पूर्वोत्तर राज्यों में परिसीमन प्रक्रिया में नई बाधाएँ | 18 Jul 2020

प्रीलिम्स के लिये:

परिसीमन आयोग, चुनाव आयोग

मेन्स के लिये:

परिसीमन और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम से संबंधित प्रश्न 

चर्चा में क्यों? 

हाल ही में चुनाव आयोग से जुड़े एक पूर्व कानूनी सलाहकार ने पूर्वोत्तर के चार राज्यों- अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, असम और नगालैंड के लिये परिसीमन आयोग गठित किये जाने के केंद्र सरकार के निर्णय को असंवैधानिक और अवैध बताया है।

प्रमुख बिंदु:

  • गौरतलब है कि देश में पिछले परिसीमन (वर्ष 2002-08) के दौरान पूर्वोत्तर के इन चार राज्यों को परिसीमन की प्रक्रिया से बाहर रखा गया था।
  • मार्च, 2020 में केंद्र सरकार द्वारा पूर्वोत्तर के चार राज्यों और जम्मू-कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश में लोकसभा और विधानसभा सीटों के निर्धारण के लिये परिसीमन आयोग की स्थापना की गई थी।
  • उच्चतम न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई को इस आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। 
  • चुनाव आयोग के पूर्व कानूनी सलाहकार के अनुसार, ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950’ (Public Representation Act, 1950) की धारा 8A में स्पष्ट किया गया है कि पूर्वोत्तर के चार राज्यों (अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर या नागालैंड) में परिसीमन की प्रक्रिया चुनाव आयोग द्वारा संचालित की जाएगी।
  • अतः परिसीमन आयोग द्वारा इन चार राज्यों में परिसीमन की प्रक्रिया न्यायालय में अमान्य घोषित कर दी जाएगी, जिससे भारी सार्वजनिक धन की बर्बादी होगी। 

परिसीमन प्रक्रिया से बाहर रखने का कारण?

  • पिछली परिसीमन प्रक्रिया (2002-08) के दौरान अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर और नागालैंड के कई संगठनों ने परिसीमन प्रक्रिया के दौरान वर्ष 2001 की जनगणना को आधार के रूप में प्रयोग किये जाने को गुवाहाटी उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी।
  • असम से एक सर्वदलीय प्रतिनिधि मंडल ने तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री से मिलकर परिसीमन की प्रक्रिया को स्थगित करने की मांग की, क्योंकि उस समय तक ‘राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर’ (National Register of Citizens - NRC) के आँकड़ों को अद्यतन/अपडेट नहीं किया गया था।

परिसीमन अधिनियम, 2002 में संशोधन: 

  • 14 जनवरी, 2008 को ‘परिसीमन अधिनियम, 2002’ में संशोधन करते हुए राष्ट्रपति को इन राज्यों में परिसीमन विलंबित करने की शक्ति प्रदान की गई।   
  • 8 फरवरी, 2008 राष्ट्रपति द्वारा इन चार राज्यों में परिसीमन स्थगित करने का आदेश जारी किया गया।
  • इसके पश्चात संसद द्वारा इन चार राज्यों में परिसीमन के लिये अलग आयोग की स्थापना करने के स्थान पर चुनाव आयोग (Election commission) के माध्यम से परिसीमन प्रक्रिया को पूरा करने का निर्णय लिया गया। 

  • इस विचार को वैधानिक मान्यता देने के लिये ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950’ में ‘धारा-8A’ को जोड़ दिया गया।  

    • संसद का यह फैसला इस तथ्य से प्रेरित था कि पूर्व में भी निर्वाचन आयोग को  निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं के निर्धारण का अधिकार दिया गया था।  

    • उदाहरण के लिये- वर्ष 1991-92 में दिल्ली में 70 विधानसभा सीटों का परिसीमन और वर्ष 2000 में उत्तराखंड में 70 विधानसभा सीटों का परिसीमन।  

निर्वाचन सीटों की संख्या पर परिसीमन का प्रभाव:   

  • वर्ष 2002 में संविधान के 84वें संशोधन के माध्यम से परिसीमन के तहत वर्ष 2026 तक किसी भी राज्य में लोकसभा और विधान सभा निर्वाचन सीटों की संख्या में परिवर्तन किये जाने पर रोक लगा दी गई थी। 
  • वस्तुतः परिसीमन के पश्चात भी पूर्वोत्तर के चार राज्यों में निर्वाचन सीटों की संख्या में कोई बदलाव नहीं होगा। 
  • प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया के तहत राज्यों में सिर्फ निर्वाचन सीटों की सीमाओं और संबंधित राज्य में अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति की आरक्षित सीटों को पुनः निर्धारित किया जा सकता है।

परिसीमन (Delimitation): 

  • परिसीमन से तात्पर्य किसी राज्य में समय के साथ जनसंख्या में हुए बदलाव के अनुरूप  विधानसभा और लोकसभा चुनावों के लिये निर्वाचन क्षेत्र की सीमाओं का निर्धारण करना है।

उद्देश्य:  

  • परिसीमन का मुख्य उद्देश्य जनसंख्या के समान खंडों को समान प्रतिनिधित्व प्रदान करना है।
  • अनुसूचित वर्ग के लोगों के हितों की रक्षा के लिये आरक्षित सीटों का निर्धारण भी परिसीमन की प्रक्रिया के तहत ही किया जाता है।
  • परिसीमन की प्रक्रिया में नवीनतम जनगणना के आँकड़ों का प्रयोग किया जाता है। 

परिसीमन आयोग (Delimitation Commission):

  • परिसीमन आयोग को सीमा आयोग (Boundary Commission) के नाम से भी जाना जाता है। 
  • प्रत्येक जनगणना के बाद भारत की संसद द्वारा संविधान के अनुच्छेद-82 के तहत एक परिसीमन अधिनियम लागू किया जाता है। 
  • परिसीमन अधिनियम के लागू होने के बाद केंद्र सरकार  द्वारा परिसीमन आयोग की नियुक्ति की जाती है और यह संस्था/निकाय निर्वाचन आयोग के साथ मिलकर काम करती है।

परिसीमन आयोग की संरचना: 

  • सामन्यतः परिसीमन आयोग की अध्यक्षता सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश द्वारा की जाती है।
  • इसके साथ ही इस आयोग में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और संबंधित राज्य के निर्वाचन आयुक्त भी शामिल होते हैं।

कार्य: 

  • जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या और सीमाओं का निर्धारण करना।
  • अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति समुदायों के लोगों की संख्या के आधार पर आरक्षित सीटों का निर्धारण किया जाता है। 
    • देश की स्वतंत्रता के पश्चात पहली बार परिसीमन की प्रक्रिया वर्ष 1950-51 में निर्वाचन आयोग के सहयोग से राष्ट्रपति द्वारा संपन्न कराई गई थी। 
    • वर्ष 1952 में परिसीमन अधिनियम के लागू होने के बाद वर्ष 1952, 1963, 1973 और 2002 में परिसीमन आयोग के द्वारा देश में परिसीमन की प्रक्रिया पूरी की गई।
    • वर्ष 1981 और वर्ष 1991 की जनगणना के बाद परिसीमन नहीं किया गया।   

स्रोत:  द इंडियन एक्सप्रेस