हिरासत में होने वाली मौतों पर सख्त कदम उठाने की आवश्यकता | 17 Apr 2024

प्रिलिम्स के लिये:

हिरासत में यातना, मानवाधिकार, हिरासत में मौत, अनुच्छेद 21, IPC, CrPC

मेन्स के लिये:

हिरासत में यातना और हिरासत में मौत, पुलिस व्यवस्था में सुधार, प्रौद्योगिकी और पूछताछ, हिरासत में मौत से बचने के उपाय

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस 

चर्चा में क्यों?

सर्वोच्च न्यायालय ने हिरासत में मौत के मामलों में आरोपित पुलिस अधिकारियों की ज़मानत याचिकाओं पर विचार करते समय "अधिक कठोर दृष्टिकोण" अपनाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है।

हिरासत में मौत क्या है?

  • परिचय:
    • हिरासत में मृत्यु ऐसी मृत्यु को संदर्भित करती है, जो उस समय होती है जब कोई व्यक्ति विधि प्रवर्तन अधिकारियों की अभिरक्षा में होता है। यह विभिन्न कारणों से हो सकता है, जैसे कि अत्यधिक बलप्रयोग, उपेक्षा या अधिकारियों द्वारा दुर्व्यवहार
    • भारत के विधि आयोग के अनुसार, गिरफ्तार किये गए या हिरासत में रखे गए व्यक्ति के विरुद्ध एक लोक सेवक द्वारा किया गया अपराध हिरासत में यातना के समान है।
  • हिरासत में मौत के प्रकार:
    • पुलिस हिरासत में मृत्यु: पुलिस हिरासत में मृत्यु अत्यधिक बल, यातना, चिकित्सा देखभाल से इनकार, या अन्य प्रकार के दुर्व्यवहार या आकस्मिक कारण से हो सकती है।
    • न्यायिक हिरासत में मृत्यु: न्यायिक हिरासत में मृत्यु भीड़भाड़, चिकित्सा सुविधाओं की कमी, कैदी की हिंसा या आत्महत्या के कारण हो सकती है।
    • सेना या अर्द्धसैनिक बलों की हिरासत में मृत्यु: यह यातना या न्यायेत्तर हत्याओं के माध्यम से हो सकती है।

पुलिस हिरासत और न्यायिक हिरासत:

पहलू

पुलिस हिरासत

न्यायिक हिरासत

हिरासत का स्थान

किसी पुलिस स्टेशन के हवालात या किसी जाँच एजेंसी के पास

मजिस्ट्रेट की हिरासत में जेल 

न्यायालय के समक्ष उपस्थिति

24 घंटे के भीतर संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष

जब तक न्यायालय से ज़मानत का आदेश नहीं आ जाता

प्रारंभ

शिकायत मिलने या FIR दर्ज करने के बाद किसी पुलिस अधिकारी द्वारा गिरफ्तारी के समय

सरकारी वकील द्वारा न्यायालय को संतुष्ट करने के बाद जाँच के लिये आरोपी की हिरासत आवश्यक है।

अधिकतम अवधि

24 घंटे (उपयुक्त मजिस्ट्रेट द्वारा 15 दिनों तक बढ़ाया जा सकता है)

आजीवन कारावास, मृत्यु या कम से कम दस वर्ष के कारावास से दंडनीय अपराधों के लिये 90 दिन; अन्य अपराधों के लिये 60 दिन

Custodial_deaths_status

हिरासत में होने वाली मौतों पर रोक लगाना क्यों आवश्यक है?

