस बेकन ने न्यायाधीशों के बारे में कहा है कि “न्यायाधीशों को मज़ाकिया से अधिक प्रबुद्ध, प्रशंसनीय से अधिक श्रद्धेय और आत्मविश्वास से अधिक विचारपूर्ण होना चाहिये। सभी चीजों के ऊपर सत्यनिष्ठा उनकी औषधि एवं मुख्य गुण है। मूल्यों में संतुलन, बार कौंसिल और न्यायिक खंडपीठ के बीच श्रद्धा, स्वतंत्र न्यायिक प्रणाली की बुनियाद है।”

न्यायिक चार्टर (Judicial Charter):

न्यायिक जवाबदेही

(Judicial Accountability):

न्यायिक नैतिकता (Judicial Ethics):

24 मई, 1949 को संविधान सभा में बहस के दौरान के. टी. शाह का वक्तव्य:

आगे की राह:

स्रोत: द हिंदू