  • यह विधि द्वारा उचित व्यवहार किये जाने के व्यक्तियों के मूल अधिकार के विरुद्ध है।
  • भारत संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन अगेंस्ट टॉर्चर (UNCAT) का एक हस्ताक्षरकर्त्ता है, जो न्यायिक और पुलिस हिरासत में लोगों के साथ अमानवीय व्यवहार पर नियंत्रण लगाता है।
  • हिरासत में यातना को रोकने के लिये सख्त नियमों के अभाव में, भारत को विजय माल्या जैसे लंबित न्यायिक कार्यवाही से बचने हेतु दूसरे देशों में शरण लेने वाले व्यक्तियों के प्रत्यर्पण में चुनौतियों का सामना भी करना पड़ता है।
    • आर्थिक अपराधी प्रायः अपने प्रत्यर्पण मामलों में भारत में हिरासत में यातना पर नियमों में लचीलेपन का हवाला देते हैं।
  • हिरासत में यातना, हिरासत में लिये गए व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य को हानि पहुँचा सकती है क्योंकि पुलिस उनकी भावनाओं की परवाह नहीं करती है, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें क्रूर व्यवहार, यौन शोषण जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है साथ ही समाज उनसे घृणा करने लगता है। उदाहरण: वर्ष 1972 में मथुरा में हिरासत में बलात्कार का मामला।

हिरासत में मौत से संबंधित संवैधानिक और विधिक ढाँचा क्या है?

  • संवैधानिक प्रावधान:
    • भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों को सुनिश्चित करता है, जिसमें यातना व अन्य क्रूर, अमानवीय या अपमानजनक उपचार या सज़ा से मुक्त होने का अधिकार शामिल है।
    • अनुच्छेद 20 किसी आरोपी व्यक्ति को मनमानी और अत्यधिक सज़ा के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करता है, चाहे वह नागरिक हो या विदेशी या कंपनी या निगम के समान विधिक इकाई हो। इसके अंतर्गत तीन प्रावधान शामिल हैं:
      • जिनमें अपराधों के लिये दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण:- (अनुच्छेद 20(1), दोहरे दंड से सुरक्षा:- अनुच्छेद 20(2) और आत्म-अपराध के विरुद्ध सुरक्षा:- अनुच्छेद 20(3) से संबंधित प्रावधान शामिल हैं।
      • इसके अतिरिक्त, सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य मामले में न्यायालय ने कहा कि राज्य किसी भी व्यक्ति की सहमति के बिना उसका नार्को-विश्लेषण, पॉलीग्राफ और ब्रेन-मैपिंग परीक्षण नहीं कर सकता है।
  • विधिक सुरक्षा:
    • भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 24 में यह प्रावधान है, कि जाँच एजेंसियों की धमकी के आगे झुककर आरोपी द्वारा की गई सभी स्वीकारोक्ति न्यायालय में स्वीकार्य नहीं होगी।
      • यह धारा मुख्य रूप से आरोपी को उसकी इच्छा के विरुद्ध बल प्रयोग के कारण बयान देने से रोकने का कार्य करती है।
    • भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 330 और 331, किसी भी व्यक्ति से अपराध स्वीकारोक्ति या सूचना प्राप्त करने के लिये स्वेच्छा से चोट या गंभीर चोट पहुँचाना अपराध मानती है।
    • सुरक्षा उपायों को शामिल करने के लिये वर्ष 2009 में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 41 में संशोधन किया गया था, जिसमें:
      • पूछताछ के लिये गिरफ्तारियों और हिरासत में लेने के लिये उचित आधार एवं दस्तावेज़ी प्रक्रियाओं को निर्धारित किया गया।
      • गिरफ्तारियों को परिवार, दोस्तों और जनता के लिये पारदर्शी बनाया जाता है तथा विधिक प्रतिनिधित्व के माध्यम से सुरक्षा प्रदान की जाती है।

हिरासत में यातना के विरुद्ध अंतर्राष्ट्रीय अभिसमय क्या हैं?

  • अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार विधि, 1948:
    • अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार विधि में एक प्रावधान है जो लोगों को यातना और अन्य बलपूर्वक कार्यवाहियों से संरक्षित करता है।
  • संयुक्त राष्ट्र चार्टर, 1945:
  • नेल्सन मंडेला नियम, 2015:
    • नेल्सन मंडेला नियमों को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा वर्ष 2015 में कैदियों के साथ अंतर्निहित गरिमा के साथ व्यवहार करने एवं यातना तथा अन्य दुर्व्यवहार पर रोक लगाने के लिये अपनाया गया था।
  • यातना के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCAT): 
    • यह संयुक्त राष्ट्र की एक अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संधि है जिसका उद्देश्य विश्वभर में यातना और क्रूर, अमानवीय, या अपमानजनक कृत्य या सज़ा के अन्य कृत्यों को रोकना है।

हिरासत में यातना से निपटने के लिये उपाय:

  • कानूनी प्रणालियों को सुदृढ़ बनाना:
    • सर्वोच्च न्यायालय के प्रकाश सिंह मामला, 2006 के आदेशों के समान व्यापक कानून स्थापित करना, जो विशेष रूप से हिरासत में यातना को अवैध बनाता है।
      • सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस व्यवस्था में बेहतर सुधार हेतु जाँच और कानून व्यवस्था के कार्यों को पृथक करने, राज्य सुरक्षा आयोग (SSC) की स्थापना करने का निर्देश दिया, जिसमें सिविल सोसाइटी के सदस्य होंगे तथा एक राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग का गठन किया जाएगा।
    • हिरासत में यातना के आरोपों की त्वरित और निष्पक्ष जाँच सुनिश्चित करना।
    • निष्पक्ष और शीघ्र सुनवाई के माध्यम से अपराधियों को जवाबदेह बनाना।
  • पुलिस सुधार और संवेदनशीलता:
    • मानवाधिकारों और गरिमा के सम्मान पर ज़ोर देने हेतु पुलिस प्रशिक्षण कार्यक्रमों को बढ़ाना।
    • कानून प्रवर्तन एजेंसियों के भीतर जवाबदेही, व्यावसायिकता और सहानुभूति की संस्कृति को बढ़ावा देना।
    • हिरासत में यातना के मामलों की प्रभावी ढंग से निगरानी और समाधान करने के लिये निरीक्षण व्यवस्था (oversight mechanism) की स्थापना करना।
  • नागरिक समाज और मानवाधिकार संगठनों को सशक्त बनाना:
    • हिरासत में यातना के पीड़ितों की सक्रिय रूप से समर्थन करने के लिये नागरिक समाज संगठनों को प्रोत्साहित करना।
    • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) को कथित मानवाधिकार उल्लंघन की तारीख से एक वर्ष के बाद भी किसी मामले की जाँच करने की अनुमति दी जानी चाहिये।
      • सशस्त्र बलों द्वारा मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामलों में उचित उपायों के साथ इसके अधिकार क्षेत्र का विस्तार किया जाना चाहिये।
    • पीड़ितों व उनके परिवारों को सहायता और कानूनी सहायता प्रदान करना।
    • निवारण और न्याय पाने हेतु अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार निकायों एवं संगठनों के साथ सहयोग करना।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  

मेन्स:

प्रश्न.1 मृत्यु दंडादेशों के लघुकरण में राष्ट्रपति के विलंब के उदाहरण न्याय प्राख्यान (डिनायल) के रूप में लोक वाद-विवाद के अधीन आए हैं। क्या राष्ट्रपति द्वारा ऐसी याचिकाओं को स्वीकार करने/अस्वीकार करने के लिये एक समय-सीमा का विशेष रूप से उल्लेख किया जाना चाहिये? विश्लेषण कीजिये। (2014)

प्रश्न.2 भारत में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (NHRC) सर्वाधिक प्रभावी तभी हो सकता है, जब इसके कार्यों को

सरकार की जवाबदेही को सुनिश्चित करने वाले अन्य यांत्रिकत्वों (मकैनिज़्म) का पर्याप्त समर्थन प्राप्त हो। उपरोक्त टिप्पणी के प्रकाश में, मानव अधिकार मानकों की प्रोन्नति करने और उनकी रक्षा करने में, न्यायपालिका और अन्य संस्थाओं के प्रभावी पूरक के तौर पर, एन.एच.आर.सी. की भूमिका का आकलन कीजिये। (2014)